सामाजिक कहानियाँ

  • राशन कार्ड

    राशन कार्ड

    नीलाभ रंजन रात के आख़िरी पहर जब गाँव के ऊपर धुंध उतर रही थी, रामसेवक अपनी टूटी हुई चारपाई के पास बैठा पुराने लोहे के बक्से में कपड़े भर रहा था। घर के आँगन में मिट्टी का चूल्हा ठंडा पड़ा था। सुनीता चुपचाप बच्चों के फटे कपड़े तह कर रही थी। दोनों के बीच कोई…

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  • छोटी गली के बड़े किस्से

    छोटी गली के बड़े किस्से

    अभिषेक त्रिवेदी एपिसोड 1 : गली का नक्शा और पहला झगड़ा कहानी शुरू होती है एक ऐसे मोहल्ले से, जो शहर के नक्शे में देखने पर बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता। नगर निगम का नक्शा बनाने वाला जब इस हिस्से तक पहुँचा तो उसकी पेंसिल की नोक टूट गई, और उसने वही अधूरा छोड़ दिया।…

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  • कागज़ की दीवारें

    कागज़ की दीवारें

    दीपक मेहता भाग १ : नोटिस की दीवार सुबह का सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था कि झुग्गी बस्ती की गलियों में हलचल मच गई। बच्चे स्कूल जाने की तैयारी में थे, औरतें चूल्हे पर चाय रख रही थीं, और आदमी अपने-अपने काम पर निकलने की सोच रहे थे। तभी किसी ने चिल्लाकर…

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  • गली-गली बनारस

    गली-गली बनारस

    आरव मिश्र पर्‍व 1: घाटों का सवेरा बनारस की सुबह का कोई मुकाबला नहीं। यह शहर जिस तरह हर दिन की शुरुआत करता है, वैसा और कहीं नहीं होता। जैसे ही पहली किरण गंगा पर गिरती है, शहर की गलियाँ धीरे-धीरे जागने लगती हैं। रात की निस्तब्धता टूटकर धीरे-धीरे जीवन की चहचहाहट में बदल जाती…

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  • एलाहाबाद की अड्डेबाज़ी

    एलाहाबाद की अड्डेबाज़ी

    आरव तिवारी भाग 1 – संगम किनारे की शुरुआत इलाहाबाद की शामें हमेशा से अनोखी रही हैं। जहाँ एक ओर संगम का किनारा अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से लोगों को आकर्षित करता है, वहीं दूसरी ओर सिविल लाइन्स और कटरा की गलियों में एक अलग ही ज़िंदगी धड़कती है। विश्वविद्यालय के सामने की चाय…

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  • मथुरा मोड़

    मथुरा मोड़

    आरव चौबे सुबह की चाय जैसे यमुना के पानी में उगता सूरज घोल देता है—गुनगुना, धुएँ-सा। विश्राम घाट पर घंटियों की अनगिन गूँज है; आरती का आख़िरी स्वर हवा में तैर रहा है। धूल-मिट्टी, धूप और भीगे पत्थरों की ख़ुशबू को माँ सरोज की उबलती चाय की भाप अलग से पहचान दिला रही है। “राघव!…

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  • छोटे-छोटे सुख

    छोटे-छोटे सुख

    आरव मिश्रा   भाग 1 – परिचय रामू की सुबह बाकी लोगों से बहुत अलग नहीं थी, पर उसमें कुछ खासियत थी जिसे वह खुद ही पहचानता था। उसकी आँखें भोर के हल्के उजाले के साथ खुल जातीं। घर छोटा था—मोहल्ले की तंग गलियों के बीच एक कमरे का मकान, जिसकी छत पर टीन की…

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  • डब्बे के रास्ते

    डब्बे के रास्ते

    नवनीत विश्वास 1 हर सुबह जैसे मुंबई जागती है – गाड़ियों की आवाज़, लोकल ट्रेनों की घरघराहट, और भीड़ के कोलाहल में – उसी के साथ एक और दुनिया भी आँखें खोलती है: डब्बावालों की दुनिया। ये वो लोग हैं जो रोज़ लाखों लोगों के घर का खाना, सैकड़ों किलोमीटर दूर, बिना एक गलती के,…

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  • सुनहरी मिठास

    सुनहरी मिठास

    सारिका शर्मा स्वादों का आगमन शहर की हलचल और तेज़ रफ्तार जीवन में एक तरह की थकान सी आ गई थी। लोग अपनी-अपनी दुनिया में खोए रहते, और शहर की गलियों में एक अजीब सा अकेलापन महसूस होता था। ऐसे में, आरण्य नामक युवक के लिए यह एक नई शुरुआत थी। वह एक सफल शेफ…

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  • आदर्श और अवसर

    आदर्श और अवसर

    सुमन यादव एक कामल गाँव के बडे़ बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा था, उसका मन बहुत दूर कहीं था, न कि उस थकाऊ खेत के काम में जो उसे घर जाकर करना था। वह बाकी लड़कों की तरह नहीं था, जो जमीन जोतने, फसल काटने या अपने पिता की मदद करने में संतुष्ट होते…

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  • चाय वाली अम्मा

    चाय वाली अम्मा

    रचना चौहान चाय की पहली प्याली कचहरी के सामने जो टूटी-फूटी सड़क थी, वहीं एक कोने में लकड़ी की छोटी-सी गाड़ी पर दिन की शुरुआत होती थी एक उबलती केतली की आवाज़ से। सुबह के सात बजते ही उस गाड़ी के पास एक बुज़ुर्ग महिला सफेद सूती साड़ी में आ जातीं, माथे पर बड़ी लाल…

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  • काँच का घर

    काँच का घर

    सुनिधि पटेल १ सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। शिवानी अपने छोटे से रसोईघर में चाय का भगौना चूल्हे पर चढ़ाकर चुपचाप खड़ी थी। स्टील की कटोरियों और कपों के टकराने की आवाज़ रसोई की दीवारों से टकराकर जैसे उसकी चुप्पी को चुनौती दे रही थी। रसोई की खिड़की से आती धूप की पतली…

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