विपुल शर्मा भाग 1: बुआ का एलान बिल्लूपुर की सुबहें आमतौर पर कबूतरों की गुटरगूँ, चाय की पहली चुस्की, और दूधवाले की साइकिल की घंटी से शुरू होती थीं। लेकिन उस दिन की सुबह कुछ अलग थी। गाँव के मंदिर के सामने चौपाल में, नीम के नीचे बैठी कांता बुआ ने एक ज़ोरदार चाय की चुस्की लेकर जैसे ही गिलास रखा, वैसे ही उनकी आवाज़ पूरे गाँव में गूँज गई— “इस साल हम कन्याकुंभ में जाएँगे!” चारों तरफ सन्नाटा। गुड्डू, जो बुआ का भतीजा और स्थानीय सरकारी दफ्तर में बाबू था, अपने अख़बार के पीछे छिपते हुए बड़बड़ाया— “लो! फिर…
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अदिति राठी भाग 1: मुलाक़ात पन्ना की सर्दी में धूप एक वरदान जैसी लगती थी। स्कूल की छत पर बिछी टाट की चटाइयों पर बच्चे बैठकर चित्र बना रहे थे—सूरज, पेड़, झोपड़ी, और किसी कोने में एक मंदिर की घंटियां। रेवती चौहान बीच में खड़ी, बच्चों की तस्वीरों पर झुकती, तारीफ़ करती और कभी-कभी पेंसिल हाथ में लेकर कोई रेखा ठीक कर देती। उसकी चुन्नी कंधे से खिसकती रहती थी, और वो बार-बार उसे एक ही अंदाज़ में पीछे सरका देती थी। जैसे उसकी ज़िंदगी में सब कुछ इसी दोहराव के भीतर समाहित था—शांत, व्यवस्थित, और बंधा हुआ। उसी दोपहर,…
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दिल्ली के शाहपुर जाट इलाके की पतली गलियों में, एक पुरानी इमारत की तीसरी मंज़िल पर अवनि शर्मा ने हाल ही में किराए पर एक फ्लैट लिया था। मकान मालिक ने कहा था, “थोड़ा पुराना है, मगर शांत इलाका है।” अवनि को यही चाहिए था—शांति। एकाकी ज़िंदगी, कॉफी मग में भाप लेती शामें, लैपटॉप पर काम और दीवार पर टँगी किताबों की अलमारियाँ। वह एक डिजिटल मीडिया एडिटर थी और ज़्यादातर वक़्त घर से ही काम करती थी। फ्लैट छोटा था लेकिन खुला-खुला, जिसकी बालकनी से हौज खास के पुराने गुंबद दिखाई देते थे। मगर पहले ही दिन जब वह…
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रौशन त्रिपाठी १ दोपहर का सूरज जयपुर की हवेलीनुमा गलियों को चटक सोने से भर रहा था। बाहर की दुनिया में चहल-पहल थी, लेकिन एक आलीशान अपार्टमेंट के अंदर, नैना वर्धन की आँखों में एक अलग ही हलचल थी। उसके लंबे भूरे बालों में हल्की लहर थी, आँखों में हल्का काजल, और होंठों पर वह मुस्कान — जो करोड़ों लोग स्क्रीन पर देखते थे। उसने ट्राइपॉड पर मोबाइल सेट किया, रिंग लाइट ऑन की, और कुछ देर तक खुद को स्क्रीन में देखा। वो जानती थी कि कैमरा चालू होते ही उसका किरदार चालू हो जाएगा — खुश, निडर, आत्मविश्वासी।…
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विराज जोशी १ ऋत्विक घोषाल एक ऐसे लेखक थे जिनकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि पुराने समय की छवियाँ तैरती थीं। दिल्ली के करोल बाग के एक पुराने अपार्टमेंट की चौथी मंज़िल पर उनका छोटा सा कमरा था—दीवारें जर्जर, खिड़की से झांकती धूल, और हर कोने में बिखरे किताबों के ढेर जिनमें से ज़्यादातर रेडियो ड्रामा, पुरानी कहानियाँ और भारतीय ऑडियो आर्काइव्स पर केंद्रित थे। पिछले छह महीने से वह एक किताब पर काम कर रहे थे, जिसका विषय था: “बुलंद आवाज़ें – भारतीय रेडियो नाटकों का इतिहास”, लेकिन लेखन अब थकान बन चुका था। उसी थकान से उबरने के…
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शैलेश पटनायक १ बिहार के सुपौल जिले के पूर्वी छोर पर बसा था कंचनपुर गांव — खेतों और तालाबों के बीच झूमता हुआ एक शांत पर रहस्यमय संसार। दोपहर की गर्मी ढल रही थी जब नीलोत्पल मिश्रा और उसकी नवविवाहिता पत्नी संध्या, गांव की कच्ची सड़कों से गुजरते हुए अपने पुश्तैनी मकान के सामने पहुंचे। पुराने समय की लाली पुती दीवारें, टीन की छत और आंगन में खड़े आम और नीम के पेड़ गांव के परिवेश की आत्मा को जीवंत बनाए हुए थे। संध्या ने पहली बार इस मिट्टी की गंध को महसूस किया — नम, सोंधी, और किसी अनजाने…
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संजीव रावत १ गढ़वाल की घाटियों में शाम जल्दी उतरती है। सूरज के ढलते ही पहाड़ियों की परछाइयाँ लंबी होकर पूरी घाटी को निगल जाती हैं। नीरज रावत, अपने कंधों पर भारी बैकपैक लटकाए, एक संकरी बर्फ़ीली पगडंडी पर बढ़ रहा था। उसका मफलर बर्फ की सफ़ेद चादर में भीग चुका था और सांसें अब स्टीम की तरह बाहर निकल रही थीं। GPS सिग्नल कब का गायब हो चुका था और मोबाइल अब केवल टाइम दिखाने की मशीन बनकर रह गया था। वह अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हाथ सुन्न पड़ने लगे थे।…
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अनिरुद्ध राजन मिश्रा वाराणसी की तंग गलियों में वो रात कुछ ज्यादा ही खामोश थी, जैसे कोई बड़ा तूफान पहले ही सब उजाड़ चुका हो। इंस्पेक्टर अयान शुक्ला की जीप जब कोतवाली इलाके की उस मोड़ पर पहुँची, तो चारों तरफ भीड़ जमा हो चुकी थी। लाल-नीली बत्तियों की चमक पुलिस की असहज उपस्थिति दर्ज करा रही थी, लेकिन वहां खड़ा हर शख्स जानता था — ये कोई आम मर्डर नहीं। “कौन है?” अयान ने उतरते ही पूछा। “साहब… एक औरत है,” कॉन्स्टेबल दुबे ने सिर झुकाते हुए जवाब दिया, “किसी ने सिर पर वार किया है, मौके पर ही…
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दिव्या कपूर १ बैंगलोर की हल्की बारिश वाली उस सुबह रीमा सेन ने एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में एक भारी बैग थामे ऑटो से उतरते ही चैन की सांस ली। कोलकाता से आए हुए उसे कुछ ही दिन हुए थे, लेकिन इस शहर की सड़कों और ट्रैफिक ने पहले ही उसे बता दिया था कि यहां की ज़िंदगी कितनी तेज़ है। वो एक नई नौकरी की शुरुआत करने जा रही थी – एक ग्राफिक डिज़ाइन स्टार्टअप में, जहाँ उसकी क्रिएटिविटी को पहली बार सही मायने में पहचान मिलने वाली थी। लेकिन सबसे बड़ी चिंता थी – रहने…
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आरोही वर्मा वो जुलाई की पहली बारिश थी। दिल्ली की सड़कों पर धूल धुल रही थी और आसमान के हर कोने से बूंदें टपक रही थीं। ऑफिस से लौटते वक़्त सारा कुछ भीग गया था—कपड़े, बाल, मन। लेकिन अदिति को बारिश से कभी शिकायत नहीं थी। बारिश उसके लिए हमेशा एक नया पन्ना खोलती थी—नमी से भरा, स्याही से गीला, यादों से लिपटा हुआ। उसे बारिश में चलना पसंद था, बिना छाते के। लेकिन आज पहली बार किसी ने उसके हाथ में छाता थमाया था। “इतनी भीग क्यों रही हो? बीमार पड़ोगी।” वो आवाज़ जैसे बादलों के बीच से आई…