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राशन कार्ड

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नीलाभ रंजन


रात के आख़िरी पहर जब गाँव के ऊपर धुंध उतर रही थी, रामसेवक अपनी टूटी हुई चारपाई के पास बैठा पुराने लोहे के बक्से में कपड़े भर रहा था। घर के आँगन में मिट्टी का चूल्हा ठंडा पड़ा था। सुनीता चुपचाप बच्चों के फटे कपड़े तह कर रही थी। दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं थी, क्योंकि जो बातें सबसे ज़रूरी होती हैं, वे अक्सर शब्दों में नहीं उतरतीं।

गाँव में इस साल तीसरी बार सूखा पड़ा था। तालाब महीनों पहले सूख चुका था। खेत का बचा हुआ हिस्सा भी साहूकार के पास गिरवी चला गया था। अब गाँव में सिर्फ़ भूख बची थी और उन लोगों की आँखें जो हर दिन किसी और के दुख में अपना आने वाला कल देखते थे।

सुबह होने से पहले वे बस अड्डे पहुँच गए। गुड़िया उनींदी आँखों से माँ का आँचल पकड़े थी। सोनू अपने छोटे से बैग को सीने से लगाए खड़ा था, जैसे उसमें कोई बहुत बड़ी दौलत रखी हो। बस पहले से भरी हुई थी। मजदूरों, गठरियों, बच्चों और पसीने की गंध से भरी हुई।

रामसेवक ने किसी तरह परिवार को पीछे वाली सीट के पास जगह दिलाई। बस चलने लगी तो गाँव धीरे-धीरे पीछे छूटता गया। मिट्टी की दीवारें, पीपल का पेड़, टूटा कुआँ— सब धुंध में खोते गए।

गुड़िया ने खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा,

“बाबू, शहर में भूख नहीं लगती क्या?”

रामसेवक ने उसकी तरफ़ देखा, लेकिन जवाब नहीं दिया। वह जानता था, कुछ सवालों का जवाब आदमी के पास नहीं होता।

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। बस अड्डे के बाहर लोगों का समुद्र था। गाड़ियों का शोर, धुएँ की गंध और भागते हुए चेहरे। शहर किसी मशीन की तरह लग रहा था जिसमें हर आदमी सिर्फ़ एक पुर्जा था।

रामसेवक का गाँव का पुराना जानकार सलीम उन्हें लेने आया। वह पास की झुग्गी बस्ती में रहता था। रास्ते भर वह शहर के नियम समझाता रहा—

“यहाँ बिना कागज़ आदमी कुछ नहीं। आधार चाहिए, राशन कार्ड चाहिए, पहचान चाहिए। नहीं तो कोई पूछेगा भी नहीं।”

झुग्गी बस्ती नाले के किनारे थी। टीन, प्लास्टिक और लकड़ी से बने छोटे-छोटे घर। बरसात में शायद पूरा इलाका पानी में डूब जाता होगा। लेकिन अभी वहाँ धुएँ, बच्चों की आवाज़ों और अधपके खाने की गंध थी।

सलीम ने उनके लिए अपनी झुग्गी के बगल में खाली जगह दिखा दी।

“यहीं रह लो अभी। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

रामसेवक ने सिर हिलाया। वह जानता था कि “धीरे-धीरे” शहर का सबसे लंबा शब्द है।

रात को सुनीता ने बचा हुआ सूखा चूड़ा बच्चों में बाँट दिया। खुद उसने कुछ नहीं खाया। गुड़िया ने आधा चूड़ा माँ की तरफ़ बढ़ाया, लेकिन उसने मुस्कराकर मना कर दिया।

दूर कहीं फ्लाईओवर के ऊपर गाड़ियाँ लगातार भाग रही थीं। उनकी रोशनी झुग्गियों की टीन की छतों पर पड़ती और तुरंत गायब हो जाती।

रामसेवक बाहर बैठा शहर को देखता रहा। उसे लगा, यह शहर किसी बड़े पेट की तरह है— जो लाखों लोगों को निगलता रहता है, लेकिन कभी भरता नहीं।

अगली सुबह अभी अँधेरा ही था जब सलीम ने झुग्गी के बाहर आवाज़ लगाई—

“रामसेवक, चलो। देर हुई तो काम नहीं मिलेगा।”

रामसेवक हड़बड़ाकर उठ बैठा। रात भर ठीक से नींद नहीं आई थी। नाले की बदबू, मच्छरों की भनभनाहट और शहर की लगातार चलती आवाज़ें उसे बार-बार जगा देती थीं। उसने जल्दी से चेहरा धोया। सुनीता ने बचा हुआ सूखा रोटी का टुकड़ा उसके हाथ में रख दिया।

“कुछ खा लो।”

रामसेवक ने आधी रोटी वापस उसकी तरफ़ बढ़ा दी।

“बच्चों को दे देना।”

सुनीता कुछ कहना चाहती थी, मगर चुप रह गई।

मजदूर चौक झुग्गी से करीब दो किलोमीटर दूर था। सड़क के किनारे सैकड़ों आदमी खड़े थे। कोई गमछा कंधे पर डाले, कोई फावड़ा पकड़े, कोई अपनी पुरानी थैली में कपड़े लिए। सबकी आँखों में एक जैसी बेचैनी थी— आज काम मिलेगा या नहीं।

ठेकेदारों की गाड़ियाँ आतीं, कुछ लोगों को चुनतीं और बाकी को धूल में छोड़कर आगे बढ़ जातीं।

एक मोटा ठेकेदार आया। उसने मजदूरों को ऐसे देखा जैसे सब्ज़ी चुन रहा हो।

“राजमिस्त्री कौन-कौन है?”

कुछ लोग आगे बढ़े। रामसेवक भी।

“पहले कहाँ काम किया?”

“गाँव में मकान बनाते थे मालिक।”

ठेकेदार ने उसकी हथेलियाँ देखीं। खुरदुरी हथेलियाँ, फटी उँगलियाँ। फिर बोला—

“चार सौ मिलेंगे। खाना अपना।”

रामसेवक जानता था कि यह कम दाम है, लेकिन मना करने की हालत में नहीं था। उसने सिर हिला दिया।

पूरा दिन वे अधूरी इमारत में सीमेंट ढोते रहे। धूप इतनी तेज़ थी कि लोहे की छड़ों को छूते ही हाथ जलने लगते। दोपहर में बाकी मजदूर अपने-अपने डिब्बे खोलकर खाने लगे। रामसेवक के पास सिर्फ़ सुबह की बची आधी रोटी थी। उसने पानी के साथ उसे निगल लिया।

शाम को पैसे मिले तो ठेकेदार ने बीस रुपये काट लिए।

“हेलमेट नहीं पहना था।”

रामसेवक कुछ बोल नहीं पाया। शहर में आदमी काम से पहले डरना सीखता है।

उधर झुग्गी में सुनीता दिन भर पानी भरने के लिए लाइन में लगी रही। बस्ती में सिर्फ़ एक सरकारी नल था जो दो घंटे के लिए खुलता था। पानी खत्म होते ही औरतों में झगड़ा शुरू हो जाता।

दोपहर में गुड़िया ने पूछा,

“अम्मा, खाना कब बनेगा?”

सुनीता ने उसे बहलाने के लिए कहा,

“शाम को बाबू पैसे लाएँगे न।”

लेकिन शाम तक घर में सिर्फ़ आधा किलो चावल आया।

रात को चारों लोग एक ही थाली से चावल और नमक खा रहे थे। तभी बगल वाली झुग्गी से टीवी की आवाज़ आई—

“सरकार कहती है, देश में कोई भूखा नहीं सोएगा।”

सलीम हँस पड़ा। उसकी हँसी में गुस्सा था।

“टीवी वाले कभी यहाँ नहीं आते।”

खाना खत्म होने के बाद उसने रामसेवक से पूछा,

“राशन कार्ड है?”

“गाँव वाला है।”

“यहाँ नहीं चलेगा। नया बनवाना पड़ेगा।”

रामसेवक ने थकी आँखों से उसकी तरफ़ देखा।

“कैसे बनेगा?”

सलीम कुछ देर चुप रहा, फिर धीमे से बोला—

“यहाँ कागज़ बनवाने में आदमी बूढ़ा हो जाता है।”

उस रात रामसेवक देर तक जागता रहा। उसकी जेब में दिन भर की मजदूरी के सिर्फ़ तीन सौ अस्सी रुपये थे। उसे पहली बार डर लगा कि कहीं शहर भी गाँव की तरह उनसे सब कुछ छीन न ले।

तीन दिन बाद सलीम रामसेवक को खाद्य विभाग के दफ्तर ले गया। सुबह के आठ बजे थे, लेकिन इमारत के बाहर पहले से लंबी लाइन लगी हुई थी। औरतें बच्चों को गोद में लिए खड़ी थीं, बूढ़े लोग दीवार से टिके हुए थे, और कुछ आदमी हाथ में फाइलें दबाए ऐसे बेचैन घूम रहे थे जैसे किसी अस्पताल के बाहर खड़े हों।

दफ्तर की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

“गरीबों के अधिकार हमारी प्राथमिकता।”

उसके ठीक नीचे पान की पीक जमी हुई थी।

सलीम ने धीरे से कहा,

“यहाँ पहले लाइन में लगो, फिर कोई बोलेगा कि दूसरा कागज़ चाहिए। फिर दूसरी लाइन। पूरा खेल यही है।”

रामसेवक ने अपनी पुरानी फाइल कसकर पकड़ ली। उसमें आधार कार्ड की फोटोकॉपी, गाँव का राशन कार्ड और प्रधान द्वारा लिखा एक पत्र रखा था। उसे लग रहा था, जैसे ये कागज़ नहीं, उसके पूरे परिवार की भूख का इलाज हों।

करीब दो घंटे बाद वे खिड़की तक पहुँचे। अंदर बैठा बाबू मोबाइल पर वीडियो देख रहा था। उसने बिना सिर उठाए पूछा—

“क्या है?”

“साहब, नया राशन कार्ड बनवाना है।”

बाबू ने कागज़ देखे और तुरंत फाइल वापस धकेल दी।

“बिजली बिल कहाँ है?”

रामसेवक घबरा गया।

“साहब, झुग्गी में रहते हैं… बिल नहीं आता।”

“तो निवास प्रमाण लाओ।”

“वो कहाँ से मिलेगा?”

बाबू ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखों में ऊब थी।

“अगला!”

पीछे खड़े लोग धक्का देने लगे। रामसेवक और सलीम किनारे हट गए।

बाहर आकर रामसेवक ने धीरे से पूछा,

“अब?”

सलीम ने बीड़ी सुलगाई।

“अब पार्षद के आदमी से मिलो। वही कागज़ बनवाएगा।”

दोपहर की धूप तेज़ थी। दोनों एक छोटे से दफ्तर पहुँचे जहाँ दीवारों पर नेता की मुस्कराती तस्वीरें लगी थीं। अंदर बैठे आदमी ने उनकी बात सुनी, फिर कुर्सी पर पीछे झुककर बोला—

“काम हो जाएगा… लेकिन खर्चा लगेगा।”

“कितना?”

“दो हजार।”

रामसेवक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके पास कुल जमा आठ सौ रुपये थे।

“साहब, हम मजदूर आदमी हैं…”

वह आदमी मुस्कराया।

“गरीब हो इसलिए तो मदद कर रहे हैं।”

बाहर निकलते समय रामसेवक का सिर झुका हुआ था। उसे लग रहा था कि इस शहर में हर दरवाज़े के सामने कोई न कोई कीमत लिखी है।

उधर घर में सुनीता ने चावल बचाने के लिए दाल में ज्यादा पानी डाल दिया था। गुड़िया बार-बार पूछ रही थी—

“अम्मा, स्कूल कब भेजोगी?”

बस्ती की औरतों ने बताया था कि सरकारी स्कूल में दोपहर का खाना मिलता है। सुनीता ने उसी शाम तय कर लिया कि चाहे जैसे हो, बच्चों का नाम स्कूल में लिखवाना होगा।

रात को रामसेवक खाली हाथ लौटा। उसकी आँखों में थकान से ज्यादा शर्म थी। उसने सुनीता को सब बताया।

कुछ देर तक दोनों चुप बैठे रहे। बाहर नाले के पास कुत्ते भौंक रहे थे। दूर कहीं शादी में बजता गाना हवा में तैर रहा था।

फिर सुनीता ने धीरे से अपने पैरों की तरफ़ देखा। उसकी चाँदी की पायल धुंधली रोशनी में चमक रही थी।

“जरूरत पड़े… तो इसे बेच देना।”

रामसेवक ने तुरंत सिर उठाया।

“नहीं।”

लेकिन दोनों जानते थे कि शहर में “नहीं” बहुत देर तक टिकता नहीं।

अगले हफ़्ते गुड़िया और सोनू का नाम पास के सरकारी स्कूल में लिख गया। स्कूल की इमारत पुरानी थी। दीवारों का रंग उतर चुका था और मैदान की मिट्टी जगह-जगह से फटी हुई थी, लेकिन सुनीता के लिए वह जगह किसी राहत की तरह थी। कम-से-कम दोपहर में बच्चों को एक वक्त का खाना तो मिल जाएगा।

पहले दिन गुड़िया नीली फ्रॉक पहनकर बहुत खुश थी। उसकी चोटी ठीक करते हुए सुनीता ने कहा,

“अच्छे से पढ़ना… मास्टर जी की बात सुनना।”

गुड़िया ने मासूमियत से पूछा,

“और खाना भी मिलेगा न?”

सुनीता मुस्करा नहीं पाई। उसने बस सिर हिला दिया।

स्कूल में दोपहर होते ही बच्चे स्टील की प्लेटें लेकर लाइन में लग गए। बड़े भगोने में खिचड़ी बन रही थी। हल्दी और चावल की गंध पूरे बरामदे में फैली हुई थी। गुड़िया की आँखें उसी भगोने पर टिकी थीं।

जब उसकी बारी आई तो रसोइया ने प्लेट में एक कलछी खिचड़ी डाल दी। गुड़िया पास जाकर बैठ गई। उसने धीरे-धीरे खाना शुरू किया, जैसे जल्दी खत्म हो जाने से डरती हो।

उसके आसपास बाकी बच्चे बातें कर रहे थे, हँस रहे थे, लेकिन गुड़िया चुप थी। उसने आधी खिचड़ी खाने के बाद प्लेट रोक ली। फिर इधर-उधर देखकर अपने छोटे डिब्बे में बची हुई खिचड़ी भर ली।

शाम को घर लौटते ही उसने डिब्बा माँ के सामने रख दिया।

“अम्मा, तुम्हारे लिए लाई हूँ।”

सुनीता कुछ सेकंड उसे देखती रही। फिर जल्दी से दूसरी तरफ़ मुँह फेर लिया। उसकी आँखें भर आई थीं।

उधर रामसेवक रोज़ मजदूर चौक जा रहा था। कभी काम मिलता, कभी नहीं। जिन दिनों काम नहीं मिलता, वह शाम तक खाली बैठा दूसरों को काम करते देखता रहता। उसे लगता, शहर में सबसे बड़ा डर बेरोज़गारी नहीं, बेकार हो जाने का है।

उस दिन भी उसे काम नहीं मिला था। लौटते वक्त उसने सड़क किनारे एक बड़े होटल के बाहर खाना फेंकते देखा। बड़े-बड़े ड्रमों में बची हुई रोटियाँ और चावल कूड़े में डाले जा रहे थे। कुछ बच्चे वहीं खड़े इंतज़ार कर रहे थे कि कब कोई उन्हें भगाए बिना खाने दे।

रामसेवक कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसे गुड़िया याद आ गई।

रात को घर में सिर्फ़ पतली दाल बनी। सोनू ने धीरे से पूछा,

“बाबू, राशन कार्ड कब बनेगा?”

रामसेवक ने जवाब नहीं दिया।

सलीम भी वहीं बैठा था। उसने कहा,

“कल फिर दफ्तर चलते हैं। शायद कोई और रास्ता निकले।”

फिर उसने धीमे स्वर में जोड़ा—

“यहाँ गरीब आदमी पेट से पहले फाइल भरता है।”

उसी समय बस्ती में खबर फैली कि अगले हफ्ते मंत्री आने वाले हैं। सफाई होगी, दीवारों पर रंग होगा, कैमरे आएँगे।

सुनीता ने कड़वाहट से कहा,

“हमारे घर में चूल्हा नहीं जलता, लेकिन फोटो में सब चमकना चाहिए।”

रात गहरी होती गई। झुग्गियों के ऊपर से फ्लाईओवर की रोशनी गुजर रही थी। गुड़िया अपनी प्लेट धोकर सो गई। उसने सोने से पहले माँ से सिर्फ़ एक बात पूछी—

“अम्मा, स्कूल रविवार को भी खुलता है क्या?”

सुनीता ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।

“क्यों?”

गुड़िया ने धीरे से कहा—

“उस दिन खाना नहीं मिलेगा न…”

अगली सुबह झुग्गी बस्ती में असामान्य हलचल थी। नगर निगम के कर्मचारी आए थे। नाले के किनारे कीचड़ हटाया जा रहा था, टूटी दीवारों पर जल्दी-जल्दी चूना पुता जा रहा था। कुछ लोग मोबाइल से तस्वीरें ले रहे थे। मंत्री का दौरा तय हो चुका था।

बस्ती के बच्चों को पहली बार समझ आया कि बड़े आदमी आने वाले हैं, क्योंकि उस दिन सरकारी गाड़ी से बिस्कुट के पैकेट बाँटे गए। गुड़िया ने पैकेट हाथ में लेकर बहुत देर तक उसे देखा, जैसे तय नहीं कर पा रही हो कि अभी खाए या बाद के लिए बचा ले।

रामसेवक सुबह से बेचैन था। पिछले तीन दिनों से उसे लगातार आधा काम मिल रहा था। ठेकेदार मजदूरी काट लेता और बहाना देता—

“मजदूर बहुत हैं।”

दोपहर को सलीम फिर उसे पार्षद के दफ्तर ले गया। वही आदमी कुर्सी पर बैठा पान चबा रहा था। उसने रामसेवक को देखते ही कहा—

“सोचा क्या?”

रामसेवक चुप रहा।

“देखो, बिना पैसे काम नहीं होगा। ऊपर तक हिस्सा जाता है।”

“थोड़ा कम नहीं हो सकता साहब?”

वह आदमी हँस पड़ा।

“सरकार मुफ्त में अनाज देती है, लेकिन कार्ड मुफ्त में नहीं बनता।”

यह सुनकर सलीम ने नजरें झुका लीं। उसे लगा जैसे यह वाक्य सिर्फ़ मज़ाक नहीं, पूरे शहर का सच हो।

शाम को घर लौटकर रामसेवक बहुत देर तक चुप बैठा रहा। सुनीता समझ गई कि बात वहीं अटकी हुई है। उसने बिना कुछ कहे अपनी पायल उतारी और उसकी हथेली पर रख दी।

चाँदी पुरानी हो चुकी थी, लेकिन वह उसकी शादी की आख़िरी निशानी थी।

रामसेवक ने पायल देखते ही हाथ पीछे खींच लिया।

“नहीं सुनीता… इसे नहीं बेचूँगा।”

“तो बच्चों को क्या खिलाओगे?”

उसके स्वर में शिकायत नहीं थी, सिर्फ़ थकान थी।

कुछ देर बाद रामसेवक पायल लेकर बाजार चला गया।

सर्राफ़ की दुकान चमकदार रोशनी से भरी हुई थी। अंदर एसी चल रहा था। शीशे के भीतर भारी गहने रखे थे। रामसेवक को अपनी धूलभरी कमीज़ और फटी चप्पलें अचानक बहुत साफ़ दिखाई देने लगीं।

दुकानदार ने पायल हाथ में लेकर तौली।

“पुरानी है… ज्यादा नहीं मिलेगा।”

“जितना दे दीजिए।”

दुकानदार ने कुछ नोट उसकी तरफ़ बढ़ा दिए। रामसेवक ने बिना गिने पैसे जेब में रख लिए। उसे लग रहा था जैसे उसने कोई चीज़ नहीं, अपनी इज़्ज़त का टुकड़ा बेच दिया हो।

वापसी में उसने आधा किलो आटा, थोड़ा तेल और बच्चों के लिए दो केले खरीदे। गुड़िया ने केला देखते ही खुश होकर पूछा—

“आज क्या त्योहार है?”

रामसेवक मुस्कराने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसकी आँखें बार-बार सुनीता के खाली पैरों की तरफ़ चली जाती थीं।

रात को खाना खाते समय सलीम आया। उसने बताया कि अगले दिन खाद्य विभाग में एक नया अधिकारी आने वाला है। शायद उससे बात बन जाए।

रामसेवक ने जेब में रखे पैसों को कसकर पकड़ा। अब उसके पास रिश्वत देने लायक रकम थी। लेकिन भीतर कहीं कुछ टूट चुका था।

उधर गुड़िया अपनी कॉपी में स्कूल से सीखा वाक्य लिख रही थी—

“भारत एक लोकतांत्रिक देश है।”

वह शब्दों का अर्थ नहीं समझती थी। उसे सिर्फ़ इतना पता था कि अगले दिन अगर स्कूल खुला रहा, तो दोपहर में खिचड़ी जरूर मिलेगी।

अगली सुबह रामसेवक बहुत जल्दी उठ गया। उसने जेब में पैसे रखे और बार-बार टटोलकर देखता रहा कि कहीं गिर न जाएँ। सुनीता चुपचाप उसे देख रही थी। दोनों जानते थे कि आज सिर्फ़ राशन कार्ड की बात नहीं थी। आज यह तय होना था कि इस शहर में उनका होना दर्ज होगा या नहीं।

खाद्य विभाग के बाहर आज भी वही भीड़ थी। फर्क सिर्फ़ इतना था कि नए अधिकारी के आने की खबर से लोग थोड़ी उम्मीद में थे।

भीतर कमरे में पंखा चरमराहट के साथ घूम रहा था। दीवारों पर सरकारी योजनाओं के पोस्टर टंगे थे जिनमें मुस्कराते हुए गरीब परिवार दिखाए गए थे। उन तस्वीरों में किसी के कपड़े मैले नहीं थे, किसी बच्चे की आँखों में भूख नहीं थी।

करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद रामसेवक की बारी आई। सामने नए अधिकारी बैठे थे— उम्र में युवा, आँखों पर चश्मा, चेहरे पर थकान।

उन्होंने फाइल खोली।

“निवास प्रमाण?”

रामसेवक ने धीरे से कहा,

“नहीं है साहब… झुग्गी में रहते हैं।”

“बिजली बिल?”

“नहीं।”

अधिकारी ने कुछ देर तक उसे देखा। फिर कुर्सी से टिकते हुए बोले,

“सिस्टम में पता चाहिए। बिना पते के कार्ड नहीं बन सकता।”

रामसेवक ने काँपते हाथों से जेब टटोली। उसे लगा यही सही समय है। उसने मुड़े हुए नोट धीरे से फाइल के भीतर सरकाने चाहे।

लेकिन तभी अधिकारी ने फाइल बंद कर दी।

“ये क्या कर रहे हो?”

रामसेवक घबरा गया।

“साहब… लोग बोले थे… तभी काम होगा…”

कमरे में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया। फिर अधिकारी ने धीमे स्वर में कहा—

“मैं रिश्वत नहीं लेता।”

रामसेवक ने तुरंत पैसे वापस खींच लिए। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया। उसे लगा जैसे उसने खुद को बहुत छोटा कर लिया हो।

अधिकारी कुछ नरम पड़े।

“देखो, नियम मेरे हाथ में नहीं हैं। लेकिन कोशिश करूँगा। झुग्गी के प्रधान से प्रमाणपत्र बनवा लो।”

बाहर निकलते ही सलीम हँस पड़ा, मगर उसकी हँसी कड़वी थी।

“ईमानदार आदमी मिल गया तुम्हें। लेकिन सिस्टम बेईमान ही रहेगा।”

दिन भर दोनों झुग्गी के प्रधान के पीछे घूमते रहे। प्रधान हर बार यही कहता—

“अभी मीटिंग में हूँ… बाद में आना।”

शाम तक थककर रामसेवक नाले के किनारे बैठ गया। सामने बच्चे गंदे पानी के पास खेल रहे थे। दूर बड़ी सड़क पर चमकती गाड़ियाँ भाग रही थीं। शहर दो हिस्सों में बँटा हुआ था— एक हिस्सा जो हमेशा जल्दी में था, दूसरा हिस्सा जो हमेशा इंतज़ार में।

उधर स्कूल में गुड़िया को आज एक उबला अंडा मिला था। उसने आधा खुद खाया और आधा सोनू के लिए बचा लिया।

घर लौटकर उसने खुश होकर कहा—

“अम्मा, आज तो राजा जैसा खाना मिला!”

सुनीता मुस्करा भी नहीं पाई। उसे डर था कि कहीं बच्चों को भूख की आदत ही न पड़ जाए।

रात को अचानक बस्ती की बिजली काट दी गई। अँधेरे में लोग बाहर निकल आए। किसी ने बताया कि मंत्री का दौरा खत्म हो गया, इसलिए अस्थायी कनेक्शन भी हटा दिया गया।

सलीम ने बीड़ी जलाते हुए कहा—

“यहाँ गरीब आदमी को रोशनी भी किराये पर मिलती है।”

अँधेरे में बैठे रामसेवक ने जेब से राशन कार्ड का अधूरा फॉर्म निकाला। कागज़ हवा में हल्का-सा काँप रहा था। उसे लगा, इस शहर में उसकी पूरी ज़िंदगी भी शायद इसी अधूरे फॉर्म की तरह रह जाएगी।

कुछ ही दिनों में बस्ती का माहौल बदलने लगा। हर दीवार पर नए पोस्टर चिपक गए। लाउडस्पीकर वाली गाड़ियाँ गलियों में घूमने लगीं—

“गरीबों का हक़ अब उनके घर तक पहुँचेगा!”

“हर परिवार को सस्ता राशन!”

बस्ती के बच्चे उन गाड़ियों के पीछे भागते थे क्योंकि कभी-कभी टॉफियाँ फेंकी जाती थीं। गुड़िया भी भागती, मगर उसकी नजर हमेशा टॉफियों पर नहीं, उन छोटे खाने के पैकेटों पर होती जो नेताओं के साथ आए लोग बाँटते थे।

रामसेवक अब पहले से ज्यादा चुप रहने लगा था। रोज़ सुबह मजदूर चौक जाना, शाम को थककर लौटना, फिर अगले दिन वही दोहराना— जिंदगी किसी मशीन की तरह हो गई थी।

उस दिन भी उसे सिर्फ़ आधे दिन का काम मिला। लौटते वक्त उसने देखा कि बस्ती के बाहर एक बड़ा मंच बन रहा है। शाम को नेता आने वाला था।

सलीम ने हँसते हुए कहा,

“आज देखना, सबको गरीब भाई-बहन कहा जाएगा।”

रात होते-होते पूरा इलाका रोशनी से भर गया। वही झुग्गियाँ जो रोज़ अँधेरे में डूबी रहती थीं, आज रंगीन बल्बों से चमक रही थीं। मंच पर बड़े-बड़े स्पीकर लगे थे।

नेता आया तो भीड़ को धक्का देकर आगे किया गया। कैमरे चमकने लगे।

नेता ने माइक पकड़ा—

“यह देश मजदूरों के दम पर चलता है! कोई गरीब भूखा नहीं रहेगा!”

भीड़ में कुछ लोगों ने ताली बजाई। कुछ सिर्फ़ इसलिए खड़े थे क्योंकि बाद में खाना मिलने वाला था।

रामसेवक पीछे खड़ा सब सुन रहा था। उसे अचानक याद आया कि तीन दिन पहले उसी के दफ्तर के बाहर एक बूढ़ी औरत राशन कार्ड के लिए रो रही थी, और किसी ने उसकी बात नहीं सुनी थी।

भाषण खत्म होते ही खाने के पैकेट बँटने लगे। लोग टूट पड़े। धक्का-मुक्की शुरू हो गई। गुड़िया भी भीड़ में फँस गई।

रामसेवक ने उसे जल्दी से खींच लिया। लेकिन उसके हाथ से प्लेट गिर चुकी थी।

गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए।

“मेरा खाना…”

रामसेवक कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर पहली बार उसके भीतर गुस्सा उठा। भूख से बड़ा अपमान शायद यही था कि आदमी को खाने के लिए भी भीड़ में लड़ना पड़े।

उधर मंच पर नेता कैमरों के सामने मुस्करा रहा था। उसके पीछे लगे बैनर पर लिखा था—

“गरीबी हटाओ अभियान।”

रात को घर लौटकर गुड़िया चुपचाप बैठी रही। उसने खाना भी ठीक से नहीं खाया।

सुनीता ने पूछा,

“क्या हुआ?”

गुड़िया धीरे से बोली—

“अम्मा, हम लोग हमेशा लाइन में ही क्यों खड़े रहते हैं?”

सुनीता के पास जवाब नहीं था।

उस रात बारिश शुरू हो गई। टीन की छत से पानी टपकने लगा। रामसेवक ने बाल्टी रख दी। फिर अँधेरे में बैठा बाहर देखता रहा।

उसे लग रहा था कि इस शहर में गरीब आदमी की पूरी जिंदगी एक लंबी लाइन है—

काम की लाइन, पानी की लाइन, राशन की लाइन… और शायद आखिर में मौत की लाइन भी।

बरसात के बाद बस्ती की गलियाँ कीचड़ से भर गई थीं। नाले का पानी कई झुग्गियों तक आ गया था। टीन की छतों से टपकता पानी रोकने के लिए लोग प्लास्टिक बाँध रहे थे। हवा में सीलन, धुएँ और गंदे पानी की मिली-जुली गंध थी।
उसी सुबह सलीम दौड़ता हुआ आया।
“रामसेवक! तुम्हारा कार्ड बन गया शायद। चलो दफ्तर!”
रामसेवक के भीतर अचानक उम्मीद की हल्की चमक जगी। इतने महीनों बाद पहली बार उसे लगा कि शायद अब घर में अनाज आएगा।
दोनों जल्दी-जल्दी खाद्य विभाग पहुँचे। भीड़ पहले की तरह ही थी, लेकिन आज रामसेवक का दिल तेजी से धड़क रहा था।
काउंटर पर बैठे बाबू ने कंप्यूटर में नाम देखा। फिर बोला—
“हाँ, कार्ड बना है।”
रामसेवक की आँखें चमक उठीं।
“साहब… मिल जाएगा?”
बाबू ने स्क्रीन पर नजर टिकाए हुए कहा—
“लेकिन स्टेटस अस्थायी है।”
“मतलब?”
“मतलब अभी पूरा राशन नहीं मिलेगा। जाँच बाकी है।”
रामसेवक कुछ समझ नहीं पाया।
“साहब, बच्चे हैं घर में…”
बाबू ने कंधे उचका दिए।
“सिस्टम में यही दिखा रहा है।”
उसे एक कागज़ थमा दिया गया। वही उसका नया राशन कार्ड था। सस्ता कागज़, धुंधली छपाई, ऊपर सरकारी मुहर।
रामसेवक उसे ऐसे देख रहा था जैसे कोई सपना हाथ में आ गया हो— और उसी पल अधूरा भी साबित हो गया हो।
राशन की दुकान बस्ती से थोड़ी दूर थी। वहाँ पहले से लंबी लाइन लगी हुई थी। लोग बोरे और थैले लिए खड़े थे। दुकान के भीतर से गेहूँ और मिट्टी की मिली गंध आ रही थी।
जब उसकी बारी आई तो डीलर ने कार्ड देखा।
“अस्थायी है। पाँच किलो कम मिलेगा।”
“पर साहब…”
डीलर ने बीच में ही रोक दिया।
“अगला!”
रामसेवक चुपचाप बोरा उठाकर बाहर आ गया। उसमें इतना अनाज नहीं था कि पूरा महीना निकल सके।
घर लौटते समय उसे लगा कि यह कार्ड भी किसी मज़ाक की तरह है। सरकार ने उसे आधा नागरिक माना था, इसलिए राशन भी आधा मिला।
उधर गुड़िया स्कूल से लौटी तो बहुत खुश थी।
“अम्मा! आज मास्टर जी ने कहा मैं साफ़ लिखती हूँ।”
फिर उसने पिता के हाथ में कार्ड देखा।
“ये क्या है?”
रामसेवक कुछ पल उसे देखता रहा। फिर धीमे से बोला—
“हमारे होने का कागज़।”
गुड़िया ने मासूमियत से कार्ड छूकर देखा।
“अब खाना मिलेगा?”
रामसेवक मुस्कराना चाहता था, लेकिन मुस्करा नहीं पाया।
रात को सुनीता ने पहली बार थोड़ा ज्यादा आटा गूँधा। घर में कई दिनों बाद रोटियों की गंध फैली। सोनू जल्दी-जल्दी खाने लगा, जैसे डर हो कि खाना खत्म न हो जाए।
लेकिन खाने के बाद भी रामसेवक का मन भारी था।
बाहर बारिश फिर शुरू हो गई थी। टीन की छत पर गिरती बूंदों की आवाज़ के बीच वह राशन कार्ड को बार-बार देखता रहा।
उस छोटे से कागज़ पर उसका नाम लिखा था—
लेकिन उसके सामने “अस्थायी” भी लिखा था।
उसे लगा, इस शहर में शायद उसकी पूरी जिंदगी ही अस्थायी है।

दिन धीरे-धीरे गुजर रहे थे। राशन कार्ड बनने के बाद भी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। महीने के बीच आते-आते अनाज फिर कम पड़ने लगता। तब सुनीता दाल में ज्यादा पानी डाल देती, या बच्चों को बहला देती कि रात में कम खाने से नींद अच्छी आती है।

लेकिन भूख बहलाने से नहीं जाती। वह शरीर के साथ-साथ आदमी के भीतर भी घर बना लेती है।

गुड़िया अब स्कूल जाने में कभी देर नहीं करती थी। उसे किताबों से ज्यादा इंतज़ार दोपहर की घंटी का रहता। जैसे ही रसोई से खाने की गंध आती, उसकी आँखें चमक उठतीं।

उस दिन स्कूल में खिचड़ी के साथ केला भी मिला। बाकी बच्चे खुशी से शोर मचा रहे थे। गुड़िया ने केला अपने बैग में छुपा लिया।

घर लौटते समय रास्ते में उसे बहुत भूख लगी। उसने कई बार बैग खोला, केले को देखा, फिर वापस रख दिया।

घर पहुँचकर उसने केला सोनू की तरफ़ बढ़ा दिया।

“तू खा ले।”

सोनू ने पूछा,

“तू नहीं खाएगी?”

गुड़िया ने सिर हिला दिया।

“मुझे स्कूल में मिल गया था।”

झूठ बोलते समय उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई थी।

उधर रामसेवक की तबीयत खराब रहने लगी थी। लगातार कम खाना और भारी मेहनत उसके शरीर को तोड़ रही थी। उस दिन निर्माण स्थल पर काम करते हुए उसे चक्कर आ गया।

ठेकेदार ने पानी पिलाने के बजाय डाँट दिया—

“कमज़ोर हो तो गाँव जाओ!”

बाकी मजदूर चुप रहे। शहर में हर आदमी डरता है कि अगला नंबर उसका न आ जाए।

शाम को सलीम उसे सहारा देकर झुग्गी तक लाया। सुनीता घबरा गई।

“डॉक्टर को दिखाओ।”

सलीम हँसा, मगर उसकी हँसी थकी हुई थी।

“गरीब आदमी पहले दवा नहीं, हिसाब देखता है।”

रामसेवक पूरी रात खाँसता रहा। गुड़िया उसकी चारपाई के पास बैठी रही। उसने धीरे से पूछा—

“बाबू, अगर तुम काम पर नहीं जाओगे तो राशन बंद हो जाएगा?”

रामसेवक ने उसकी तरफ़ देखा। उसे लगा जैसे सात साल की बच्ची नहीं, पूरा शहर उससे सवाल पूछ रहा हो।

अगले दिन वह फिर मजदूर चौक चला गया। शरीर जवाब दे रहा था, लेकिन भूख छुट्टी नहीं देती।

दोपहर में उसने देखा कि सड़क किनारे एक बड़ा होर्डिंग लगा है—

“नया भारत: सबका विकास।”

उसके नीचे एक बच्चा कूड़ेदान में खाना ढूँढ़ रहा था।

रामसेवक कुछ देर तक उस दृश्य को देखता रहा। फिर चुपचाप आगे बढ़ गया। अब उसे हैरानी नहीं होती थी। शायद यही सबसे खतरनाक बात थी— आदमी दुख का आदी हो जाए।

रात को घर में सिर्फ़ तीन रोटियाँ बची थीं। सुनीता ने कहा कि उसे भूख नहीं है। रामसेवक भी यही बोला।

आख़िर में दोनों रोटियाँ बच्चों में बाँट दी गईं।

गुड़िया खाते-खाते अचानक रुक गई। उसने आधी रोटी तोड़कर माँ की तरफ़ बढ़ाई।

“तुम भी खा लो।”

सुनीता ने मुस्कराकर मना कर दिया।

लेकिन गुड़िया इस बार जिद करने लगी।

“स्कूल में मैडम कहती हैं खाना बाँटकर खाना चाहिए।”

सुनीता की आँखें भर आईं। उसने रोटी का छोटा टुकड़ा लिया और धीरे-धीरे खाने लगी।

बाहर रात गहरी हो चुकी थी। नाले से बदबूदार हवा आ रही थी। दूर कहीं शहर अब भी जगमगा रहा था— जैसे वहाँ भूख नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं।

सर्दियाँ आने लगी थीं। सुबह की हवा में ठंड घुल गई थी, लेकिन झुग्गियों के भीतर अब भी वही घुटन थी। टीन की दीवारों से हवा अंदर चली आती और रात में बच्चे सिकुड़कर सोते।

रामसेवक की खाँसी अब लगातार बढ़ रही थी। कई बार काम करते-करते उसकी साँस फूलने लगती। फिर भी वह रोज़ मजदूर चौक जाता। क्योंकि शहर में बीमारी से ज्यादा डर बेरोज़गारी का होता है।

उस सुबह भी वह जल्दी निकल गया। सुनीता ने पीछे से आवाज़ दी—

“आज जल्दी लौट आना।”

रामसेवक ने सिर्फ़ सिर हिलाया।

दोपहर तक आसमान धुँधला हो गया। ठंड के साथ हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। मजदूर चौक पर खड़े कई लोगों को आज काम नहीं मिला। रामसेवक भी उनमें था।

वह चुपचाप सड़क किनारे बैठ गया। सामने चायवाले की दुकान पर टीवी चल रहा था। समाचार वाचक मुस्कराकर बता रहा था—

“सरकार की नई योजना से अब कोई गरीब भूखा नहीं रहेगा।”

पास बैठे कुछ मजदूर हँस पड़े। वह हँसी मज़ाक की नहीं, हार की थी।

शाम को जब रामसेवक घर लौटा तो झुग्गी के भीतर अँधेरा था। बिजली फिर चली गई थी। सुनीता मिट्टी के छोटे दीये के पास बैठी आटा गूँध रही थी।

“आज काम नहीं मिला?”

रामसेवक ने चुपचाप सिर हिला दिया।

कुछ देर बाद गुड़िया स्कूल बैग लेकर उसके पास आकर बैठ गई। उसने धीरे-धीरे बैग खोला और भीतर से अपनी स्टील की प्लेट निकाली।

वह प्लेट को कपड़े से साफ़ करने लगी। बहुत सावधानी से, जैसे कोई कीमती चीज़ हो।

रामसेवक उसे देखता रहा।

“क्या कर रही है?”

गुड़िया ने बिना सिर उठाए कहा—

“कल स्कूल जाना है न… खाना मिलेगा।”

उसकी आवाज़ में मासूम खुशी थी। वही खुशी जो कभी खिलौनों से मिलती है, अब दोपहर की खिचड़ी से मिलने लगी थी।

रामसेवक की नजर पास रखे राशन कार्ड पर गई। बारिश की नमी से उसका कोना हल्का मुड़ गया था।

उसने कार्ड हाथ में उठाया। उस पर उसका नाम लिखा था, परिवार के बाकी लोगों के नाम भी। सरकारी मुहर भी थी।

फिर भी घर में भूख मौजूद थी।

उसे अचानक लगा, यह कार्ड सिर्फ़ अनाज पाने का कागज़ नहीं है। यह उस लंबी लड़ाई का निशान है जिसमें गरीब आदमी पहले साबित करता है कि वह जिंदा है, तब कहीं जाकर उसे जीने का अधिकार मिलता है।

बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। नाले का पानी बहने की आवाज़ आ रही थी। दूर फ्लाईओवर पर गाड़ियाँ लगातार गुजर रही थीं— तेज़, चमकदार, बेपरवाह।

झुग्गी के भीतर गुड़िया अब भी अपनी प्लेट साफ़ कर रही थी।

सुनीता ने चूल्हे पर पतली दाल चढ़ा दी। सोनू आधी नींद में किताब पकड़े बैठा था।

और रामसेवक अँधेरे में बैठा राशन कार्ड को देखता रहा।

बहुत देर तक।

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