सामाजिक कहानियाँ

  • दोपहर की खिड़की

    दोपहर की खिड़की

    सौरभ मेहता भाग १ शहर की उस पुरानी गली में जहाँ मकानों की छतें एक-दूसरे के कंधे पर टिकी होती हैं और गलियों की साँसें भी धीमी पड़ चुकी होती हैं, वहीं तीसरे नंबर का मकान सबसे चुप है। दीवारों की सीलन अब तस्वीरों के किनारों तक पहुँच चुकी है, और खिड़कियों से झाँकती धूप…

    read more

  • छांव सी दोस्ती

    छांव सी दोस्ती

    अनामिका मिश्रा भाग 1 गाँव का नाम था चांदपुर—उत्तरप्रदेश के बलिया जिले में बसा एक ऐसा गाँव, जहाँ न तो शहर की चकाचौंध थी, न ही इंटरनेट की तेज़ रफ्तार। लेकिन था तो बस एक चीज़—दिल से जुड़ा अपनापन। वही अपनापन था जो आरती और फरज़ाना की दोस्ती की नींव बना। आरती थी ज़मींदार के…

    read more

  • तुम्हारे साथ, मेरा होना

    तुम्हारे साथ, मेरा होना

    अमूलिक त्रिपाठी 1 गाँव की आखिरी गली में खड़ा बांस का पेड़ अब बूढ़ा हो चला था। उसकी शाखाएँ जैसे समय के हाथों से झुक गई थीं, और पत्तियाँ… हर साल कम होती जा रही थीं। उसी पेड़ के नीचे आज भी वही पुराना पत्थर पड़ा था, जहाँ कभी शाम को सोनू, रमिया और बाकी…

    read more

  • छांव की तलाश

    छांव की तलाश

    अर्जुन प्रसाद मिश्रा वाराणसी — एक ऐसा शहर जो गंगा की गोद में बसा है, जहाँ हर सुबह आरती की धुनों और शंखनाद की गूँज से होती है। वहीँ पुराने घाटों, मंदिरों और तंग गलियों के बीच बसा है हरिश्चंद्र मोहल्ला, जो अपनी गरीबी में भी आत्मसम्मान और रिश्तों की गर्माहट से भरा है। यहाँ…

    read more