Hindi
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चाय वाली अम्मा
रचना चौहान चाय की पहली प्याली कचहरी के सामने जो टूटी-फूटी सड़क थी, वहीं एक कोने में लकड़ी की छोटी-सी गाड़ी पर दिन की शुरुआत होती थी एक उबलती केतली की आवाज़ से। सुबह के सात बजते ही उस गाड़ी के पास एक बुज़ुर्ग महिला सफेद सूती साड़ी में आ जातीं, माथे पर बड़ी लाल…
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कुरकुरे और कविता
अभिराज गुप्ता भोपाल की कोचिंग स्ट्रीट पर शाम ढलते ही भीड़ उमड़ने लगती है। सड़क के दोनों ओर कतार से लगे कोचिंग सेंटर्स से थके हुए छात्रों की भीड़ निकलती है, हाथों में बैग, आंखों में अधपकी नींद और मन में परीक्षा की चिंता। इन्हीं में एक लड़का हर शाम बिना चूके ठेले की एक…
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नीली चूड़ियों की आवाज़
सोनल शर्मा पहली रात बसेरिया में प्राची मिश्रा की कार धूल उड़ाती हुई जब बसेरिया गांव के छोर पर पहुँची, तब शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। चारों ओर पीली रोशनी में नहाया खेत, सूखी घास की सरसराहट और दूर कहीं पीपल के पेड़ पर बैठे कौवे की कांव-कांव। उसने कार से उतरते हुए…
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सियाही का खून
माधुरि वर्मा १ लखनऊ की हल्की बारिश में भीगता शहर उस शाम असहज सन्नाटे में डूबा था, जब नेहा द्विवेदी की लाश उसके छोटे से किराए के फ्लैट में मिली। दीवार पर एक अधजला अगरबत्ती होल्डर अब भी धुआँ छोड़ रहा था और खिड़की से आती हल्की हवा कागज़ के पन्नों को सरसराहट के साथ…
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लौट चलें हेमकुंड
निशा अरोरा एक दिल्ली के उस सुबह की धूप बेहद सामान्य थी—उजली, लेकिन भावना से शून्य। अद्वैता शर्मा की खिड़की से छनकर आती रोशनी जैसे उसका चेहरा नहीं, उसकी पुरानी आदतों पर गिर रही थी। साढ़े सात बजे का अलार्म बंद कर वह वैसा ही उठी जैसे हर दिन, मैकेनिक की तरह। कॉफी मशीन चालू,…
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मसान की दुल्हन
तपन मिश्रा वाराणसी का स्टेशन, सुबह की भीड़, लाउडस्पीकर पर गूंजती announcements, और हवा में फैली एक चिरपरिचित गंध—धूप, धूल, और जलते घी की। अंशुमान का कैमरा उसकी छाती से लटका था, और उसकी आँखों में तलाश थी—एक अलग दुनिया की, उस लकीर के पार की जहाँ जीवन और मृत्यु हाथ थामे चलते हैं। वह…
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काँच का घर
सुनिधि पटेल १ सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। शिवानी अपने छोटे से रसोईघर में चाय का भगौना चूल्हे पर चढ़ाकर चुपचाप खड़ी थी। स्टील की कटोरियों और कपों के टकराने की आवाज़ रसोई की दीवारों से टकराकर जैसे उसकी चुप्पी को चुनौती दे रही थी। रसोई की खिड़की से आती धूप की पतली…
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शिवमंदिर के पीछे
शिवानंद पाठक कोल्हापुर की घाटियों से गुजरती जीप धूल उड़ाते हुए चिखली गाँव की सीमा में प्रवेश कर रही थी। जीप में बैठे वेदांत त्रिपाठी खिड़की से बाहर झाँकते हुए मंदिर की मीनार की झलक पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। वे भारत सरकार के पुरातत्व विभाग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी थे और इस अभियान…
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उस रात जब चाँद मुस्कुराया
वेदिका शर्मा बमुश्किल शाम के साढ़े सात बजे होंगे जब आयरा सेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँची। प्लेटफॉर्म पर हलचल थी, लेकिन वह खुद किसी दूसरी लय में थी—धीमी, शांत और थोड़ी खोई हुई। पीठ पर कैमरा बैग और हाथ में एक काले रंग की डायरी थामे वो आगे बढ़ रही थी, जैसे किसी…
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धागों के उस पार – एक रामेश्वरम यात्रा
नीलय मेहता अनिरुद्ध सेनगुप्ता ने स्टेशन पर रुकती उस ट्रेन को देखा तो कुछ देर तक बस खड़ा रहा, जैसे कोई अंतर्मन उसे रोक रहा हो या शायद वही धक्का दे रहा हो जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। चेन्नई एগ्मोर से रामेश्वरम जाने वाली वह रात की ट्रेन उसके लिए किसी साधारण सफ़र का…
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श्रीवास्तव जी की ऑनलाइन शॉपिंग
अयन त्रिपाठी श्रीवास्तव जी की सुबह हमेशा की तरह अख़बार और चाय से शुरू हुई, लेकिन आज कुछ अलग था। अख़बार पढ़ते-पढ़ते उनके कान में पाखी की आवाज़ पड़ी, जो अपने मोबाइल पर कुछ दिखा रही थी – “पापा, देखिए, ऑनलाइन में कितनी सेल लगी है!” पहले तो उन्होंने नज़रअंदाज़ किया, लेकिन जब बेटे चिराग…
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चौथी मंज़िल वाले चमनलाल
रंजन मिश्रा भाग 1: व्हाट्सऐप वार “चमनलाल जी ने फिर ग्रुप पर पोस्ट कर दिया—’कल रात तीसरी मंज़िल से जो हड्डी गिराई गई थी, उससे मेरी गुलाब की क्यारी घायल हो गई है। मैं FIR दर्ज करवाने जा रहा हूँ। – चौथी मंज़िल, चमनलाल’।” कॉलोनी का ‘अप्टू कॉलोनी रेसिडेंट्स ग्रुप’ सुबह-सुबह सुलग उठा। एक ओर…












