कुणाल राठौर एपिसोड 1 : तहखाने की खिड़की रात ढाई बजे दिल्ली की हवा भारी थी। डिफेंस कॉलोनी की पुरानी कोठी—डी-17—के बाहर पुलिस की पीली पट्टी लगी थी। भीतर कदम रखते ही रिपोर्टर नैना त्रिपाठी को महसूस हुआ मानो दीवारें खुद साँस ले रही हों। बरामदे में एक परिचित चेहरा दिखा—राघव मेहरा, क्राइम ब्रांच के रिटायर्ड अफ़सर। हाथ में टॉर्च, आँखों में वही पुराना धैर्य। “आप यहाँ?” नैना ने पूछा। “आवाज़ सुनकर आया। और यह केस मुझे पुकार रहा था।” स्ट्रेचर पर लेटा मृतक था—आईएएस अफ़सर अरविंद कश्यप। चेहरे पर नीली झलक और कमरे में हल्की बादाम जैसी गंध। नैना…
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सोनल शर्मा पहली रात बसेरिया में प्राची मिश्रा की कार धूल उड़ाती हुई जब बसेरिया गांव के छोर पर पहुँची, तब शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे। चारों ओर पीली रोशनी में नहाया खेत, सूखी घास की सरसराहट और दूर कहीं पीपल के पेड़ पर बैठे कौवे की कांव-कांव। उसने कार से उतरते हुए कैमरा और बैग उठाया, मोबाइल की लो बैटरी का नोटिफिकेशन नजरअंदाज़ किया, और अपनी डायरी जेब में खिसका ली। दिल्ली से करीब आठ घंटे की दूरी पर स्थित बसेरिया अब बस एक नाम भर रह गया था। कभी गुलजार रहा ये गांव अब जैसे साँसें…