प्रेम कहानियाँ
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बनारस की गलियों में प्यार
विशाल सुरि गंगा की लहरों में आरण, दिल्ली का एक युवा लेखक, हमेशा से ही अपनी ज़िंदगी में कुछ नया और अनोखा ढूंढ़ने की कोशिश करता रहा था। उसका जीवन किताबों और कहानियों के बीच बसा था, लेकिन वह खुद कभी अपनी कहानी नहीं लिख पाया था। अपनी अगली किताब के लिए प्रेरणा की तलाश…
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धूप के टुकड़े
अन्वेषा सिन्हा १ निहारिका की दुनिया बहुत सीमित थी—एक पुराना, ऊँची छतওয়ाला कमरा जिसमें मोटे-मोटे परदे हर खिड़की को ढँके रखते थे, और दीवारों पर हल्की नमी और एक अधूरी राग की गूँज बसी रहती थी। दिल्ली के बांग्ला साहिब रोड के पुराने इलाके में स्थित उस मकान की छत पर कभी-कभी धूप उतनी बेधड़क…
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दिल का रास्ता
स्मिता कपूर करण एक सफल वकील था, जो हमेशा तर्क और क़ानून के आधार पर अपनी ज़िंदगी जीता था। उसने कभी भी अपनी भावनाओं को प्राथमिकता नहीं दी थी, और उसकी पूरी दुनिया सख्त अनुशासन और काम के हिसाब से चलती थी। वह अपने पेशे में माहिर था, और समाज में उसका सम्मान था। लेकिन…
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समंदर के किनारे इश्क
कविता प्रधान मुंबई की बारिश किसी पुराने फ़िल्मी गीत की तरह होती है — धीमी, भीगी, और दिल में उतरती हुई। शहर की रफ्तार थोड़ी थम जाती है, पर दिलों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। जुहू चौपाटी की रेत उस दिन भीगी हुई थी, हवा समंदर से नमक चुराकर ला रही थी, और आसमान…
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छत की मोगरी
आयुषी राठौर भाग 1: आवाज़ों के बीच “धड़-धड़-धड़-धड़।” नवीन त्रिपाठी की सुबह की पढ़ाई का राग एक बार फिर उस मोगरी की थाप से बिगड़ गया। उसने ज़ोर से किताब बंद की, चश्मा उतारा, और आंखें मिचमिचाते हुए सामने वाली छत की ओर देखा। वहीं थी — वही लड़की — नीली सलवार-कुर्ता, बाल झटका हुआ,…
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कुरकुरे और कविता
अभिराज गुप्ता भोपाल की कोचिंग स्ट्रीट पर शाम ढलते ही भीड़ उमड़ने लगती है। सड़क के दोनों ओर कतार से लगे कोचिंग सेंटर्स से थके हुए छात्रों की भीड़ निकलती है, हाथों में बैग, आंखों में अधपकी नींद और मन में परीक्षा की चिंता। इन्हीं में एक लड़का हर शाम बिना चूके ठेले की एक…
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उस रात जब चाँद मुस्कुराया
वेदिका शर्मा बमुश्किल शाम के साढ़े सात बजे होंगे जब आयरा सेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँची। प्लेटफॉर्म पर हलचल थी, लेकिन वह खुद किसी दूसरी लय में थी—धीमी, शांत और थोड़ी खोई हुई। पीठ पर कैमरा बैग और हाथ में एक काले रंग की डायरी थामे वो आगे बढ़ रही थी, जैसे किसी…
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वापसी की राह
अनिकेत तिवारी सुबह की भीड़भाड़ भरी दिल्ली, उसकी चिल्ल-पों और भागती ज़िंदगी की आवाज़ें जब भी खिड़की से भीतर आतीं, आदित्य के मन में एक खालीपन भर देतीं। उसकी ग्यारहवीं मंज़िल की बालकनी से दिखाई देता था ट्रैफिक का रेंगता हुआ सर्प, जिसके बीच वो भी रोज़ अपनी कार में फँसा रहता—सोचता हुआ कि आखिर…
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संगीत के उस पार
आकाश वर्मा १ मुंबई की बारिशें जैसे पूरे शहर को धो डालती थीं, वैसे ही कभी-कभी मन के भीतर जमी गर्द भी बहा ले जाती थीं। लेकिन विवान मल्होत्रा के लिए, आज की शाम औरों से अलग थी—बाहर की बूंदों में तो लय थी, मगर उसके भीतर सुर गुम थे। वह अपने छोटे से अपार्टमेंट…
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दिल्ली मेट्रो का मुसाफिर
मिताली गुप्ता १ दिल्ली की सुबहें कुछ अलग नहीं होतीं — ट्रैफिक का शोर, भागती हुई भीड़, गाड़ियों के हॉर्न और मेट्रो स्टेशनों पर गूंजती उद्घोषणाओं की आवाज़ें। लेकिन निहारिका की सुबहें उन सब से थोड़ी अलग थीं। वह हर सुबह ठीक 8:12 की ब्लू लाइन मेट्रो पकड़ती थी — द्वारका सेक्टर 9 स्टेशन से…
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ক্যালেন্ডারের বাইরের দিনগুলো
তিস্তা বন্দ্যোপাধ্যায় পর্ব ১: প্রথম ইমেল সকালটা শুরু হয়েছিল একেবারে নির্লিপ্তভাবে। স্নান, ব্রেকফাস্ট, মেট্রো, আর তারপর অফিস। কিন্তু সেই নির্লিপ্ততাকে ভেঙে দিল একটা ইমেল—অপরিচিত প্রেরকের, বিষয়বস্তু: “Couldn’t help noticing your post-it habit.” অপরাধ যেন হাতে নাতে ধরা পড়েছে। অনন্যা বসু, এইচআর ডিপার্টমেন্টের অ্যাসিস্ট্যান্ট ম্যানেজার, যাঁর ডেস্ক সবসময় একটা রঙিন ঝকঝকে পোস্ট-ইটের সাম্রাজ্য, প্রথমে একটু চমকে…
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तुम्हारे बिना भी तुमसे
अनामिका जोशी 1 शाम की हवा में अजीब सी उदासी थी, जैसे दिन अपने पैरों के निशान समेट रहा हो। दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन पर मयंक एक बेंच पर बैठा था, अपने नीले डफल बैग के ऊपर कोहनी टिकाए, और दूसरी ओर एक किताब पकड़े—”Norwegian Wood”। कानों में ईयरफोन, लेकिन कोई गाना नहीं चल…












