तपन मिश्रा वाराणसी का स्टेशन, सुबह की भीड़, लाउडस्पीकर पर गूंजती announcements, और हवा में फैली एक चिरपरिचित गंध—धूप, धूल, और जलते घी की। अंशुमान का कैमरा उसकी छाती से लटका था, और उसकी आँखों में तलाश थी—एक अलग दुनिया की, उस लकीर के पार की जहाँ जीवन और मृत्यु हाथ थामे चलते हैं। वह पिछले कई महीनों से देश के अलग-अलग शहरों में डॉक्युमेंट्री शूट कर रहा था—अंधविश्वास, परंपरा, मृत्यु और पुनर्जन्म पर। लेकिन वाराणसी… वह जानता था, यहाँ कुछ और मिलेगा। स्टेशन से निकलते ही, उसे घाटों की ओर खींचती एक अदृश्य डोर ने जकड़ लिया था। जब…
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सुनिधि पटेल १ सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। शिवानी अपने छोटे से रसोईघर में चाय का भगौना चूल्हे पर चढ़ाकर चुपचाप खड़ी थी। स्टील की कटोरियों और कपों के टकराने की आवाज़ रसोई की दीवारों से टकराकर जैसे उसकी चुप्पी को चुनौती दे रही थी। रसोई की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर उसके चेहरे को छूकर सरक जाती थी, लेकिन उसका चेहरा भावहीन था — न मुस्कान, न तनाव, न थकान — बस एक आदत से पैदा हुई स्थिरता। गैस पर चाय खौलने लगी तो उसने दूध की थैली फाड़ी, दो ब्रेड टोस्टर में डाले, और…
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शिवानंद पाठक कोल्हापुर की घाटियों से गुजरती जीप धूल उड़ाते हुए चिखली गाँव की सीमा में प्रवेश कर रही थी। जीप में बैठे वेदांत त्रिपाठी खिड़की से बाहर झाँकते हुए मंदिर की मीनार की झलक पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। वे भारत सरकार के पुरातत्व विभाग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी थे और इस अभियान के मुख्य अन्वेषक भी। चिखली जैसे दूरदराज़ गाँवों में आना उनकी रिसर्च का हिस्सा नहीं, बल्कि जुनून था। उनके साथ बैठी थीं रुचिका देशमुख, एक दक्ष रिसर्च एनालिस्ट, जो कोल्हापुर से ही ताल्लुक रखती थीं। उनके हाथ में मंदिर के नक्शे और एक पुरानी पांडुलिपि…
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वेदिका शर्मा बमुश्किल शाम के साढ़े सात बजे होंगे जब आयरा सेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँची। प्लेटफॉर्म पर हलचल थी, लेकिन वह खुद किसी दूसरी लय में थी—धीमी, शांत और थोड़ी खोई हुई। पीठ पर कैमरा बैग और हाथ में एक काले रंग की डायरी थामे वो आगे बढ़ रही थी, जैसे किसी दृश्य को नहीं, बल्कि किसी याद को पकड़ना चाहती हो। उसकी ट्रेन—काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस—रात 8:00 बजे रवाना होने वाली थी। वह S3 कोच तक पहुँची और अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठ गई। खिड़की का शीशा टूटा हुआ था, लेकिन उसे कोई शिकायत नहीं थी।…
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नीलय मेहता अनिरुद्ध सेनगुप्ता ने स्टेशन पर रुकती उस ट्रेन को देखा तो कुछ देर तक बस खड़ा रहा, जैसे कोई अंतर्मन उसे रोक रहा हो या शायद वही धक्का दे रहा हो जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। चेन्नई एগ्मोर से रामेश्वरम जाने वाली वह रात की ट्रेन उसके लिए किसी साधारण सफ़र का ज़रिया नहीं थी—वह एक ऐसा दरवाज़ा थी, जो उसे उसके भीतर की किसी गूंजती आवाज़ तक ले जाने वाली थी। टिकट खिड़की पर लंबी लाइन, प्लेटफॉर्म की गंध, खड़खड़ाती ट्रॉली और चायवालों की पुकार—यह सब अनिरुद्ध को परिचित सा लगा लेकिन उस दिन हर आवाज़…
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अयन त्रिपाठी श्रीवास्तव जी की सुबह हमेशा की तरह अख़बार और चाय से शुरू हुई, लेकिन आज कुछ अलग था। अख़बार पढ़ते-पढ़ते उनके कान में पाखी की आवाज़ पड़ी, जो अपने मोबाइल पर कुछ दिखा रही थी – “पापा, देखिए, ऑनलाइन में कितनी सेल लगी है!” पहले तो उन्होंने नज़रअंदाज़ किया, लेकिन जब बेटे चिराग ने भी जोड़ दिया, “पापा, आपको तो नए जूते चाहिए थे ना? ऑनलाइन सस्ते मिल रहे हैं,” तब श्रीवास्तव जी का ध्यान उधर गया। मन में थोड़ा डर और थोड़ी जिज्ञासा – आखिर कैसा होता है ये ऑनलाइन ख़रीदारी का अनुभव? अब तक तो हर…
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रंजन मिश्रा भाग 1: व्हाट्सऐप वार “चमनलाल जी ने फिर ग्रुप पर पोस्ट कर दिया—’कल रात तीसरी मंज़िल से जो हड्डी गिराई गई थी, उससे मेरी गुलाब की क्यारी घायल हो गई है। मैं FIR दर्ज करवाने जा रहा हूँ। – चौथी मंज़िल, चमनलाल’।” कॉलोनी का ‘अप्टू कॉलोनी रेसिडेंट्स ग्रुप’ सुबह-सुबह सुलग उठा। एक ओर हड्डी का मुद्दा, दूसरी ओर FIR की धमकी, और तीसरी ओर वो मोहल्ले की क्यारी जिसमें तीन पौधे छोड़कर सबकुछ सूख चुका था—पर चमनलाल जी का दावा था कि गुलाब कल ही खिला था। “दादा, आप ज़रा ग्रुप से बाहर वाले मसले ग्रुप में मत…
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प्रमोद कुमार १ मध्यप्रदेश के सिंगनामा गाँव की सूखी, तपती ज़मीन पर जून की दोपहर भी नर्क से कम नहीं थी, लेकिन डॉ. प्रणव कश्यप की आँखों में जिज्ञासा की जो आग जल रही थी, वह हर तपन को फीका कर देती थी। पुरातत्व विभाग की ओर से सिंधु घाटी से जुड़ी किसी उप-सभ्यता की खोज के लिए खुदाई का यह दसवाँ दिन था, और अब तक मिली थीं केवल मिट्टी के बर्तन, टूटे हुए दीवार के टुकड़े, और दो-तीन अधजली लकड़ियाँ। मगर आज, जब खुदाई की टीम ज़मीन के तीसरे स्तर तक पहुँची थी, एक कुदाली ज़मीन में किसी…
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अनिकेत तिवारी सुबह की भीड़भाड़ भरी दिल्ली, उसकी चिल्ल-पों और भागती ज़िंदगी की आवाज़ें जब भी खिड़की से भीतर आतीं, आदित्य के मन में एक खालीपन भर देतीं। उसकी ग्यारहवीं मंज़िल की बालकनी से दिखाई देता था ट्रैफिक का रेंगता हुआ सर्प, जिसके बीच वो भी रोज़ अपनी कार में फँसा रहता—सोचता हुआ कि आखिर ये दौड़ क्यों है, किसलिए है, और वो इस दौड़ में क्या खो रहा है। उसने एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सालों मेहनत की थी, कामयाबी की ऊँचाई पर था, हर महीने अच्छा खासा वेतन, स्टेटस, कार, ऑफिस कैबिन, सबकुछ था—सिवाय चैन के। उस सुबह,…
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आकाश वर्मा १ मुंबई की बारिशें जैसे पूरे शहर को धो डालती थीं, वैसे ही कभी-कभी मन के भीतर जमी गर्द भी बहा ले जाती थीं। लेकिन विवान मल्होत्रा के लिए, आज की शाम औरों से अलग थी—बाहर की बूंदों में तो लय थी, मगर उसके भीतर सुर गुम थे। वह अपने छोटे से अपार्टमेंट के कोने में बैठे हुए गिटार के तारों को हल्के से छेड़ता रहा, जैसे किसी खोए हुए एहसास को आवाज़ देने की कोशिश कर रहा हो। पिछले कुछ महीनों से उसकी ज़िंदगी एक अजीब-सी दोहरी लड़ाई में उलझी थी—एक तरफ़ अपने सपनों को सच करने…