Hindi - फिक्शन कहानी

सत्ता के साये में

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कविता मेहरा


भाग १

दिल्ली की सर्द सुबहें हमेशा कुछ छुपाए रखती हैं। कोहरे में लिपटी इमारतें, सड़क किनारे चाय की दुकानों से उठती भाप, और नेताओं की कारों के काफ़िले—इन सबके बीच कुछ ऐसा भी चलता है जो दिखाई नहीं देता, पर असर छोड़ता है। साउथ ब्लॉक के पीछे एक पुरानी बिल्डिंग है—’शंकर निवास’—जहाँ कभी एक मंत्री का परिवार रहता था, पर अब वहाँ रहस्यों की परछाइयाँ घूमती हैं।

नेहा वर्मा, एक तेज़-तर्रार पत्रकार, ‘नव भारत आज’ चैनल की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर है। ३२ साल की नेहा राजनीति की गलियों में सच खोजने की आदी हो चुकी थी। उसका काम केवल ख़बरें लाना नहीं था, बल्कि उन कहानियों के पीछे की कहानियों को उजागर करना था, जिनसे पूरा देश अंजान होता है। उस दिन जब उसने अपने मेलबॉक्स में एक बिना नाम का लिफ़ाफ़ा देखा, तो उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि ये उसके करियर की सबसे खतरनाक स्टोरी का दरवाज़ा खोल देगा।

लिफ़ाफ़े में एक पेंड्राइव थी। उसमें एक वीडियो था—कमज़ोर आवाज़ में कोई कह रहा था, “अगर मैं नहीं रहा तो ये वीडियो जनता तक पहुँचाना। ये सिर्फ़ एक आदमी की हत्या नहीं है, ये लोकतंत्र की हत्या है।” वीडियो में दिखाई दिया—मंत्री रमेश गौतम, सत्ताधारी दल के कद्दावर नेता, एक गुप्त मीटिंग में कुछ लोगों को नक्शे और दस्तावेज़ दिखा रहे थे। कुछ सेकंड बाद कैमरा झटके से बंद हो गया।

नेहा की आँखें खुली की खुली रह गईं। रमेश गौतम—जिसे जनता ‘जननायक’ कहती है, जिसके नाम पर योजनाएँ बनती हैं, स्कूलों के नाम रखे जाते हैं—क्या वह वाकई किसी गहरी साजिश का हिस्सा है?

उसी शाम नेहा पहुँची अपने बॉस, करण मेहता के पास। करण ने वीडियो देखा, फिर सिगरेट का एक लंबा कश लेते हुए बोला, “नेहा, ये स्टोरी तुम्हें या तो स्टार बना देगी, या सब कुछ छीन लेगी। सोच लो, कूदना है या नहीं।”

नेहा मुस्कराई, “मैं डरने वालों में नहीं हूँ, सर।”

जांच की शुरुआत वहीं से हुई। सबसे पहला सवाल था—ये वीडियो किसने भेजा? नेहा ने मेलबॉक्स की जानकारी निकाली—कोई साइबर कैफ़े से भेजा गया था, आई.पी. ट्रेस कर पाना नामुमकिन था। उसने वीडियो को फॉरेंसिक टीम से सत्यापित कराया—वीडियो असली था, छेड़छाड़ नहीं की गई थी।

अब नेहा का अगला कदम था—रमेश गौतम के इर्द-गिर्द मौजूद लोगों की पड़ताल। उसे पता चला कि हाल ही में एक आर.टी.आई. कार्यकर्ता, अभय मिश्रा, लापता हुआ था। उसका आख़िरी ट्वीट था, “अगर मुझे कुछ हुआ, तो जानना कि सच्चाई बहुत बड़ी है।”

नेहा को शक हुआ—क्या ये वीडियो उसी अभय ने भेजा था? वो उसके परिवार से मिली—बूढ़ी माँ, टूटे हुए भाई—सबका एक ही जवाब था, “अभय ने किसी बड़े आदमी को बेनकाब करने की कसम खाई थी।”

नेहा ने पुराने न्यूज़ आर्टिकल्स खंगाले। एक खबर में लिखा था कि अभय ने मंत्रालय से कुछ ज़मीन आवंटन के दस्तावेज़ माँगे थे, जो रमेश गौतम की पत्नी की एनजीओ को गए थे। यहीं से नेहा को एक और लिंक मिला—’कवच फाउंडेशन’—एक एनजीओ जो सुदूर गांवों में हेल्थ सेंटर खोलने का दावा करता है, लेकिन असल में वहाँ ज़मीन के नाम पर गड़बड़ी चल रही थी।

जैसे-जैसे नेहा गहराई में जाती गई, उसे अपने चारों ओर निगाहें महसूस होने लगीं। एक दिन उसकी गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए, लेकिन वो बाल-बाल बच गई। पुलिस ने कहा, “महज एक्सिडेंट है।” पर नेहा जानती थी, ये एक चेतावनी थी।

उसी रात उसके दरवाज़े पर एक लिफाफ़ा फेंका गया—इस बार एक तस्वीर थी—नेहा की माँ, पार्क में बैठी हुई। पीछे एक लाइन लिखी थी—”सच की क़ीमत बहुत होती है।”

नेहा काँप गई, पर रुकी नहीं। अगले दिन उसने तय किया कि वो ‘कवच फाउंडेशन’ के ऑफ़िस जाकर अंदरूनी हालात देखेगी। पत्रकार के रूप में नहीं, एक वॉलंटियर बनकर।

वहाँ जाकर जो उसने देखा, उससे उसकी सांसें थम गईं—दीवार पर लगी एक पुरानी फोटो—जिसमें रमेश गौतम, अभय मिश्रा और तीसरे व्यक्ति की तस्वीर थी, जिसका चेहरा धुंधला था। नेहा जानती थी, उस तीसरे आदमी को पहचानना ही अब इस साजिश की चाबी था।

लेकिन तभी उसके फोन पर एक कॉल आया—अंजान नंबर से—”अगर अगले कदम पर बढ़ी, तो तुम्हारी माँ को नहीं बचा पाओगी। तुम्हारे पास सिर्फ़ तीन दिन हैं, सब छोड़ दो।”

नेहा की आंखों में गुस्सा भर आया। वो अब पीछे नहीं हटेगी। लड़ाई सिर्फ़ सच्चाई की नहीं थी, बल्कि उन लोगों की आवाज़ की थी जो खो चुके थे, जिन्हें ग़लत ताकतों ने हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया था।

भाग २

नेहा के पास अब तीन दिन थे। तीन दिन में या तो वह पीछे हटती, या उस राज़ को उजागर करती जिसे छिपाने के लिए ताकतवर लोग किसी भी हद तक जा सकते थे। लेकिन अब यह खेल केवल स्टोरी ब्रेक करने का नहीं था—यह उसकी मां की जान बचाने का सवाल बन चुका था। डर उसके मन में था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बड़ा था उसका जिद्दीपन, जो उसे सच्चाई के और करीब ले जा रहा था।

अगली सुबह, नेहा ने ‘कवच फाउंडेशन’ की गहराई से छानबीन शुरू की। उसने एक फर्जी पहचान बनाई—‘समीरा खान’, लखनऊ की एक सोशल वर्कर, जो गांवों में हेल्थकेयर प्रोजेक्ट पर काम करना चाहती थी। नकली दस्तावेज़ों और एक फर्जी ईमेल आईडी के ज़रिए उसने फाउंडेशन में इंटरव्यू लिया। दो दिन के अंदर उसे ‘फील्ड डिपार्टमेंट असिस्टेंट’ की पोज़िशन मिल गई।

पहले दिन ही, उसे कुछ अजीब बातें समझ में आईं। फाउंडेशन की मीटिंग्स में मंत्री रमेश गौतम कभी-कभी अचानक बिना किसी रिकॉर्ड के आ जाते, और उनके आने पर पूरे स्टाफ का बर्ताव बदल जाता। फाइलें बंद हो जातीं, लोग कानाफूसी करने लगते। जो गाँवों में क्लीनिक बनाने के नाम पर लाखों के बजट की बात होती थी, वहां किसी भी गाँव में असल में एक भी क्लीनिक न था।

तीसरे दिन, एक वर्कर रजनी ने धीरे से नेहा को पास बुलाया और फुसफुसाकर कहा, “तुम बाहर की लगती हो, पत्रकार हो क्या? संभल के रहना, यहां लोग ऐसे ग़ायब होते हैं जैसे कभी थे ही नहीं।”

नेहा चौंकी। “तुम क्या जानती हो?” नेहा ने पूछा।

रजनी ने एक पुरानी फाइल पकड़ाई, जिसके ऊपर लिखा था—“प्रोजेक्ट जनकल्याण: जिला बैतूल।” फाइल में दर्ज था कि वहां एक हेल्थकेयर सेंटर खुला है, ५० लाख की लागत से। साथ में एक फोटो भी लगी थी जिसमें एक गाँव की बूढ़ी महिला के हाथ में इंजेक्शन लगते हुए दिखाया गया था।

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वह महिला पहले भी एक और फाउंडेशन की फाइल में थी—बिलकुल वही पोज़, वही कपड़े, बस गांव का नाम अलग। यानी, फोटो फर्जी थी। एक ही तस्वीर बार-बार इस्तेमाल हो रही थी अलग-अलग परियोजनाओं को दर्शाने के लिए।

रात को नेहा अपने अपार्टमेंट में लौटी, तो दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर सब कुछ अस्त-व्यस्त पड़ा था। लाइट ऑन करते ही उसे दीवार पर खून से लिखा एक वाक्य दिखा—”सच जानना अच्छा है, पर ज़िंदा रहना बेहतर।”

नेहा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन उसने तुरन्त पुलिस को नहीं बुलाया। उसे पता था—ये लोग सिस्टम में बहुत ऊपर तक बैठे हैं। कोई भी छोटी गलती उसके लिए भारी पड़ सकती थी।

उसने अपने दोस्त और तकनीकी एक्सपर्ट अर्जुन को कॉल किया, “अर्जुन, मेरी जगह कोई आ गया था। मुझे एक हार्डड्राइव चाहिए जो फुल एनक्रिप्टेड हो, और अगर मैं दो दिन तक नहीं लौटी, तो फोल्डर ‘प्रोजेक्ट D’ तुम्हारे पास पहुँचना चाहिए।”

अर्जुन ने कहा, “तू सच में जान हथेली पर रख के चल रही है। पर तेरी हिम्मत सलाम है।”

अगले दिन, नेहा ने ‘प्रोजेक्ट जनकल्याण’ के गांव जाने की तैयारी की। उसने एक पुरानी गाड़ी किराए पर ली, और अकेले निकल पड़ी बैतूल की ओर। रास्ता लंबा था, जंगलों और वीरान रास्तों से होकर गुजरता हुआ। लेकिन जब वह वहाँ पहुँची, तो देखा—वह गांव तो था, पर वहां किसी भी तरह का क्लीनिक नहीं था। लोगों ने बताया, “साहब लोग आए थे एक साल पहले, कुछ बैनर लगाए, फोटो खिंचवाई, और चले गए। उसके बाद कोई नहीं आया।”

नेहा ने वही फर्जी फोटो गांव के एक बूढ़े से दिखाकर पूछा, “ये आप हैं?”
वह हँस पड़ा, “नाही बिटिया, हमको कभी कोई इंजेक्शन भी नहीं लगाया गया। फोटो तो हमरी भाभी की लग रही है, लेकिन कब खिंची, पता नहीं।”

अब नेहा के पास पर्याप्त सबूत थे—फर्जी दस्तावेज़, फर्जी फोटो, और गांव वालों के बयान। उसने तय किया—अब इस स्टोरी को लाइव लाना ही होगा। लेकिन चैनल पर वह स्टोरी चलती, उससे पहले उसे एक और टुकड़ा चाहिए था—वह तीसरा चेहरा।

वापसी के समय, नेहा ने एक पुरानी लाइब्रेरी से रमेश गौतम की जीवनी उठाई—‘जननायक: एक संघर्षशील नेता’। किताब के पीछे लेखक का नाम था—प्रोफेसर समीर सेन। उसे याद आया—अभय मिश्रा की एक पुरानी पोस्ट में इसी नाम का ज़िक्र था—“समीर सेन ने जो बताया, वह अगर जनता को पता चल जाए, तो क्रांति हो जाए।”

नेहा ने तुरंत समीर सेन का पता निकाला—वह अब रिटायर हो चुके थे और देहरादून में रहते थे। वह रात को ही ट्रेन से देहरादून निकल पड़ी।

समीर सेन एक दुबले-पतले, लेकिन तीखी नज़र वाले बुजुर्ग थे। नेहा ने जैसे ही अपना परिचय दिया, समीर बोले, “अभय ने तुम्हें भेजा है न?”

नेहा चौंकी, “आप जानते हैं?”

“मैं जानता था, वो ज़िंदा नहीं बचेगा। वो सच्चाई जान गया था। और मैं… मैं गुनहगार हूं, नेहा। क्योंकि मैंने ही मंत्री को बनाया था। मैंने उसकी कहानी लिखी, उसका संघर्ष गढ़ा, उसकी छवि बनायी।”

नेहा ने पूछा, “आप तीसरे आदमी को पहचानते हैं न?”

समीर ने चुपचाप एक पुराना अलबम निकाला। उसमें वही फोटो थी—रमेश गौतम, अभय, और तीसरा व्यक्ति—समीर सेन खुद।

“मैं ही था वो तीसरा चेहरा। मैं जानता हूं, मंत्री ने क्या किया। मेरे पास रिकॉर्डिंग है जो सबको हिला कर रख सकती है। लेकिन उसके लिए कीमत चुकानी पड़ेगी।”

“कैसी कीमत?” नेहा ने पूछा।

समीर बोले, “तुम्हें सत्ता के सबसे अंधेरे गलियारों में उतरना होगा, नेहा। जहां एक बार जाओ, तो लौटना मुश्किल होता है।”

नेहा ने गहरी सांस ली। उसे अब तय करना था—वो लौटेगी, या सत्ता के साये में आगे बढ़ेगी।

भाग ३

समीर सेन की बातों ने नेहा के भीतर कुछ तोड़ दिया और कुछ गढ़ भी दिया। वो जानती थी कि जिस रास्ते पर वह अब बढ़ रही है, वहां से पीछे लौटना संभव नहीं। समीर ने जिस रिकॉर्डिंग का ज़िक्र किया था, वही इस पूरे घोटाले की कड़ी को जोड़ सकती थी—और शायद यही वह चाबी थी जिससे मंत्री रमेश गौतम की पूरी सत्ता हिल सकती थी। लेकिन समीर ने एक शर्त रखी—“यह रिकॉर्डिंग मैं तभी दूंगा, जब तुम तय कर लो कि इसे इस्तेमाल करने की हिम्मत रखती हो। इसे सार्वजनिक करने का मतलब है कि तुम्हारे पीछे सिर्फ़ गुंडे नहीं, पूरी सरकार पड़ जाएगी।”

नेहा ने उसकी आंखों में देख कर कहा, “मैं अपने डर से पहले ही दूर आ चुकी हूं, अब बस सच को सामने लाना है।”

समीर एक पुराना टेपरिकॉर्डर निकाल लाया, उसके अंदर एक टेप थी जिस पर लिखा था—”१९ जनवरी २०१८ – शक्ति भवन मीटिंग”। टेप प्ले करते ही एक धीमी सी आवाज़ उभरी—”रमेश, ज़मीन अगर हम कवच फाउंडेशन को ट्रांसफर करते हैं, तो यह NGO के नाम पर रहेगा, लेकिन नियंत्रण हमारे पास।…” फिर रमेश गौतम की आवाज़ आई—”और जब चुनाव आएंगे, तो उसी ज़मीन को मुफ्त में बाँटकर हम मसीहा कहलाएंगे। योजना सफल होनी चाहिए, समझे?”

नेहा के रोंगटे खड़े हो गए। ये टेप सिर्फ़ घोटाले का सबूत नहीं था, ये दर्शा रहा था कि सत्ता के गलियारों में कैसे योजनाओं की नहीं, चालों की राजनीति होती है।

समीर ने कहा, “यह टेप मैं अभय को देना चाहता था, लेकिन उससे पहले ही वह गायब हो गया। मुझे अब डर है कि अगर यह टेप तुम्हारे पास नहीं पहुँचा, तो सच्चाई कभी नहीं बाहर आएगी।”

नेहा ने टेप को सुरक्षित अपने बैग में रखा और एक बार फिर दिल्ली के लिए रवाना हो गई। इस बार उसके पास कहानी पूरी थी—सबूत, गवाह, और साजिश का केंद्र बिंदु।

दिल्ली पहुँचते ही उसने अर्जुन को बुलाया और पूरी रिकॉर्डिंग डिवाइस में कॉपी करवाई। “दो बैकअप रखो। एक तुम्हारे पास, एक क्लाउड पर। और इसे एनक्रिप्ट करो। अगर मुझे कुछ हुआ, तो ये पब्लिक कर देना।”

अर्जुन की आंखों में चिंता थी। “तू क्यों नहीं समझती, नेहा? ये लोग कुछ भी कर सकते हैं। तुझे पुलिस प्रोटेक्शन लेनी चाहिए।”

नेहा हँसी, “जिस सिस्टम में दोषी बैठे हैं, उसी सिस्टम से सुरक्षा मांगे? नहीं अर्जुन, मेरी सुरक्षा अब सिर्फ़ मेरी सच्चाई है।”

उस रात उसने ‘नव भारत आज’ चैनल के प्रोड्यूसर करण मेहता से मीटिंग की। करण ने जब रिकॉर्डिंग सुनी, तो कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “नेहा, ये स्टोरी नहीं है, ये ब्लास्ट है! पर हमें सावधानी से चलना होगा। अगर ये पहले लीक हो गया, तो वे इसे झूठा बता देंगे। हम इसे प्राइम टाइम पर दिखाएंगे, लेकिन उससे पहले इसे लीगल टीम से क्लियर कराना होगा।”

नेहा को अंदेशा था कि ज्यादा वक्त लिया गया, तो ये खबर दबा दी जाएगी। इसलिए उसने एक बैकअप प्लान बनाया। उसने एक गुमनाम सोशल मीडिया अकाउंट तैयार किया—“जनता का गवाह”—और उसमें पूरे डॉक्यूमेंट्स, फर्जी फोटोज़ और एक छोटा सा अंश टेप का पोस्ट किया।

“देश को जागना होगा,” उसने ट्वीट किया।

अगले २४ घंटे में पोस्ट वायरल हो गया। न्यूज़ चैनल्स, यूट्यूब, और ट्विटर पर ‘कवच फाउंडेशन घोटाला’ ट्रेंड करने लगा। मंत्री रमेश गौतम का नाम पहली बार जनता की नजरों में सवालों के घेरे में आया।

लेकिन जैसे ही तूफान उठा, तूफान लाने वाले पर भी वार हुआ।

अगले दिन नेहा के फ्लैट के नीचे एक काली स्कॉर्पियो खड़ी मिली। उसकी मां, जो अब तक उसके मामा के घर थी, अचानक लापता हो गई। नेहा के फोन पर एक वीडियो आया—मां की आंखों पर पट्टी बंधी थी, और पीछे से वही आवाज़—“हमने कहा था ना, सच्चाई की कीमत होती है। अब ये खेल तुझसे नहीं, तेरे खून से होगा।”

नेहा के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह दौड़कर थाना गई, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया। एक इंस्पेक्टर ने धीरे से कान में कहा, “बहुत ऊपर से आदेश है, मैडम जी। हम कुछ नहीं कर सकते।”

नेहा टूट नहीं सकती थी। वह जानती थी, अब उसे खुद ही अपनी मां को बचाना होगा। उसने चैनल ऑफिस में करण और अर्जुन को बुलाया।

“अब वक्त है रिवर्स अटैक का,” नेहा बोली। “अगर हम पीछे हटे, तो वो मेरी मां को मार देंगे। हमें इन्हें डराना होगा।”

करण ने कहा, “हम प्राइम टाइम पर टेप चला देंगे।”

नेहा ने सिर हिलाया, “लेकिन उससे पहले मुझे माँ तक पहुँचना होगा। मुझे अंदाज़ा है, वे उसे कहाँ ले जा सकते हैं।”

उसने कवच फाउंडेशन के पुराने दस्तावेज़ खंगाले। एक ‘रूरल ट्रेनिंग सेंटर’ का ज़िक्र था—गुड़गांव के बाहर, एक वीरान फार्महाउस में। कोई स्टाफ रजिस्टर नहीं था, कोई आॅपरेशन रिकॉर्ड नहीं। बहुत संभव था कि वही ‘अदृश्य ठिकाना’ हो।

नेहा और अर्जुन उसी रात उस लोकेशन के लिए निकले। रास्ते में अर्जुन बोला, “नेहा, पुलिस नहीं, लेकिन मेरे पास एक जान-पहचान है—आर्मी से रिटायर्ड कर्नल अरोड़ा, जो प्राइवेट सिक्योरिटी चलाते हैं। मैं उन्हें कॉल कर रहा हूँ।”

नेहा ने शुक्रिया कहा। फार्महाउस पहुँचते ही उन्हें चार हथियारबंद लोग दिखे। अंदर एक अंधेरे कमरे में उसकी माँ बंधी हुई थी।

अर्जुन ने कर्नल की टीम को इशारा किया। एक मिनी-ऑपरेशन हुआ। थोड़ी मारपीट, थोड़ी भगदड़—लेकिन नेहा की माँ सुरक्षित बाहर आ गई।

नेहा ने माँ को गले लगाते हुए कहा, “अब कोई हमें रोक नहीं सकता।”

उसी रात ‘नव भारत आज’ पर 9 बजे की हेडलाइन थी—“टेप से खुला मंत्री रमेश गौतम का काला सच: नेहा वर्मा की एक्सक्लूसिव स्टोरी।”

स्टूडियो में नेहा, करण और लीगल टीम बैठी थी। कैमरा ऑन हुआ।

नेहा ने कहा, “ये स्टोरी किसी एक की नहीं, देश की है। लोकतंत्र की सच्चाई है कि जब कोई सवाल पूछे, तो उसे डराया जाता है। लेकिन अब डरने का वक्त नहीं, अब लड़ने का वक्त है।”

और वीडियो ऑन हुआ—वह टेप, वह गवाही, वह आवाज़ जिसने सत्ता की दीवारों में दरार डाल दी।

भाग ४

टेप के प्रसारण ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। ‘नव भारत आज’ की स्क्रीन पर चलते उस वीडियो ने ऐसा तूफ़ान मचाया कि सोशल मीडिया से लेकर संसद तक सिर्फ़ एक ही नाम गूंजने लगा—रमेश गौतम। विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया, चैनलों पर बहसें तेज़ हो गईं, और जनता सवालों से लैस होकर सड़कों पर उतरने लगी।

लेकिन जैसे ही सच्चाई की एक लहर उठी, सत्ता ने भी अपनी चालें तेज़ कर दीं।

नेहा अगली सुबह चैनल पहुँची तो गेट पर पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं। अंदर घुसते ही करण ने उसे घबराई आवाज़ में बताया, “सतर्कता विभाग ने चैनल पर छापा मारा है। कहा गया है कि ‘राष्ट्रविरोधी सामग्री’ प्रसारित की गई है। सरकार का आदेश है—आज रात से प्रसारण पर रोक।”

नेहा का चेहरा बुझ गया। वह समझ गई थी कि यह ‘कानूनी कार्रवाई’ नहीं बल्कि एक सीधा हमला है, उसे चुप कराने की साज़िश। लेकिन वह रुकी नहीं। उसने अर्जुन से कहा, “अब हमें प्लान बी पर जाना होगा।”

प्लान बी—जिसका मतलब था, स्टोरी को जनता के पास सीधे पहुंचाना, बिना किसी चैनल या सरकार की अनुमति के। अर्जुन ने एक अनऑथराइज्ड स्ट्रीमिंग सर्वर तैयार किया था, जो डार्क वेब की मदद से लाइव जा सकता था। “अगर हम इसे इंटरनेट पर रिलीज़ करें, तो कोई इसे रोक नहीं सकता,” अर्जुन ने कहा।

उसी समय, नेहा को एक अनजान नंबर से कॉल आया।

“तुम बहुत दूर चली आई हो, नेहा। लेकिन ये आख़िरी कदम होगा तुम्हारा। इस बार सिर्फ़ धमकी नहीं होगी।”

फोन कट गया। नेहा ने नंबर ट्रेस करने की कोशिश की, लेकिन वह किसी वर्चुअल नेटवर्क से जुड़ा था। कोई ऐसा शख्स था जो उसे लगातार देख रहा था—हर कदम, हर फैसला।

उधर, मंत्री रमेश गौतम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने कैमरे के सामने आकर कहा, “ये एक राजनीतिक साजिश है। मुझे बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। वीडियो नकली है, और मैं इसकी जांच की मांग करता हूं।”

कुछ न्यूज चैनल्स, जो सत्ता के करीब थे, तुरंत उनके समर्थन में खबरें चलाने लगे। “वीडियो का सोर्स संदिग्ध,” “पत्रकार की नीयत पर सवाल,” “नेहा वर्मा की राजनीति से साठगांठ?”—ऐसे हैडलाइन चलने लगे।

नेहा जानती थी, अगर उसने इस समय चुप्पी साध ली, तो सब खत्म हो जाएगा। इसलिए उसने एक और हिम्मत भरा फैसला लिया—जनता अदालत। एक लाइव इवेंट, जिसमें वो खुद सामने आकर सारे सबूत रखेगी, जनता से सीधा संवाद करेगी।

कार्यक्रम के लिए एक गुप्त लोकेशन चुनी गई—दिल्ली के बाहर एक पुरानी फिल्म स्टूडियो। वहाँ अर्जुन ने तकनीकी सेटअप लगाया, समीर सेन भी पहुँच चुके थे, और कुछ भरोसेमंद स्वतंत्र पत्रकारों को आमंत्रित किया गया।

रात आठ बजे, नेहा कैमरे के सामने बैठी। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में वही ज्वाला थी जो सच्चाई की आग से जलती है।

“नमस्कार,” उसने कहा, “मैं नेहा वर्मा हूँ। आज मैं कोई स्टोरी नहीं सुना रही, मैं एक लड़ाई लड़ रही हूँ—आपके लिए, हमारे लोकतंत्र के लिए।”

फिर उसने एक-एक कर सबूत पेश किए—वह टेप, वह फर्जी एनजीओ की रिपोर्ट, ज़मीन घोटाले के दस्तावेज़, और गाँव वालों के बयान। समीर सेन ने खुद कैमरे के सामने आकर गवाही दी, “मैंने मंत्री रमेश गौतम की छवि बनाई थी। आज मैं उसी को तोड़ रहा हूँ, क्योंकि सच अब भी ज़िंदा है।”

लाइव वीडियो के दौरान दर्शक संख्या लाखों में पहुँच गई। ट्विटर पर #सच्चाई_की_आवाज़ ट्रेंड कर रहा था। लेकिन उसी दौरान, कुछ खतरनाक हुआ।

फिल्म स्टूडियो के बाहर फायरिंग शुरू हो गई। अर्जुन ने दौड़ते हुए नेहा से कहा, “कुछ हथियारबंद लोग बाहर घुसने की कोशिश कर रहे हैं। हमें तुरंत लाइव बंद करना होगा।”

नेहा ने कहा, “नहीं अर्जुन, अगर आज यह वीडियो अधूरा रह गया, तो वे इसे कभी दिखने नहीं देंगे। हम तब तक लाइव रहेंगे, जब तक सच्चाई आख़िरी इंसान तक नहीं पहुँच जाती।”

उसी समय, कर्नल अरोड़ा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुँचे। फायरिंग रुकवाई गई, और हमलावरों को खदेड़ दिया गया। लेकिन नेहा समझ चुकी थी कि अब वह केवल पत्रकार नहीं रही—वह एक खतरा बन चुकी थी, उन लोगों के लिए जो सत्ता के पर्दे के पीछे छिपे बैठे थे।

इवेंट के बाद, नेहा की माँ और समीर सेन को एक सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया। नेहा और अर्जुन अब छिपते-छिपते रह रहे थे। लेकिन उनका वीडियो पूरी दुनिया में वायरल हो चुका था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इसे कवर करने लगी।

तीन दिन बाद, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। सीबीआई जांच के आदेश दिए गए। मंत्री रमेश गौतम को पहले पूछताछ के लिए बुलाया गया, फिर अस्थायी रूप से पद से हटने की घोषणा की गई। सरकार ने मामले को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया, लेकिन जनता जान चुकी थी कि असल लड़ाई किसने लड़ी थी।

नेहा चैनल लौटकर आई, तो ऑफिस में तालियाँ बज रही थीं। लेकिन उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी।

करण ने पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें तो जीत मिली है।”

नेहा बोली, “सच को उजागर करना जीत नहीं, ज़िम्मेदारी है। मुझे पता है, ये लड़ाई खत्म नहीं हुई—ये तो शुरुआत थी। एक मंत्री गया, पर वो व्यवस्था जो ऐसे लोगों को जन्म देती है, अब भी जिंदा है।”

अर्जुन पास आया, “अब क्या करेगी?”

नेहा ने कहा, “अब एक नया चैप्टर शुरू होगा—सत्ता के साए से बाहर की पत्रकारिता। हम अब डर के बिना, हर कोने से सच लाएंगे।”

और उसने अपनी डायरी में लिखा:

“हमने अंधेरे में एक दिया जलाया है। अब अगर आँधी आई, तो दीयों की कतार बना देंगे।”

भाग ५

नेहा की कहानी अब किसी एक पत्रकार की नहीं रह गई थी। वह आवाज़ बन चुकी थी उन सबकी जो कभी चुप थे, डरे हुए थे, या दबा दिए गए थे। ‘सत्ता के साये में’ जो तूफ़ान उसने खड़ा किया था, उसकी गूंज देश के कोने-कोने में सुनाई देने लगी थी। लेकिन जैसे ही पहली परत हटती है, अगली परतें और ज़्यादा खतरनाक निकलती हैं—और नेहा यह बात अब अच्छे से समझ चुकी थी।

सीबीआई ने जैसे ही मंत्री रमेश गौतम को पूछताछ के लिए तलब किया, वह अचानक बीमार पड़ गए। अस्पताल में भर्ती हो गए, और सरकारी डॉक्टर्स की टीम ने कहा—“उन्हें हृदय संबंधी समस्याएं हैं, आराम की ज़रूरत है।” मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अब भी सरकार के इशारे पर कहानी को ‘दुखद साजिश’ बताने में जुटा हुआ था।

लेकिन नेहा अब इस नाटक से थक चुकी थी। वह जानती थी कि अगर जनता का ध्यान भटका, तो यह सारा संघर्ष व्यर्थ हो जाएगा।

उसी समय, अर्जुन ने एक और चौंकाने वाला सुराग पेश किया। उसने कवच फाउंडेशन के पुराने बैंक रिकॉर्ड्स ट्रेस किए थे। वहाँ एक अजीब-सा नाम सामने आया—M/S Shree Laxmi Traders—एक कंपनी जिसने फाउंडेशन को कई करोड़ की मशीनरी सप्लाई की थी। लेकिन जब अर्जुन ने एड्रेस ट्रेस किया, तो वह एक पुरानी बंद फैक्ट्री निकली।

नेहा को लगा जैसे यह कोई शेल कंपनी है, जो सिर्फ पैसे घुमाने के लिए बनाई गई थी।

नेहा ने कहा, “इस ट्रैक को फॉलो करना होगा। पैसा जहां जाता है, वहीं से सच्चाई का रास्ता शुरू होता है।”

अर्जुन ने रात भर की मेहनत से उस कंपनी से जुड़ी डिटेल निकाली—डायरेक्टर का नाम था निखिल वशिष्ठ। और सबसे चौंकाने वाली बात ये थी कि निखिल, रमेश गौतम की बेटी की ससुराल से जुड़ा हुआ था। यानी रिश्ता पारिवारिक था, और लेन-देन में पारदर्शिता शून्य।

नेहा को समझ आ गया कि यह घोटाला अकेले रमेश गौतम का नहीं है। इसके पीछे एक पूरा नेटवर्क है—रिश्तों, पदों और पैसे का जाल, जो देश की सबसे ऊंची कुर्सियों तक फैला है।

अब इस साजिश का अगला हिस्सा था—’प्रोजेक्ट विकास 2040’।

ये एक नई सरकारी योजना थी जिसका शिलान्यास रमेश गौतम ने अस्पताल से वीडियो कॉल के ज़रिए किया था। योजना के अंतर्गत देश के पिछड़े जिलों में 2040 तक 100 स्मार्ट गांव बनाए जाने थे—संपूर्ण तकनीकी, स्वास्थ्य, और शिक्षा सुविधाओं से युक्त। लेकिन नेहा ने जब इसके प्रोजेक्ट पेपर्स देखे, तो उसमें फिर वही कंपनी—M/S Shree Laxmi Traders—लाभार्थी थी।

नेहा जानती थी कि यह एक और बड़ी लूट की तैयारी है, बस इस बार एक नई चादर ओढ़कर।

वह इस बार अकेली नहीं जाना चाहती थी। उसने अब तक कई दुश्मन बना लिए थे। वह समीर सेन से मिलने गई।

“सर, ये ‘प्रोजेक्ट विकास’ असल में क्या है?”

समीर ने गहरी सांस ली, “नेहा, ये एक सपना है जिसे सरकार दिखाकर अपना उल्लू सीधा करती है। जब मैं सत्ता के पास था, तब भी ऐसी योजनाएं बनती थीं, लेकिन ज़मीनी हकीकत वही थी—लोग भूखे थे, स्कूल बिना छत के थे, और अस्पतालों में डॉक्टर नहीं थे।”

“तो इसका क्या किया जाए?” नेहा ने पूछा।

“इस बार तुम्हें एक राजनीतिक स्रोत की ज़रूरत है। कोई ऐसा जो सिस्टम के अंदर हो, लेकिन सच के साथ खड़ा हो सके।”

नेहा ने दो दिन की मेहनत के बाद ऐसे एक सांसद से संपर्क किया—आरती राव, एक स्वतंत्र सांसद जो पहले भी कई बार सरकार की नीतियों पर सवाल उठा चुकी थीं। वह महिला सशक्तिकरण, पारदर्शिता और किसान मुद्दों की कट्टर समर्थक थीं।

नेहा ने आरती राव से मुलाकात की और सबूतों का पुलिंदा उनके सामने रखा।

आरती राव ने शांत स्वर में कहा, “नेहा, तुम्हारी हिम्मत काबिल-ए-तारीफ है। मैं संसद में सवाल उठाऊंगी, लेकिन तुम तैयार रहो—अगर मैंने यह मुद्दा उठाया, तो सरकार पलटवार करेगी। तुम्हें निशाना बनाया जाएगा।”

नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “मुझे अपनी नहीं, देश की चिंता है। मुझे डर नहीं लगता अब।”

अगले हफ्ते संसद सत्र में आरती राव ने बम फोड़ा। उन्होंने कैबिनेट से सीधा सवाल किया—“क्या मंत्री रमेश गौतम की पारिवारिक कंपनियों को ‘प्रोजेक्ट विकास 2040’ का ठेका मिला है? क्या सरकार को नहीं मालूम कि यह ट्रांजैक्शन हितों के टकराव का मामला है?”

संसद में हंगामा मच गया। सत्ता पक्ष के मंत्री बेंच थपथपाने लगे, लेकिन विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया।

उधर, नेहा और अर्जुन ने सोशल मीडिया पर एक खुली सीरीज़ शुरू की—“विकास के पीछे की सच्चाई”। इसमें उन्होंने दस्तावेज़ों, गांवों की तस्वीरें, बैंक ट्रांसफर डिटेल और लाभार्थियों के नामों के साथ तथ्य साझा करने शुरू किए।

तीन दिन में ही देशभर के पत्रकार, स्टूडेंट्स और एक्टिविस्ट्स इस मुहिम से जुड़ गए।

लेकिन जैसे-जैसे सच्चाई बाहर आ रही थी, ख़तरा भी बढ़ता जा रहा था।

एक रात, नेहा के अपार्टमेंट के बाहर फिर वही स्कॉर्पियो खड़ी मिली। इस बार पीछे की सीट पर एक आदमी बैठा था—चेहरे पर नकाब। उसने शीशा नीचे किया और धीरे से एक लिफाफा बाहर फेंका।

नेहा ने हिम्मत करके वह लिफाफा खोला।

भीतर एक फोटो थी—उसकी माँ, समीर सेन और आरती राव की—तीनों पर लाल निशान बने हुए थे।

साथ में एक चिट्ठी थी—“अगली गोली चेतावनी नहीं होगी। विकास का विरोध बंद करो।”

नेहा का शरीर सिहर गया। पर उसने अपनी मुट्ठी भींच ली।

उस रात उसने अपनी माँ को एक नए सेफहाउस में शिफ्ट किया। समीर सेन को सेना की मदद से उत्तराखंड भेजा गया। और आरती राव को संसद में एक विशेष सुरक्षा दल मिला।

लेकिन नेहा जानती थी कि अब आखिरी मोर्चा आ चुका है।
अब ये सिर्फ़ एक घोटाले की रिपोर्ट नहीं, बल्कि सत्ता और जनता के बीच की आख़िरी लड़ाई थी।

और इस बार, हारने का मतलब था—सिर्फ़ एक पत्रकार का हारना नहीं, बल्कि सच का दम घुट जाना।

भाग ६

नेहा की ज़िंदगी अब एक रोलिंग कैमरा बन चुकी थी—हर पल रिकॉर्ड हो रहा था, हर कदम ज़िम्मेदारी से भरा था। उसका मोबाइल, उसका लैपटॉप, उसके मेल—सब हैक होने की कोशिश की जा चुकी थी। लेकिन अब डर से परे, वह एक अलग ज़ोन में पहुँच चुकी थी। जैसे किसी धधकती आग में प्रवेश कर लिया हो, और अब पीछे लौटने का कोई रास्ता न हो।

उसने अगली सुबह पत्रकारों की एक बैठक बुलाई—वे सब युवा और स्वतंत्र पत्रकार थे, जो इस क्रांति का हिस्सा बनना चाहते थे। नेहा ने सबके सामने एक ब्लूप्रिंट रखा—“ऑपरेशन दीपशिखा”।

“यह कोई एक रिपोर्ट या वीडियो नहीं होगा,” नेहा ने कहा। “ये एक ऐसा दस्तावेज़ होगा जिसमें हर कड़ी, हर कागज़, हर नाम जुड़ा होगा। हम इसे पूरी तरह से फुल-प्रूफ बनाएंगे, और फिर एक साथ देशभर के ५० शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। सोशल मीडिया पर लाइव होंगे, और एक इंटरएक्टिव डॉक्युमेंट्री बनाएंगे—ताकि कोई इसे छिपा न सके, मिटा न सके।”

किसी ने पूछा, “क्या सरकार इसे रोकने की कोशिश नहीं करेगी?”

नेहा ने मुस्कराकर कहा, “जरूर करेगी। इसलिए हम इसे विकेंद्रीकृत करेंगे। हर राज्य में एक यूनिट होगी, और फाइल्स ब्लॉकचेन पर एन्क्रिप्टेड होंगी। हम टेक्नोलॉजी से लड़ेंगे, और पब्लिक से जोड़ेंगे।”

इस बार नेहा केवल अकेली योद्धा नहीं थी—उसके साथ अब एक आंदोलन खड़ा हो चुका था।

इधर सरकार की ओर से भी दबाव बढ़ने लगा। एक फर्जी केस फाइल किया गया—नेहा पर ‘जनता को भड़काने’ और ‘गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ों की चोरी’ का आरोप लगा।
पुलिस का वारंट लेकर कुछ अफसर उसके फ्लैट पर पहुंचे, लेकिन वह पहले ही अंडरग्राउंड हो चुकी थी।

इस बीच, मंत्री रमेश गौतम ने अस्पताल से एक वीडियो जारी किया—“मेरे खिलाफ षड्यंत्र रचा जा रहा है। मेरी तबियत बिगड़ती जा रही है, लेकिन मुझे न्याय चाहिए। मैं अदालत में केस करूंगा इस पत्रकार के खिलाफ।”

वहीं दूसरी ओर, नेहा और उसकी टीम ने ऑपरेशन दीपशिखा का पहला ट्रेलर यूट्यूब पर रिलीज़ किया। एक मिनट का वीडियो जिसमें एक आवाज़ उभरती है—

“यह कहानी एक आदमी की नहीं, एक पूरी व्यवस्था की है। जो चुप रहे, वो भी दोषी हैं। पर अब कोई चुप नहीं रहेगा।”

वीडियो वायरल हो गया। तीन दिन में एक करोड़ व्यूज़। नेहा अब न केवल एक पत्रकार, बल्कि एक प्रतीक बन गई थी—सत्य की लौ, सत्ता की आँखों में।

उस दिन शाम को, आरती राव ने संसद में एक विशेष प्रस्ताव रखा—“विकास परियोजना की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन।” बहस गर्म थी। सरकार ने बचाव में कहा, “यह सब एक महिला पत्रकार की सनसनी फैलाने की कोशिश है।”

लेकिन इस बार पूरा विपक्ष एकजुट हो गया। जनता के दबाव और सोशल मीडिया की आंधी ने सरकार को मजबूर कर दिया—प्रस्ताव पास हुआ।

संसद में एक समिति गठित हुई, और जांच के लिए एक स्वतंत्र आयोग बनाया गया।

इधर नेहा ने अंतिम तैयारी शुरू की। ऑपरेशन दीपशिखा को लॉन्च करने से एक दिन पहले, उसने अर्जुन से कहा, “हम अब वापस नहीं जा सकते। जो होगा, सामना करेंगे।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा, “तू जानती है, मैं तुझसे प्यार करता हूँ, ना?”

नेहा चौंक गई। सन्नाटा छा गया कुछ पल के लिए।

“मैं जानती थी,” उसने धीरे से कहा। “पर अभी ये लड़ाई ज़्यादा बड़ी है, अर्जुन।”

अर्जुन ने सिर हिलाया, “मैं तुम्हारे साथ हूँ, हमेशा। चाहे नायक बनूं या बलि का बकरा।”

अगली सुबह, भारत के ५० शहरों में एक साथ प्रेस मीट हुई। डॉक्युमेंट्री ‘दीपशिखा: सत्ता के साये में’ यूट्यूब और वेबसाइट्स पर लॉन्च हुई।

उसके अंदर एक-एक घोटाले की कड़ी थी—फ़र्जी कंपनियाँ, रिश्वतखोरी के प्रमाण, सरकारी दस्तावेज़ों में हेरफेर, गाँव वालों की गवाही, और सबसे अहम—राजनीतिक रिश्तों की चौंकाने वाली परतें।

आख़िरी दस मिनट में एक गुप्त क्लिप चलाई गई—जो अब तक किसी ने नहीं देखी थी।

उसमें एक मीटिंग दिखाई गई—रमेश गौतम और दो अन्य मंत्रियों के बीच। टेबल पर लम्बे फाइल, और एक आदमी कैमरा छिपाकर रिकॉर्डिंग कर रहा था—वही अभय मिश्रा, जो अब इस दुनिया में नहीं था।

रमेश गौतम कह रहे थे, “हमें योजना ऐसे ढंग से बनानी है कि सब कुछ लीगल लगे। पैसा एनजीओ से कंपनी में, कंपनी से दूसरे हाथ में। और जो सवाल पूछे, उसका ट्रांसफर, या एक्सीडेंट।”

यह सुनते ही देश भर में शॉकवेव फैल गया।

इस क्लिप ने सारे शक दूर कर दिए। यह ‘एक आदमी की गलती’ नहीं, एक पूरी गैंग का षड्यंत्र था। और उस गैंग में सिर्फ नेता नहीं, बिज़नेसमैन, अफसर, और मीडिया के लोग भी शामिल थे।

अगले दो घंटे में, राष्ट्रपति ने प्रेस स्टेटमेंट जारी किया—“देश के लोकतंत्र की रक्षा सर्वोपरि है। आरोप गंभीर हैं। निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी।”

रात के ११ बजे, एक न्यूज ब्रेक आया—रमेश गौतम गिरफ्तार।

पूरा देश झूम उठा। सोशल मीडिया पर #JusticeForAbhay ट्रेंड करने लगा। नेहा की फोटो हाथों में लिए लोग मोमबत्तियाँ जलाने लगे।

लेकिन उस जीत के बीच एक कॉल आया।

नेहा के फोन पर एक अजनबी नंबर से आवाज़ आई—

“गौतम तो मोहरा था। असली खिलाड़ी अब भी पर्दे के पीछे है। अगली कहानी क्या है, पत्रकार साहिबा?”

फोन कट गया।

नेहा ने एक गहरी साँस ली, और फिर अर्जुन से कहा, “चलो, अगले मोहरे की तलाश करते हैं।”

भाग ७

नेहा के लिए जीत की घोषणा जितनी तेज थी, उतनी ही जल्दी उसे अहसास हुआ कि वह सिर्फ एक मोहरे को गिरा पाई थी, खेल का राजा अभी भी छुपा बैठा था। रमेश गौतम की गिरफ्तारी ने जनता को थोड़ी राहत दी थी, लेकिन सत्ता का असली चेहरा अब भी परदे के पीछे था—शांत, अडिग, और कहीं ज़्यादा खतरनाक।

फोन पर आई वो गुमनाम आवाज़ उसकी नींदें उड़ाने के लिए काफी थी।
“गौतम तो मोहरा था। असली खिलाड़ी अब भी पर्दे के पीछे है। अगली कहानी क्या है, पत्रकार साहिबा?”

नेहा ने अर्जुन से उस नंबर को ट्रेस करवाया, लेकिन जैसा कि उम्मीद थी, नंबर एक टॉर ब्राउज़र-जनरेटेड वर्चुअल नेटवर्क से आया था। वह जानती थी, ये कोई साधारण धमकी नहीं थी—ये एक संकेत था कि असली युद्ध अभी बाकी है।

उसने अगले दिन एक इंटर्नल मीटिंग बुलाई जिसमें ऑपरेशन दीपशिखा की टीम, आरती राव, समीर सेन और अर्जुन शामिल हुए। सबकी आँखों में एक सवाल था—अब क्या?

नेहा ने स्क्रीन पर एक नई स्लाइड ओपन की—”Project Sutradhar”।

“इसमें हम उन सभी फाइलों, ईमेल, और मीटिंग रिकॉर्ड्स को जोड़ने वाले बिंदुओं को खोजेंगे जो अब तक दिखते नहीं थे,” नेहा ने कहा। “हमारे पास सिर्फ़ सबूत नहीं, एक जाल है। लेकिन इस जाल का केंद्र कहां है, वो जानना ज़रूरी है।”

अर्जुन ने उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “हमने अब तक २३ कंपनियों को ट्रैक किया है, जो कवच फाउंडेशन से किसी न किसी रूप में जुड़ी थीं। लेकिन एक नाम बार-बार सामने आ रहा है—सीरीयस इन्फ्राटेक लिमिटेड।”

यह कंपनी कोई सार्वजनिक रूप से जानी-पहचानी कंपनी नहीं थी। वेबसाइट पर बस दो पन्ने, एक नंबर जो कभी उठता नहीं, और एक एड्रेस—जो मुंबई के एक पॉश टावर का फ्लोर नंबर दिखाता था।

नेहा ने कहा, “हमें मुंबई जाना होगा। सत्ता दिल्ली में बैठती है, लेकिन उसकी पूंजी, उसके धागे मुंबई की ऊंची इमारतों में बुनते हैं।”

दो दिन बाद, नेहा और अर्जुन मुंबई पहुँचे। सीरीयस इन्फ्राटेक का ऑफिस २८वीं मंज़िल पर था—कांच की दीवारों से घिरा, चमचमाता, लेकिन पूरी तरह खाली। एक रिसेप्शनिस्ट बैठी थी जो मुस्कराकर बोली, “सर अभी बाहर हैं, अपॉइंटमेंट है क्या?”

नेहा ने झूठी आईडी दी—“हम सीईओ मिस्टर देवांश मलिक से मीटिंग के लिए आए हैं।”

रिसेप्शनिस्ट बोली, “वो अक्सर विदेश में होते हैं। शायद अगले हफ्ते वापस आएँगे।”

नेहा ने रिसेप्शन के पीछे दीवार पर लगी एक पेंटिंग पर नज़र डाली—कला का एक बेजोड़ नमूना। लेकिन उसके नीचे एक प्लेट लगी थी—Presented by Aryavarta Trust, 2017.

वहीं से उसे पहला सुराग मिला।

आर्यवर्त ट्रस्ट—जिसका नाम न पहले कभी आया था, न अब तक किसी डॉक्यूमेंट में दिखा था।

वापसी के बाद, नेहा ने इसकी तहकीकात शुरू की। यह ट्रस्ट किसी विदेशी संगठन द्वारा फंडेड था। इसके कागज़ातों में नाम था—रजत अरोड़ा, एक एनआरआई कारोबारी जो सालों से विदेश में रह रहा था, लेकिन उसके नाम पर भारत में दर्जनों संपत्तियाँ थीं।

आरती राव, जो अब संसद की संयुक्त समिति की मेंबर थीं, ने कहा, “रजत अरोड़ा का नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना, लेकिन एक बार वित्त मंत्रालय की एक बंद मीटिंग में उनका ज़िक्र हुआ था।”

नेहा और अर्जुन ने आर्यवर्त ट्रस्ट के सालाना फंडिंग पेपर्स निकाले—रजत अरोड़ा के साथ वहाँ एक और नाम था—विनयक शाह।

यह नाम नेहा के लिए नया नहीं था। एक दशक पहले, विनयक शाह का नाम एक घोटाले में आया था, जिसमें सरकारी ज़मीन को बाजार मूल्य से कम दाम में एक फाउंडेशन को ट्रांसफर किया गया था। उस फाउंडेशन का अध्यक्ष था—रमेश गौतम।

यानी कड़ियाँ जुड़ रही थीं। रमेश गौतम, रजत अरोड़ा, विनयक शाह—तीनों किसी एक गहरे वित्तीय और राजनीतिक गठजोड़ का हिस्सा थे।

नेहा ने इन तीनों के बीच की ट्रांज़ैक्शन ट्रेल बनाने की कोशिश की। बैंक स्टेटमेंट्स, कंपनी रजिस्ट्रेशन, और इनकम टैक्स फाइलिंग के ज़रिए वह धीरे-धीरे एक डायग्राम बना रही थी—एक ऐसा जाल, जिसमें बिज़नेस, सत्ता, धर्म और मीडिया तक का ताना-बाना बुना गया था।

लेकिन तभी एक और धमाका हुआ।

नेहा की टीम के एक सदस्य, रवि, जो कानपुर में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहा था, अचानक लापता हो गया।

तीन दिन तक कोई संपर्क नहीं। फिर एक वीडियो क्लिप आई—रवि बुरी तरह घायल अवस्था में ज़मीन पर पड़ा था, और एक आवाज़ कह रही थी—

“जितना जानना ज़रूरी था, वो जान चुके। अब अगर और खोदने की कोशिश की, तो एक-एक करके चुप कर दिए जाओगे।”

नेहा की आँखें जलने लगीं, लेकिन उसका संकल्प और भी मजबूत हो गया।

उसने उसी रात एक न्यूज़ रिलीज़ तैयार की—“Project Sutradhar begins. अब पर्दे के पीछे का चेहरा भी सामने आएगा।”

उसने लिखा:

“वो हमें धमकाते रहेंगे। पर जब सच्चाई ज़ोर से बोलेगी, तो उनकी गोलियों की आवाज़ भी दब जाएगी।”

अगले दिन सुबह, उसकी पोस्ट वायरल हो गई। अब तक जो जनता उसकी हिमायती थी, वह अब उसके साथ खड़ी थी।

ट्विटर पर #ExposeSutradhar ट्रेंड करने लगा।

पर अब खेल बड़ा हो गया था।

नेहा जानती थी कि अगले कदम में उसे सीधे रजत अरोड़ा तक पहुँचना होगा।
वह आदमी, जो परदे के पीछे बैठा, पूरी सरकार की नीतियों को चला रहा था।

और इसके लिए उसे एक नई भूमिका निभानी थी—सिर्फ पत्रकार नहीं,
एक जासूस।

भाग ८

मुंबई की गर्म और चिपचिपी दोपहर में नेहा, पहली बार, खुद को पत्रकार नहीं बल्कि किसी जासूसी थ्रिलर की मुख्य किरदार मान रही थी। लेकिन यह कल्पना नहीं थी—वह सचमुच एक बेहद ताकतवर और अदृश्य दुश्मन के खिलाफ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी। रजत अरोड़ा—एक ऐसा नाम जो न मीडिया में था, न किसी आधिकारिक सूची में, लेकिन जो सत्ता और पूंजी के ताने-बाने को चुपचाप बुन रहा था।

नेहा ने तय किया कि अब रजत तक पहुंचने के लिए उसे उसकी दुनिया में घुसना होगा—उसी स्टाइल, उसी चालाकी से। इसके लिए उसने एक नया रूप बनाया—रिया मल्होत्रा, एक फ्रीलांस इन्वेस्टमेंट कंसल्टेंट जो दुबई से इंडिया में हाई-वैल्यू प्रोजेक्ट्स के लिए पार्टनर तलाश रही है। उसने अपने पुराने कॉन्टैक्ट्स को खंगालकर एक नकली लेकिन विश्वसनीय प्रोफाइल खड़ी की।

अर्जुन ने एक स्पूफ वेबसाइट बनाई—riaforfinance.com। वहाँ बिज़नेस कैपिटल, वेंचर फंड, और प्राइवेट इक्विटी जैसे शब्दों का जाल था, जो अमीरों की भाषा में भरोसा जगाता था। उसके सोशल मीडिया प्रोफाइल से लेकर उसके फोन नंबर तक—सब कुछ सुसंगठित और मजबूत।

नेहा जानती थी कि रजत सीधे मिलने वाला नहीं। उसे उसके नेटवर्क में सेंध लगानी होगी। पहला नाम सामने आया—कृपा सिंह, एक हाई-प्रोफाइल इवेंट कंसल्टेंट जो अरबपतियों के लिए क्लोज़-डोर डील्स ऑर्गनाइज़ करती थी।

नेहा ने कृपा को मेल किया—“आपके नेटवर्क में शामिल होकर भारत में एक स्मार्ट सस्टेनेबल ग्रीन सिटी प्रोजेक्ट पर इनवेस्ट करना चाहती हूँ। संभव हो तो एक मीटिंग चाहती हूँ।”

अगले ही दिन, कृपा ने रिप्लाई किया—“आपकी प्रोफाइल प्रभावशाली है। मैं अगले हफ्ते ‘हेरिटेज क्लब’ में एक प्राइवेट इन्वेस्टर्स मीटिंग आयोजित कर रही हूँ। वहाँ एक परिचय हो सकता है।”

हेरिटेज क्लब—मुंबई के मालाबार हिल्स में एक अल्ट्रा एक्सक्लूसिव क्लब, जहाँ आम पत्रकार की पहुँच नामुमकिन थी। लेकिन अब नेहा, रिया बनकर, वहां दाखिल होने वाली थी।

इवेंट के दिन, नेहा ने खुद को मिरर में देखा। उसने पहली बार कोई बिज़नेस फॉर्मल गाउन पहना था, आंखों पर हल्का मेकअप, बाल बांधे हुए—एक पूरी तरह अलग व्यक्तित्व। अर्जुन ने ड्राइवर बनकर उसे वहाँ छोड़ा और कहा, “तू ये सब इतनी आसानी से कैसे कर लेती है?”

नेहा मुस्कराई, “क्योंकि मैं सच्चाई के लिए खेल रही हूँ, और वो सबसे बड़ा रोल है।”

क्लब के अंदर सबकुछ वैसा ही था जैसा उसने कल्पना की थी—क्रिस्टल झूमर, चमकदार सिगार के धुएं में लिपटे चेहरे, और हर ओर पैसे की गंध। कृपा सिंह ने नेहा को एक जापानी निवेशक से मिलवाया, फिर एक दक्षिण अफ्रीकी खनन टायकून से।

“और ये रहे मिस्टर साहनी,” कृपा ने एक शख्स से मिलवाया जो फॉर्मल सूट में था, और अपनी घड़ी से ज़्यादा लोगों पर ध्यान नहीं देता था। “रजत जी के बहुत करीब हैं। अगर आपका प्रोजेक्ट दिलचस्प हुआ, तो वह ज़रूर पास करवाएंगे।”

नेहा ने एक चमकदार स्माइल के साथ हाथ बढ़ाया—“रिया मल्होत्रा, Dubai Fund Partner.”

साहनी ने हाथ मिलाते हुए कहा, “रजत बहुत चूज़ी हैं। लेकिन सही भाषा बोलो, तो वो जल्दी सुन लेते हैं।”

नेहा ने कागज़ पर एक फर्जी ग्रीन सिटी प्रोजेक्ट स्लाइड डाली। मगर उसका असली उद्देश्य था—उन लोगों के शब्द, चेहरे, भाषा और आदतें समझना जो रजत तक रास्ता खोल सकते थे।

उस शाम उसने साहनी को एक गिलास वाइन के दौरान छेड़ते हुए पूछा, “रजत जी तो मिलते नहीं, क्या वो रियल भी हैं या मिथ की तरह हैं?”

साहनी हँसा, “मिथ नहीं, रजत खुद को मिथ बनाना चाहता है। वो कहते हैं—‘अगर तुम दिख गए, तो खेल खत्म हो जाएगा।’”

नेहा को यहीं समझ आया कि रजत का अस्तित्व उसकी अनुपस्थिति में ही था। वो सामने नहीं आता, बल्कि सिस्टम को डील से चलाता है।

मगर उसी वक्त, क्लब के एक कोने से एक और व्यक्ति उसकी ओर लगातार देख रहा था। उसकी आँखें जैसे कैमरा हों—नेहा के चेहरे के पार झाँकते हुए।

नेहा ने साहनी से पूछा, “वो कौन हैं?”

साहनी ने देखा और मुस्कराया, “अरे, वो तो रजत का सबसे पुराना सलाहकार है—मिलिंद देसाई। पर बड़ा चुप रहता है।”

नेहा अब जान चुकी थी कि अगला कदम मिलिंद तक पहुँचना होगा। उसने क्लब से बाहर निकलते ही अर्जुन को कॉल किया।

“मिलिंद देसाई—पूरा बैकग्राउंड चाहिए। एजुकेशन, फाइनेंस, ट्रैवल, सबकुछ। और जल्द।”

अर्जुन ने कहा, “तू तो जासूस निकली।”

नेहा बोली, “अब जासूसी ही पत्रकारिता है।”

अगले दिन, नेहा को अर्जुन का मैसेज आया—“मिलिंद देसाई, IIT दिल्ली, फिर स्टैनफोर्ड, फिर वर्ल्ड बैंक। लेकिन २०१५ के बाद उसकी सारी डिजिटल एक्टिविटी डिलीट है। बस एक चीज़ मिली—उसे एक बार २०१८ में सिंगापुर में रजत के साथ देखा गया।”

नेहा ने अब तय किया—उसे मिलिंद तक पहुँचना होगा, क्योंकि वह रजत तक का अंतिम और असली रास्ता था।

लेकिन उसी रात, होटल के कमरे में, दरवाज़े पर दस्तक हुई।

नेहा ने दरवाज़ा खोला, तो बाहर कोई नहीं था। ज़मीन पर एक छोटा पार्सल रखा था।

उसे खोला—अंदर एक ब्लैक बर्न की डायरी और एक कार्ड:

“रिया मल्होत्रा नहीं, नेहा वर्मा ही बनकर आओ। अगली मुलाकात सच्चाई की होगी।”

नेहा की साँसें रुक गईं। ये साफ था—रजत जान चुका था कि वह कौन है।

पर यह आमंत्रण था या जाल?

भाग ९

नेहा ने उस ब्लैक डायरी को हाथ में लेकर पहली बार हिचकिचाहट महसूस की। ये सिर्फ़ कागज़ों का एक पुलिंदा नहीं था—ये एक चुपचाप चुनौती थी, एक स्वीकारोक्ति कि खेल अब खुलकर खेला जाएगा। कार्ड पर लिखे शब्द—“नेहा वर्मा बनकर आओ”—मानो सीधे उसकी आत्मा में उतर गए हों। उसने खुद को अब तक जितना भी छुपाया था, वो सब रजत जानता था। और फिर भी, उसे बुलाया गया था। क्या यह एक आमंत्रण था, या एक ट्रैप?

उसने अर्जुन को फ़ौरन कॉल किया।

“अर्जुन, वह मुझे जानता है। नाम, काम, सबकुछ।”

अर्जुन की आवाज़ चिंतित थी, “तो क्या अब हमें सब बंद कर देना चाहिए?”

नेहा ने गहरी साँस ली, “नहीं। अब पीछे हटने का मतलब है—उन सबकी हार जो मुझ पर विश्वास कर चुके हैं। मैं जाऊंगी, लेकिन इस बार… बिल्कुल नेहा वर्मा बनकर।”

उसने ब्लैक डायरी को खोला।

पहला पेज हाथ से लिखा हुआ था—

“यह डायरी उस आदमी के लिए है जो सत्ता को साधन नहीं, साधना समझता है। अगर तुम इसे पढ़ रहे हो, तो शायद तुम भी उसी आग में झुलसे हो जिससे मैं निकला हूं।”

उसके बाद के पन्नों में एक रहस्यमय कहानी थी—न तो पूरी तरह सच, न पूरी तरह झूठ। उसमें रजत अरोड़ा की ज़िंदगी की झलक थी—एक अनाथ लड़का, जो दिल्ली की झुग्गियों से निकलकर ऑक्सफोर्ड पहुंचा, फिर वर्ल्ड बैंक और अंत में अंधेरे गलियारों का वो वास्तुकार बन गया जो सत्ता की छाया में अपनी दुनिया बनाता था।

लेकिन इस डायरी में एक और चीज़ थी—कुछ नाम, कुछ तारीखें, कुछ जगहें। और इन सबमें एक कॉमन लिंक था—Project Vikas 2040।

नेहा समझ गई कि ये डायरी रजत का एक गेम है। वह जानबूझकर उसे यह सब दिखा रहा है। एक सत्ता संचालक का अहंकार, या किसी बड़े क्लाइमेक्स की तैयारी?

दो दिन बाद, उसे एक गुप्त लोकेशन पर बुलाया गया—गोवा के एक पुराने पुर्तगाली विला में, जो अब एक प्राइवेट रिट्रीट बना दिया गया था। कोई सुरक्षा गार्ड नहीं, कोई हथियारबंद आदमी नहीं। बस समंदर की आवाज़, और पत्थरों के बीच बसा एक खामोश द्वीप-सा घर।

नेहा वहाँ पहुँची तो देखा, वहाँ कोई भव्यता नहीं थी—सिर्फ़ एक साधारण कमरा, लकड़ी की मेज़, दो कुर्सियाँ और एक लंबी खिड़की, जिससे बाहर नारियल के पेड़ और समंदर का नीलापन दिखता था।

वहीं खिड़की के पास एक आदमी खड़ा था—काले लिबास में, हल्के बाल, और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे कोई भविष्य की चाल पहले से जानता हो।

“आप ही रजत अरोड़ा हैं?” नेहा ने पूछा।

वह मुस्कराया। “मैं वह हूं जिससे सब डरते हैं, और जिसे किसी ने देखा नहीं। लेकिन हां, अगर नाम चाहिए तो रजत ही समझिए।”

नेहा ने डायरेक्ट पूछा, “आपने मुझे क्यों बुलाया?”

रजत ने धीरे से कहा, “क्योंकि तुम एकमात्र इंसान हो जो पूरे खेल को समझी हो। बाक़ी सब मोहरे थे। पत्रकार, नेता, मंत्री—even गौतम। तुम्हें मैं खत्म कर सकता था, पर मैं चाहता हूं… कि तुम खुद समझो कि इस देश की राजनीति सिर्फ़ लाल बत्ती की नहीं, स्याही की होती है। कलम से ज्यादा खतरनाक कुछ नहीं।”

नेहा चुप रही। उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन वह जानती थी कि आज उसे सुनना है।

रजत ने एक फ़ाइल मेज़ पर रखी—Vikas 2040 Master Plan। उसमें सरकार की योजनाएं, जमीन अधिग्रहण डील्स, और अंतरराष्ट्रीय लॉबियों की पार्टनरशिप्स थी।

“ये सब तुमने कंट्रोल किया?” नेहा ने पूछा।

रजत ने सिर झुकाया, “नहीं, मैंने इसे पैदा किया। लोकतंत्र में लोग सरकार चुनते हैं, लेकिन मैं तय करता हूं कि सरकार क्या देखेगी, क्या सुनेगी, और क्या बोलेगी। तुम्हें लगता है कि तुमने कोई भ्रष्ट नेता को हटा दिया—पर असली खेल ये था कि वो नेता हटा दिया जाए। ताकि नया चेहरा आए… और खेल चलता रहे।”

“तो आपने ही गौतम को बलि का बकरा बनाया?” नेहा का गला सूख गया।

“वो ज़रूरी था,” रजत बोला। “अगर जनता को एक खलनायक न मिले, तो वे असली सवाल पूछने लगते हैं।”

नेहा ने घृणा से उसकी ओर देखा। “तो अब मेरा क्या? आपने मुझे यहाँ बुलाया ताकि मुझे खरीद सकें?”

रजत की मुस्कान गहराई, “खरीदना आसान होता तो मैं मेल से ऑफर भेज देता। मैं चाहता हूं कि तुम खुद तय करो। अगर तुम्हें लगता है कि ये देश सच से बदल सकता है, तो जाओ—सच दिखाओ। लेकिन एक बार दिखा दोगी, फिर सब खत्म। तुम्हारे पास दो दिन हैं। उसके बाद ये सब सिस्टम में से मिटा दिया जाएगा।”

नेहा खड़ी हो गई। “आप डर रहे हैं कि मैं सच्चाई सामने लाऊंगी?”

रजत बोला, “मैं डरता नहीं। मैं बस जानता हूं—सत्य लंबी लड़ाई है, और लोग जल्दी थक जाते हैं।”

नेहा ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “मैं नहीं थकूंगी।”

वह बाहर निकली। अर्जुन बाहर कार में इंतज़ार कर रहा था।

“कैसा रहा?” उसने पूछा।

नेहा ने सिर्फ़ इतना कहा, “अब वक्त है आखिरी वार का।”

भाग १०

नेहा की आँखों में समंदर का पानी नहीं, उस दिन सिर्फ़ आग थी—उस सच्चाई की आग जिसे वह अब दुनिया के सामने लाने जा रही थी। गोवा के उस विला से लौटते वक्त, कार की हर खिड़की से बाहर एक नया भारत भागता दिख रहा था—जहाँ लोग अखबार नहीं पढ़ते, बल्कि किसी ट्रेंडिंग वीडियो से अपनी राय बनाते हैं। लेकिन नेहा जानती थी, सच्चाई को ट्रेंड बनाना ही अब उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

उसके पास दो दिन थे। रजत अरोड़ा ने उसे साफ़ शब्दों में कहा था—अगर वह चाहती है कि उसकी आवाज़ अमर हो, तो वह अभी बोले। क्योंकि तीसरे दिन, वो सब मिटा दिया जाएगा।

दिल्ली लौटते ही उसने अपनी पूरी टीम को जुटाया। अर्जुन, समीर सेन, आरती राव, पत्रकार रवि जो अब अस्पताल से बाहर आ चुका था, और पूरे देश से जुड़े हुए स्वतंत्र रिपोर्टर।

“अब कोई डॉक्युमेंटरी नहीं, कोई रिपोर्ट नहीं। अब सिर्फ़ एक आखिरी सत्य—एक लाइव डिबेट, एक असेंबली, एक जन-संवाद। और इसका नाम होगा—‘सत्ता के साये में — अंतिम सच’।”

इस आयोजन के लिए जगह चुनी गई—जनपथ चौक, संसद भवन से कुछ ही दूर। वहाँ एक अस्थायी स्टेज बनाया गया, लाइव ब्रॉडकास्ट के लिए मोबाइल सैटेलाइट ट्रक, और सोशल मीडिया की पूरी टीम जुटी। अनुमति माँगने का कोई प्रयास नहीं किया गया—क्योंकि नेहा जानती थी, ये सच्चाई अब सरकार से पूछकर नहीं बताई जा सकती।

उसने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक खुला मेल भेजा—

“तीन घोटाले, पाँच मंत्री, एक छुपा हुआ आदमी और सत्ता की कठपुतलियाँ—सारे नाम, सारे सबूत, सारे रिकॉर्ड कल दोपहर देश के सामने रखे जाएंगे। अगर आप चाहें तो रोक सकते हैं, लेकिन याद रखिए, ये अब एक पत्रकार की कहानी नहीं, लोकतंत्र का प्रश्न है।”

अर्जुन ने सुबह तक पूरी सामग्री को ब्लॉकचेन एन्क्रिप्शन से सुरक्षित किया। एक ऑटो-डिलीवरी सिस्टम बनाया गया—अगर नेहा या उसका कोई सदस्य दो घंटे तक सक्रिय न रहे, तो सबकुछ पूरी दुनिया में एक साथ लीक हो जाए।

नेहा ने कैमरे के सामने बैठने से पहले अपनी माँ का हाथ थामा, जो आज पहली बार सामने आई थीं।

“तू मेरा गर्व है,” उसकी माँ ने कहा, “जो बेटी मैंने पाली, वह अब देश की बेटी बन गई है।”

नेहा की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसके हाथ कांप नहीं रहे थे।

दोपहर ठीक १२ बजे, लाइव शुरू हुआ।

पूरे देश में स्क्रीनें चमक उठीं—मेट्रो के अंदर, रेलवे स्टेशनों पर, कॉलेजों में, ऑफिस ब्रेकरूम में—हर जगह लोग रुक गए। टीवी चैनलों ने तो इस स्ट्रीम को ब्लॉक किया, लेकिन यूट्यूब, इंस्टाग्राम और स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ये आग की तरह फैलने लगा।

नेहा ने कैमरे में देखा, और कहा—

“मैं नेहा वर्मा हूं। और आज मैं किसी स्टोरी की रिपोर्टर नहीं, उस भारत की नागरिक हूं जो सच्चाई से दूर एक नकाब ओढ़े हुए जी रहा है।”

फिर उसने वो एक-एक नाम उजागर किए—

मंत्री रमेश गौतम, जिसे गिराना ही सिस्टम का प्लान था।

निखिल वशिष्ठ, फर्जी कंपनी M/S Shree Laxmi Traders का मालिक।

विनयक शाह और कृपा सिंह, जो फंडिंग और डील्स में साइलेंट पार्टनर थे।

और अंत में, वो नाम जिसने पूरे खेल को लिखा था—रजत अरोड़ा।

“ये सिर्फ घोटाला नहीं है,” उसने कहा, “ये एक पूरा तंत्र है—जो हमारी सरकारों को, मीडिया को, और हमारी सोच को नियंत्रित करता है। आज मैं आपको सबूत दिखा रही हूँ, क्योंकि कल शायद ये फाइलें मौजूद न रहें।”

नेहा ने लाइव प्रेजेंटेशन में एक के बाद एक दस्तावेज़ दिखाए—बैंक ट्रांसफर, ज़मीन के नक्शे, विदेशी अकाउंट्स, और वह ब्लैक डायरी जो सबकी आत्मा थी।

फिर एक सरप्राइज़ गवाह को मंच पर बुलाया गया—मिलिंद देसाई।

सब चौंक गए।

मिलिंद ने सीधे कैमरे में देखकर कहा—

“हाँ, मैं रजत अरोड़ा के साथ वर्षों तक काम करता रहा। लेकिन जब मैंने देखा कि सच के नाम पर झूठ का सौदा हो रहा है, तो मेरा ज़मीर जाग गया। मैं आज हर भारतीय से माफी माँगता हूँ।”

उसने सभी मीटिंग रिकॉर्डिंग्स, मेल्स, और डीलिंग्स लाइव शेयर कीं।

अब ये एक पत्रकार की गवाही नहीं, बल्कि एक अंदरूनी सूत्र की कुबूलियत थी।

देश हिल गया।

ट्विटर पर #FinalTruth ट्रेंड कर रहा था। इंस्टाग्राम पर लाइव स्टोरीज की बाढ़ आ गई थी। जनपथ चौक पर हजारों लोग जमा हो गए।

उसी समय, सरकार की ओर से कुछ चैनलों पर बयान आने लगे—“ये एक ड्रामेबाज़ी है, एक अस्थायी विद्रोह, लेकिन सिस्टम स्थायी है।”

नेहा ने जवाब दिया—

“आपने सत्ता को दीवार बना दिया है। मैं अब उस दीवार में एक दरार हूं। और ये दरार अब रुकेगी नहीं।”

शाम होते-होते, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। सरकार को जवाब देने का नोटिस भेजा गया। संसद के अंदर विपक्ष ने वॉकआउट किया। दो केंद्रीय मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया।

और सबसे अहम—रजत अरोड़ा का नाम इंटरपोल की सूची में जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई।

लाइव समाप्त होने से पहले नेहा ने कहा—

“अगर आज आप इस स्टोरी को देखकर केवल ‘वाह’ कहकर आगे बढ़ जाएंगे, तो ये बदलाव अधूरा रह जाएगा। इसे आगे ले जाने का वक्त है—हर गाँव, हर गली, हर स्कूल तक। ताकि अगली पीढ़ी सत्ता की नहीं, सच्चाई की छाया में बड़ी हो।”

लोग खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे। कुछ लोग रो रहे थे। और शायद पहली बार, देश ने एक पत्रकार को नायिका की तरह देखा।

अर्जुन पास आया, धीमे से बोला, “तू जीत गई, नेहा।”

नेहा ने दूर आसमान की ओर देखा—जहाँ सूरज ढल रहा था, लेकिन उस ढलती रोशनी में एक नई सुबह की उम्मीद साफ दिख रही थी।

“नहीं अर्जुन,” उसने कहा, “अभी तो हम जागे हैं।

समाप्त

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