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    “सपनों की खिड़की”

    अदिति राठी भाग 1 – मुलाक़ात दिल्ली की सर्दियों में धूप किसी पुराने कंबल की तरह होती है—पतली, मगर भरोसेमंद। अनाया ने खिड़की पर टंगी धुले हुए कपड़ों की कतार के बीच से झांककर आकाश को देखा और घड़ी पर नज़र डाली। सुबह के आठ बजकर पैंतालीस। नौ बजे की ब्लू लाइन पकड़नी है। उसके फोन पर माँ का मैसेज चमका—“शाम तक सब्ज़ी ले आना, और अम्मा के लिए दवा भी।” उसने “ठीक है” टाइप किया, बैग उठाया और दुपट्टा कंधे पर पक्का किया। नोटबुक बैग के सबसे अंदर, जैसे कोई निजी पुड़िया — जिसमें नाम, जगहें और कुछ अधलिखी…

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    लखनऊ की कहकशां

    समीरा आबरू पुराना लखनऊ उस शाम कुछ और ही रौनक में डूबा हुआ था। चौक की हवेली, जिसकी मेहराबों में अब भी पुराने ज़माने की नवाबी झलकती थी, आज रोशनियों से नहा रही थी। झूमरों की सुनहरी चमक, दीवारों पर लटकते रंग-बिरंगे पर्दे और आँगन में बिछे मोटे क़ालीन, सब मिलकर माहौल को एक अदबी जन्नत बना रहे थे। पान और इत्र की ख़ुशबू हवाओं में घुली थी, और शेर-ओ-शायरी के शौक़ीन लोग धीरे-धीरे महफ़िल में अपनी जगह तलाश कर रहे थे। शेरों की दबी-दबी गुनगुनाहट, मुस्कुराहटों और आदाब के सिलसिले ने महफ़िल को पहले ही गर्म कर दिया था।…

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    आख़िरी ट्रेन टू बनारस

    सौरभ पांडेय भाग 1 – बनारस की रात बनारस स्टेशन की पुरानी घड़ी रात के ग्यारह बजकर पैंतीस मिनट दिखा रही थी और प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ियों की आवाजाही थम-सी गई थी, आख़िरी ट्रेन के इंतज़ार में कुछ बचे-खुचे यात्री धीरे-धीरे अपनी चादरें समेट रहे थे, कोई थैले से समोसा निकालकर खा रहा था, तो कोई चाय वाले की स्टील के गिलास से धुआँ उड़ाते हुए अपने थके चेहरे को राहत दे रहा था, और इसी भीड़ में कबीर हाथ में पुराना बैग थामे बेचैन नज़रों से ट्रैक की ओर देख रहा था क्योंकि उसे किसी भी हालत में ये आख़िरी…

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    दुपट्टा और स्टेथोस्कोप

    अन्वी शर्मा १ लखनऊ मेडिकल कॉलेज की सुबह हमेशा अलग होती थी—कभी नीले आसमान में सूरज की तेज़ धूप सीधी इमारतों की सफ़ेद दीवारों पर पड़कर चमक उठती, तो कभी बरामदों में टंगे नीले-हरे कोट और सफ़ेद लैब कोट हवा में झूलते रहते। उस सुबह कैंपस में एक अलग ही हलचल थी, क्योंकि नए बैच की कक्षाएँ शुरू हो रही थीं। हॉस्टल से निकलती लड़कियों के समूहों में हंसी-ठिठोली और लड़कों के बीच किताबें और नोट्स के बोझ तले दबे चेहरे—हर जगह एक ताजगी का माहौल था। इन्हीं चेहरों के बीच नायरा खान थी—दूसरे साल की मेडिकल स्टूडेंट, लेकिन नई…

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    मोबाइल का मिस्ड कॉल

    आरव मेहरा भाग 1 — अनजान आवाज़ उस रात दिल्ली की हवा में नमी थी और मेरी खिड़की पर महीन बारिश टपक रही थी। मैं लैपटॉप बंद करके बिस्तर पर गिरा ही था कि फोन बज उठा—एक नंबर जो पहले कभी नहीं देखा। मैंने उठाया, “हेलो?” दूसरी तरफ एक गहरी साँस, फिर धीमी आवाज़, “सॉरी… गलती से डायल हो गया।” उस स्वर में बारिश की-सी झनझनाहट थी। मैंने “कोई बात नहीं” कहा और कॉल कट गई। पाँच मिनट बाद वही नंबर फिर। “इस बार भी गलती?” मैंने मुस्कुराकर पूछा। वह बोली, “मत काटिए… बस पूछना था—क्या आपके यहाँ भी यह…

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    आख़िरी पन्ना

    समीरा चतुर्वेदी १ काव्या के लिए किताबों की दुकान किसी मंदिर से कम नहीं थी। हर शनिवार दोपहर वह अपने बैग में एक नोटबुक और पेन रखकर मेट्रो से सीधे कनॉट प्लेस की उस संकरी गली में उतरती, जहाँ लकड़ी की अलमारियों और पुराने काग़ज़ की गंध से भरी वह छोटी-सी दुकान थी। बाहर से देखने पर वह दुकान किसी पुराने ज़माने की विरासत लगती—फीकी होती हुई नीली पेंट की दीवारें, दरवाज़े पर लटकता हुआ घंटी वाला परदा और अंदर जाते ही धूल और इतिहास की मिली-जुली खुशबू। काव्या को हमेशा लगता कि इस जगह पर किताबें सिर्फ़ पढ़ने के…

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    चाँदनी चौक की मोहब्बत

    आरव सक्सेना भाग 1 : भीड़ के बीच पहली नज़र पुरानी दिल्ली का दिल है चाँदनी चौक। यहाँ की गलियाँ इतनी तंग हैं कि दो साइकिलें साथ निकलें तो लगता है जैसे दीवारें कानाफूसी कर रही हों। सुबह का वक़्त था। सूरज की सुनहरी रोशनी लाल क़िले की बुर्ज़ों से उतरकर हौज़ क़ाज़ी की तरफ़ फैल रही थी। दुकानों के शटर धीरे-धीरे उठ रहे थे, पर गलियाँ पहले ही ज़िंदा हो चुकी थीं। मिठाईवालों के यहाँ से ताज़े जलेबी की महक, चायवालों की केतली से उठती भाप और रिक्शों की घंटियों की आवाज़ मिलकर एक अलग ही संगीत बना रही…

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    तेरे नाम की ख़ामोशी

    स्मृति चौहान भाग 1 – मुलाक़ात दिल्ली की उस ठंडी सुबह में हवा में हल्की धुंध घुली थी। कनॉट प्लेस की गोलाई पर कॉफ़ी शॉप्स की हलचल धीरे-धीरे बढ़ रही थी। भीड़ के बीच भी आरव को सब कुछ फीका लग रहा था। वह अपने लैपटॉप बैग को कंधे पर टाँगे एक पुरानी किताब की तलाश में ‘कॉफ़ी एंड पेजेज़’ नाम की बुक-कैफ़े में चला गया। कैफ़े का लकड़ी का दरवाज़ा खोलते ही उसकी नज़र उस पर पड़ी। खिड़की के पास वाली टेबल पर बैठी वह लड़की, जिसके बालों पर हल्की धूप झलक रही थी। उसकी आँखें किताब में गुम…

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    कच्छ की चांदनी

    अनुपमा राजपूत १ दिल्ली की ठंडी, धुंधभरी सुबह में जब हवाई जहाज़ ने उड़ान भरी, तो समीर राठौड़ के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी—कुछ वैसी, जैसी किसी पुराने दोस्त से मिलने से पहले महसूस होती है, भले ही वो दोस्त कभी सच में मिला न हो। ट्रैवल ब्लॉगिंग उसके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि एक जिज्ञासापूर्ण यात्रा थी—कहानियों की तलाश में भटकना, उन्हें कैमरे और शब्दों में कैद करना। इस बार उसका गंतव्य था गुजरात का कच्छ, जहाँ सालाना रण उत्सव चल रहा था। फ्लाइट से उतरते ही हल्की धूप, सूखी हवा और नमक-सी महक लिए एक खुला आसमान उसका…

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    बारिश की महक

    १ मुंबई की हलचल भरी सुबह में, जब अरब क्रिएटिव एजेंसी की 12वीं मंज़िल पर धूप कांच की दीवारों से छनकर बोर्डरूम में गिर रही थी, तभी नए कैंपेन की मीटिंग शुरू हुई। एजेंसी का यह सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था—एक इंटरनेशनल ब्रांड का भारत में पहला बड़ा लॉन्च—और हर कोई इस मीटिंग में अपनी चमक दिखाने के लिए तैयार बैठा था। कमरे में मौजूद क्लाइंट, अकाउंट मैनेजर, आर्ट डायरेक्टर्स, और कॉपी टीम के बीच, अरब मेहता की उपस्थिति अलग ही थी। शांत, सधे हुए, लेकिन आंखों में गहराई लिए, वह क्रिएटिव डायरेक्टर के तौर पर अपने नोट्स के साथ तैयार…