मिताली गुप्ता १ दिल्ली की सुबहें कुछ अलग नहीं होतीं — ट्रैफिक का शोर, भागती हुई भीड़, गाड़ियों के हॉर्न और मेट्रो स्टेशनों पर गूंजती उद्घोषणाओं की आवाज़ें। लेकिन निहारिका की सुबहें उन सब से थोड़ी अलग थीं। वह हर सुबह ठीक 8:12 की ब्लू लाइन मेट्रो पकड़ती थी — द्वारका सेक्टर 9 स्टेशन से राजीव चौक तक का सफर। उसका कोच वही होता, वो खिड़की के पास की वो एक सीट तक पहुँचने का अभ्यास उसके पैरों को आदत हो गया था। चेहरे बदलते रहते थे लेकिन कुछ एक यात्री रोज़ मिलते थे — एक बुज़ुर्ग जो रामायण पढ़ते…