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  • त्रयलोक-समय यंत्र

    त्रयलोक-समय यंत्र

    प्रमोद कुमार १ मध्यप्रदेश के सिंगनामा गाँव की सूखी, तपती ज़मीन पर जून की दोपहर भी नर्क से कम नहीं थी, लेकिन डॉ. प्रणव कश्यप की आँखों में जिज्ञासा की जो आग जल रही थी, वह हर तपन को फीका कर देती थी। पुरातत्व विभाग की ओर से सिंधु घाटी से जुड़ी किसी उप-सभ्यता की…

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  • वापसी की राह

    वापसी की राह

    अनिकेत तिवारी सुबह की भीड़भाड़ भरी दिल्ली, उसकी चिल्ल-पों और भागती ज़िंदगी की आवाज़ें जब भी खिड़की से भीतर आतीं, आदित्य के मन में एक खालीपन भर देतीं। उसकी ग्यारहवीं मंज़िल की बालकनी से दिखाई देता था ट्रैफिक का रेंगता हुआ सर्प, जिसके बीच वो भी रोज़ अपनी कार में फँसा रहता—सोचता हुआ कि आखिर…

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  • संगीत के उस पार

    संगीत के उस पार

    आकाश वर्मा १ मुंबई की बारिशें जैसे पूरे शहर को धो डालती थीं, वैसे ही कभी-कभी मन के भीतर जमी गर्द भी बहा ले जाती थीं। लेकिन विवान मल्होत्रा के लिए, आज की शाम औरों से अलग थी—बाहर की बूंदों में तो लय थी, मगर उसके भीतर सुर गुम थे। वह अपने छोटे से अपार्टमेंट…

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  • भूतहिया कुआँ

    भूतहिया कुआँ

    अनामिका चौधरी पटना यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में उस दिन कुछ अजीब सा सन्नाटा था। रीतू ने अपनी डायरी में अंतिम लाइन लिखी—“लोककथाओं में सिर्फ डर नहीं होता, इतिहास भी छिपा होता है।” उसे अगले सप्ताह फील्ड वर्क के लिए सुभाषपुर जाना था—बिहार के बरौनी ज़िले का एक छोटा-सा गाँव, जहाँ आज़ादी से पहले के ज़मींदारों…

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  • पृथ्वी 2.0

    पृथ्वी 2.0

    राजेश कुमार दास 2094 की वह शाम बाकी शामों से अलग थी। सूरज का अस्तित्व अब प्रतीकात्मक रह गया था—आकाश में केवल राखी धुंध थी और हवा में जलती हुई धातु की गंध। गंगा के घाट सूख चुके थे, हिमालय की बर्फ पिघल चुकी थी, और समुद्रों ने अपनी सीमाएँ लांघ दी थीं। भारत समेत…

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  • सत्ता के साये में

    सत्ता के साये में

    कविता मेहरा भाग १ दिल्ली की सर्द सुबहें हमेशा कुछ छुपाए रखती हैं। कोहरे में लिपटी इमारतें, सड़क किनारे चाय की दुकानों से उठती भाप, और नेताओं की कारों के काफ़िले—इन सबके बीच कुछ ऐसा भी चलता है जो दिखाई नहीं देता, पर असर छोड़ता है। साउथ ब्लॉक के पीछे एक पुरानी बिल्डिंग है—’शंकर निवास’—जहाँ…

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  • १३ वीं मंज़िल

    १३ वीं मंज़िल

    सम्वित शर्मा अध्याय १: एक और गिरावट बारिश की एक भारी रात थी, जब मुंबई की गगनचुंबी इमारत ‘ओशन व्यू हाइट्स’ के नीचे पुलिस की गाड़ियाँ जमा हो गईं। चारों तरफ नीली-लाल बत्तियों की झिलमिलाहट में भीगते हुए कुछ लोग भीड़ बनाकर खड़े थे, और बीच में एक पीले प्लास्टिक की शीट से ढका शव—एक…

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  • दिल्ली मेट्रो का मुसाफिर

    दिल्ली मेट्रो का मुसाफिर

    मिताली गुप्ता १ दिल्ली की सुबहें कुछ अलग नहीं होतीं — ट्रैफिक का शोर, भागती हुई भीड़, गाड़ियों के हॉर्न और मेट्रो स्टेशनों पर गूंजती उद्घोषणाओं की आवाज़ें। लेकिन निहारिका की सुबहें उन सब से थोड़ी अलग थीं। वह हर सुबह ठीक 8:12 की ब्लू लाइन मेट्रो पकड़ती थी — द्वारका सेक्टर 9 स्टेशन से…

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  • EMI का महा-भंवर

    EMI का महा-भंवर

    संजीव मिश्रा भाग 1: किशोरलाल की किस्त-कथा किशोरलाल गुप्ता, उम्र लगभग 43 साल, पेशे से एक मध्यम दर्जे का सेल्समैन, लेकिन दिल से बहुत बड़े सपने देखने वाला इंसान था। सपना—नई चमचमाती कार, फ्लैट में दो बाथरूम, और एक स्मार्ट टीवी जिसमें नेटफ्लिक्स चले बिना बफरिंग के। पर समस्या एक ही थी—पैसे। और तब उसके…

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  • दोपहर की खिड़की

    दोपहर की खिड़की

    सौरभ मेहता भाग १ शहर की उस पुरानी गली में जहाँ मकानों की छतें एक-दूसरे के कंधे पर टिकी होती हैं और गलियों की साँसें भी धीमी पड़ चुकी होती हैं, वहीं तीसरे नंबर का मकान सबसे चुप है। दीवारों की सीलन अब तस्वीरों के किनारों तक पहुँच चुकी है, और खिड़कियों से झाँकती धूप…

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  • न्याय की आख़िरी दस्तक

    न्याय की आख़िरी दस्तक

    समीर त्रिपाठी भाग 1: एक लाश, एक सवाल बारिश की बूंदें जैसे अदालत की खिड़कियों से टकरा रही थीं, वैसी ही बेचैनी आज सत्र न्यायाधीश आरव मल्होत्रा के चेहरे पर थी। कोर्ट रूम नंबर ३ में उस दिन एक ऐसा मामला पेश हुआ था जो पिछले चार महीने से पूरे शहर में चर्चा का विषय…

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  • पीपल का शाप

    पीपल का शाप

    शक्कर रञ्जन महापात्र जब बप्पा भानगढ़ी गाँव पहुँचा, तो आसमान धूसर था और धूप जैसे छिप कर बैठ गई थी। बस से उतरते ही उसे सबसे पहले महसूस हुआ मिट्टी की सोंधी गंध, जो बारिश से पहले की नमी जैसी लग रही थी। गाँव छोटा था, मगर उसकी खामोशी में कोई अजीब सी बात थी—जैसे…

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