विराज कुलकर्णी १ उत्तर भारत के एक सुदूर गाँव में जब सरकारी जीप धूल उड़ाती हुई दाखिल हुई, तो सूरज अपनी नारंगी किरणें खेतों की मेड़ों पर बिखेर रहा था। गाँव का नाम ‘गहना’ था — और सच में, यह गाँव घने सन्नाटे से ढका हुआ था। डॉ. अदिति वर्मा खिड़की से बाहर झाँकती रही; मिट्टी की सोंधी गंध के बीच कुछ अजीब सा बेचैन कर देने वाला सन्नाटा था। रास्ते भर उसने सोचा था कि यह नई तैनाती उसके लिए एक ‘ब्रेक’ होगी — शहर की भागदौड़ से दूर, कुछ समय सुकून में बिताने का मौका। लेकिन जैसे ही…
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कौशिक मिश्रा १ गांव की सुबहें हमेशा एक सी होती थीं—मुर्गों की बांग, कुएं पर बर्तनों की छनछन, और स्कूल जाने की हड़बड़ाहट। लेकिन उस दिन जैसे सब कुछ रुका हुआ था। चौधरी टोले के नुक्कड़ पर लोग जमा थे, आंखों में डर और होठों पर चुप्पी। पायल, बारह साल की एक होशियार बच्ची, जो हर रोज़ अपनी साइकिल से स्कूल जाती थी, आज सुबह अपने बिस्तर से ही गायब थी। दरवाज़ा अंदर से बंद था, खिड़कियां सलामत, और कमरे में उसकी किताबें सजी थीं जैसे अभी-अभी वो पढ़ाई करके उठी हो। लेकिन सबसे अजीब था उस दरवाज़े के बाहर…
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सारिका शर्मा स्वादों का आगमन शहर की हलचल और तेज़ रफ्तार जीवन में एक तरह की थकान सी आ गई थी। लोग अपनी-अपनी दुनिया में खोए रहते, और शहर की गलियों में एक अजीब सा अकेलापन महसूस होता था। ऐसे में, आरण्य नामक युवक के लिए यह एक नई शुरुआत थी। वह एक सफल शेफ था, जिसने शहर के सबसे बड़े रेस्तरां में काम किया था। बड़े शेफ की भूमिका निभाते हुए, वह जानता था कि सच्ची कला सिर्फ व्यंजन बनाने में नहीं, बल्कि दिल से भोजन में भावना डालने में है। लेकिन एक दिन उसने महसूस किया कि वह…
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अमिताभ वर्मा १ बघेलपुर गाँव की दोपहरें अक्सर आलस से भरी होती थीं, लेकिन उस दिन हवेली की मिट्टी में जो निकला, उसने पूरे गाँव को एक अनकहे सन्नाटे में डुबो दिया। ठाकुर हवेली, जो पिछले चालीस सालों से वीरान पड़ी थी, अब नई खरीददारी के बाद मरम्मत के लिए खुली थी। मजदूरों का दल दीवारें तोड़ रहा था, फर्श उखाड़ रहा था, और मलबे से धूल उड़ रही थी। तभी एक कुल्हाड़ी ज़मीन के नीचे किसी सख़्त चीज़ से टकराई — “ठक!” जैसी आवाज़ आई। मजदूर रुक गए। किसी ने कुदाल से थोड़ा और खोदा, तो बाहर निकला एक…
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सुमन यादव एक कामल गाँव के बडे़ बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा था, उसका मन बहुत दूर कहीं था, न कि उस थकाऊ खेत के काम में जो उसे घर जाकर करना था। वह बाकी लड़कों की तरह नहीं था, जो जमीन जोतने, फसल काटने या अपने पिता की मदद करने में संतुष्ट होते थे। कामल का मन हमेशा किताबों में लगता था, सिर्फ उन किताबों में नहीं, बल्कि ज्ञान की उस दुनिया में, जहाँ से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बदल सकता है। जब भी वह किसी महान व्यक्ति के बारे में सुनता जो शिक्षा और ज्ञान…
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कविता राठौर दिल्ली विश्वविद्यालय की उस पुरानी लाइब्रेरी में जैसे समय ठहर गया था। दीवारों पर किताबों की महक और खिड़की से आती धूप की एक पतली परत उन पन्नों पर गिरती, जिनमें जाने कितनी कहानियाँ कैद थीं। आरव वहाँ रोज़ आता था—शायद किताबों से ज़्यादा खामोशी से मिलने। लेकिन उस दिन सब कुछ बदल गया। वो एक मेज़ के कोने पर बैठी थी, सफेद सूती सलवार-कुर्ते में, उसके बालों की लटें माथे पर बार-बार गिरतीं और वो बिना परवाह किए बस पढ़ती जाती। उसके सामने खुली थी “साहिर लुधियानवी की शायरी”, और उसकी आँखों में जैसे हर शब्द समा…
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सुनील पाटिल राजेश और आर्टी की शादी हो चुकी थी, और अब वे अपनी शादी के बाद के हनीमून के लिए तैयार थे। दोनों ने एक शांत और सुरम्य हिल स्टेशन का चुनाव किया था, जो उनके दिलों के करीब था। हालांकि, राजेश को यात्रा की योजना बनाते वक्त कुछ उलझन थी, क्योंकि वह हमेशा से ही हर चीज़ को व्यवस्थित और नियंत्रित रखना पसंद करते थे। वह चाहते थे कि उनका हनीमून एक सपने जैसा हो, बिना किसी परेशानी और अड़चनों के। आर्टी, जो हमेशा से रोमांचक और नए अनुभवों की तलाश में रहती थी, इस यात्रा को लेकर…
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शुभदीप मिश्र वाराणसी स्टेशन की गर्म हवा में अजीब-सी गंध थी—कुछ धूप की, कुछ पुराने लोहे की, और कुछ जैसे समय की। शौर्य व्यास ने अपने ट्रॉली बैग का हत्था कसकर पकड़ा और भीड़ को चीरते हुए बाहर निकला। सालों बाद भारत लौटना उसे उतना अजनबी नहीं लगा, जितना लगा व्यास निवास का नाम सुनते ही मन में उभर आया अनकहा डर। वह तेरह साल का था जब उसके पिता की अचानक मौत के बाद मां ने उसे लंदन भेज दिया था, और तब से उसने कभी बनारस की ओर मुड़कर नहीं देखा। पर अब, वर्षों बाद, वकील के एक…
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शशांक त्रिवेदी १ कश्मीर की पहाड़ियों में दिसंबर की कड़ाके की ठंड बर्फ के परदे की तरह चारों ओर फैली थी। गुलमर्ग के निकट, बर्फ से ढके एक निर्जन घाटी में सेना की एक स्पेशल यूनिट गश्त पर थी—नेतृत्व कर रहे थे मेजर शौर्य व्यास, जो अपनी दृढ़ निगाहों और अचूक निर्णयों के लिए जाने जाते थे। सेना को एक हफ्ते पहले सूचना मिली थी कि LOC के करीब किसी दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों के संकेत मिले हैं, लेकिन सैटेलाइट इमेज में कुछ अजीब सा दिखा—बर्फ के नीचे गोलाकार संरचना की आकृति, जो प्राकृतिक नहीं थी। संदेह और…
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रश्मि वर्मा शालिनी वर्मा के कदम जैसे ही मुंबई की गलियों में पड़े, उसके मन में एक अजीब सा घबराहट का अहसास था। कई सालों बाद वह इस शहर में वापस आई थी, और यह शहर अब पहले जैसा नहीं था। न जाने कितनी बार उसने यहाँ की सड़कों पर चलते हुए अपने बचपन और किशोरावस्था की यादों को महसूस किया था, लेकिन आज वह इन सड़कों को एक पुलिस अधिकारी के नजरिए से देख रही थी। शालिनी को याद था कि जब वह यहां पहली बार आई थी, तो उसकी आँखों में उम्मीद और हिम्मत की चमक थी, लेकिन…