Niraj Kashyap 1 The road to Kohima was narrower than Dev Malhotra expected, its serpentine curves stitched into hills that breathed mist with every mile. His cab driver, a lean man named Lipok, didn’t speak much beyond gestures and short English bursts. The air grew thinner as they climbed, and pine forests swayed like silent sentinels watching their passage. Dev kept his DSLR beside him, ready to catch any atmospheric shot that could set the tone for his article. A seasoned investigative journalist, he’d covered riots, cults, and graveyard confessions in Bundelkhand—but this was different. Stories of a phantom priest…
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अनिरुद्ध राजन मिश्रा वाराणसी की तंग गलियों में वो रात कुछ ज्यादा ही खामोश थी, जैसे कोई बड़ा तूफान पहले ही सब उजाड़ चुका हो। इंस्पेक्टर अयान शुक्ला की जीप जब कोतवाली इलाके की उस मोड़ पर पहुँची, तो चारों तरफ भीड़ जमा हो चुकी थी। लाल-नीली बत्तियों की चमक पुलिस की असहज उपस्थिति दर्ज करा रही थी, लेकिन वहां खड़ा हर शख्स जानता था — ये कोई आम मर्डर नहीं। “कौन है?” अयान ने उतरते ही पूछा। “साहब… एक औरत है,” कॉन्स्टेबल दुबे ने सिर झुकाते हुए जवाब दिया, “किसी ने सिर पर वार किया है, मौके पर ही…
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নিবেদিতা চক্রবর্তী অধ্যায় ১: কুমিরডাঙার বাংলো অরিত্র বসুর মনটা বেশ কয়েক মাস ধরেই ভারী হয়ে আছে। ছবি আঁকার চেষ্টা করলেই মনে হয়, ব্রাশটা যেন বাতাসে দোলা খায়, কিন্তু রঙে ডুবে না। ক্যানভাসে রঙ মিশে যায় ঠিকই, কিন্তু তাতে জীবন থাকে না। তার ভেতরের কিছু যেন চুপ করে বসে আছে, আর তা না জাগলে কিছুই উঠে আসে না ক্যানভাসে। কলকাতার কোলাহল থেকে মুক্তি পেতে, এক বন্ধুর পরামর্শে সে চলে এল পুরুলিয়ার এক প্রাচীন, নির্জন গ্রামে—কুমিরডাঙা। পাহাড়, জঙ্গল আর অদ্ভুত নীরবতায় ঘেরা এই গ্রাম এখনো যেন কালের গায়ে আঁচড় পড়তে দেয়নি। এখানে মোবাইলের নেটওয়ার্ক ঠিকঠাক চলে না, ইলেকট্রিকের তার আসে আবার যায়—আর…
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दिव्या कपूर १ बैंगलोर की हल्की बारिश वाली उस सुबह रीमा सेन ने एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में एक भारी बैग थामे ऑटो से उतरते ही चैन की सांस ली। कोलकाता से आए हुए उसे कुछ ही दिन हुए थे, लेकिन इस शहर की सड़कों और ट्रैफिक ने पहले ही उसे बता दिया था कि यहां की ज़िंदगी कितनी तेज़ है। वो एक नई नौकरी की शुरुआत करने जा रही थी – एक ग्राफिक डिज़ाइन स्टार्टअप में, जहाँ उसकी क्रिएटिविटी को पहली बार सही मायने में पहचान मिलने वाली थी। लेकिन सबसे बड़ी चिंता थी – रहने…
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Tara Ellison Ray Jay Parker hated weddings. He hated the drama, the speeches, the couples gazing into each other’s eyes like the world was a chocolate fountain. But most of all, he hated commitment. So naturally, when his best mate Ollie invited him to a week-long bachelor party in Goa—far, far away from London’s relentless drizzle and his ex-girlfriend’s constant texting—Jay booked the flight without a second thought. He didn’t bother to read the fine print. Details bored him. That’s how he ended up sleep-deprived, slightly hungover, and entirely confused when a chauffeur holding a sign that read “Jai Prakash…
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आरोही वर्मा वो जुलाई की पहली बारिश थी। दिल्ली की सड़कों पर धूल धुल रही थी और आसमान के हर कोने से बूंदें टपक रही थीं। ऑफिस से लौटते वक़्त सारा कुछ भीग गया था—कपड़े, बाल, मन। लेकिन अदिति को बारिश से कभी शिकायत नहीं थी। बारिश उसके लिए हमेशा एक नया पन्ना खोलती थी—नमी से भरा, स्याही से गीला, यादों से लिपटा हुआ। उसे बारिश में चलना पसंद था, बिना छाते के। लेकिन आज पहली बार किसी ने उसके हाथ में छाता थमाया था। “इतनी भीग क्यों रही हो? बीमार पड़ोगी।” वो आवाज़ जैसे बादलों के बीच से आई…
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ঋজু ভট্টাচার্য ১ কলকাতার আকাশটা সকাল থেকেই মেঘলা ছিল। শহরের কনস্ট্যান্ট কোলাহলের মাঝেও যেন এক অদ্ভুত নিস্তব্ধতা নেমে এসেছিল কোর্ট স্ট্রিটের চত্বর জুড়ে। আইনজীবীদের মধ্যে চাপা উত্তেজনা, কিছুটা উদ্বেগও, কারণ শহরের অন্যতম শ্রেষ্ঠ ক্রিমিনাল ল’ এক্সপার্ট বরণ ঘোষাল আজও কোর্টে আসেননি। এই নিয়ে সাত দিন হয়ে গেল তিনি নিখোঁজ। প্রথম দু’দিন ভেবেছিল সবাই হয়তো কোনো প্রফেশনাল ট্রিপে গেছেন, তৃতীয় দিনে একাধিক কেসের শুনানি বাতিল হওয়ায় শুরু হয়েছিল গুঞ্জন, এবং সপ্তম দিনে এসে পুরো শহরটা যেন চঞ্চল হয়ে উঠল। মিডিয়া জ্বলজ্বল করছে ‘সেলিব্রিটি লইয়ার নিখোঁজ’ শিরোনামে। পুলিশ অফিশিয়ালি এখনও “মিসিং পারসন” কেস ফাইল করলেও, তদন্তে নামানো হয়েছে দুই কনস্টেবল, একটি গোয়েন্দা…
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Ira Devyani Sen It was the kind of evening that carried warmth on its skin — not from the sun, but from the longing that hung in the air like unspoken words. The rain had stopped just an hour ago, leaving behind a breathless hush. The windows were still misted, half open to the scent of soaked earth and hibiscus. She stood by the sill, fingers tracing the wooden frame, her saree a soft rustle of maroon and gold wrapped tightly around her curves, as if the fabric itself remembered touch. Down below, the courtyard glistened — bricks slick with…
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স্মিতা সেন বিকেলটা ঘন বর্ষায় ভিজে গিয়েছিল যেন আঁধারের রঙে। দিগন্তজোড়া নীলচে মেঘে ঢেকে থাকা আকাশের তলায়, ঈশান তার হাতের ব্যাগটা টেনে তুলল ট্যাক্সি থেকে নামার সময়। সেই পুরনো বাংলো, যার ছাদে কচুরিপানার পাতার মত শ্যাওলা জমেছে, তার দালানে দাঁড়িয়েই সে প্রথম রূপসীকে দেখেছিল। সে এক অপূর্ব মুহূর্ত। যেন কেউ জলরঙে এঁকে দিয়েছে। মাটি ছোঁয়া শাড়ির প্রান্তটা কাঁধ থেকে খানিকটা পিছলে পড়েছে, ভেজা কেশরাশি কপাল ছুঁয়ে ঝুলছে, আর চোখে সেই চিরচেনা বিষণ্ণতা, যেটা শুধু একাকিত্বের গায়ে জন্মায়। ঈশান চোখ সরাতে পারছিল না। শিল্পী মাত্রেই সৌন্দর্যে হারিয়ে যায়, কিন্তু এই সৌন্দর্যটা যেন ক্যানভাসের বাইরের কিছু—নাড়ি ছোঁয়া, নিঃশ্বাসের মতো বাস্তব। “আপনি নিশ্চয়ই…
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অপূৰ্ব গগৈ টেঙাখালিৰ গাঁওখন মাত্ৰ পুৱা জাগি উঠিছিল, জুইৰ ধোঁৱা আৰু গৰুৰ ঘণ্টাৰ শব্দেৰে আবৰি উঠিছিল গাওঁখনৰ আকাশ। হালধীয়া মাটিৰ পথেদি এখন নীলৰঙৰ জীপ গৈ আছিল, য’ত বহি আছিল এজন সদ্য বদলি হোৱা ইংৰাজী শিক্ষক— জয়ন্ত বৰা। চকুত এক গম্ভীৰতা, মুখত নিঃসঙ্গতা, আৰু হাতত ধৰা এটা ডায়েৰী, য’ত তেওঁ সদায় নতুন গাঁৱত পোৱা অভিজ্ঞতা লিখি ৰাখে। টেঙাখালিৰ বিদ্যালয়খন যদিও সৰু, তাৰ ইতিহাস আছে আৰু শিক্ষাৰ প্ৰতিও কিছু মান থাকে বুলি তেওঁ শুনিছিল। জীপখন গাঁওখনৰ মাজেৰে গৈ থাকোতেই গাঁওবাসীৰ চকু জিপৰ দিশে ঘূৰি আহিছিল— নতুন মানুহ, নতুন পইচন, আৰু তেওঁলৈ নতুন কল্পনা। “এইজনেই হ’ব নতুন শিক্ষকজন”, কোৱা বুলি এগৰাকী বুঢ়ীয়ে চাৰুখুৰীয়া…