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  • साँझ के साए

    साँझ के साए

    शिवांगी वर्मा सूर्य अस्त होते-होते बनारस की गलियों में साँझ की परछाइयाँ उतरने लगी थीं, और अस्सी घाट की सीढ़ियाँ रोज़ की तरह शांत और उदास थीं। गंगा की लहरों में हल्की-सी चांदी की चमक थी, लेकिन उस शाम घाट पर कुछ अजीब-सा सन्नाटा पसरा था। स्थानीय नाविक सोमू जब पानी से लौट रहा था,…

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  • अंधेरे की पुकार

    अंधेरे की पुकार

    आलोक पाण्डेय १ राजस्थान की तपती हुई धरती पर फैला हुआ था कर्णपुरा गाँव—एक ऐसा स्थान जहाँ गर्म हवाएँ दिन में साँय-साँय करती थीं और रात होते ही सब कुछ जैसे ठहर जाता था। चारों ओर बंजर ज़मीन, सूखे पेड़ों की छाँह, और रेत में गहराती चुप्पी। जुलाई की उस दोपहर में, जब सूरज अपनी…

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  • कोंकण की रेल यात्रा

    कोंकण की रेल यात्रा

    वसुंधरा देशमुख मुंबई की सुबह हमेशा की तरह व्यस्त और शोरगुल से भरी थी, लेकिन नीरा के दिल में एक गूंजती सी ख़ामोशी थी, जैसे किसी पुराने मंदिर की घंटी जो वर्षों से नहीं बजी हो। रेलवे स्टेशन की भीड़ से होते हुए वह अपने ट्रॉली बैग को धीमे-धीमे खींचती हुई प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ी।…

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  • हवलदार की डायरी

    हवलदार की डायरी

    मनीष कुमार तिवारी भोपाल की शाम में एक अजीब सी खामोशी थी, जैसे कोई पुरानी आवाज़ शहर की हवाओं में छुपी हुई हो। रामस्वरूप मिश्रा, पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त हवलदार, का पार्थिव शरीर श्मशान से घर वापस नहीं आया था — वह वहीं राख बन चुका था, और अब केवल स्मृतियों में बचा था। उनके…

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  • विवाह से पहले

    विवाह से पहले

    विवेक शर्मा जयपुर की सर्दियों में जब गुलाबी हवाएं हवेली की पुरानी खिड़कियों से टकराती थीं, उस समय गोयल परिवार के आँगन में गहमागहमी थी। हल्के गुनगुने धूप में बैठे बुज़ुर्ग चाय पीते हुए किसी बड़े फैसले की चर्चा कर रहे थे, और रसोई से आती मसालों की खुशबू माहौल को और आत्मीय बना रही…

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  • बेरोज़ा हवेली का अंतिम दीपक

    बेरोज़ा हवेली का अंतिम दीपक

    मानव वर्धन १ मध्य प्रदेश के भीतरी हिस्सों में बसा था एक पुराना, लगभग भुला दिया गया गाँव — बेरोज़ा। इस गाँव का नाम तक मानचित्रों में साफ़ नहीं दिखता था, लेकिन उसकी कहानियाँ लोकगीतों और बुज़ुर्गों की फुसफुसाहटों में अब भी ज़िंदा थीं। किसी जमाने में यह इलाका राजा वीरप्रताप सिंह के अधीन था,…

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  • मृगतृष्णा

    मृगतृष्णा

    निखिल देसाई १ कच्छ के सफेद रेगिस्तान में जब सूर्य ढलता है, तो आकाश किसी सूती कपड़े पर फैले सिंदूरी रंग-सा लगता है। ध्रुव पटेल ने कैमरे की लेंस से उस दृश्य को कैद करते हुए गहरी साँस ली। “WanderSoul.in” पर पोस्ट होने वाली यह उसकी अगली कहानी थी, और वह चाहता था कि यह…

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  • कान्हा के काले धागे

    कान्हा के काले धागे

    प्रकाश पांडेय प्रवीर एक छोटे से गाँव गंगावटी में पहुंचा, जहाँ वह अपने जीवन की तकलीफों से बचने के लिए एक नया आरंभ करना चाहता था। अपनी मां की आकस्मिक मृत्यु के बाद, वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। शहर के शोर-शराबे और हलचल से दूर इस शांत गांव में आने का…

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  • नरसंहार की रात

    नरसंहार की रात

    विराज नागपाल १ रघुवीर राणा की जीप जैसे ही कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ी, सामने के दृश्य ने उसे सहसा खामोश कर दिया। सड़क के दोनों ओर सरसों के खेत अभी हरे ही थे, लेकिन उन खेतों के बीचोंबीच खड़ी एक बूढ़ी हवेली अपने पुराने ज़ख्मों की तरह झुलसी हुई दिख रही…

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  • धार्मिक भ्रम

    धार्मिक भ्रम

    विक्रम यादव राजस्थान के एक शांत और ऐतिहासिक मंदिर नगर विश्णुप्रिया की गलियों में सुबह की ताजगी फैली हुई थी। देवांश कुमार, एक युवा और ऊर्जावान पत्रकार, अपनी यात्रा की शुरुआत करने के लिए यहाँ आया था। उसे इस बार अपने प्रतिष्ठित समाचार पत्र के लिए एक रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया था।…

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  • चुप रहो, वरना…

    चुप रहो, वरना…

    रश्मि सावंत नोएडा के पॉश सेक्टर में बने ‘एलिट वैली’ टावर की दसवीं मंज़िल पर सुबह की धूप खिड़की के मोटे शीशों से छनकर अंदर आ रही थी। फ्लैट के अंदर हर चीज़ करीने से सजी—सफेद दीवारों पर न्यूनतम आर्टवर्क, अलमारी पर बच्चों की तस्वीरें, और एक कोने में एलेक्ज़ा पर बज रहा था—“गुड मॉर्निंग,…

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  • अनुपमा

    अनुपमा

    १ रात का अंधेरा कुछ ज़्यादा ही घना था जब डॉक्टर रुचिका सावंत अपनी कार लेकर पुणे-मुंबई एक्सप्रेसवे पर निकल पड़ी। अस्पताल की ड्यूटी से छूटकर वो देर हो गई थी, और रात के ग्यारह बज चुके थे। उसके पास और कोई विकल्प नहीं था—अगले दिन एक जरूरी ऑपरेशन था, और वो चाहती थी कि…

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