प्रेम कहानियाँ
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बारिश की वो बात
आरोही वर्मा वो जुलाई की पहली बारिश थी। दिल्ली की सड़कों पर धूल धुल रही थी और आसमान के हर कोने से बूंदें टपक रही थीं। ऑफिस से लौटते वक़्त सारा कुछ भीग गया था—कपड़े, बाल, मन। लेकिन अदिति को बारिश से कभी शिकायत नहीं थी। बारिश उसके लिए हमेशा एक नया पन्ना खोलती थी—नमी…
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गुलाबी दुपट्टा
ईशा पांडेय १ दिल्ली की एक उमस भरी दोपहर थी। चारों ओर ट्रैफिक का शोर, कारों के हॉर्न और मोबाइल फोन की लगातार बजती घंटियाँ करण वर्मा की चेतना को कुंद कर रही थीं। अपने ऑफिस के कांच लगे स्टूडियो में बैठा वह बार-बार कैमरे की लेंस से बाहर झांक रहा था — जैसे कोई…
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विवाह से पहले
विवेक शर्मा जयपुर की सर्दियों में जब गुलाबी हवाएं हवेली की पुरानी खिड़कियों से टकराती थीं, उस समय गोयल परिवार के आँगन में गहमागहमी थी। हल्के गुनगुने धूप में बैठे बुज़ुर्ग चाय पीते हुए किसी बड़े फैसले की चर्चा कर रहे थे, और रसोई से आती मसालों की खुशबू माहौल को और आत्मीय बना रही…
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पल दो पल की बात नहीं थी
श्रेयांशी वर्मा फिर से देखना वाराणसी की वो दोपहर वैसी ही थी जैसी होती है—धूल भरी, हल्की धूप से चकाचौंध, और गंगा की तरफ बहते हवा के छोटे-छोटे झोंकों के साथ एक ठहराव लिए। घाटों के पास बैठा आरव त्रिपाठी, अपनी डायरी की खाली पन्नियों को ताक रहा था, मानो शब्द कहीं खो गए थे।…
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उस रात जंतर मंतर पर
विराज देशमुख अध्याय १ दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस की सड़कें अगस्त की हल्की बारिश से चमक रही थीं। पेड़ों की पत्तियाँ भीग चुकी थीं, और हॉस्टल के गलियारों में एक नई उमंग घुली हुई थी—नए सेमेस्टर की, नई क्लासेस की, और हाँ, नए चेहरों की भी। आर्ट्स फैकल्टी के बाहर एक छोटा-सा जमावड़ा था,…
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कुमाऊँ की हवाएँ
सान्या जोशी अदिति कपूर की ज़िन्दगी एक दौड़ बन चुकी थी। दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर उसके कदम तेज़ थे, और उसकी आँखें हमेशा किसी न किसी लक्ष्य की ओर दौड़ती रहती थीं। एक सफल कॉर्पोरेट पेशेवर, 28 वर्षीय अदिति ने शहर की तेज़-तर्रार दुनिया में अपने कदम जमा लिए थे। मगर, अब यह सब…
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तेरा इंतज़ार
नवनीत तनेजा अध्याय १: “ख़ामोश दिल की रातें” रेडियो स्टेशन की हल्की पीली रौशनी में बैठी सिया राय ने अपने सामने रखे माइक की ओर देखा। रात के दस बजने ही वाले थे, और वो पल आने वाला था जब उसकी आवाज़ शहर की अनगिनत खिड़कियों से होकर उन लोगों तक पहुँचेगी जो तन्हा हैं,…
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कांच सा दिल
कविता राठौर दिल्ली विश्वविद्यालय की उस पुरानी लाइब्रेरी में जैसे समय ठहर गया था। दीवारों पर किताबों की महक और खिड़की से आती धूप की एक पतली परत उन पन्नों पर गिरती, जिनमें जाने कितनी कहानियाँ कैद थीं। आरव वहाँ रोज़ आता था—शायद किताबों से ज़्यादा खामोशी से मिलने। लेकिन उस दिन सब कुछ बदल…
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दियों के बीच मोहब्बत
सात साल के बाद भारत की ज़मीन पर पैर रखते ही अनुपम को एक अजीब-सी गरमाहट महसूस हुई, जैसे किसी पुराने स्वेटर को फिर से पहन लिया हो। एयरपोर्ट से निकलते ही चिलचिलाती धूप और खस्ता ट्रैफिक ने उसे भले ही हल्का सा चौंका दिया हो, पर दिमाग कहीं और था — उन गलियों की…
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तेरे नाम की एक शाम
समीरा खान पहला भाग: वो शाम कुछ अलग थी दिल्ली की शामों में एक अजीब सी बात होती है। भीड़भाड़, ट्रैफिक, और गाड़ियों के हॉर्न के शोर के बीच भी कभी-कभी एक ऐसी ख़ामोशी उतरती है जो सीधे दिल तक पहुँचती है। ऐसा लगता है जैसे शहर थम सा गया हो, बस एक धीमा संगीत…
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पूर्णिमा की रात
श्रुति चतुर्वेदी अध्याय १: चाँदनी और लोककथा कुमाऊँ की पहाड़ियों में बसा वह छोटा सा गाँव अपनी ठंडी हवाओं, चीड़ के ऊँचे-ऊँचे वृक्षों और सदियों पुरानी लोककथाओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। बरसों से बुजुर्गों की कहानियों में एक रहस्य जिंदा था—पूर्णिमा की रात एक सफेद साड़ी में लिपटी औरत की परछाईं तालाब की…
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कॉफी मशीन के पास मोहब्बत
कविता अग्रवाल भाग 1: कॉफी मशीन के पास ऑफिस की सातवीं मंज़िल पर हर सुबह नौ बजकर पैंतालीस मिनट पर कॉफी मशीन के पास एक तयशुदा सी हलचल होती थी। मशीन की टन-टन की आवाज़, प्लास्टिक के कपों की हल्की खनखनाहट और थोड़ी-सी सुबह की थकान लिए लोग—इन सबके बीच आकांक्षा का आना किसी नियम…












