राकेश मिश्र ऊँचे बर्फीले पर्वतों के बीच, जहाँ हवा में देवताओं की सांसें महसूस होती थीं, एक पुरानी पत्थर की गुफा थी — भीतर सन्नाटा, बाहर प्रकृति का मधुर संगीत। गुफा के भीतर विराजमान थे साधु बाबा, जिनका वास्तविक नाम किसी को नहीं मालूम था; सब उन्हें ‘बाबा’ कहकर ही बुलाते थे। वर्षों से इस गुफा में वे ध्यान, जप और प्रकृति की साधना में लीन थे। उनके आसपास न कोई मंदिर था, न कोई मूर्ति, न ही कोई सेवक या शिष्य—सिर्फ एक चटाई, एक कमंडल, और एक जलपात्र। उनके शरीर पर एक मोटी जटा-जूट की लहराती पगड़ी, चेहरा समय…
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शेखर राणे भाग 1 मुंबई की उस रात कुछ अलग था। समंदर की लहरें जैसे कुछ कहने को बेताब थीं, और आसमान की कालिख शहर के गुनाहों की तरह भारी लग रही थी। पुलिस स्टेशन नं. 17 के इंस्पेक्टर अर्जुन पाटिल की आंखों में नींद नहीं थी। पिछले चौबीस घंटे में तीन कत्ल, तीनों एक ही तरीके से, और कोई सुराग नहीं। अर्जुन ने मेज पर रखी फाइल उठाई, जिस पर लिखा था – “केस: ब्लैक रोज मर्डर्स।” हर शव के पास एक काली गुलाब की पंखुड़ी पाई गई थी। न खून के धब्बे, न संघर्ष के निशान, जैसे मौत…
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चयनिका श्रीवास्तव जयपुर की पुरानी गलियों में बसे एक शांत मोहल्ले में, हल्के नीले रंग का एक छोटा-सा स्टूडियो था जहाँ से हर शाम एक अनकही ख़ामोशी और रंगों की सोंधी महक बाहर आती थी। वहाँ बैठती थी इशिता वर्मा—नेत्रहीन, मगर भावनाओं से भरी एक चित्रकार, जो रंगों को अपनी उंगलियों की नमी और हवा की कंपन से पहचानती थी। उसके पास रंगों की दृष्टि नहीं थी, पर एक अनोखी शक्ति थी—हर रंग की भावना को महसूस करने की। स्टूडियो में बिखरे कैनवासों पर वह अपने भीतर के संसार को उतारती थी—कभी आंधी की तरह, तो कभी बारिश के बूंदों…
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अनामिका तिवारी अध्याय १: वह शिलालेख धूप की किरणें पहाड़ की चोटियों को छूते हुए नीचे बसे गाँव को जगाने लगी थीं। पहाड़ी हवा में अभी भी रात की ठंडक बाकी थी। गाँव का नाम था “बद्रीनगर” — सघन देवदारों के बीच बसा एक छोटा-सा अज्ञात गाँव, जहाँ समय मानो रुक गया हो। बद्रीनगर की सबसे पुरानी विरासत थी — कालेश्वर मंदिर, जो गाँव से कुछ दूरी पर पहाड़ी की चोटी पर स्थित था। यह मंदिर न सिर्फ अपने स्थापत्य के लिए, बल्कि वहाँ लिखे एक शिलालेख के कारण भी प्रसिद्ध था — वह शिलालेख, जिसे कोई नहीं छूता, कोई…
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मिथिला शर्मा भाग 1: पहले शो का दीवाना पंकज को शहर के पुराने सिनेमाघर “रूपसागर टॉकीज” से बेहद प्यार था। वो वही सिनेमाघर था जहां उसकी पहली फिल्म लगी थी — शाहरुख खान की “कुछ कुछ होता है।” उम्र तब सिर्फ नौ साल थी, लेकिन उस दिन से जो रिश्ता बना परदे से, वो आज भी टूटा नहीं। हर शुक्रवार की सुबह, जब बाकी लोग ऑफिस या कॉलेज की तैयारियों में उलझे होते, पंकज अपने बैग में पानी की बोतल, एक पुराना टिकट का कवर और एक छोटी सी डायरी लेकर रूपसागर की ओर निकल पड़ता। उसका सपना था —…
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अरुण कुमार त्रिपाठि १ रामू का जीवन बिल्कुल वैसा था जैसा किसी सीधे-साधे किसान का होता है। वह उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव धनपुर में अपने मिट्टी के छोटे-से घर में पत्नी गौरी और दो बच्चों — सोनू और मुनिया — के साथ रहता था। रामू की दिनचर्या सूरज निकलने से पहले शुरू हो जाती थी। पैरों में फटे हुए चप्पल, सिर पर पुरानी टोपी और कंधे पर खुरपी लटकाए, वह सुबह की ओस में भीगती घास पर धीरे-धीरे खेतों की ओर बढ़ता। उसके खेत में गेहूं, चना और सरसों के कुछ हिस्से थे, लेकिन फसलें बहुत समृद्ध…
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अमूलिक त्रिपाठी 1 गाँव की आखिरी गली में खड़ा बांस का पेड़ अब बूढ़ा हो चला था। उसकी शाखाएँ जैसे समय के हाथों से झुक गई थीं, और पत्तियाँ… हर साल कम होती जा रही थीं। उसी पेड़ के नीचे आज भी वही पुराना पत्थर पड़ा था, जहाँ कभी शाम को सोनू, रमिया और बाकी दोस्त बैठा करते थे। अब ना वो शोर था, ना कहकहे, बस एक सन्नाटा था जो हर चीज़ में रिसता चला आया था। सोनू वहीं बैठा था, मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ घुमा रहा था, लेकिन आँखें कहीं और थीं। कानों में हल्की आवाज़ में…
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राहुल शुक्ला भाग 1: धारावी का नया राजा धारावी की तंग गलियाँ उस रात कुछ ज्यादा ही चुप थीं। हवा में बारूद की गंध घुली थी और पुलिस की सायरन की आवाज़ दूर से गूंज रही थी। साया — मुम्बई अंडरवर्ल्ड का एक नाम, जिसे सुनते ही लोगों के चेहरे पर पसीना छलक आता था — आज रात एक और खून के बाद माफिया की गद्दी पर पूरी तरह बैठ चुका था। साया का असली नाम था रईस अली, लेकिन अब उसे कोई इस नाम से नहीं जानता। वो गुमनाम रहना चाहता था, पर उसकी कहानियाँ हर नुक्कड़-चाय की दुकान…
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सुभाष मिश्र रामलाल फतेहपुर कस्बे की एक तंग गली में रहने वाला एक साधारण आदमी था। उम्र कोई पैंतालीस के आसपास, चेहरे पर झुर्रियों की कुछ रेखाएँ जो हर सुबह के संघर्ष और हर शाम की थकान की गवाही देती थीं। पेशे से वह नगरपालिका दफ्तर में एक लिपिक था, और महीने की पहली तारीख को तनख्वाह मिलते ही उसकी जेब से पैसों के पंख लग जाते थे। रामलाल की ज़िंदगी बसों और साइकिल रिक्शाओं पर कट रही थी। हर सुबह वो अपने घर से निकलता, पहले आधा किलोमीटर पैदल चलता, फिर एक धक्का-मुक्की वाली बस में लटकते-लटकते दफ्तर पहुँचता।…
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अर्चित रस्तोगी भाग १ चौक बाज़ार की पुरानी सड़कें जब रात के अंधेरे में चुप हो जाती हैं, तब भी एक जगह है जहाँ हलचल बनी रहती है—चौधरियों की हवेली। लोगों का कहना है कि उस हवेली के भीतर से आधी रात के बाद ज़ंजीरों की खनक सुनाई देती है। कोई कहता है बंधी हुई आत्मा है, तो कोई कहता है किसी ने वहाँ कुछ छुपा रखा है। राघव, एक २७ वर्षीय पत्रकार, दिल्ली से इस छोटे से शहर “दौरगंज” आया था। वह क्राइम रिपोर्टिंग में नाम कमाना चाहता था, पर दिल्ली की भीड़ और राजनीति ने उसे थका दिया…