Hindi
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अंधेरे में हँसी
अमूलिक त्रिपाठी भाग 1 रतनलाल मिश्र को रिटायर हुए दो साल हो चुके थे, लेकिन मोहल्ले में अब भी लोग उन्हें ‘मिश्र जी पोस्टमैन’ कहकर बुलाते थे। असली नाम से कोई कुछ नहीं पुकारता, जैसे आदमी नहीं, उसकी पुरानी नौकरी ही उसकी पहचान हो। रतनलाल को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। अब तक तो आदत…
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किस्तों में ज़िंदगी
मनोज नायक पहला अध्याय राकेश की ज़िंदगी की सुबह हमेशा की तरह उठी, लेकिन आज का दिन उसके लिए खास था। एक ऐसी शुरुआत जो उसके लिए सिर्फ नए सपनों का नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों और चुनौतियों का भी आगाज़ था। वह उस मोड़ पर था जहां उसके परिवार की आर्थिक स्थिति में बदलाव आना था।…
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एक सफर… खुद से मिलने का
रीनी शर्मा दिल्ली का जनवरी महीने का मौसम था। हल्की ठंड, कोहरे की चादर और भीड़-भाड़ से भरी सड़कें। हर इंसान जैसे किसी अदृश्य घड़ी की सुई के पीछे दौड़ रहा था—बिना रुके, बिना पूछे कि ये दौड़ किसके लिए है? इन्हीं लाखों चेहरों में एक चेहरा था अर्जुन मेहरा का—32 वर्षीय, सॉफ्टवेयर कंपनी में…
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रात की आहट
विवेक मिश्रा शाम के साढ़े पांच बजे का वक्त था। आसमान धीरे-धीरे नारंगी से जामुनी होता जा रहा था। धूप की आखिरी किरणें गांव के पुराने पीपल के पेड़ों से छनकर मिट्टी पर पड़ रही थीं, और कहीं-कहीं से झींगुरों की आवाज़ें हवा में घुलने लगी थीं। यही वो वक़्त था जब रवि अपनी मोटरसाइकिल…
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कुंभ के मेले में खोया
अनिरुद्ध त्रिपाठी जनवरी की ठंडी सुबह थी। कुंभ मेले का शोर हर दिशा में गूंज रहा था — गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम तट पर आस्था और भक्ति की एक अलग ही दुनिया बसी थी। साधु-संतों की आवाज़ें, ढोल-नगाड़ों की थाप, मंत्रों की गूंज और दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का उत्साह — सबकुछ मानो…
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तेरे नाम सा कुछ…
शर्मिष्ठा दीक्षित दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस में नए सत्र की चहल-पहल थी। अगस्त की उमस भरी सुबह, बादलों की ओट से झांकती धूप, और कॉलेज की पुरानी बिल्डिंग के गलियारे, सब कुछ जैसे किसी नई कहानी के लिए तैयार खड़ा था। पहला साल, नया कॉलेज, नई किताबें, और अनगिनत अनजाने चेहरे। इन्हीं चेहरों में…
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समय के पर
हिमांशु वर्मा १ डॉ. समीर वर्मा के लिए विज्ञान सिर्फ एक पेशा नहीं था—वह उनका जुनून था, उनका सपना था, उनका अस्तित्व था। दिल्ली यूनिवर्सिटी के थ्योरीटिकल फिजिक्स विभाग में कार्यरत समीर उन विरले वैज्ञानिकों में से थे, जो विज्ञान को महज फॉर्मूलों और समीकरणों तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसमें जीवन के हर…
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अपराध की छाया
रवि शर्मा 1 शहर के बाहरी इलाके में एक वीरान मकान था, जिसके चारों तरफ कंटीली झाड़ियों का घेरा था। लोग कहते थे कि वहां रात में अजीब आवाजें सुनाई देती हैं। किसी ने बताया था कि सालों पहले वहां एक कत्ल हुआ था और वो मकान तब से वीरान पड़ा था। इंस्पेक्टर राघवन को…
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परछाई की साजिश
अध्याय 1: आगमन वाराणसी, प्राचीनता की जीवित परिभाषा। गंगा की गोद में बसी यह नगरी, समय के प्रवाह में भी स्थिर जान पड़ती है — जैसे हर पत्थर, हर मोड़, हर गली ने सदियों की कहानियाँ अपने भीतर समेट रखी हों। सुबह की आरती, शाम की गूंजती घंटियाँ, घाटों पर बैठे साधु, और तंग गलियों…
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बरसात की वो शाम
स्वप्निल वर्मा दिल्ली की वो शाम बेहद भीगी हुई थी। जून का आख़िरी हफ्ता था और मौसम विभाग ने जिस बारिश की चेतावनी दी थी, वो अब हक़ीक़त बनकर शहर की सड़कों को बहा ले जा रही थी। बिजली चमक रही थी, ठंडी हवाएं चल रही थीं और हर गली-मोहल्ला जैसे पानी के नीचे डूबा…
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टाइम मशीन वाला लड़का
निहारिका शर्मा आठवीं कक्षा का छात्र अंशुल एक सामान्य लड़का था — न बहुत होशियार, न बहुत शरारती। लेकिन एक चीज़ जो उसे सबसे अलग बनाती थी, वो थी उसकी जिज्ञासा। उसे मशीनों से, तारों से, घड़ी के पुर्ज़ों से खेलना बेहद पसंद था। जब उसके दोस्त क्रिकेट खेलते या वीडियो गेम में खोए रहते,…
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अल्लाहाबाद की पतंगें
अमूलिक त्रिपाठी संगम के आकाश में संगम नगरी इलाहाबाद की सुबहें कुछ अलग होती हैं। जब सूरज यमुना के ऊपर से अपना नारंगी उजाला धीरे-धीरे फैलाना शुरू करता है, तब शहर की संकरी गलियों से आवाज़ें आने लगती हैं—“पेच दे!” “ढील दे!” “अब कटेगी!” यही पतंगबाज़ी की शुरुआत होती है। नौवी कक्षा का छात्र अर्जुन…












