ঋজু সেন ঠাকুমা ও ‘ShortyShorts’-এর প্রথম সাক্ষাৎ কলকাতার বালিগঞ্জে পুরনো বনেদি দোতলা বাড়ি, ছাদের কোণে একটা নারকেল গাছ, দেওয়ালে ফাটল, আর উঠোনে ঝাঁপিয়ে পড়া হিবিসকাস ফুল। বাড়িটার বয়স প্রায় একশো। আর তার একজন স্থায়ী বাসিন্দা—শৈলজা বসু, ওরফে ‘ঠাকুমা’। বয়স ৮২, চোখে চশমা, মুখে হাঁ করা চমকানো অভিব্যক্তি প্রায় সর্বক্ষণ। কিন্তু তিনি হাঁটেন সোজা, শাড়ি পরেন রঙিন—তুলসী পাতার মতো সবুজ, চেরি ফুলের মতো গোলাপি। ঠাকুমা সারাদিন খবরের কাগজ পড়েন, টিভি দেখে রান্নার শো, আর মাঝে মাঝে শঙ্খ বাজিয়ে জানান দেন তিনি এখন “যোগা” করছেন। কিন্তু এই পরিপাটি নিয়মমাফিক জীবনে হঠাৎ একদিন হট্টগোল লাগে। নাতি অভ্র, ক্লাস টুয়েলভে পড়ে, তার ঘরে বসে…
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Vijoy Menon Part 1: Ashes That Speak The smoke rose like a slow, coiled prayer — grey and indifferent, curling against the dimming sky. At Manikarnika Ghat, the fires had no time to rest. One pyre faded, another was lit. Wood cracked, bones whispered, and the Ganges swallowed the silence of the dead with the same patience it gave the living. The priests moved like phantoms in ochre robes, their hands blackened with ghee and soot. No one cried here. Grief had long since turned into muscle memory. Devkant Mishra stood by the edge of the river, his white dhoti…
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সায়ন্তনী ঘোষ পর্ব ১: ট্রেন যখন ছাড়ে, মন তখন কোথাও আটকে থাকে কলকাতা স্টেশনটা যেমন সব সময় গমগম করে, সেদিনও ঠিক তেমনই ব্যস্ত আর পাঁপড়ের মতো শব্দে ভরা ছিল। তবে আমাদের ভেতরে যেন কোনও শব্দ ছিল না। আমরা দাঁড়িয়ে ছিলাম দু’জন দু’দিকে মুখ করে — কেউ কিছু বলছে না, কেউ কিছু বলার চেষ্টাও করছে না। ট্রেন ছাড়ার দশ মিনিট আগে, আমার হাতের বোর্ডিং পাসটা খানিকটা ভিজে গিয়েছিল, জানি না মেঘের জল ছিল না চোখের জল। রুদ্র আমার থেকে একটু দূরে দাঁড়িয়ে ছিল, পিঠে রুকস্যাক, আর একটা নীল চেক শার্ট গায়ে। এই মানুষটার সঙ্গে আট বছর কেটে গেছে, অথচ আজও মাঝে…
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अदिति राठी भाग 1: मुलाक़ात पन्ना की सर्दी में धूप एक वरदान जैसी लगती थी। स्कूल की छत पर बिछी टाट की चटाइयों पर बच्चे बैठकर चित्र बना रहे थे—सूरज, पेड़, झोपड़ी, और किसी कोने में एक मंदिर की घंटियां। रेवती चौहान बीच में खड़ी, बच्चों की तस्वीरों पर झुकती, तारीफ़ करती और कभी-कभी पेंसिल हाथ में लेकर कोई रेखा ठीक कर देती। उसकी चुन्नी कंधे से खिसकती रहती थी, और वो बार-बार उसे एक ही अंदाज़ में पीछे सरका देती थी। जैसे उसकी ज़िंदगी में सब कुछ इसी दोहराव के भीतर समाहित था—शांत, व्यवस्थित, और बंधा हुआ। उसी दोपहर,…
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Isla Verma The Letter in the Book It was a Sunday shaped like rain. The city hadn’t yet decided if it wanted to pour or pretend, and Anaya stood under the torn yellow canopy of a second-hand bookstall near Churchgate, letting her fingers glide across spines of the forgotten. The old man who ran the stall smoked a cigarette with one hand and flipped through pages with the other, not even looking up as she pulled a faded copy of Wuthering Heights from the stack. The pages were frayed at the edges, browned like toast. Anaya loved that. She liked…
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সৌরভ ভৌমিক দোতলা বাংলোটির রং ছিল ছাই ধূসর, যেন রোদে পোড়া কোনও পুরোনো অ্যালবাম থেকে উঠে এসেছে। জানালার কাচগুলো ঘোলাটে, কাঠের পাল্লায় পোকায় ধরা ক্ষতচিহ্ন। হেমন্তের পড়ন্ত বিকেলে গাড়ির শব্দ থেমে গেলে মৃদু হাওয়া বইছিল পুরনো বাগানের ঘাসের গায়ে। গাড়ির দরজা খুলে নামলেন সায়ন আর রীতা। নবদম্পতি, শহরের ব্যস্ত জীবন থেকে খানিক দূরে এক নিঃসঙ্গ বাংলোয় নতুন শুরু করতে এসেছেন। “এমন একটা জায়গা তুমি ঠিক করো কীভাবে?”—রীতার গলায় মৃদু অসন্তোষ। সায়নের হাসিটা ধীর, ঠোঁটের কোণে অদ্ভুত প্রশান্তি—”শান্তি চেয়েছিলে, না? এখানে ট্রাফিক নেই, শব্দ নেই, কিচ্ছু নেই।” রীতা মুখ ফেরালেও বাড়ির দিকে চাইল—তাদের নতুন বাসা। ব্রোকার বলেছিল, বাড়িটা আগে এক ইংরেজ…
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অভিজিৎ শইকীয়া বাৰিষাৰ পিচত গুৱাহাটীৰ ৰাস্তাবোৰৰ কিছুমান বিশেষ গন্ধ থাকে। কেঁচা মাটিৰ গন্ধ, কফিৰ গন্ধ, বাটত সোমোৱা নতুনকৈ ধোৱা কাপোৰৰ গন্ধ, আৰু কেতিয়াবা কিবা অতীতৰ। “Beans & Books”—বাৰগাঁওৰ এটি কফি শ্বপ—এইবোৰ গন্ধৰ সৈতে একেধৰণৰ স্মৃতিৰো আধাৰ। ঠাণ্ডা এচিপ কফিৰ দৰে উষ্ণ। ইমা প্ৰতিদিনে আহে। কালধুপীয়া চামৰাৰ জেকেট, ভাঙি পৰা ছাতা, আৰু এটা নীল মেকআপ বিহীন মুখ। পেছাতে বহাগ বিহুত কিছুমান গীত লিখিছিল, এখন স্থানীয় থিয়েটাৰত বাজিছিল। তাৰ পাছত এজাক চিনাকি ওলালেও, ইমা আজি ঘূৰি আহিছে একেবাৰে অচিনাকী হৈ। লেখাৰ টেবুলটো হ’ল তেওঁৰ, কাষৰ ব’কা খুঁটি এখনৰ ঠিক পিচত থকাটো। অণুৰাগ আজি প্ৰথমে পতা চুলিত আহিল। লেপটপ লৈ, টেবুলৰ লেম্পটো অফ…
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रेशमा गुलज़ार 1 दिल्ली की गर्मी जब जून के तीसरे हफ्ते में साँस लेने लगती है, तो शामें धुएँ में घुल जाती हैं। ट्रैफिक की आवाजें खिड़कियों के भीतर तक आती हैं, और पर्दे धीमे-धीमे नाचते हैं, जैसे किसी ने उन्हें एक धीमा राग गुनगुनाया हो। अन्वी ने लैपटॉप बंद किया। स्क्रीन पर वो तीसरा पैराग्राफ अब भी अधूरा था—एक स्त्री का स्पर्श लिखते-लिखते उसकी अपनी त्वचा पर सिहरन सी दौड़ गई थी। उसने कॉफ़ी मग उठाया, जो अब ठंडा हो चुका था। बालों की एक लट उसकी गर्दन पर टिक गई थी—गर्मी और अधूरी नींद दोनों की गवाही देती…
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दिल्ली के शाहपुर जाट इलाके की पतली गलियों में, एक पुरानी इमारत की तीसरी मंज़िल पर अवनि शर्मा ने हाल ही में किराए पर एक फ्लैट लिया था। मकान मालिक ने कहा था, “थोड़ा पुराना है, मगर शांत इलाका है।” अवनि को यही चाहिए था—शांति। एकाकी ज़िंदगी, कॉफी मग में भाप लेती शामें, लैपटॉप पर काम और दीवार पर टँगी किताबों की अलमारियाँ। वह एक डिजिटल मीडिया एडिटर थी और ज़्यादातर वक़्त घर से ही काम करती थी। फ्लैट छोटा था लेकिन खुला-खुला, जिसकी बालकनी से हौज खास के पुराने गुंबद दिखाई देते थे। मगर पहले ही दिन जब वह…
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Nikhil Vartak 1 The morning rush at Dadar station had already peaked by 8:15 AM—porters yelling over the screech of arriving locals, chai vendors navigating through tired office-goers, and the ever-present static of platform announcements blending into the Mumbai noise symphony. Sub-Inspector Tanya Naik stepped onto Platform Three with the weariness of someone who hadn’t finished her first week in the city. Her boots made a dull thud on the wet concrete, and she blinked slowly at the wall of commuters parting around a huddle of constables near a shuttered tea stall. The rain had left the platform slick and…