मयंक दुबे मिर्ज़ापुर की सुबहें शांत दिखती थीं, लेकिन ज़मीन के नीचे खदबदाता था कुछ ऐसा जो इंसानी आंखों से नहीं दिखता था। उस दिन भी सूरज वैसा ही उगा था—रंगीन, गर्म और निर्दोष, जैसे खदान के पास के गाँवों में हर सुबह उगता है। लेकिन खदान नंबर-17 में काम कर रहे मजदूरों की चीखों ने उस सुबह को झकझोर दिया। रामऔतार नाम का बुज़ुर्ग मजदूर, जिसकी पीठ झुकी थी लेकिन नज़रें सीधी चलती थीं, पत्थर तोड़ते-तोड़ते अचानक ज़मीन के अंदर समा गया। साथी मजदूरों ने सोचा कोई दरार होगी, पर जब उसे निकाला गया, तो उसकी खोपड़ी पीछे से…
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मालविका नायर १ समुद्र की लहरों की निरंतर गूंज और उस पर खड़ा बेकल किला — केरल की सबसे प्राचीन और रहस्यमयी किलों में से एक, जहाँ इतिहास केवल पत्थरों पर नहीं, हवाओं में दर्ज है। जान्हवी शर्मा की नजरों में ये किला सिर्फ एक वास्तुकला नहीं था, बल्कि एक अदृश्य आवाज़ थी जो सदियों से किसी को पुकार रही थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में शोध कर रही जान्हवी तटीय दुर्गों पर काम कर रही थी, लेकिन जब उसने “रक्त कमल” के नाम से जुड़ी एक पुरानी मलयालम पांडुलिपि पढ़ी, तो वह विचलित हो उठी। उस लेख में उल्लेख…
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विराज देशमुख अध्याय १ दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस की सड़कें अगस्त की हल्की बारिश से चमक रही थीं। पेड़ों की पत्तियाँ भीग चुकी थीं, और हॉस्टल के गलियारों में एक नई उमंग घुली हुई थी—नए सेमेस्टर की, नई क्लासेस की, और हाँ, नए चेहरों की भी। आर्ट्स फैकल्टी के बाहर एक छोटा-सा जमावड़ा था, हाथों में पोस्टर, गले में स्लोगन, और आँखों में जुनून। काव्या, अपने कुर्ते के नीचे एक पुराने से झोले में नोटबुक और पेन लिए, उस भीड़ के बीच खड़ी थी—ना पीछे, ना आगे—बस ठीक वहीं जहाँ सबसे ज्यादा आवाज़ गूंजती थी। “आज की नारी सब…
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मधुश्री चौहान १ गाँव की सुबह में एक अलग ही सादगी होती है—न शोर, न भागदौड़, बस मिट्टी की खुशबू और जागते जीवन की धीमी गूंज। ऐसी ही एक सुबह, जब सूरज की हल्की किरणें आम के पेड़ों को छूती हुई धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं, राधा अपने कच्चे घर के सामने झुकी हुई कुएँ से पानी भर रही थी। उसकी माँ गौरी भीतर चूल्हा जलाने में लगी थी और छोटी बहन मुनिया अब भी खाट पर आधी नींद में कसमसा रही थी। राधा के शरीर में नींद की थकान अभी भी थी, लेकिन आँखों में घर के हालातों…
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शिवानी कश्यप इशा रेड्डी अपने मुंबई स्थित उच्च-मूल्य वाले फ्लैट की खिड़की से बाहर देख रही थी, जहाँ से शहर का विस्तृत आकाश नजर आता था। कभी इस शहर ने उसे अपने सपनों के रंग दिए थे, लेकिन अब यह शहर उसे एक बंद पिंजरे जैसा महसूस होने लगा था। वाहनों का शोर, लोगों की भाग-दौड़, और निरंतर दौड़ते हुए जीवन ने उसे पूरी तरह से थका दिया था। वह एक सफल करियर में थी, प्रतिष्ठित कंपनी में काम कर रही थी, जहां उसकी हर पहचान थी, लेकिन इन सबके बावजूद, उसे अंदर से एक खालीपन महसूस हो रहा था।…
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सान्या जोशी अदिति कपूर की ज़िन्दगी एक दौड़ बन चुकी थी। दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर उसके कदम तेज़ थे, और उसकी आँखें हमेशा किसी न किसी लक्ष्य की ओर दौड़ती रहती थीं। एक सफल कॉर्पोरेट पेशेवर, 28 वर्षीय अदिति ने शहर की तेज़-तर्रार दुनिया में अपने कदम जमा लिए थे। मगर, अब यह सब उसे बोझ लगने लगा था। हर दिन की भागदौड़, मीटिंग्स, डेडलाइन्स और संघर्ष ने उसे थका दिया था। वह अपने जीवन में एक स्थिरता की तलाश में थी, लेकिन यहाँ, दिल्ली में, ऐसा कुछ भी नहीं था। उसके पास सब कुछ था—उच्च वेतन, एक भरा-पूरा…
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संध्या जोशी १ रात के ढाई बजे थे। मुंबई की हवा में उमस थी, लेकिन सिटी केयर अस्पताल की ICU यूनिट में एसी की ठंडक के बीच सब कुछ शांत था—कम से कम सतह पर। अंदर गहराई में कुछ हिल रहा था। ICU नंबर 3 में 52 वर्षीय व्यवसायी राजीव भाटिया की एपेंडिक्स सर्जरी खत्म हुए तीन घंटे हो चुके थे। ऐनेस्थेसिया के प्रभाव से उबरने के बाद, उन्हें हल्की नींद देने के लिए Zolaprim नामक एक आम नींद का इंजेक्शन देना था—जो अस्पताल की SOP (Standard Operating Procedure) का हिस्सा था। रात्रि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर कबीर माथुर ने…
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हिमाचल की घाटियों में दिसंबर की रातें कुछ अलग ही किस्म की सन्नाटे से भरी होती हैं। हवा में बर्फ़ की गंध, पेड़ों पर जमीं सफेद चादर, और दूर कहीं से आती घंटियों की हल्की गूंज जैसे समय को रोक देती है। उन्हीं घाटियों में, देवदार के पेड़ों से घिरे एक पहाड़ी ढलान पर खड़ा है सेंट जोसेफ चर्च — एक पुराना, पत्थर का बना हुआ गिरिजाघर, जिसकी दीवारों में वक्त की सीलन और रहस्य दोनों बसे हैं। क्रिसमस के एक सप्ताह पहले की सुबह, जब गांव के लोग अपने घरों में लकड़ी जलाकर खुद को गर्म रखने में लगे…
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नवनीत तनेजा अध्याय १: “ख़ामोश दिल की रातें” रेडियो स्टेशन की हल्की पीली रौशनी में बैठी सिया राय ने अपने सामने रखे माइक की ओर देखा। रात के दस बजने ही वाले थे, और वो पल आने वाला था जब उसकी आवाज़ शहर की अनगिनत खिड़कियों से होकर उन लोगों तक पहुँचेगी जो तन्हा हैं, अधूरे हैं, और किसी न किसी इंतज़ार में हैं। “ख़ामोश दिल” – उसका नाइट शो, शहर का सबसे भावुक रेडियो सेगमेंट बन चुका था, जहाँ लोग अपने अधूरे ख़त, दर्दभरी कविताएँ, और बेसब्र मोहब्बतें साझा करते थे। लेकिन सिया का अपना दिल भी कुछ कम…
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नवनीत विश्वास 1 हर सुबह जैसे मुंबई जागती है – गाड़ियों की आवाज़, लोकल ट्रेनों की घरघराहट, और भीड़ के कोलाहल में – उसी के साथ एक और दुनिया भी आँखें खोलती है: डब्बावालों की दुनिया। ये वो लोग हैं जो रोज़ लाखों लोगों के घर का खाना, सैकड़ों किलोमीटर दूर, बिना एक गलती के, समय पर पहुँचा देते हैं। नाथा पाटील, लगभग साठ साल के बुज़ुर्ग डब्बावाले, इस दुनिया के एक अनुभवी सिपाही हैं। सफेद नेहरू टोपी, हल्की झुर्रियों वाली मुस्कान, और आँखों में वर्षों का अनुभव। सुबह चार बजे उनकी नींद खुलती है, जैसे शरीर में कोई अलार्म…