সৌভিক বন্দ্যোপাধ্যায় পর্ব ১ নন্দিনী জানালার কাঁচ ঘেঁষে বসে ছিল। নভেম্বরের হালকা রোদ গায়ে মেখে একটা পুরনো বইয়ের পাতা ওল্টাচ্ছিল সে, কিন্তু চোখ ছিল অনেক দূরে—ঠিক যেখানে আকাশ শহরটাকে ছুঁয়ে আছে, আর তারও পেছনে কোথাও যে প্রশ্নটা ওকে টানছে দিনের পর দিন—”এটাই কি আমার জীবন?” বিয়ে হয়েছে দশ বছর। সঞ্জয়ের সঙ্গে সম্পর্কটা স্থিত, নিরাপদ, কিন্তু অনুভবহীন। ঘরে সব আছে, হাসি নেই। বিছানায় স্পর্শ আছে, উত্তাপ নেই। নন্দিনী কখন যে নিজের শরীরকে ভুলে গিয়েছে, নিজেকে শুধু গৃহিণী, মা, আর এক নিঃশব্দ রুটিন ভেবে নিয়েছে, সে আর মনে পড়ে না। অথচ আজ সকালেই তার মনে হয়েছে, তার শরীর এখনও চায়। তার চোখ…
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Rohit Jha Chapter 1: The Silence Breaks The sun had only just begun to crest the misty ridge of the Shivalik hills when Inspector Arvind Rawat’s car crunched across the gravel path leading into Shakti Dham Retreat. The towering teak gate, adorned with Sanskrit shlokas and brass lotus insignias, parted slowly before him, revealing manicured gardens and stone pathways shaded by deodar trees. The ashram was a place of silence—literally so, as the guests were observing a week-long vow of maun vrat, speechlessness meant to cleanse the mind. But peace was the last thing present this morning. Arvind stepped out…
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सम्वित शर्मा अध्याय १: एक और गिरावट बारिश की एक भारी रात थी, जब मुंबई की गगनचुंबी इमारत ‘ओशन व्यू हाइट्स’ के नीचे पुलिस की गाड़ियाँ जमा हो गईं। चारों तरफ नीली-लाल बत्तियों की झिलमिलाहट में भीगते हुए कुछ लोग भीड़ बनाकर खड़े थे, और बीच में एक पीले प्लास्टिक की शीट से ढका शव—एक और मौत। सेक्योरिटी गार्ड ने सबसे पहले देखा था, या शायद सबसे पहले उसने देखा जाना तय किया गया था। इमारत की 13वीं मंज़िल से गिरकर मरी महिला का चेहरा क्षत-विक्षत हो चुका था, लेकिन अयान शेख को इतना तो साफ दिख गया कि ये…
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অনিরুদ্ধ ঘোষ পর্ব ১ দুপুর গড়িয়ে বিকেল। উত্তর কলকাতার এক পুরনো দোতলা বাড়ির জানালার পাশের ঘরটায় বসে আছে অরিত্র। চোখে তার একধরনের শূন্যতা, চা ঠান্ডা হয়ে গেছে টেবিলের কোণে, আর গিটারের তার ছুঁয়ে ছুঁয়ে সে যেন কোনো স্মৃতি ছুঁতে চাইছে। হঠাৎ ঘরের দরজা খুলে ঢুকে পড়ল মৃণাল, অরিত্রর ছোটবেলার বন্ধু, এখনকার থিয়েটার ডিরেক্টর। “তুই এখনো ওই পুরনো গানের সুরটা নিয়ে পড়ে আছিস? কতবার বলেছি, নাটকটা নিয়ে সিরিয়াস হতে হবে,” বলে মৃণাল চেয়ারে বসে পড়ল। অরিত্র হালকা হেসে বলল, “এই সুরটা গেলে অনেক কিছুই হারিয়ে যাবে রে। মা যখন ছোটো ছিলাম, এই গানের সুরেই ঘুম পাড়াতো। এখন এটা ছাড়া কিছুই ভালো…
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मिताली गुप्ता १ दिल्ली की सुबहें कुछ अलग नहीं होतीं — ट्रैफिक का शोर, भागती हुई भीड़, गाड़ियों के हॉर्न और मेट्रो स्टेशनों पर गूंजती उद्घोषणाओं की आवाज़ें। लेकिन निहारिका की सुबहें उन सब से थोड़ी अलग थीं। वह हर सुबह ठीक 8:12 की ब्लू लाइन मेट्रो पकड़ती थी — द्वारका सेक्टर 9 स्टेशन से राजीव चौक तक का सफर। उसका कोच वही होता, वो खिड़की के पास की वो एक सीट तक पहुँचने का अभ्यास उसके पैरों को आदत हो गया था। चेहरे बदलते रहते थे लेकिन कुछ एक यात्री रोज़ मिलते थे — एक बुज़ुर्ग जो रामायण पढ़ते…
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Tanya Mehra Part 1: Swipe Left on Sanity Mehul Mehta was the kind of man who walked into cafés with the confidence of a founder but paid for coffee with borrowed Paytm credit. On the second Tuesday of February, as the Koramangala sun turned everyone into sweating overachievers, Mehul stood outside BeanBag Labs, a co-working space that smelled like ambition and stale sandwiches. He adjusted his Zara-but-says-Gucci blazer, turned to his reflection in a glass door, and whispered, “Today, destiny gets an upgrade.” Inside, Tara Jacob sat hunched over her laptop, surrounded by four open coffee cups and a fifth…
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মীনাক্ষী বৰুৱা হেমন্তে সৰুৰে পৰাই গছপুলৰ মাজত ঘূৰি-ফুৰি জীৱনটোকে এক প্ৰতিঘূৰণি পৰীক্ষা হিচাপে ল’ব শিকিছিল। ৰাতিপুৱাই মাকৰ লগত খেতিত জুইলগা পাতবোৰ উলিওৱা, আবেলি গৰু ল’ই গধূলি মাঠ পাৰ হোৱা — এইবোৰেই তেওঁৰ জীৱনৰ সাধাৰণ ছবি। কিন্তু এইবোৰৰ মাজতো তেওঁৰ চকুৰ তলত চকুত সপোন থাকে — এবিধ অদ্ভুত কৌতূহল যি তেওঁক খোলা বতাহত উৰাৰ সপোন দেখুৱাইছিল। কোনোবাৰ গাঁওৰ বিদ্যালয়ত তেওঁ বৈজ্ঞানিক অভিসন্ধানৰ বিষয়ে শুনি আচৰিত হয় — ‘গছেও কথা কয়’, ‘চন্দ্ৰৰ পৃষ্ঠত বৰফ থাকে’, ‘জলৰ ভিতৰত বিদ্যুৎ চলিব পাৰে’ — এইবোৰ কথা তেওঁৰ হৃদয়ত পোহৰ লগাইছিল। যদিও গাঁৱৰ পাঠশালাখনত বৈজ্ঞানিক সামগ্ৰী সৰ্বনিম্ন, হেমন্তৰ মনখন সদায় জ্বলন্ত। খৰঙা টিনৰ টুকুৰা, কুঁহিপাতৰ সিন্দুৰী…
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संजीव मिश्रा भाग 1: किशोरलाल की किस्त-कथा किशोरलाल गुप्ता, उम्र लगभग 43 साल, पेशे से एक मध्यम दर्जे का सेल्समैन, लेकिन दिल से बहुत बड़े सपने देखने वाला इंसान था। सपना—नई चमचमाती कार, फ्लैट में दो बाथरूम, और एक स्मार्ट टीवी जिसमें नेटफ्लिक्स चले बिना बफरिंग के। पर समस्या एक ही थी—पैसे। और तब उसके जीवन में एंट्री हुई EMI की। पहली बार उसने EMI का नाम सुना था अपने ऑफिस के कलीग भोला प्रसाद से। भोला ने गर्व से बताया था, “भाई, मैंने तो अब iPhone भी EMI पे लिया है, बीवी की सिलाई मशीन भी, और बेटे की…
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অভীক ভট্টাচার্য পর্ব ১: পুলকের আগমন মেঘমল্লার হাউজিং-এর D ব্লকের চতুর্থ তলার ৪২০ নাম্বার ফ্ল্যাটে এক আশ্চর্য বিকেলে ঢুকল নতুন ভাড়াটে—পুলক চ্যাটার্জি। বয়স পঁয়ষট্টির ঘরে, চুলে পাক ধরেছে, চোখে মোটা ফ্রেমের চশমা, আর কাঁধে একটা জীর্ণ রেক্সিনের ব্যাগ। তবে যে জিনিসটা প্রথমেই নজর কাড়ল তা হলো তাঁর বুকের উপর ঝোলানো একটা প্ল্যাকার্ড: “I AM RETIRED BUT STILL DANGEROUS.” তীর্থ তখন অফিস থেকে ফিরছে। জলের বোতলটা সবে ফ্রিজে ঢুকিয়েছে, দরজার সামনে শব্দ পেয়ে তাকাতেই দেখে ওই প্রবীণ ভদ্রলোক তাঁর দিকে তাকিয়ে আছেন। —“তুমি তীর্থ তো? আমি তোমার নতুন রুমমেট—পুলক চ্যাটার্জি। এক্স-কোড নেম: রেড কোবরা।” তীর্থ মুখ হাঁ করে তাকিয়ে রইল। —“কোড…
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অধ্যায় ১: উত্তরাধিকার দক্ষিণ কলকাতার শেষ প্রান্তে, গড়িয়ার পাশ ঘেঁষে দাঁড়িয়ে থাকা পুরনো বাড়িগুলোর মধ্যে একটি ছিল “নীলকুঠি”—একটা অর্ধভাঙা, গাঢ় সবুজ পাতাবরণে ঢাকা অদ্ভুত প্রাসাদসদৃশ বাড়ি। বহু বছর ধরে পরিত্যক্ত, নিঃসঙ্গ সেই বাড়িটির একটিমাত্র প্রহরী ছিল সময়—যার সঙ্গে লড়তে লড়তে ভেঙে পড়েছিল ছাদের কার্নিশ, ভেঙে গিয়েছিল মেঝের সিমেন্ট, আর কড়া নড়তে নড়তে শূন্যতার ভিতরেও এক অচেনা শব্দ তৈরি হত। অনেকেই বলত, ও বাড়ি ভৌতিক। কেউ কেউ বলত, শয়তানের বাড়ি। কিন্তু অদ্বৈত মৈত্র এসব কল্পকাহিনি শুনেই বড় হয়নি। তার শৈশবের কতশত দুপুর আর সন্ধ্যে এই বাড়ির এক কোনায় তার ঠাকুরদার কোলে বসে কেটেছে—পুঁথি আর প্রাচীন কাগজের গন্ধমাখা গল্পের ভিতর। তবে বড়…