शुभदीप मिश्र वाराणसी स्टेशन की गर्म हवा में अजीब-सी गंध थी—कुछ धूप की, कुछ पुराने लोहे की, और कुछ जैसे समय की। शौर्य व्यास ने अपने ट्रॉली बैग का हत्था कसकर पकड़ा और भीड़ को चीरते हुए बाहर निकला। सालों बाद भारत लौटना उसे उतना अजनबी नहीं लगा, जितना लगा व्यास निवास का नाम सुनते ही मन में उभर आया अनकहा डर। वह तेरह साल का था जब उसके पिता की अचानक मौत के बाद मां ने उसे लंदन भेज दिया था, और तब से उसने कभी बनारस की ओर मुड़कर नहीं देखा। पर अब, वर्षों बाद, वकील के एक…
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विवेक यादव १ दिल्ली की हल्की सर्दियों की उस सुबह अर्जुन सिंह की आंखें अलार्म घड़ी की कानफाड़ू आवाज़ से खुलीं, पर दिलो-दिमाग में जो बेचैनी थी, वह किसी अलार्म से नहीं जागी थी। अपने छोटे से किराये के फ्लैट में अर्जुन ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा—सुबह के सात बजने वाले थे। बाहर से दूधवाले की साइकिल की घंटी, अखबार के लड़के की पुकार और पड़ोसी की चाय के प्याले की खनक सुनाई दे रही थी, मगर अर्जुन का मन इन साधारण आवाजों से परे किसी और ही दुनिया में भटक रहा था। वो दुनिया, जो सपनों…