दिव्या कपूर
१
बैंगलोर की हल्की बारिश वाली उस सुबह रीमा सेन ने एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में एक भारी बैग थामे ऑटो से उतरते ही चैन की सांस ली। कोलकाता से आए हुए उसे कुछ ही दिन हुए थे, लेकिन इस शहर की सड़कों और ट्रैफिक ने पहले ही उसे बता दिया था कि यहां की ज़िंदगी कितनी तेज़ है। वो एक नई नौकरी की शुरुआत करने जा रही थी – एक ग्राफिक डिज़ाइन स्टार्टअप में, जहाँ उसकी क्रिएटिविटी को पहली बार सही मायने में पहचान मिलने वाली थी। लेकिन सबसे बड़ी चिंता थी – रहने की जगह। तीन दिन होस्टल में काटने के बाद उसे ऑनलाइन एक फ्लैटमेट का ऐड दिखा था — “Calm, clean, chill flatmate needed. No drama. No dating. Only peace.” रीमा को लगा जैसे ये ऐड उसी के लिए लिखा गया हो। उसने कॉल किया और मिलने का समय तय हो गया। अब जब वह फ्लैट के सामने खड़ी थी — बेंगलुरु के कोरमंगला के एक 2BHK अपार्टमेंट के बाहर — उसका मन एक अजीब-सी घबराहट से भरा था। बेल बजते ही दरवाज़ा खुला और सामने खड़ा था सिद्धार्थ मेहरा — नीली टीशर्ट में, हाथ में मग और मुस्कराता हुआ चेहरा।
“Hey, you must be Reema?” उसने दोस्ताना लहजे में पूछा, और दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया। अंदर दाखिल होते ही रीमा ने फ्लैट को एक तेज़ नज़र से देखा — सादगी भरा लेकिन साफ़-सुथरा। ड्राइंग रूम में एक छोटा सा फर्नीचर सेट, दीवार पर एक बूँदों से सजी पेंटिंग और बालकनी से आती ठंडी हवा। सिद्धार्थ ने उसे रूम दिखाया, किचन की हालत और बेसिक रूल्स बताए। “बस एक ही शर्त है — हम फ्लैटमेट्स हैं, दोस्त बन सकते हैं, लेकिन कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं चाहिए।” रीमा को ये शर्त पसंद आई। “Same here,” उसने जवाब दिया, “मैं काम में ही इतनी डूबी रहती हूं कि रिलेशनशिप के लिए समय नहीं है।” दोनों हँसे और उसी हँसी में उनके बीच की झिझक कुछ कम हुई। दो अजनबी एक अजनबी शहर में एक नया ‘घर’ साझा करने जा रहे थे — लेकिन दोनों को यह नहीं पता था कि इस दोस्ती के अंदर कुछ ऐसा भी छिपा होगा जो वक्त के साथ खुद को बाहर लाएगा।
अगले कुछ दिनों में दोनों की दिनचर्या एक लय में ढल गई। सुबह-सुबह सिद्धार्थ अपने लैपटॉप के साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर काम करता, वहीं रीमा देर से उठती लेकिन कॉफी मशीन पर हक ज़रूर जमाती। दोनों एक-दूसरे की प्राइवसी का पूरा ख्याल रखते — लेकिन जब भी वक़्त मिलता, बातें भी खूब होतीं। सिद्धार्थ को खाना बनाना पसंद था, और रीमा को खाना खाने का शौक। धीरे-धीरे दोनों ने एक अनकही डील बना ली — सिद्धार्थ खाना बनाएगा, रीमा बर्तन धोएगी। ऑफिस से लौटते समय कभी-कभी दोनों एक ही कैब शेयर करते, और उस सफर में ट्रैफिक से ज़्यादा एक-दूसरे की कहानियाँ चलतीं। रीमा ने बताया कि कैसे कोलकाता में उसका रिलेशनशिप अचानक टूट गया था, और वह अब बस अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से शुरू करना चाहती है। सिद्धार्थ ने भी अपने दिल्ली वाले दिनों के कुछ किस्से सुनाए — खासकर वह रिलेशनशिप जो उसे बहुत बदल कर गया। इन बातों में न तो कोई नाटक था, न ही कोई अपेक्षा — बस दो लोग जो एक-दूसरे की दुनिया को थोड़ा-थोड़ा जानने लगे थे।
रविवार की एक सुबह जब बाहर बारिश हो रही थी, दोनों बालकनी में बैठे थे — रीमा हाथ में कॉफी, सिद्धार्थ फोन पर पुराने गाने चला रहा था। उस रोज़ बातों में एक अलग सी गर्माहट थी। दोनों ने पहली बार खुलकर हँसी में पुरानी गलतियों को स्वीकारा, और यह महसूस किया कि शायद इस रूम शेयरिंग से कहीं ज़्यादा उन्हें एक-दूसरे की कंपनी पसंद आने लगी थी। लेकिन कोई भी इसे नाम देने को तैयार नहीं था। “तुम्हारा बायो बहुत फ़िल्मी था – no drama, no dating,” रीमा ने चिढ़ाते हुए कहा। सिद्धार्थ ने मुस्कराकर जवाब दिया, “और तुमने उसी फ़िल्मी रूल को मान भी लिया, मिस सेने!” वे दोनों हँस पड़े, लेकिन उसी हँसी में एक चुप्पी भी थी — एक ऐसा मौन जो बताता था कि दोस्ती के इस बंधन में कुछ और भी उगने लगा है, जिसे अभी दोनों पहचानना नहीं चाहते थे। उन्हें ये भी पता था कि जैसे ही उन्होंने उस लाइन को पार किया, सब बदल सकता है। इसलिए फिलहाल, उस एक रूम में दो दिल चुपचाप, एक सुरक्षित दूरी से, एक-दूसरे के करीब आते जा रहे थे — बिना किसी शोर के।
२
बैंगलोर की सुबहें अक्सर धुंधली होती हैं—सड़कों पर दौड़ती बसें, उबले कॉफी के कप, और लोगों की भागती निगाहें। रीमा के लिए यह शहर अब धीरे-धीरे एक रूटीन बनता जा रहा था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी राहत था वो घर जिसे वह अब “फ्लैट” नहीं बल्कि “ठिकाना” कहने लगी थी। एक दिन ऑफिस से लौटते समय उसे देर हो गई थी — ट्रैफिक में फँसी, थकी हुई, और भूखी। दरवाज़ा खोलते ही जो खुशबू अंदर से आई, उसने जैसे रीमा की थकान को खींचकर बाहर फेंक दिया। किचन से मसालों की खुशबू आ रही थी और सामने सिद्धार्थ खड़ा था — एप्रन पहने, बटर चिकन बना रहा था। “Surprise dinner,” उसने कहा बिना देखे ही, जैसे वो जानता हो कि रीमा को आज इसकी ज़रूरत है। उस शाम जब दोनों ने डाइनिंग टेबल पर एक साथ खाना खाया, तो पहली बार रीमा ने यह महसूस किया कि खाना सिर्फ भूख मिटाने का ज़रिया नहीं है — वह रिश्ता जोड़ने की शुरुआत भी हो सकता है। उसने हँसते हुए कहा, “तुम्हें खाना बनाने का हुनर है, और मुझे तारीफ़ करने का। Perfect match!” सिद्धार्थ मुस्कराया, लेकिन जवाब नहीं दिया। उस मुस्कराहट में बहुत कुछ था — अनकहा, लेकिन ज़रूरी।
अगले हफ्तों में रसोई का माहौल बदल गया। दोनों एक टीम की तरह हो गए — कभी सिद्धार्थ खाना बनाता, तो रीमा Spotify पर अपनी ‘चाय वाली प्लेलिस्ट’ चला देती। कभी दोनों मिलकर पास्ता बनाते, और कभी-कभी ऑर्डर कर लेते लेकिन साथ में Netflix ज़रूर देखते। अब घर के हर कोने में एक रिदम बस गई थी — सुबह के अख़बार पर चर्चा, फ्रिज पर चिपके चॉकलेट शेयर करने के नोट्स, और रात को किचन स्लैब पर बैठकर आधे घंटे की थकी हुई बातें। सिद्धार्थ ने एक दिन मज़ाक में कहा, “तुम्हें देखता हूँ तो लगता है जैसे किसी फिल्म की quirky female lead मेरे घर में किराए पर रहने आ गई है।” रीमा ने जवाब दिया, “तो तुम वही मेल लीड हो जो अंत में लड़की से प्यार कर बैठता है?” दोनों हँस दिए, लेकिन हँसी के पीछे एक ऐसा डर भी था — कहीं वो मज़ाक सच न हो जाए। दोनों अपने-अपने कमरे में वापस जाते हुए दरवाज़ा भले बंद कर लेते थे, पर मन की खिड़कियाँ धीरे-धीरे खुल रही थीं।
एक रविवार को रीमा ने सिद्धार्थ के लिए एक बंगाली डिश — “शुक्तो” — बनाने का प्रयास किया। हल्के से जले मसालों और अधपकी सब्ज़ियों के बीच उसने पहली बार कोशिश की थी कुछ अपना देने की। सिद्धार्थ ने बिना किसी आलोचना के पूरा खाना खा लिया और बोला, “Taste से ज़्यादा effort की कद्र होती है।” उस वाक्य ने रीमा के भीतर एक हलचल पैदा की — कितने समय बाद किसी ने उसकी कोशिश को बिना परखे स्वीकार किया था। उसी शाम, बालकनी में बैठे हुए, जब दोनों ने चुपचाप शहर की रोशनी को देखा, तो पहली बार किसी ने कुछ नहीं कहा — और फिर भी सबकुछ कहा जा चुका था। रिश्तों की यही तो सबसे अजीब बात है — जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, जब चाय की चुस्कियों और सन्नाटे में भी एक स्पर्श छिपा होता है। रीमा को एहसास हुआ कि अब वह सिर्फ एक फ्लैटमेट नहीं थी — वह इस घर का हिस्सा बन चुकी थी।
धीरे-धीरे ऑफिस, मीटिंग्स और काम के दबावों के बीच दोनों ने एक-दूसरे की केयर करना सीख लिया था। सिद्धार्थ जानता था कि रीमा को PMS के दौरान क्या खाना चाहिए और वह कौन-सा डायलॉग बोलती है जब उसे गुस्सा आता है। रीमा जानती थी कि सिद्धार्थ वीकेंड्स पर अपने पौधों से बात करता है और बारिश में चुपचाप बैठना उसे सुकून देता है। एक शाम, जब रीमा बीमार हो गई, सिद्धार्थ ने बिना कहे डॉक्टर बुलाया, खिचड़ी बनाई और पूरा दिन उसकी बगल में बैठा रहा। “Thank you,” रीमा ने धीमी आवाज़ में कहा। “Flatmates भी दोस्त हो सकते हैं,” सिद्धार्थ ने जवाब दिया। लेकिन दोनों जानते थे कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं थी। अब कुछ और जुड़ गया था — एक ऐसा रिश्ता जो किसी परिभाषा से बंधा नहीं था, पर दिल के किसी कोने में जगह बना चुका था। दोनों ने अभी तक कुछ कहा नहीं था, लेकिन जो महसूस हो रहा था — वह हर शाम की थाली में, हर सुबह के Good Morning में, और हर बालकनी की चुप्पी में लिखा था।
३
वो शनिवार की शाम थी, जब बारिश ने बैंगलोर की सड़कों को जाम और खिड़कियों को धुंधला कर दिया था। रीमा ऑफिस से जल्दी लौट आई थी, सिद्धार्थ पहले से ही घर पर था — ट्रैकपैंट और पुरानी कॉलेज की टीशर्ट में, बाथरूम से निकलते हुए सिर से तौलिया सुखाते हुए। बिजली चली गई थी, और अचानक पूरा घर मोमबत्तियों और खिड़की से आती हल्की रोशनी के भरोसे रह गया। “क्यों न कुछ खेलें?” सिद्धार्थ ने चाय बनाते हुए पूछा, और रीमा ने आँखें गोल करते हुए कहा, “तुम्हारे पास बोर्ड गेम है?” “नहीं, लेकिन मेरे पास एक पुराना ट्रुथ एंड डेयर ऐप है।” कुछ ही देर में दोनों लिविंग रूम के फर्श पर बैठ गए — बीच में पिज़्ज़ा, दो मग में चाय, और हाथों में एक फोन जो रैंडम सवाल उगल रहा था। शुरुआत हँसी-मज़ाक से हुई — “तुमने कभी किसी को बिना ब्रश किए किस किया है?” — “कभी नहीं!” — “झूठी!” — “तुम बताओ, कितने लोगों को डेट किया?” — “गिना नहीं…” बातें यूँ ही चलती रहीं, और खेल ने धीरे-धीरे दिल की परतें खोलना शुरू किया।
जैसे-जैसे ट्रुथ एंड डेयर के सवाल गहरे होते गए, वैसे-वैसे दोनों के जवाब भी — थोड़ा सच्चे, थोड़ा झिझकते, लेकिन बेहद असली। सिद्धार्थ से पूछा गया, “तुम किससे डरते हो?” उसने बिना हिचकिचाहट के जवाब दिया, “किसी अपने को खो देने से।” रीमा के चेहरे पर गंभीरता आ गई थी, लेकिन उसने बात को हल्का करने की कोशिश की। “तो फिर किसी को अपना बनाना क्यों?” वह बोली। सिद्धार्थ ने सिर्फ मुस्करा कर देखा और कहा, “शायद इसीलिए हम दोनों फ्लैटमेट्स हैं, ताकि कुछ बना भी रहे, और कुछ टूटे भी नहीं।” रीमा हँसी, पर वो जानती थी कि उसके भीतर कुछ खिंच गया है — जैसे कोई भूली हुई चिट्ठी अचानक किसी पुरानी किताब से गिर जाए। उसकी बारी आई, तो सवाल था — “क्या तुम कभी किसी दोस्त से प्यार कर बैठी हो?” वह चुप रही, फिर बोली, “हां, लेकिन मैंने कहा नहीं। डर था कि कह दूँगी तो दोस्ती भी जाएगी।” दोनों की नज़रें मिलीं, एक पल को जैसे वक्त रुक गया। उस कमरे में सिर्फ मोमबत्ती की रोशनी थी, लेकिन उनके बीच जैसे सैकड़ों जवाब तैर रहे थे।
खेल खत्म हो गया था, लेकिन बातचीत जारी थी। दोनों अब फर्श से उठकर बालकनी में आ चुके थे — जहां बारिश थम चुकी थी, लेकिन उसकी नमी अभी भी हवा में थी। रीमा ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, दो लोग एक ही घर में रहकर बिना उलझे रह सकते हैं?” सिद्धार्थ ने गहरी सांस ली और कहा, “अगर दोनों को डर लगे कि वो किसी के बहुत करीब आ रहे हैं, तो उलझने की गुंजाइश तो बन ही जाती है।” रीमा ने पहली बार ऐसा महसूस किया जैसे वो अपने मन की उलझनों को शब्दों में बुन पा रही हो — और कोई उन्हें सलीके से सुलझा भी रहा हो। उन्हें ये अहसास हुआ कि खेल सिर्फ समय बिताने का ज़रिया नहीं था, बल्कि वो एक रास्ता था — जहाँ से दिलों की दीवारें दरकने लगी थीं। अब दोनों एक-दूसरे को सिर्फ “अच्छा फ्लैटमेट” नहीं मानते थे — अब वो उन हिस्सों को जान रहे थे जिन्हें अक्सर लोग छिपा कर रखते हैं। डर, पछतावे, चाहत, और सबसे ज़्यादा — अकेलापन।
रात के गहराने के साथ ही बातचीत और भी निजी हो गई। सिद्धार्थ ने बताया कि जब उसका ब्रेकअप हुआ था, तो वह तीन दिन तक किसी से बात नहीं कर पाया था। “मैंने उसे सब कुछ दिया था — लेकिन उसने कहा, मैं बहुत ‘emotionally unavailable’ हूं।” रीमा ने अपनी चाय खत्म करते हुए कहा, “मुझे भी यही सुनने को मिला था — कि मैं बहुत practical हूं, प्यार में डूबने वाली नहीं।” दोनों थोड़ी देर तक चुप रहे, फिर रीमा ने धीमे से कहा, “शायद हम दोनों बहुत कुछ देना चाहते थे, लेकिन हमें ठीक से लेना नहीं आया।” उस एक वाक्य में दोनों के टूटे हुए अतीतों की परछाई थी — लेकिन अब एक-दूसरे के पास बैठकर, वो परछाइयाँ थोड़ी कम डरावनी लग रही थीं। रात के आख़िरी घंटे में, जब दोनों अपने-अपने कमरों में वापस लौटे, तो मन एक अजीब बेचैनी से भरा था। ये बेचैनी न अजनबी थी, न नई — बस अब उसका चेहरा थोड़ा और साफ़ हो गया था। एक रूम, दो दिल — और अब उनके बीच एक अनकहा रिश्ता, जो खेल में तो नहीं लिखा था, लेकिन खेल ने उसे ज़रूर जगा दिया था।
४
बैंगलोर की बारिश का कोई भरोसा नहीं—कभी हल्की फुहारों से शुरू होती है और पल भर में मूसलधार बन जाती है। उस दिन ऑफिस की छुट्टी थी, लेकिन आसमान के रंग कुछ और ही इशारा कर रहे थे। रीमा खिड़की के पास बैठी कॉफी का मग पकड़े, किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बारिश की बूँदों की टप-टप आवाज़ और हवा में घुलती मिट्टी की गंध ने उसका ध्यान भटका दिया। सिद्धार्थ अपने कमरे से निकला, हाथ में ब्लूटूथ स्पीकर और वाई-फाई की शिकायत करता हुआ। “लगता है आज दुनिया ऑफ़लाइन ही रहना चाहती है,” उसने कहा, और स्पीकर से एक पुराना ग़ज़ल प्ले कर दिया—जगजीत सिंह की आवाज़ कमरे में गूँजने लगी। रीमा ने मुस्कराकर कहा, “बारिश और जगजीत—क्लासिक।” दोनों बालकनी में आ गए, जहां सामने की सड़क पानी से चमक रही थी, और पीपल के पत्ते नाचते हुए आकाश से बात कर रहे थे। हर दिन की हड़बड़ी से उलट यह दिन धीमा था, और उस धीमेपन में दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी कुछ ज़्यादा ही गहराई से महसूस होने लगी।
सिद्धार्थ ने चुपचाप रीमा से पूछा, “कभी सोचा है, अगर ज़िंदगी में कुछ पल को स्लो मोशन में जीने दिया जाए तो हम कितनी बातें पकड़ पाते जो हम रोज़ मिस करते हैं?” रीमा ने कुछ पल सोचा, फिर बोली, “हम शायद अपने ही दिल की आवाज़ भी सुन पाते।” थोड़ी देर बाद, जब बारिश कुछ थमी, सिद्धार्थ दो गिलास वाइन लेकर आया और बोला, “आज कुछ हल्का-फुल्का नहीं, कुछ भारी बातें करें?” रीमा ने गिलास थामते हुए कहा, “चलो आज पुराने ज़ख़्मों की बात करते हैं, जिन पर अब तक हम सिर्फ़ पट्टी बाँधते रहे।” जैसे ही वाइन का पहला घूंट नीचे गया, रीमा की आँखों में एक पुराना सा दर्द उभरा—वो जो उसने शायद ही किसी को दिखाया हो। उसने पहली बार बताया कि कैसे उसका पिछला रिश्ता एकदम टूट गया था, बिना closure, बिना goodbye—एक मैसेज पर खत्म कर दिया गया था। “मैंने उस इंसान पर भरोसा किया था,” उसने धीमे स्वर में कहा, “और फिर एक दिन वो बस गायब हो गया, जैसे मैंने कुछ भी मायने नहीं रखा।”
सिद्धार्थ चुपचाप सुनता रहा—उसकी आँखों में कोई सहानुभूति नहीं थी, बल्कि समझ थी। जब रीमा रुकी, उसने कहा, “मैं भी किसी ऐसे दौर से गुज़रा हूं। जब तुम किसी को बहुत करीब लाते हो, और फिर वो तुम्हारे सबसे अंधेरे हिस्सों को देखकर भाग जाता है, तो खुद से डर लगने लगता है।” रीमा ने पहली बार महसूस किया कि कोई उसकी कहानियों में खुद को भी देख रहा है। यह बातचीत अब केवल शब्दों का लेन-देन नहीं रह गई थी—यह एक आत्मीयता थी जो खामोशी में गूँज रही थी। बारिश की वो ठंडी हवा अब घर के भीतर एक ग़र्माहट ले आई थी, जिसमें दोनों धीरे-धीरे खुद को समेट रहे थे। दोनों के हाथ में गिलास था, लेकिन नशा अब शब्दों का होने लगा था। सिद्धार्थ ने एक किस्सा सुनाया जब वह अकेले गोवा गया था, ब्रेकअप के बाद, और तीन दिन समंदर के किनारे बैठा रहा था, बिना किसी से बात किए। “कभी-कभी खुद से मिलना ज़रूरी होता है,” उसने कहा। रीमा ने जवाब दिया, “और कभी-कभी कोई दूसरा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर फिर से ढूँढने में मदद करता है।”
शाम होते-होते अंधेरा धीरे-धीरे कमरे में उतरने लगा था। दोनों ने बल्ब नहीं जलाया—केवल खिड़की से आती गीली रोशनी और अंदर एक मद्धम स्पीकर की आवाज़ ने माहौल को संजीदा बनाए रखा। रीमा ने कहा, “शायद हम इसीलिए इतने आसानी से बात कर पाते हैं, क्योंकि हम दोनों जानते हैं कि सामने वाला जज नहीं करेगा।” सिद्धार्थ ने उसकी तरफ देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा, “या शायद इसीलिए क्योंकि हम दोनों थोड़ा टूटे हुए हैं।” वह वाक्य जैसे रीमा की किसी अंदरूनी दीवार को छू गया हो। उसने आँखें बंद कर लीं और कुछ पल तक कुछ नहीं कहा। जब उसने आँखें खोलीं, तो सामने सिद्धार्थ उसी की ओर देख रहा था—आँखों में न कोई सवाल, न कोई प्रस्ताव, बस एक शांति। इस बार चुप्पी ने सब कह दिया था। उस शाम, उस एक बालकनी में, बारिश की उन बूँदों के नीचे दो दिलों ने अपनी-अपनी कहानियाँ खोली थीं—बिना किसी साजिश के, बिना किसी नियति के, सिर्फ़ इस उम्मीद में कि शायद यहाँ से कुछ और शुरू हो सकता है। और शायद, अनजाने में ही सही, वो शुरुआत हो भी चुकी थी।
५
शहर की चकाचौंध भरी एक ऑफिस पार्टी में जब रीमा और सिद्धार्थ पहुँचे, तब दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया था—”बस एक-एक ड्रिंक और फिर सीधा घर।” लेकिन बैंगलोर की शामों का अपना ही जादू होता है, और जब माहौल में हलकी वाइन, तेज़ म्यूज़िक, और दोस्ताना ठहाके मिल जाएँ, तो ‘एक ड्रिंक’ कई बार दो से तीन और फिर चार हो जाती है। रीमा ब्लैक ड्रेस में चमक रही थी—सादा, लेकिन आँखों में कुछ खास था। सिद्धार्थ ने पहली बार उसे इस तरह देखा, जैसे उसने अपनी सारी परतों को बाहर पहन रखा हो। जब दोनों डांस फ्लोर पर पहुँचे, तो शराब, रोशनी, और धड़कनों ने जो दूरी अब तक थी, उसे मिटा दिया। उनकी हँसी, उनकी आँखों की चमक और छूते-छूटते हाथों की गर्माहट में कुछ था जो पहले कभी नहीं था—या था भी, तो अब तक छिपा हुआ था। जब रात गहराई, तो टैक्सी में लौटते समय रीमा का सिर सिद्धार्थ के कंधे पर टिक गया। दोनों चुप थे, लेकिन उस चुप्पी में संगीत था, जिसमें हर बीट कुछ कह रही थी।
फ्लैट में लौटकर रीमा सीधे लिविंग रूम के सोफे पर लेट गई और सिद्धार्थ किचन से पानी लेकर आया। उसने पूछा, “ठीक हो?” रीमा ने आँखें खोले बिना कहा, “मैं थक गई हूं… थोड़ी टूटी भी हूं शायद।” सिद्धार्थ पास बैठा, और धीरे-धीरे उसकी हथेली को पकड़ लिया। न कोई जल्दी थी, न कोई डर—बस एक भाव था जो बहुत दिनों से संजोया गया था। रीमा ने उसकी तरफ देखा और पहली बार आँखों में कोई पर्दा नहीं था। वह कहने वाली थी कुछ, लेकिन कुछ कहे बिना ही उसने अपना माथा उसके कंधे पर टिका दिया। उसी पल जैसे वक्त थम गया। सिद्धार्थ ने बिना पूछे उसका हाथ थाम लिया, और रीमा ने बिना सोचे उसकी उंगलियों को कस लिया। नशा दोनों में बराबर था—वाइन का, अधूरी भावनाओं का, और उस पल की ईमानदारी का जो अब किसी नियम से नहीं बंधा था। बिना इरादे के, बिना डर के, दोनों ने खुद को उस पल के हवाले कर दिया। शरीर से पहले आत्माएँ जुड़ीं—एक थरथराती साँस के साथ, एक धीमे कंपकंपाते स्पर्श में, जिसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बस एक सुकून था।
रात के किसी हिस्से में जब दोनों एक ही चादर में, एक-दूसरे के करीब, एक ही साँस में लिपटे थे, तो किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस चुप्पी में जितना कुछ कहा गया, उतना शायद सैकड़ों बातों में भी नहीं होता। रीमा की उंगलियाँ सिद्धार्थ की पीठ पर थमी थीं, और सिद्धार्थ की हथेली रीमा की पीठ पर एक हल्के स्पर्श के साथ टिकी हुई थी—जैसे कोई टूटे हुए काँच को थामे हुए हो कि वो फिर से ना बिखर जाए। उस रात उन्होंने न कुछ माँगा, न कोई वादा किया, न ही कोई परिभाषा गढ़ी। जो हुआ, वह एक रात की ग़लती नहीं थी—बल्कि वर्षों से थमी हुई भावनाओं का विस्फोट था। उनके बीच वो दीवार जो “सिर्फ दोस्त” होने के नाम पर खड़ी थी, अब गिर चुकी थी। और जब दीवारें गिरती हैं, तो दोनों तरफ से धूल उड़ती है—सच्चाइयों की, डर की, और उस अजीब सी उम्मीद की जो सुबह होते ही एक नया सवाल खड़ा करती है: अब आगे क्या?
सुबह की पहली रोशनी ने जब कमरे में झाँका, तो नींद आधी खुल चुकी थी। रीमा पहले उठी, और कुछ देर तक चुपचाप सिद्धार्थ को देखती रही—सोते हुए वह किसी किताब के आखिरी पन्ने जैसा लग रहा था, जिसे पढ़ने के बाद भी मन शांत नहीं होता। वह उठी, अपने कपड़े समेटे, और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। सिद्धार्थ की नींद कुछ देर बाद टूटी—खाली सोफा, चुप्पी, और हलकी सी सुगंध जो अब भी हवा में थी। उसने घड़ी देखी, लेकिन वक्त अब किसी काम का नहीं लग रहा था। वो जानता था, कुछ बदल गया है। और शायद वो यह भी जानता था कि सबसे मुश्किल बात अब वही है जो हमेशा सबसे आसान थी—बात करना। उस दिन दोनों एक-दूसरे से नज़रें नहीं मिला पाए। एक ही घर में रहकर भी जैसे दो ज़िंदगियाँ अलग-अलग कमरों में सांस ले रही थीं। लेकिन वो एक रात अब उनके बीच थी—एक पुल की तरह जो दो दिलों को जोड़ता भी था, और अगर संभाला न जाए तो गिरा भी सकता था।
६
रात की वो घटना जैसे बैंगलोर की बारिश बन गई थी — कुछ देर की थी, लेकिन असर अब भी हर कोने में टपक रहा था। सिद्धार्थ के लिए रीमा अब सिर्फ़ एक रूममेट नहीं रही थी। वो उसकी आदत बन चुकी थी, उसकी रूटीन में घुली हुई कॉफ़ी की तरह, जिसे छोड़ा नहीं जा सकता। पर अब जब दोनों को ऑफिस जाना होता, उनकी आँखें मिलतीं, मगर शब्दों से ज़्यादा चुप्पियाँ बोलती थीं। वो एक-दूसरे से नज़रें चुराते, फिर अचानक किसी बहाने से मुस्कुराते। मगर जब भी दोनों अकेले एक कमरे में होते, तो दीवारों पर सन्नाटा चढ़ जाता। रीमा को लगता, उसने कोई सीमा लांघ दी है — कोई ऐसा लम्हा जी लिया है, जो शायद नहीं जीना चाहिए था। पर दिल से जो जुड़ाव हुआ था, वो अब चुपचाप पल नहीं सकता था।
एक शाम सिद्धार्थ बाहर बालकनी में बैठा बारिश देख रहा था, कानों में इयरफोन और हाथ में चाय का कप। रीमा किचन से सब देख रही थी। वो जानती थी कि सिद्धार्थ अंदर ही अंदर कुछ कहने की कोशिश कर रहा है, पर शब्द शायद कम पड़ रहे हैं। आखिरकार, उसने खुद पहल की। बालकनी में जाकर बिना कुछ कहे उसके बगल में बैठ गई। कुछ देर तक दोनों बस चुपचाप बैठे रहे, फिर रीमा ने कहा, “सिद्धार्थ, जो हुआ वो अचानक था… लेकिन क्या तुमने भी वही महसूस किया जो मैंने?” सिद्धार्थ ने धीरे से सिर हिलाया। “हाँ,” उसने कहा, “मगर मुझे डर है रीमा, कि अगर हम इसमें गहराई से उतर गए, तो वो दोस्ती का किनारा कहीं छूट न जाए।” रीमा की आँखें थोड़ी नम हो गईं, “शायद वो किनारा छूट भी जाए, पर क्या हम तैर नहीं सकते साथ?” उस सवाल ने सिद्धार्थ के भीतर की सभी दुविधाओं को हिला दिया।
इसके बाद उनके बीच का रिश्ता एक नया आकार लेने लगा। अब कॉमन एरिया में बैठकर मूवी देखना, सुबह साथ में उठकर ब्रेकफ़ास्ट करना, ये सब कुछ नया-सा लगने लगा। हँसी अब गहराई लिए होती, और मौन अब बोझ नहीं, सुकून देता था। मगर बैंगलोर की व्यस्त ज़िंदगी में हर दिन एक जैसा नहीं होता। एक दिन रीमा की कॉलेज की एक दोस्त, अर्जुन, जो अब बैंगलोर में ही था, फ्लैट पर आया। वो बेहद फ्रेंडली और चुलबुला था, और सिद्धार्थ ने देखा कि रीमा उसके साथ पहले जैसी थी — बिना किसी डर या उलझन के। सिद्धार्थ को अचानक जलन होने लगी, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। रात को उसने रीमा से बात करने की कोशिश की, लेकिन जब उसने बात घुमा दी, सिद्धार्थ खामोश रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो कौन-सी स्थिति में फँसा है — प्यार, अधिकार, या बस असमंजस।
सिद्धार्थ की बेचैनी अब साफ़ झलकने लगी थी। उसने ऑफिस में भी खुद को अलग-थलग रखना शुरू कर दिया था। रीमा ने कोशिश की उससे बात करने की, लेकिन सिद्धार्थ टाल गया। एक रात, जब रीमा ने देखा कि सिद्धार्थ छत पर अकेला बैठा है, तो वो चुपचाप उसके पास गई और उसके हाथ में एक चिट पकड़ाई — उस चिट में बस तीन शब्द थे — “चलो बात करें।” और उस रात, जब बैंगलोर की सड़कें सो रही थीं, दो दिल फिर से खुल गए — diesmal नशे में नहीं, बल्कि पूरी होश में। भावनाओं के समुद्र में डूबते हुए दोनों ने उस रेखा को मिटा दिया जिसे कभी “दोस्ती की सीमा” कहा जाता था।
७
बैंगलोर की वो शाम बाकी दिनों से कुछ अलग थी। हवा में एक अजीब सी नमी थी, जैसे कुछ कहना चाह रही हो। रीमा बालकनी में खड़ी थी, हाथ में कॉफी का मग और आंखों में उलझे हुए सवाल। उसके ज़हन में लगातार वही रात घूम रही थी — जब उसने और सिद्धार्थ ने उन दोस्ती के नियमों को तोड़ दिया था। वो एक लम्हा था, जिसमें सब कुछ बदल गया था, और अब हर छोटी बात उस लम्हे की याद दिलाती थी। सिद्धार्थ उसकी पीठ पीछे आकर खड़ा हो गया। “कॉफी ठंडी हो रही है,” उसने धीमे से कहा। रीमा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो दोस्ती की सीमाओं से परे था — एक ऐसा अपनापन जो डराता भी था और सुकून भी देता था।
दोनो के बीच अब बातचीत पहले जैसी नहीं रही थी। जहां पहले मस्ती और खुलापन होता था, वहां अब चुप्पियाँ और अनकहे सवालों की दीवार खड़ी हो गई थी। रीमा ने कई बार कोशिश की कि वो उस रात को एक गलती मानकर आगे बढ़ जाए, लेकिन दिल शायद अब मानने को तैयार नहीं था। सिद्धार्थ भी उसे समझने की पूरी कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी अपनी उलझनें थीं। क्या वो इस रिश्ते को एक नाम देना चाहता था या सिर्फ़ उस रात की कमजोरी थी? वो सवाल बार-बार रीमा के दिमाग में उठता। ऑफिस से लौटने के बाद जब दोनों डिनर टेबल पर आमने-सामने बैठे होते, तो बीच में थाली से ज़्यादा उनकी नज़रे टकरातीं और झुका ली जातीं।
एक दिन रीमा को उसकी कंपनी के ऑफसाइट ट्रिप पर जाना पड़ा — दो दिन के लिए कोडाइकनाल। वो चाहती थी कि सिद्धार्थ उससे पूछे, उसे रोके, कुछ कहे — लेकिन उसने सिर्फ़ “Enjoy” कहकर मुस्कुरा दिया। वो मुस्कान रीमा को अंदर तक तोड़ गई। ट्रिप पर रीमा ने बहुत कोशिश की मस्त रहने की, लेकिन रात के वक्त जब वो होटल के कमरे में अकेली होती, तो सिद्धार्थ की बातें, उसकी हँसी, और वो एक रात की गर्माहट — सब कुछ उसे घेर लेती। उसने तय किया कि अब और नहीं। वापस लौटते वक्त, बस में बैठे-बैठे उसने एक मैसेज टाइप किया — “हमें बात करनी है, और इस बार टालना नहीं है।” लेकिन भेजने की हिम्मत नहीं हुई।
वापसी पर सिद्धार्थ ने उसे लेने एयरपोर्ट नहीं आया था, जो पहले कभी नहीं हुआ था। रीमा ने खुद टैक्सी ली और जब घर पहुंची, तो देखा सिद्धार्थ किचन में कुछ पका रहा था — पास्ता, रीमा का फेवरेट। वो चौंकी, “आज इतना स्पेशल क्यों?” सिद्धार्थ ने बिना उसकी आंखों में देखे जवाब दिया, “कभी-कभी अपनी ग़लतियों को स्वाद में बदलने की कोशिश करनी चाहिए।” रीमा चुपचाप बैग रखकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। रात का खाना बहुत कुछ कह रहा था — दोनों ने एक-दूसरे को बिना कहे बहुत कुछ सुना दिया था। लेकिन फिर भी, दोनों जानते थे कि असली बात अभी भी हवा में लटकी है, जवाब मांगती हुई।
८
रीमा की आंखों में उस रात की हल्की नमी अब भी बसी थी, जब सिद्धार्थ ने कहा था कि उसने कभी प्यार को ‘दोस्ती के उस पार’ देखने की हिम्मत नहीं की थी। लेकिन उस दिन के बाद से उनके बीच कुछ बदल गया था — कोई न कोई चीज़ हर मुलाकात में सांस लेती थी, हर मुस्कान में कुछ छिपा होता था। ऑफ़िस से लौटते वक़्त रीमा ने खुद को अक्सर सिद्धार्थ की आवाज़ सुनने को तरसते पाया था, और जब वो घर आता, तो वो बेवजह किचन में चाय बनाने लगती — सिर्फ़ एक कप नहीं, दो। लेकिन अब दोनों इस बदलाव को शब्द नहीं दे पा रहे थे। एक नई उलझन थी — जैसे दोनों ही उस मोड़ पर खड़े हों जहां दोस्ती पीछे रह गई थी, लेकिन आगे का रास्ता भी धुंधला था।
उस रविवार की सुबह, सिद्धार्थ ने बुखार के बहाने कमरे से निकलना टाल दिया, लेकिन रीमा को लगा कुछ और भी था — कुछ ऐसा जो उसके चेहरे पर छिपा नहीं रह पा रहा था। दोपहर को जब वह फ्रूट सलाड लेकर उसके कमरे में गई, तो सिद्धार्थ ने कहा, “तुम कभी-कभी मुझे इतना अपना बना देती हो कि मैं डर जाता हूँ कि कहीं ये सब ख़त्म न हो जाए।” रीमा हँसी, पर उसकी आँखें गंभीर थीं। “ख़त्म क्यों होगा?” सिद्धार्थ चुप रहा, फिर बोला, “क्योंकि दोस्ती का कोई अनुबंध होता है, लेकिन प्यार… प्यार तो बस गिरा देता है इंसान को।” उस वाक्य में एक अजीब सच्चाई थी — जैसे वो दोनों खुद से नहीं, अपने अतीत से डर रहे थे। रीमा का पिछला रिश्ता और सिद्धार्थ की टूटी हुई मंगनी दोनों ही अपने घाव छोड़ गए थे, और अब इन घावों की गहराई में दोनों खुद को फिर से खो देने से डरते थे।
उसी रात, एक बार फिर बारिश ने बैंगलोर को धीमे साज में लपेट लिया। रीमा बालकनी में बैठी कॉफी पी रही थी, और सिद्धार्थ उसके पास आकर खड़ा हो गया। “रीमा,” उसने धीरे से कहा, “क्या तुमने कभी चाहा है कि हम वाकई एक बार उन नियमों को तोड़ दें?” रीमा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में अब डर नहीं था — बल्कि साहस था। “मैं तोड़ चुकी हूँ,” उसने जवाब दिया, “उस दिन जब तुमने मुझे पकड़ा था उस पार्टी के बाद… मैं खुद को पहली बार पूरी तरह तुम्हें सौंप चुकी थी, नशे में नहीं, होश में।” सिद्धार्थ ने कॉफी का मग उसके हाथ से ले लिया, फिर उसके गाल पर धीरे से हाथ रखा। उस क्षण में बारिश, सड़कों का शोर, और शहर की सारी व्यस्तता ठहर गई थी। दोनों की सांसें जैसे एक लय में थीं, और इस लय में दोस्ती नहीं थी — एक अनकहा वादा था, कि जो भी हो, वो अब अधूरा नहीं रहेगा।
अगली सुबह, रीमा की आँख खुलते ही उसने देखा कि सिद्धार्थ ने उसके लिए नाश्ता तैयार किया था — आमलेट, टोस्ट, और बगल में रखा एक छोटा नोट: “कभी-कभी डर को हराने के लिए सिर्फ़ एक कदम काफी होता है। मैंने वो उठाया है।” रीमा की आंखों में नमी थी, लेकिन चेहरा मुस्कान से भरा हुआ। प्यार का यह पहला स्पर्श सच्चाई के आईने में अब साफ़ दिखने लगा था। दोनों ने अपने अतीत के डर, दोस्ती के नियम और शहर की आपाधापी से निकलकर एक नए रिश्ते की ओर पहला कदम बढ़ा लिया था। लेकिन क्या यह रिश्ता उन्हें अगले मोड़ पर स्थिरता देगा, या फिर कोई और तूफ़ान उनका इंतज़ार कर रहा है — ये सवाल अब भी हवा में तैर रहा था।
९
बैंगलोर की उस रात आसमान खुलकर रोया था। घर के बाहर तेज़ बारिश की आवाज़ खिड़की से टकरा रही थी और भीतर रीमा अपने चुपचाप दिल के तूफान से लड़ रही थी। सिद्धार्थ और वह अब पहले जैसे नहीं थे—कम से कम उसके लिए। उस रात की नज़दीकी, वो छुअन, वो सच्चाई भरी बातों का सैलाब — सब कुछ उसकी नींदों से लेकर होश तक पर छा गया था। सिद्धार्थ अब भी उसी तरह सामान्य था, चाय बनाते हुए पुराने गानों पर झूमता, ऑफिस से आकर कहानी सुनाता, लेकिन रीमा का दिल अब उसे सिर्फ़ ‘रूममेट’ कहने को तैयार नहीं था। वह चाहती थी कि सिद्धार्थ उसकी नज़रों में झाँककर जाने कि वो कब से उसे चाहने लगी है। लेकिन डर था—अगर उसने कुछ कहा और सिद्धार्थ ने मना कर दिया तो ये खूबसूरत दोस्ती, ये साझा घर, ये सुकून सब खो जाएगा।
उस रात जब बिजली कड़कती हुई आई, लाइट चली गई। सिद्धार्थ किचन से बोला, “रीमा, क्या मोमबत्तियाँ हैं?” रीमा ने लिविंग रूम के दराज़ से मोमबत्ती निकालकर टेबल पर रख दी। बारिश की रौशनी में दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, चुपचाप, बिना शब्दों के। फिर सिद्धार्थ ने एक धीमी आवाज़ में कहा, “याद है उस रात? मैं नशे में था, लेकिन कुछ भी फेक नहीं था।” रीमा चौंक गई। वो यही सुनना चाहती थी, लेकिन जब अचानक वो शब्द मिले तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “और अगर मैं कहूं कि मैं उस रात के बाद से तुझसे प्यार करने लगी हूँ?” सिद्धार्थ थोड़ा रुका, फिर धीरे से उसके पास आया, “तो मैं कहूंगा कि मैंने तो पहले से ही किया था… लेकिन डरता था।”
उस एक क्षण में मानो सारी उलझनें धुल गईं। दो रूममेट्स अब दो दिलों के रूप में एक साथ खड़े थे। बारिश की बूंदों की तरह उनके अहसास भी एक के बाद एक दिल में गिर रहे थे। सिद्धार्थ ने रीमा का हाथ पकड़कर कहा, “तू सिर्फ मेरी रूमी नहीं है रीमा। तू मेरी सुबह की कॉफी है, मेरी देर रात की बातों की साथी, मेरा सबसे प्यारा कॉन्फेशन।” रीमा मुस्कुरा दी, वो मुस्कान जो सिर्फ़ सच्चे प्यार में होती है, जब कोई तुम्हारे टूटे हुए हिस्सों को प्यार से सहला देता है।
तभी एक ज़ोरदार बिजली चमकी, और फिर हल्की सी हँसी दोनों की गूँज बन गई। अब ये रिश्ता दोस्ती के नियमों से बाहर था, लेकिन किसी ग़लती के नहीं, बल्कि दिलों के इरादों से बना था। रूम का हर कोना अब एक नई शुरुआत की गवाही दे रहा था—‘रूमी से रूह तक’ की यात्रा पूरी हो रही थी। लेकिन क्या ये प्यार हमेशा के लिए रहेगा या फिर एक और तूफान उनका इंतज़ार कर रहा था? ये जानना अब बाकी था…
१०
बैंगलोर की उस शाम की हवा में जैसे कोई राहत का गीत घुला हुआ था। रीमा बालकनी में बैठी कॉफ़ी का कप थामे सामने के गुलमोहर की टहनियों को झूमते देख रही थी। ज़िंदगी का हर पन्ना आजकल किसी नई किताब की तरह लग रहा था, जिसकी हर लाइन उसने और सिद्धार्थ ने साथ लिखी थी। पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने दोस्ती, उलझन, पश्चाताप और अंत में अपने सच्चे इमोशन्स को पहचाना था। लेकिन आज कोई उलझन नहीं थी। सिद्धार्थ ने अपने रूम के दरवाज़े पर खड़े होकर उसे देखा और मुस्कुरा दिया—वो मुस्कान जो अब किसी परिचित दोस्त की नहीं, बल्कि उस इंसान की थी जिसने उसे दिल से अपनाया था। “रीमा,” वो बोला, “हम बहुत कुछ सह चुके हैं। क्या अब हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं? बिना किसी शर्त, बिना किसी नियम के, बस एक साथ?” रीमा ने उसकी तरफ देखा और बिना कुछ कहे उसकी ओर बढ़ आई। इस बार न कोई नियम था, न कोई दीवार। सिर्फ़ एक साथ चलने की स्वीकृति थी, बिना किसी शंका के।
वक़्त ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया था। जब दो लोग एक ही छत के नीचे रहते हैं, तो या तो दीवारें बनती हैं या पुल। रीमा और सिद्धार्थ ने शुरुआत में दीवारें खड़ी की थीं—‘डिस्टर्ब न करना’, ‘नो पर्सनल ड्रामा’, ‘कोई अटैचमेंट नहीं’ जैसे नियमों के पत्थर से। लेकिन वो रात, जब सब कुछ बदल गया, वो कोई ग़लती नहीं थी। वो दो आत्माओं का मिलन था, जो दोस्ती की सीमाओं को पार कर एक सच्चे रिश्ते की ओर बढ़ चले थे। उस एक रात के बाद चाहे उन्होंने अलग कमरों की दूरी बना ली थी, लेकिन दिलों की दूरी मिट चुकी थी। सिद्धार्थ ने जब पहली बार रीमा की आंखों में वो डर देखा, जो उसके अंदर के प्यार को छुपा रहा था, तभी वो जान गया था कि यह सिर्फ़ दोस्ती नहीं रही। और रीमा को भी वक्त लगा, लेकिन अब उसे भी यकीन था—सिद्धार्थ उसका ‘कम्फर्ट ज़ोन’ नहीं, उसका ‘होम’ बन चुका है।
अब सब कुछ बदल चुका था। रूममेट्स की तरह शुरू हुआ यह सफ़र अब लिव-इन पार्टनर्स की तरह नहीं, बल्कि जीवन साथी की तरह आगे बढ़ने वाला था। उन्होंने फ्लैट को फिर से सजाया—हर कोना, हर तस्वीर, हर पर्दा अब उनके नए रिश्ते की छाया में ढला था। सिद्धार्थ की उस पुरानी दीवार पर, जहाँ पहले उसकी बाइक की तस्वीरें थीं, अब रीमा के स्केच टंगे थे। किचन में अब सिद्धार्थ भी हाथ बँटाता, और रीमा हर सुबह उसे उसी चाय के साथ जगाती जो कभी सिर्फ़ ‘दोस्ताना ज़रूरत’ थी, लेकिन अब एक आदत बन चुकी थी। वो अब सिर्फ़ एक रूम नहीं था—वो एक घर था। वो जगह जहाँ दो दिलों ने एक दूसरे को पाया, खोया, और फिर से समेटा। एक नई सुबह की शुरुआत के साथ, उन्होंने एक नया सफर तय किया—इस बार बिना किसी शर्त के।
उनकी कहानी अब सिर्फ़ “एक रूम, दो दिल” नहीं रही थी। अब ये थी “एक ज़िंदगी, दो साथी।” उन्होंने अपने रिश्ते को समाज के ठप्पों से ऊपर उठाया था। रीमा ने खुद से डरना छोड़ दिया था और सिद्धार्थ ने आखिरकार ये समझा कि प्यार सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि हर उस छोटी-छोटी बात में होता है जो हम बिना बोले करते हैं। जब वो दोनों शाम को साथ बैठकर चुपचाप आसमान में उड़ते बादलों को देखते, तो उनमें उन्हें अपनी कहानी दिखती। कोई क्लाइमैक्स नहीं, कोई परफेक्ट एंडिंग नहीं—बस एक चलती कहानी, जो हर दिन नया मोड़ लेती, पर साथ चलती। प्यार की परिभाषा अब उनके लिए वो नहीं थी जो फिल्मों में दिखती थी, बल्कि वो थी जो उन्होंने साथ में जिया था। और इस बार, उन्हें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक-दूसरे की आँखों में झाँककर हर सुबह ये कहना था—“मैं यहाँ हूँ, और हमेशा रहूँगा।”
समाप्त


