चयनिका श्रीवास्तव जयपुर की पुरानी गलियों में बसे एक शांत मोहल्ले में, हल्के नीले रंग का एक छोटा-सा स्टूडियो था जहाँ से हर शाम एक अनकही ख़ामोशी और रंगों की सोंधी महक बाहर आती थी। वहाँ बैठती थी इशिता वर्मा—नेत्रहीन, मगर भावनाओं से भरी एक चित्रकार, जो रंगों को अपनी उंगलियों की नमी और हवा की कंपन से पहचानती थी। उसके पास रंगों की दृष्टि नहीं थी, पर एक अनोखी शक्ति थी—हर रंग की भावना को महसूस करने की। स्टूडियो में बिखरे कैनवासों पर वह अपने भीतर के संसार को उतारती थी—कभी आंधी की तरह, तो कभी बारिश के बूंदों…