मायूरी शंकर माया ने मुंबई की व्यस्त और तनावपूर्ण जिंदगी से थक कर गोवा जाने का फैसला किया था। वह एक कॉर्पोरेट पेशेवर थी, जो अपने काम में हमेशा डूबी रहती थी। हर दिन की भागदौड़, मीटिंग्स और डेडलाइन्स ने उसे मानसिक और शारीरिक थकावट का शिकार बना दिया था। वह किसी तरह अपने कार्यों को पूरा करती, लेकिन अंदर ही अंदर वह महसूस कर रही थी कि वह अपनी जिंदगी को खोती जा रही है। पिछले कुछ दिनों से उसकी आंखों में एक अजीब सी थकान थी, और मन में खालीपन महसूस हो रहा था। एक दिन उसने अचानक…
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१ राजस्थान की तपती धरती पर बीकानेर से करीब ८० किलोमीटर उत्तर-पश्चिम की ओर बसे कर्णसर गाँव की ओर बढ़ते हुए विराज प्रताप शेखावत के कैमरे का लेंस हर बंजर टीले, हर झुलसे पेड़, और हर झोंपड़ी को अपनी स्मृति में कैद कर रहा था। उसकी SUV रेत में बार-बार धँसती, पर चालक रफीक के अनुभव से रास्ता मिल ही जाता। विराज के पास बस एक अधूरी रिपोर्ट, एक पुराना नक़्शा, और अपनी गुमशुदा सहयोगी अन्वी चतुर्वेदी की फील्ड डायरी की कुछ जली पन्नियाँ थीं। चैनल हेड उसे इस स्टोरी से हटा चुका था—“लोककथाओं के पीछे वक्त ज़ाया न कर,…
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अनुज वर्मा दिल्ली की उमस भरी गर्मी की दोपहर में नेहा शर्मा जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से होकर उस हवेली की तरफ़ बढ़ी, तो उसके दिल में हल्का-सा डर और अजीब-सी उत्सुकता एक साथ उभर आई। हवेली का नाम उसने कई बार सुना था, अख़बारों में उसकी तस्वीरें भी देखी थीं, पर सामने खड़े होकर उसकी जर्जर दीवारों को देखना जैसे किसी पुराने ज़ख्म की परत हटाने जैसा था। टूटी हुई जालीदार खिड़कियाँ, ऊपर से झूलती बेलें और लोहे का ज़ंग खाया बड़ा सा दरवाज़ा — सब कुछ जैसे समय के थपेड़ों से थक कर झुक गया था।…
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शिवांगी राणा 1 कालाजोर। झारखंड-बिहार की सीमा पर बसा एक छोटा-सा कस्बा, जो अब धीरे-धीरे एक कोयला साम्राज्य की अंधेरी गहराइयों में समा चुका है। सूरज की पहली किरणें भी यहाँ की काली मिट्टी में अपना रंग खो देती थीं। एक समय था जब यहाँ जीवन था—खेत, मेले, और बच्चों की किलकारियाँ। अब हर कोने से सिर्फ एक ही आवाज़ आती थी—डंपर की घरघराहट, मशीनों की चरमराहट और… खदानों से उठती एक लंबी थकान भरी साँस। आईपीएस अधिकारी अवनि राय जब ट्रेन से उतरीं, तो सबसे पहले उन्होंने वही साँस सुनी—जैसे किसी ज़िंदा शहर के सीने पर कोयले की मोटी…
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आयुषी राठौर भाग 1: आवाज़ों के बीच “धड़-धड़-धड़-धड़।” नवीन त्रिपाठी की सुबह की पढ़ाई का राग एक बार फिर उस मोगरी की थाप से बिगड़ गया। उसने ज़ोर से किताब बंद की, चश्मा उतारा, और आंखें मिचमिचाते हुए सामने वाली छत की ओर देखा। वहीं थी — वही लड़की — नीली सलवार-कुर्ता, बाल झटका हुआ, हाथ में मोगरी। मुस्कुरा रही थी, मानो जानबूझकर ये सब कर रही हो। “ओ मैडम!” नवीन ने आवाज़ लगाई, “थोड़ा धीरे चला लीजिए मोगरी। हर दिन यही शोर!” लड़की ने थाली में से कपड़े निकालते हुए कहा, “पढ़ाई में मन नहीं लग रहा तो मोगरी…
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रचना चौहान चाय की पहली प्याली कचहरी के सामने जो टूटी-फूटी सड़क थी, वहीं एक कोने में लकड़ी की छोटी-सी गाड़ी पर दिन की शुरुआत होती थी एक उबलती केतली की आवाज़ से। सुबह के सात बजते ही उस गाड़ी के पास एक बुज़ुर्ग महिला सफेद सूती साड़ी में आ जातीं, माथे पर बड़ी लाल बिंदी, बाल पूरी तरह सफ़ेद, लेकिन चाल में अब भी गज़ब की चुस्ती। लोग उन्हें नाम से नहीं, दिल से जानते थे—”चाय वाली अम्मा”। पैंतीस साल से उसी जगह चाय बना रही थीं। किसी को नहीं मालूम कि वो कहाँ से आई थीं, कौन उनका…
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अभिराज गुप्ता भोपाल की कोचिंग स्ट्रीट पर शाम ढलते ही भीड़ उमड़ने लगती है। सड़क के दोनों ओर कतार से लगे कोचिंग सेंटर्स से थके हुए छात्रों की भीड़ निकलती है, हाथों में बैग, आंखों में अधपकी नींद और मन में परीक्षा की चिंता। इन्हीं में एक लड़का हर शाम बिना चूके ठेले की एक विशेष गंध की तरफ खिंचता चला आता है। उसका नाम है वेदांत शर्मा। ग्वालियर से आया है, और कोचिंग के इस शहर में अपना इंजीनियरिंग का सपना लिए भटक रहा है। बाकी लड़कों से कुछ अलग है—भीड़ में होते हुए भी अलग-थलग, बातों में नहीं…
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सोनल शर्मा पहली रात बसेरिया में प्राची मिश्रा की कार धूल उड़ाती हुई जब बसेरिया गांव के छोर पर पहुँची, तब शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। चारों ओर पीली रोशनी में नहाया खेत, सूखी घास की सरसराहट और दूर कहीं पीपल के पेड़ पर बैठे कौवे की कांव-कांव। उसने कार से उतरते हुए कैमरा और बैग उठाया, मोबाइल की लो बैटरी का नोटिफिकेशन नजरअंदाज़ किया, और अपनी डायरी जेब में खिसका ली। दिल्ली से करीब आठ घंटे की दूरी पर स्थित बसेरिया अब बस एक नाम भर रह गया था। कभी गुलजार रहा ये गांव अब जैसे साँसें…
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माधुरि वर्मा १ लखनऊ की हल्की बारिश में भीगता शहर उस शाम असहज सन्नाटे में डूबा था, जब नेहा द्विवेदी की लाश उसके छोटे से किराए के फ्लैट में मिली। दीवार पर एक अधजला अगरबत्ती होल्डर अब भी धुआँ छोड़ रहा था और खिड़की से आती हल्की हवा कागज़ के पन्नों को सरसराहट के साथ उड़ा रही थी। पुलिस आई, फॉरेंसिक टीम आई, और एक सीलबंद बॉडी बैग में उसे बाहर ले जाया गया — मानो वह कोई केस फाइल हो, जो अब बंद की जा रही हो। उसके पास रखी डायरी का आखिरी पन्ना — अधूरा और खून से…
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निशा अरोरा एक दिल्ली के उस सुबह की धूप बेहद सामान्य थी—उजली, लेकिन भावना से शून्य। अद्वैता शर्मा की खिड़की से छनकर आती रोशनी जैसे उसका चेहरा नहीं, उसकी पुरानी आदतों पर गिर रही थी। साढ़े सात बजे का अलार्म बंद कर वह वैसा ही उठी जैसे हर दिन, मैकेनिक की तरह। कॉफी मशीन चालू, बाथरूम की टाइल्स पर नंगे पाँव चलना, और टेबल पर बिखरे केस फाइल्स को एक नज़र देखना—जैसे उसने ज़िंदगी को स्वचालित मोड पर डाल रखा हो। लेकिन आज कुछ अलग था। उसकी आँखें एक जगह पर अटक गईं थीं—बुकशेल्फ़ के ऊपरी कोने पर रखी वो…