अनामिका चौधरी पटना यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में उस दिन कुछ अजीब सा सन्नाटा था। रीतू ने अपनी डायरी में अंतिम लाइन लिखी—“लोककथाओं में सिर्फ डर नहीं होता, इतिहास भी छिपा होता है।” उसे अगले सप्ताह फील्ड वर्क के लिए सुभाषपुर जाना था—बिहार के बरौनी ज़िले का एक छोटा-सा गाँव, जहाँ आज़ादी से पहले के ज़मींदारों की हवेलियाँ अब खंडहर बन चुकी थीं। लेकिन उसका असली मकसद था—“भूतहिया कुआँ”। उस कुएँ की कथा सुनकर ही उसका रिसर्च टॉपिक तय हुआ था। कहा जाता था कि हर साल सावन की पहली अमावस्या की रात, उस सूखे कुएँ से एक औरत की कराह…
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Nitish Joshi One The desert shimmered like an illusion, an expanse of white and gold stretching endlessly under the early winter sun. From above, the Rann of Kutch looked like a cracked mirror, its salt flats fragmented into wild geometries — but down here on the ground, it felt alive with movement, heat, and secret rhythms. The wind dragged dry whispers across the land as the colors of the Rann Utsav unfolded like a fever dream — turbans spinning in the breeze, mirror-work lehengas glittering, the scent of fried fafda and jaggery jalebi wafting from the festival stalls. Kabir Pathak,…
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অরিত্রী চক্রবর্তী পর্ব ১: সকালটা তোমার মতো নরম ছিল সকালটা নরম ছিল। ঠিক যেমন নরম হয় ভিজে তুলোর মতো আবেশ—যা গায়ের ওপর পড়ে না, কিন্তু ঢুকে যায় চামড়ার নিচে। পল্লবী জানালার কাঁচে কপাল ঠেকিয়ে দাঁড়িয়ে ছিল তখন, পেছনে এলার্মের শব্দ থেমে গেছে অনেক আগেই। মা চিৎকার করছেন—“পল্লু, দেরি হয়ে যাবে ব্যাচে যাওয়ার! আবার না খেয়ে বেরোবি?” কিন্তু পল্লবীর চোখ তখন জানালার ওপারে একটা দৃশ্য খুঁজছে—যেটা প্রতিদিন দেখে সে, অথচ কাউকে কখনও বলে না। রাস্তাটা ফাঁকা। সাইকেলের ঘণ্টি একটা বাজে পাশের গলিতে, তারপর আবার নীরবতা। কিন্তু হঠাৎ করেই সেই দোকানের সামনের স্টিলের শাটারটা উঠে যায়। একটা ঝাঁপ খুলছে, আর তাতেই তার…
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Sohini Das The car stopped in front of the rusted gates of Windmere Lodge with a hiss, steam rising faintly from the bonnet like breath on a cold mirror. Devika Rao stepped out, pulling her shawl tighter around her shoulders. Mussoorie in late October was crueler than she’d expected. The sun had vanished behind a sheet of dull grey clouds, and even the pine trees looked like shadows painted against a darkening canvas. She looked up at the lodge — a two-storied colonial building half-swallowed by ivy and memory. The windows were arched, curtained in velvet too heavy for the…
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राजेश कुमार दास 2094 की वह शाम बाकी शामों से अलग थी। सूरज का अस्तित्व अब प्रतीकात्मक रह गया था—आकाश में केवल राखी धुंध थी और हवा में जलती हुई धातु की गंध। गंगा के घाट सूख चुके थे, हिमालय की बर्फ पिघल चुकी थी, और समुद्रों ने अपनी सीमाएँ लांघ दी थीं। भारत समेत सम्पूर्ण पृथ्वी अब जीवन के योग्य नहीं रही थी। वैश्विक वैज्ञानिक परिषदों, जलवायु आयोगों और पृथ्वी बचाओ संगठनों ने वर्षों तक चेतावनी दी थी, लेकिन देर हो चुकी थी। अब एक ही विकल्प बचा था—पृथ्वी 2.0। भारत ने “सम्भव-1” नामक इंटरप्लैनेटरी मिशन की योजना वर्षों…
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Ishaan Talwar Part 1: The First Note The first time Aryan strummed his guitar on the old green bench outside the Fine Arts Block, the sun was melting into the Delhi skyline and the air smelled of samosas from the canteen. He wasn’t playing for anyone. He never did. But someone was always listening. That evening, it was Tara—the girl with the nose ring and the journal full of angry poetry. She was standing near the rusted railing, scribbling something when his chords cut through the dusk like the beginning of something they didn’t yet know was coming. He looked…
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Ashmita Khan Part 1: The Debate The air-conditioning inside the NDTV studio was just enough to keep nerves hidden under silk and suit fabric. Aarushi Singh adjusted the collar of her rust-red handloom kurta, her fingers lightly grazing the gold brooch that bore her father’s party symbol—two clasped hands in a rising sun. It wasn’t just decoration. It was legacy. Across from her sat Ishaan Rizvi, crisp in a blue blazer, his notes neatly stacked, untouched. He didn’t need them. He never did. His reputation as the Opposition’s silent strategist had made him a reluctant star of the night’s “Youth…
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ঋত্বিক বসু ১ শীতকাল তখন ঠিক জমে ওঠেনি, তবে পাহাড়ি হাওয়ায় একটা ঝাঁঝালো ঠান্ডা সকাল নিয়ে হাজির হয়েছিল অভিষেক দাশগুপ্ত। দার্জিলিঙের চৌরস্তা থেকে আরও পঁচিশ কিলোমিটার উপরের দিকে, ছোট্ট একটা পাহাড়ি গ্রাম — ‘চাংথাং’। কেউ শোনেনি শহরে এই গ্রামের নাম, আর যারা শুনেছে, তারা এটাকে এড়িয়ে গেছে বছরের পর বছর। অভিষেক কিন্তু ইচ্ছা করেই এখানে এসেছে। কলকাতার এক নামী বিশ্ববিদ্যালয়ে ইতিহাসের অধ্যাপক, বিশেষজ্ঞ লোকজ বিশ্বাস ও লোকশ্রুতি নিয়ে। উত্তরবঙ্গের গা ছমছমে প্রাচীন গল্প-গাথা নিয়ে একটা গবেষণাপত্রের কাজ চলছে তার। এই চাংথাং গ্রামের কথা সে প্রথম শুনেছিল একটি অজানা তিব্বতি চিঠিতে, যেটা পাওয়া গিয়েছিল সিকিম সীমান্তের এক পুরনো গুহায়, সঙ্গে একটা…
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পূর্ণেন্দু রায় (১) হ্যাঁ, এই শহরটা বদলে গেছে। অথবা বদলে যায়নি কিছুই—শুধু সময়ের ফ্রেম বদলেছে, চোখের লেন্স বদলে গেছে। কলকাতা বিমানবন্দরের গ্লাস দরজার ওপার থেকে যখন বাইরে পা রাখল অরিত্র, ঠিক তখনই গায়ে লেগে গেল এক অদ্ভুত গন্ধ—একটুও রুমালসুলভ নয়, বরং ধুলো, জল, গরমের পরশ আর ভিজে বাসনের মত পুরনো দিনের এক গন্ধ। কাস্টমস আর ইমিগ্রেশন পার হতে হতেই মুখভরা ক্লান্তি, কিন্তু বাইরের আলোয় এসে দাঁড়াতেই সে যেন হঠাৎ চুপ করে যায়। মনে পড়ে যায় শৈশবের শেষ পুজোটার কথা, যখন সে মায়ের গলা জড়িয়ে কাঁদছিল কানাডা যাওয়ার আগে। আজ এত বছর পর সেই মাটিতে আবার পা রেখেছে—যার গন্ধ সে ভুলে…
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कविता मेहरा भाग १ दिल्ली की सर्द सुबहें हमेशा कुछ छुपाए रखती हैं। कोहरे में लिपटी इमारतें, सड़क किनारे चाय की दुकानों से उठती भाप, और नेताओं की कारों के काफ़िले—इन सबके बीच कुछ ऐसा भी चलता है जो दिखाई नहीं देता, पर असर छोड़ता है। साउथ ब्लॉक के पीछे एक पुरानी बिल्डिंग है—’शंकर निवास’—जहाँ कभी एक मंत्री का परिवार रहता था, पर अब वहाँ रहस्यों की परछाइयाँ घूमती हैं। नेहा वर्मा, एक तेज़-तर्रार पत्रकार, ‘नव भारत आज’ चैनल की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर है। ३२ साल की नेहा राजनीति की गलियों में सच खोजने की आदी हो चुकी थी। उसका काम…