रहस्य कहानियाँ
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बीबी का मक़बरा: अधूरी मोहब्बत का ख़ून
रागिनी शुक्ला १ औरंगाबाद की सर्द रात की हवा में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जैसे इतिहास की परतों में दबी कोई अनकही दास्तान सांस रोके खड़ी हो। बीबी का मक़बरा अपने जमे हुए सौंदर्य के साथ अंधेरे में भी चमक रहा था, उसकी संगमरमर की दीवारों पर चाँदनी बिखरी हुई थी और…
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काली चट्टान का रहस्य
शिवांगी तिवारी 1 मुंबई से लगभग 40 किलोमीटर दूर, समंदर के किनारे एक छोटा-सा गांव है—रॉकविले। यह गांव शहर की चकाचौंध से दूर है, लेकिन वहां की सबसे खास और डरावनी चीज़ है—’काली चट्टान’। हर शाम समंदर के बीचोंबीच उस काली चट्टान पर एक अजीब-सा नीला उजाला दिखाई देता है। कोई नहीं जानता वो रोशनी…
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सीलन की दीवार
अनुज वर्मा दिल्ली की उमस भरी गर्मी की दोपहर में नेहा शर्मा जब पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से होकर उस हवेली की तरफ़ बढ़ी, तो उसके दिल में हल्का-सा डर और अजीब-सी उत्सुकता एक साथ उभर आई। हवेली का नाम उसने कई बार सुना था, अख़बारों में उसकी तस्वीरें भी देखी थीं, पर सामने…
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शिवमंदिर के पीछे
शिवानंद पाठक कोल्हापुर की घाटियों से गुजरती जीप धूल उड़ाते हुए चिखली गाँव की सीमा में प्रवेश कर रही थी। जीप में बैठे वेदांत त्रिपाठी खिड़की से बाहर झाँकते हुए मंदिर की मीनार की झलक पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। वे भारत सरकार के पुरातत्व विभाग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी थे और इस अभियान…
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अंधेरे की परछाइयाँ
विवेक यादव १ दिल्ली की हल्की सर्दियों की उस सुबह अर्जुन सिंह की आंखें अलार्म घड़ी की कानफाड़ू आवाज़ से खुलीं, पर दिलो-दिमाग में जो बेचैनी थी, वह किसी अलार्म से नहीं जागी थी। अपने छोटे से किराये के फ्लैट में अर्जुन ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा—सुबह के सात बजने वाले थे।…
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रामलाल का भूतिया स्कूटर
सुभाष मिश्र रामलाल फतेहपुर कस्बे की एक तंग गली में रहने वाला एक साधारण आदमी था। उम्र कोई पैंतालीस के आसपास, चेहरे पर झुर्रियों की कुछ रेखाएँ जो हर सुबह के संघर्ष और हर शाम की थकान की गवाही देती थीं। पेशे से वह नगरपालिका दफ्तर में एक लिपिक था, और महीने की पहली तारीख…
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सांकलों के पीछे
अर्चित रस्तोगी भाग १ चौक बाज़ार की पुरानी सड़कें जब रात के अंधेरे में चुप हो जाती हैं, तब भी एक जगह है जहाँ हलचल बनी रहती है—चौधरियों की हवेली। लोगों का कहना है कि उस हवेली के भीतर से आधी रात के बाद ज़ंजीरों की खनक सुनाई देती है। कोई कहता है बंधी हुई…
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अधूरी तस्वीर
असिम बर्मा वाराणसी की उस पुरानी गली में जहां मकान सड़ चुके थे, दीवारें सीलन से भरी थीं और खिड़कियों से झाँकता धूप भी मानो थक हार कर लौट जाना चाहती थी, वहीं एक मोड़ पर खड़ा था वह मकान, जो न तो पूरी तरह खंडहर था, न ही पूरी तरह जीवित। मकान नंबर ३२।…
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रात की आहट
विवेक मिश्रा शाम के साढ़े पांच बजे का वक्त था। आसमान धीरे-धीरे नारंगी से जामुनी होता जा रहा था। धूप की आखिरी किरणें गांव के पुराने पीपल के पेड़ों से छनकर मिट्टी पर पड़ रही थीं, और कहीं-कहीं से झींगुरों की आवाज़ें हवा में घुलने लगी थीं। यही वो वक़्त था जब रवि अपनी मोटरसाइकिल…
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कुंभ के मेले में खोया
अनिरुद्ध त्रिपाठी जनवरी की ठंडी सुबह थी। कुंभ मेले का शोर हर दिशा में गूंज रहा था — गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम तट पर आस्था और भक्ति की एक अलग ही दुनिया बसी थी। साधु-संतों की आवाज़ें, ढोल-नगाड़ों की थाप, मंत्रों की गूंज और दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का उत्साह — सबकुछ मानो…
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परछाई की साजिश
अध्याय 1: आगमन वाराणसी, प्राचीनता की जीवित परिभाषा। गंगा की गोद में बसी यह नगरी, समय के प्रवाह में भी स्थिर जान पड़ती है — जैसे हर पत्थर, हर मोड़, हर गली ने सदियों की कहानियाँ अपने भीतर समेट रखी हों। सुबह की आरती, शाम की गूंजती घंटियाँ, घाटों पर बैठे साधु, और तंग गलियों…











