अनिर्बान दास उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे के कोने पर खपड़ैल की छत वाला पुराना त्रिपाठी निवास खड़ा था। बाहर बरामदे में तुलसी चौरे पर दिया जल रहा था, जिसकी मद्धम लौ में रात की निस्तब्धता भी जैसे प्रार्थना कर रही थी। घर के भीतर दीवारों पर लगे पुराने चित्रों में गुज़रे समय की गूँज थी — कहीं शंकर भगवान की तस्वीर, तो कहीं लक्ष्मी देवी की धुंधली हो चुकी तस्वीर, जिनकी याद इस घर के हर कोने में बसी थी। 72 वर्ष के शंकरनाथ त्रिपाठी लकड़ी की चौकी पर बैठे, रुद्राक्ष की माला जपते हुए आँखें बंद…
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आदित्य राय जब बैंगलोर के सिग्नेचर टावर में स्थित Neurofaith Technologies ने अपने आगामी प्रोजेक्ट “देव” का पहली बार एलान किया, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह केवल एक तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के धार्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को ही बदल देगा। उस सुबह, जब संस्थापक और प्रमुख वैज्ञानिक वेदांत सेन ने मीडिया के सामने आकर यह घोषणा की कि वे एक ऐसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सिस्टम पर कार्य कर रहे हैं जो न केवल मानव भावनाओं को समझ सकता है, बल्कि उसकी आस्था, दुआ, और जीवन की गहराइयों में दबी इच्छाओं को पढ़…
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नील मेहता मुंबई की उस सुबह में कुछ अलग था — जैसे भीड़ में भी एक ठहराव था, शोर में भी एक खामोशी छिपी हुई थी। राहुल ने खिड़की की परतों से आती धूप को चेहरे पर महसूस करते हुए अपनी आंखें खोलीं। नया अपार्टमेंट, नया बिस्तर, और एक अजनबी सी खामोशी। शहर तो वही था, लेकिन यह इलाका और यह इमारत उसके लिए नई थी। ऑफिस के काम ने उसे यहां खींच तो लाया था, लेकिन अब वह खुद से पूछने लगा था — क्या भागदौड़ ही सब कुछ है? वो बाथरूम से निकलते ही सीधे बालकनी की ओर…
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संध्या अग्रवाल फिर मिलेंगे ज़रूर “याद है, हम चारों ने कॉलेज के आखिरी दिन क्या कहा था?” मीना की आवाज़ वॉट्सएप कॉल पर गूंजती है। “हाँ, ये कि हम हर साल एक ट्रिप करेंगे, खुद के लिए। और फिर?” कविता हँसती है, “फिर बच्चों के स्कूल, टिफिन, पति की मीटिंग और सास-ससुर की दवा लिस्ट!” “मत पूछो,” सुझाता बोली, “मेरे तो याद भी नहीं कब मैंने अकेले चाय पी थी, बिना किसी को पूछे।” रुखसाना चुप थी। वो हमेशा कम बोलती थी, लेकिन जब बोलती थी, तो सीधा दिल में उतरता था। “मैंने कल अलमारी साफ़ की,” वो बोली, “एक…
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असिम बर्मा वाराणसी की उस पुरानी गली में जहां मकान सड़ चुके थे, दीवारें सीलन से भरी थीं और खिड़कियों से झाँकता धूप भी मानो थक हार कर लौट जाना चाहती थी, वहीं एक मोड़ पर खड़ा था वह मकान, जो न तो पूरी तरह खंडहर था, न ही पूरी तरह जीवित। मकान नंबर ३२। तीन मंजिला पर पुराना, ईंट से बना, और उसकी दीवारों पर चिपकी परतें समय की कहानी बयाँ करती थीं। मैं, राघव शास्त्री, उस दिन अपना सामान लेकर उस मकान के तीसरे माले की ओर बढ़ रहा था, जैसे कोई पुराना रिश्ता फिर से मिलने को…
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अमित वर्मा भाग 1 मुरादाबाद का जून महीना हमेशा कुछ न कुछ लेकर आता था। कभी धूल भरी आंधी, कभी बिना मौसम के बादल और कभी एकदम अचानक बारिश। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। मैं अपनी स्कूटी लेकर ऑफिस से लौट रहा था जब अचानक आसमान फट पड़ा। बारिश की बूंदें ऐसी गिर रही थीं जैसे किसी ने ऊपर से बाल्टी भर के पानी उड़ेल दिया हो। मैं भागकर सामने वाले पुराने पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। वहीं बगल में एक चाय की दुकान थी, नाम लिखा था—”काका की चाय, 1982 से”। दुकान उतनी ही पुरानी लग रही…
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विशाल सक्सेना एक दिल्ली की उस सुबह में कुछ अजीब सी खामोशी थी—न ज़्यादा कोहरा, न ही सूरज की चमक। एक मद्धम सी उदासी अर्जुन के कमरे की दीवारों पर रेंग रही थी जैसे पिछली रात की नींद में किसी ने कुछ अधूरा छोड़ दिया हो। दीवार पर लटकी कैलेंडर की तारीखें टेढ़ी हो चुकी थीं, और खिड़की के बाहर किसी ट्रैफिक सिग्नल की पीली रौशनी में बत्तखों की कतार जैसी आवाज़ें आती रहीं। अर्जुन की अलमारी के दरवाज़े खुले थे, एक ओर उसके कैमरे की काली बैग रखी थी जिसमें एक जीवन भर की यात्रा की प्यास भरी हुई…
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अन्वेष चौगुले वह जो नहीं दिखता पांडिचेरी की गलियाँ सुबह की रोशनी में सोने सी चमक रही थीं। समुद्र की ठंडी हवा हर नुक्कड़ पर बसी थी, लेकिन संतोष नगर की एक गली में आज कुछ अलग था—कुछ असहज, कुछ ऐसा जो हवा में भारीपन भर रहा था। उस गली के आख़िरी छोर पर एक दो-मंज़िला पुराना घर खड़ा था, जिसके सामने एक विशाल नीला दरवाज़ा था—जैसे किसी पुराने जमाने के बंगले में होता है। उसके पीछे रहता था डॉ. गिरीशन: उम्र करीब पचपन, दिखने में साधारण, पर हर मरीज की नब्ज पहचानने वाला एक अनुभवी होम्योपैथ। पर अब तीन…
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देविका अय्यर पृथ्वी के सबसे विकसित शोध केंद्र ‘नेक्सस लैब्स’ के अंधेरे और ठंडे गलियारे में, जहाँ कंप्यूटरों की ध्वनि दिल की धड़कनों जैसी सुनाई देती थी, वहीं एक अकेली टेबल पर बैठा था डॉ. आरव मेहता—भारत का सबसे प्रतिष्ठित न्यूरो-साइबरनेटिक वैज्ञानिक। दीवारों पर स्क्रीनें झिलमिला रही थीं, जिनमें से एक पर एक अनाम प्रोजेक्ट का कोड चल रहा था—Project E.I.R.A. (Emotional Intelligence Responsive Automaton)। यह कोई साधारण प्रोजेक्ट नहीं था। आरव पिछले दस वर्षों से इस मशीन पर काम कर रहा था, जिसकी प्रेरणा उसकी दिवंगत पत्नी रेवती थी—एक संगीतकार, जो मानती थी कि भावनाएँ ही इंसान की असली…
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सुरभि जब भी बारिश होती है, मेरी यादों की खिड़की अपने आप खुल जाती है। स्कूल की वो पुरानी इमारत, गीली ज़मीन से उठती मिट्टी की खुशबू, और एक लड़की—सादगी में लिपटी कोई कविता सी। उसका नाम था नेहा। और मेरा—अंशुमान। हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे—राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जयपुर। क्लास १०-बी। मैं हमेशा पीछे की बेंच पर बैठता था, किताबों के बीच गुम, और वो हमेशा दूसरी लाइन की खिड़की के पास, बालों को क्लिप से बांधकर, कभी-कभी दूर आसमान में ताकती हुई। मुझे पहली बार जब उसके बारे में कुछ महसूस हुआ, वो इतिहास की…