शक्कर रञ्जन महापात्र जब बप्पा भानगढ़ी गाँव पहुँचा, तो आसमान धूसर था और धूप जैसे छिप कर बैठ गई थी। बस से उतरते ही उसे सबसे पहले महसूस हुआ मिट्टी की सोंधी गंध, जो बारिश से पहले की नमी जैसी लग रही थी। गाँव छोटा था, मगर उसकी खामोशी में कोई अजीब सी बात थी—जैसे कोई सब कुछ देखकर भी अनजान बना हो। स्टेशन से निकलकर वह जब कच्चे रास्ते पर चला, तो देखा कि बच्चे खेलते समय अचानक चुप हो जाते हैं, और बूढ़े अपनी छड़ी थामे, गर्दन झुका कर ऐसे निकल जाते हैं जैसे आँखें मिलाना कोई अपराध…