नीता देव अध्याय 1: रंगों की चुप्पी झाँसी की गलियों में सुबह की पहली किरण जब पुराने किलों की दीवारों से टकराकर उतरती थी, तब शहर में एक धीमी-सी हलचल शुरू होती थी। पर उस हलचल से दूर, एक छोटी-सी गली में, पुराने नीले दरवाज़े के पीछे राधा अपनी दुनिया में खोई हुई बैठी थी। लकड़ी की खड़खड़ाती खिड़की से छनकर आती धूप उसकी आधी-अधूरी पेंटिंग पर पड़ रही थी, जिसमें एक लड़की एक खिड़की के भीतर बैठी आकाश को देख रही थी—कुछ वैसा ही जैसे खुद राधा थी। कलाई तक रंगों में सनी हुई, वह ब्रश को बहुत नर्मता…