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बरसात की वो शाम

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स्वप्निल वर्मा


दिल्ली की वो शाम बेहद भीगी हुई थी। जून का आख़िरी हफ्ता था और मौसम विभाग ने जिस बारिश की चेतावनी दी थी, वो अब हक़ीक़त बनकर शहर की सड़कों को बहा ले जा रही थी। बिजली चमक रही थी, ठंडी हवाएं चल रही थीं और हर गली-मोहल्ला जैसे पानी के नीचे डूबा हुआ था।

राजौरी गार्डन के पास एक पुराना बस स्टॉप था जहाँ लोग बारिश से बचने के लिए जमा हो गए थे। वहीं खड़ा था आरव — २७ साल का, एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाला सीधा-सादा लड़का। कंधे पर लैपटॉप बैग, हल्के गीले बाल, और आँखों में बारिश से बचने की कोशिश — पर चेहरे पर एक अजीब-सी राहत। जैसे बारिश की वजह से मिली छुट्टी उसे किसी अनजाने सुख की ओर खींच रही हो।

बस स्टॉप पर एक लड़की पहले से खड़ी थी। सफ़ेद चिकनकारी कुर्ता, नीली जींस, और हाथ में एक बंद छाता जिसे उसने खोलने की ज़रूरत नहीं समझी थी। वो भीग रही थी, आँखें आसमान की तरफ़, और मुस्कान होंठों पर।

आरव ने बगल में खड़े होकर कहा, “छाता है फिर भी भीग रही हैं आप?”

लड़की ने नज़र घुमाई और हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“कुछ बारिशें महसूस करने के लिए होती हैं, बचने के लिए नहीं।”

आरव ने हँसते हुए कहा, “वाह, कोई शेर लिखने का इरादा है?”

“नहीं,” उसने मुस्कराकर कहा, “बस दिल की बात है।”

“अच्छा नाम क्या है आपका?”
“सना। और आप?”
“आरव।”

बस इतनी-सी बात से दोनों के बीच की चुप्पी टूट गई। और जब तक बस आई नहीं, दोनों बातें करते रहे — बारिश, बचपन की यादें, और गर्म चाय की चाह।

उस एक मुलाकात के बाद दोनों की ज़िंदगी में कुछ बदल गया था। आरव ने उसे सोशल मीडिया पर ढूंढ़ निकाला। कुछ ही दिनों में, कॉफी पर मुलाकातें होने लगीं। कभी कनॉट प्लेस के कैफे में, तो कभी इंडिया गेट के पास देर रात की वॉक।

सना के अंदर कुछ रहस्यमय था। उसकी आँखों में गहराई थी और हँसी में एक अधूरी कहानी छुपी थी। वो ज़्यादा नहीं बोलती थी, लेकिन जब भी बोलती थी, आरव ध्यान से सुनता।

एक शाम सना बोली, “क्या तुम कभी किसी को पूरी तरह समझ पाए हो?”

आरव ने कहा, “शायद नहीं। लेकिन मैं तुम्हें जानना चाहता हूँ। पूरी तरह।”

वो कुछ नहीं बोली, बस हल्के से मुस्कुराई।

मुलाकातें अब आदत बन चुकी थीं। एक दिन सना ने पहली बार आरव का हाथ पकड़ा — जब वो रास्ता पार कर रही थी। उस एक स्पर्श ने दिल के तारों को झनझना दिया।

एक और शाम, जब बारिश फिर से आई, दोनों इंडिया हैबिटैट सेंटर के बाहर छतरी के नीचे खड़े थे।

आरव ने कहा, “तुम्हें पता है, जब मैं तुम्हें पहली बार देखा था, मुझे लगा था तुम कोई फ़िल्मी किरदार हो।”

“और अब?”
“अब लगता है, तुम मेरी कहानी की हीरोइन हो।”

सना चुप रही, उसकी आँखों में आँसू आ गए।

लेकिन हर कहानी में एक मोड़ होता है। एक दिन, आरव ने सना को अपने दोस्तों से मिलवाने के लिए बुलाया। वो नहीं आई। फोन बंद। मेसेज का जवाब नहीं। तीन दिन बाद सना खुद आरव के घर आ गई। आँखों के नीचे काले घेरे, होंठ सूखे, और चेहरा बेजान।

“मुझे माफ़ कर दो आरव। मुझे ये सब नहीं करना चाहिए था।”

“क्या हुआ है सना? मुझे बताओ।”

सना ने चुप्पी तोड़ी — “मैं किसी से बहुत प्यार करती थी। वो मेरा मंगेतर था। शादी से एक हफ़्ता पहले उसने रिश्ता तोड़ दिया। मुझे छोड़कर चला गया। मैं बिखर गई थी। फिर जब तुम मिले, सब ठीक लगने लगा… लेकिन डर भी लगने लगा।”

आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।”

उसके बाद के दिन आसान नहीं थे। सना कभी-कभी उदास हो जाती, कभी खो जाती। लेकिन आरव ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा। वो उसे लाइब्रेरी ले जाता, म्यूज़िक सुनाता, और कहानियाँ सुनाता।

धीरे-धीरे, सना मुस्कुराने लगी। एक दिन उसने आरव से कहा,
“अगर तुम मेरी ज़िंदगी में नहीं आते, तो शायद मैं फिर कभी प्यार पर यक़ीन नहीं कर पाती।”

एक साल बाद, फिर वही दिन आया — जून का आख़िरी हफ़्ता।
वही जगह, वही बस स्टॉप। बारिश उसी तरह झमाझम हो रही थी।

सना और आरव वहीं खड़े थे। आरव ने पूछा, “याद है यहाँ क्या हुआ था?”
सना ने कहा, “यही तो वो शाम थी, जब मेरी कहानी फिर से शुरू हुई थी।”

आरव ने घुटनों के बल बैठकर अंगूठी निकालते हुए कहा, “तो क्या अब हम इस कहानी को कभी खत्म न होने वाली किताब बना दें?”

सना की आँखों में आँसू थे। वो झुक गई और उसे गले से लगा लिया।

हर कहानी का एक अतीत होता है, लेकिन उसका भविष्य वही तय करता है जो उसे थामने की हिम्मत रखता है।
आरव और सना ने एक-दूसरे को थामा — बारिश के मौसम में, डर के बावजूद, उम्मीद के साथ।
और बरसात की वो शाम, अब सिर्फ़ एक याद नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत मोड़ बन चुकी थी।

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