मानव वर्धन १ मध्य प्रदेश के भीतरी हिस्सों में बसा था एक पुराना, लगभग भुला दिया गया गाँव — बेरोज़ा। इस गाँव का नाम तक मानचित्रों में साफ़ नहीं दिखता था, लेकिन उसकी कहानियाँ लोकगीतों और बुज़ुर्गों की फुसफुसाहटों में अब भी ज़िंदा थीं। किसी जमाने में यह इलाका राजा वीरप्रताप सिंह के अधीन था, जिनकी विशाल हवेली अब वीरान पड़ी थी। हवेली की जर्जर दीवारें, छत पर उगी काई, टूटी खिड़कियाँ और सामने की परछाइयाँ — सब मिलकर उस जगह को किसी शापित चित्र की तरह बनाते थे। पत्रकार शौर्य वर्मा और उसकी कैमरा ऑपरेटर मित्र दीपिका उस दिन…
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निखिल देसाई १ कच्छ के सफेद रेगिस्तान में जब सूर्य ढलता है, तो आकाश किसी सूती कपड़े पर फैले सिंदूरी रंग-सा लगता है। ध्रुव पटेल ने कैमरे की लेंस से उस दृश्य को कैद करते हुए गहरी साँस ली। “WanderSoul.in” पर पोस्ट होने वाली यह उसकी अगली कहानी थी, और वह चाहता था कि यह कुछ अलग हो—कुछ ऐसा जो पाठकों को रेगिस्तान की गंध, उसके रंग और उसकी नीरवता तक पहुँचा दे। अहमदाबाद से आए हुए उसे तीन दिन हो चुके थे और रण उत्सव की भीड़-भाड़ से दूर वह भुज से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर एक गांव, खुदर…
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प्रकाश पांडेय प्रवीर एक छोटे से गाँव गंगावटी में पहुंचा, जहाँ वह अपने जीवन की तकलीफों से बचने के लिए एक नया आरंभ करना चाहता था। अपनी मां की आकस्मिक मृत्यु के बाद, वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। शहर के शोर-शराबे और हलचल से दूर इस शांत गांव में आने का उसका उद्देश्य सिर्फ यही था कि वह अपने भीतर शांति और सुकून पा सके। गंगावटी गांव नदियों और खेतों से घिरा हुआ था, जहां लोग अपनी सादी और कठिन जिंदगी जीते थे। गाँव की गलियों में टहलते हुए उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि…
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विराज नागपाल १ रघुवीर राणा की जीप जैसे ही कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ी, सामने के दृश्य ने उसे सहसा खामोश कर दिया। सड़क के दोनों ओर सरसों के खेत अभी हरे ही थे, लेकिन उन खेतों के बीचोंबीच खड़ी एक बूढ़ी हवेली अपने पुराने ज़ख्मों की तरह झुलसी हुई दिख रही थी। उसके टूटे छज्जे, काले पड़े झरोखे और छत की ढही हुई चौखटें उसे किसी युद्ध का थका हुआ सैनिक बना रही थीं। गाँव वालों ने पहले ही चेता दिया था — “उधर मत जाइयो, बाबूजी। वो खून वाली कोठी है।” लेकिन इतिहास और तस्वीरों…
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विक्रम यादव राजस्थान के एक शांत और ऐतिहासिक मंदिर नगर विश्णुप्रिया की गलियों में सुबह की ताजगी फैली हुई थी। देवांश कुमार, एक युवा और ऊर्जावान पत्रकार, अपनी यात्रा की शुरुआत करने के लिए यहाँ आया था। उसे इस बार अपने प्रतिष्ठित समाचार पत्र के लिए एक रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया था। हर साल यहाँ बड़े धूमधाम से विश्णु मंदिर का वार्षिक उत्सव मनाया जाता था, और देवांश को इस उत्सव की कवरेज करनी थी। इस प्रकार के धार्मिक आयोजन हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहे थे, लेकिन देवांश का ध्यान कुछ और ही था। उसने…
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रश्मि सावंत नोएडा के पॉश सेक्टर में बने ‘एलिट वैली’ टावर की दसवीं मंज़िल पर सुबह की धूप खिड़की के मोटे शीशों से छनकर अंदर आ रही थी। फ्लैट के अंदर हर चीज़ करीने से सजी—सफेद दीवारों पर न्यूनतम आर्टवर्क, अलमारी पर बच्चों की तस्वीरें, और एक कोने में एलेक्ज़ा पर बज रहा था—“गुड मॉर्निंग, प्रिय शर्मा।” प्रिय, हल्के पीले रंग की सूती साड़ी में, रसोई में चाय उबाल रही थी, पर उसकी नज़रें दरवाज़े के नीचे अटक गई थीं। किसी ने दरवाज़े के नीचे से एक लिफ़ाफा अंदर सरकाया था। वह पल भर के लिए थम गई। किसी ऑनलाइन…
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१ रात का अंधेरा कुछ ज़्यादा ही घना था जब डॉक्टर रुचिका सावंत अपनी कार लेकर पुणे-मुंबई एक्सप्रेसवे पर निकल पड़ी। अस्पताल की ड्यूटी से छूटकर वो देर हो गई थी, और रात के ग्यारह बज चुके थे। उसके पास और कोई विकल्प नहीं था—अगले दिन एक जरूरी ऑपरेशन था, और वो चाहती थी कि रात में घर पहुँचकर थोड़ी देर माँ के हाथ का बना खाना खा ले और फिर आराम से नींद ले। उसका मन शांत नहीं था—वो खुद को थका हुआ महसूस कर रही थी, और ड्राइविंग में उसका ध्यान कम ही था। एक्सप्रेसवे के आसपास कोई…
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विक्रम चतुर्वेदी दिल्ली की पुरानी गलियों में सर्दियों की रातें हमेशा से रहस्यमयी रही हैं, लेकिन उस रात की धुंध कुछ अलग थी—जैसे हवा में अजीब सी गंध घुली हो, जैसे पुरानी कहानियाँ अचानक फिर से ज़िंदा हो उठी हों। रात के करीब ढाई बज रहे थे जब पुरानी दिल्ली के एक तंग गली में एक मृत शरीर मिला। कोहरे की मोटी चादर के बीच झांकती स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, लेकिन जो दिख रहा था, वो डरावना था—उसके चेहरे पर गहरी दहशत की झलक थी, जैसे मौत से पहले उसने कुछ…
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दीपक मिश्रा विकास मुख़र्जी ने अपने जीवन में कई बार खुद को चुनौती दी थी, लेकिन अब वह एक नई, कठिन चुनौती का सामना करने जा रहा था। कोलकाता के एक हलचल भरे मोहल्ले से दूर, उसने चादर ट्रैक के बारे में सुना था—लद्दाख के जंस्कार क्षेत्र में स्थित एक बर्फीली नदी पर पैदल यात्रा। यह ट्रैक दुनियाभर के साहसिक यात्रियों के लिए एक चुनौती है, और विकास के लिए तो यह एक सपना जैसा था। वह आदतन साहसी था, हमेशा अपनी सीमा को पार करने की कोशिश में रहता था। पहले उसने कई पहाड़ी ट्रैक किए थे, लेकिन चादर…
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श्रेयांशी वर्मा फिर से देखना वाराणसी की वो दोपहर वैसी ही थी जैसी होती है—धूल भरी, हल्की धूप से चकाचौंध, और गंगा की तरफ बहते हवा के छोटे-छोटे झोंकों के साथ एक ठहराव लिए। घाटों के पास बैठा आरव त्रिपाठी, अपनी डायरी की खाली पन्नियों को ताक रहा था, मानो शब्द कहीं खो गए थे। एक दशक से भी ज़्यादा समय हो गया, लेकिन उस शहर की गंध, वो पुराने पत्थर की दीवारें, वो किताबों की दुकानें—सब अभी भी वैसा ही था। बस एक चीज़ बदल गई थी—वो। संजना मिश्रा। वो अब भी उसी शहर में थी। वही गलियाँ, वही…