अनुपमा राजपूत १ दिल्ली की ठंडी, धुंधभरी सुबह में जब हवाई जहाज़ ने उड़ान भरी, तो समीर राठौड़ के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी—कुछ वैसी, जैसी किसी पुराने दोस्त से मिलने से पहले महसूस होती है, भले ही वो दोस्त कभी सच में मिला न हो। ट्रैवल ब्लॉगिंग उसके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक जिज्ञासापूर्ण यात्रा थी—कहानियों की तलाश में भटकना, उन्हें कैमरे और शब्दों में कैद करना। इस बार उसका गंतव्य था गुजरात का कच्छ, जहाँ सालाना रण उत्सव चल रहा था। फ्लाइट से उतरते ही हल्की धूप, सूखी हवा और नमक-सी महक लिए एक खुला आसमान उसका…
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१ कर्नाटक के एक पुराने शहर में अर्जुन वर्मा और उनकी पत्नी नैना वर्मा अपने बेटे रोहन के साथ नए जीवन की शुरुआत करने के लिए एक पुराना घर खरीदने का निर्णय लेते हैं। अर्जुन, जो इतिहास के प्रोफेसर हैं, और नैना, जो एक फ्रीलांस आर्टिस्ट हैं, दोनों ही शहर के शोरगुल से दूर, शांति की तलाश में थे। उनका नया घर शहर के बाहरी इलाके में स्थित था, एक ठंडे, शांति से भरे इलाके में, जहां हवा में एक अनूठी ठंडक थी और आस-पास के पेड़-पौधे इस क्षेत्र को और भी सुंदर बना रहे थे। घर का बाहरी हिस्सा…
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१ मुंबई की हलचल भरी सुबह में, जब अरब क्रिएटिव एजेंसी की 12वीं मंज़िल पर धूप कांच की दीवारों से छनकर बोर्डरूम में गिर रही थी, तभी नए कैंपेन की मीटिंग शुरू हुई। एजेंसी का यह सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था—एक इंटरनेशनल ब्रांड का भारत में पहला बड़ा लॉन्च—और हर कोई इस मीटिंग में अपनी चमक दिखाने के लिए तैयार बैठा था। कमरे में मौजूद क्लाइंट, अकाउंट मैनेजर, आर्ट डायरेक्टर्स, और कॉपी टीम के बीच, अरब मेहता की उपस्थिति अलग ही थी। शांत, सधे हुए, लेकिन आंखों में गहराई लिए, वह क्रिएटिव डायरेक्टर के तौर पर अपने नोट्स के साथ तैयार…
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दिव्या चावला १ जून की एक नमी से भरी, भारी-सी रात थी। मुंबई की बारिश अपनी पूरी ताक़त के साथ बरस रही थी, सड़कें पानी से भर चुकी थीं और कहीं-कहीं रेल की पटरियों के नीचे पानी बहने की आवाज़ एक अजीब-सी लय बना रही थी। शहर के पुराने हिस्से में, लोहे का वह पुल खड़ा था जो एक सदी से भी ज़्यादा समय से स्थानीय ट्रेनों का भार उठाता आ रहा था। पुल के नीचे काले पानी का एक स्थायी पोखर बना रहता था, और चारों ओर दीवारों पर उग आई हरी काई, समय और नमी के मिलन की…
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आर्या मेहता पुराने शहर की गलियों में नवंबर की धुंध ऐसे उतरती थी, जैसे कोई धीमी धुन दीवारों पर टिक-टिक करती हो। शाम के पाँच बजते ही सफ़ेद रोशनी वाले बल्बों के चारों ओर पतंगों की नन्ही परिक्रमा शुरू हो जाती, और मिट्टी से आती सोंधी गंध लोगों के चेहरों पर अनजाने-से भाव रच देती। उसी धुंध में, चौक की मोड़ पर, “गुलमोहर लाइब्रेरी” अपनी लकड़ी की खिड़कियों के पीछे शांति की एक अलग दुनिया समेटे बैठी रहती—पुराने पन्नों की महक, फुसफुसाहट-सी आवाज़ें, और गिरे हुए पत्तों की ख़ामोशी। अदिति ने दरवाज़ा धकेला तो घंटी की एक पतली-सी ‘टिन’ बजकर…
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आरव सिंह ठाकुर भाग 1: पहाड़ की पहली चीख धुंध सुबह की खिड़की पर जम चुकी थी जैसे किसी ने रात भर चुपचाप रोते हुए आंसुओं से शीशा धो डाला हो मलाणा घाटी में सूरज का उदय हमेशा देर से होता है लेकिन उस दिन उसकी रौशनी जैसे खुद डर गई थी गांव के ऊपर जो नीला जंगल फैला था उसके बीचोंबीच एक चीख गूंजी थी जो इंसान की नहीं लगती थी पर इंसानों की दुनिया में ही गिरी थी सुभाष ठाकुर अपने लकड़ी के मकान की छत से धुआं निकालते चूल्हे की ओर देखते हुए उस आवाज़ को महसूस…
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तृषा तनेजा १ धुंध से भरी उस सुबह में, पहाड़ों का रंग नीला नहीं था—वह कुछ धुंधला, कुछ राखी था, जैसे नींद से आधे जागे किसी ख्वाब के किनारे खड़े हों। चित्रधारा नामक इस छोटे से पहाड़ी कस्बे में पहली बार कदम रखते ही दक्ष सहगल को लगा मानो किसी भूली हुई याद की गलियों में लौट आया हो। स्टेशन से लेकर गांव के ऊपरी छोर तक पहुँचने वाली पतली पगडंडी के दोनों ओर देवदार के ऊँचे वृक्ष उसकी यात्रा के साथी बने हुए थे। उसके ट्रैवल बैग से लटकता कैमरा हर छाया को पकड़ने को उतावला था, पर उसके…
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कृष्णा तामसी १ चारों तरफ बर्फ की सफेद चादरें बिछी थीं और हरे देवदार के पेड़ जैसे किसी पुराने रहस्य को छिपाए खड़े थे। आरव मल्होत्रा की जीप धीरे-धीरे घने कोहरे को चीरती हुई हिमाचल के दुर्गम पहाड़ी रास्तों से गुजर रही थी। मोबाइल नेटवर्क कब का गायब हो चुका था और जीपीएस भी मानो बर्फ में जम चुका था। ड्राइवर संजय, जो गांव का ही था, बिना कुछ कहे बस गाड़ी चलाता जा रहा था। आरव अपने कैमरे से बर्फबारी की फुटेज लेने में मग्न था, जब उसने अचानक पूछा, “संजय भाई, कितनी दूर है वो गेस्ट हाउस?” संजय…
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कालसूत्र भाग 1: वरसा का खून मुंबई की उस रात में समुद्र शांत नहीं था। लहरों का शोर सड़क की सन्नाटे को काटता जा रहा था, और बंदरगाह की ओर दौड़ती एक काली SUV की हेडलाइट्स किसी अजाने फैसले की गवाही दे रही थीं। गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा था आदित्य वरसा — वरसा परिवार का आखिरी वारिस, और अंडरवर्ल्ड का एक उभरता चेहरा। पिता सुरेश वरसा की दो दिन पहले गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने इसे “गैंग वॉर” कह कर फाइल बंद कर दी थी, लेकिन आदित्य जानता था कि ये कोई आम…
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१ शाम के साढ़े नौ बज रहे थे। शहर के सबसे पॉश इलाके, वसंत विहार के बंगला नंबर 47 में एक अजीब सी शांति फैली हुई थी। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, और भीतर की दुनिया किसी रहस्य को अपने अंदर समेटे चुप थी। इस घर के मालिक, विवेक मल्होत्रा, एक नामचीन उद्योगपति थे जिनके व्यापारिक साम्राज्य का विस्तार देश के कई हिस्सों में था। उनका नाम अक्सर बिजनेस मैगज़ीन के पहले पन्ने पर छपता था, लेकिन आज उनकी एक और पहचान सामने आने वाली थी — एक मृतक की। घर का दरवाज़ा भीतर से बंद था, खिड़कियाँ हल्की-हल्की…