पवन कुमार शाह
इलाहाबाद शहर की तंग गलियों के बीचोंबीच बसा हुआ वह पुराना डाकघर बरसों से अपनी जगह पर वैसे ही खड़ा था जैसे समय ने उसे भुला दिया हो। चारों ओर से छिल चुकी पपड़ी वाली दीवारें, जंग खाए लोहे के गेट और मकड़ी के जालों से भरे छज्जे इस इमारत की थकान का प्रमाण थे। सर्दियों की उस धुंधली सुबह में डाकघर की हवा भी किसी अजनबी बेचैनी से भरी हुई लग रही थी। पोस्टमास्टर हरीश चतुर्वेदी अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या में डूबे हुए थे—कभी पुराने रजिस्टर पर झुकी आंखें, कभी डाकियों को निर्देश देने का स्वर, और कभी खाँसते हुए चाय की प्याली उठाना। वह अपने जीवन की गिनती के दिनों को शांतिपूर्वक गुज़ार रहे थे क्योंकि सेवानिवृत्ति बस कुछ ही महीनों दूर थी। तभी डाकियों के ढेर से एक लिफ़ाफ़ा उनके सामने आकर रुक गया, बिल्कुल वैसे जैसे किसी अनजाने हाथ ने उसे चुनकर उन तक पहुंचा दिया हो। हरीश की नज़रें उस लिफ़ाफ़े पर टिक गईं—उस पर न तो भेजने वाले का नाम था, न पाने वाले का पता। केवल हल्के भूरे कागज़ पर फैले लाल धब्बे थे, जो देखने में ऐसे लग रहे थे मानो किसी ने जानबूझकर उस पर खून की छींटें मारी हों।
पहले तो उन्होंने सोचा कि यह किसी बच्चे की शरारत होगी, या फिर किसी ने डाकघर के बाहर सड़क पर घायल होने के बाद गलती से यह पत्र डाल दिया होगा। उनके अनुभव ने उन्हें सिखा दिया था कि हर अजीब चीज़ का कोई न कोई साधारण कारण होता है। मगर जैसे-जैसे उनकी आंखें उन धब्बों पर जमीं, उनकी रीढ़ की हड्डी में ठंडक दौड़ गई। वह लिफ़ाफ़ा अपने हाथों में लेकर देर तक घूरते रहे। उनके सामने बैठे पुराने सहायक ने मज़ाक में कहा—“लगता है किसी आशिक़ ने अपना दिल निकालकर खत लिख दिया है।” लेकिन हरीश के होंठों पर मुस्कान तक न आई। उन्हें भीतर से महसूस हो रहा था कि यह कोई साधारण मज़ाक नहीं। धीरे-धीरे उन्होंने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। कागज़ बाहर निकलते ही पूरे कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पसर गई। कागज़ मोटा और खुरदुरा था, और उस पर लिखे अक्षर स्पष्ट रूप से खून से बनाए गए थे। स्याही के बजाय लाल गाढ़ा रंग, जिसकी गंध अभी भी कागज़ से उठ रही थी, कमरे की हवा में घुलकर सबको असहज कर रही थी।
ख़त पढ़ते हुए हरीश की सांसें अटक गईं। उसमें लिखा था कि अगले हफ़्ते एक हत्या होने वाली है—हत्या किसकी और कैसे, यह सब विस्तार से दर्ज था। किसी स्थान का नक्शा, समय का उल्लेख और उस वक्त का पूरा प्लान। ऐसा लग रहा था मानो कोई मास्टरमाइंड अपने अपराध की पटकथा पहले ही किसी को बताकर खेल खेलना चाहता हो। हरीश ने आंखें मलीं और कई बार शब्दों को दोहराकर पढ़ा। उनके लिए यह यकीन करना कठिन था कि उनके हाथ में ऐसा खत है, जो किसी की आने वाली मौत की घोषणा कर रहा है। उनके भीतर का डर धीरे-धीरे घबराहट में बदल रहा था। एक ओर उन्हें लगा कि शायद यह किसी पागल की हरकत हो, लेकिन दूसरी ओर उनके अनुभव ने फुसफुसाकर कहा कि ऐसे खत कभी व्यर्थ नहीं होते। अगर यह सच निकला तो आने वाले दिनों में उनका शहर खून से नहा सकता है।
कमरे में मौजूद डाकियों की नजरें अब उसी कागज़ पर थीं। हर चेहरा सवालों से भरा हुआ, लेकिन बोलने की हिम्मत किसी में न थी। बाहर से आती गाड़ियों की आवाज़, कबूतरों की फड़फड़ाहट और दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी। हरीश ने खत को अपनी मेज़ पर रखा और गहरी सांस ली। उन्होंने तय किया कि इसे तुरंत पुलिस तक पहुंचाना चाहिए, लेकिन दिल के किसी कोने में एक डर ने उन्हें जकड़ लिया—अगर यह खत सच हुआ तो वह इस रहस्य के पहले गवाह बन चुके हैं, और अगर किसी ने इन्हें देख लिया तो शायद वे खुद भी खतरे में पड़ जाएँ। उनकी आंखें धुंधली पड़ने लगीं, माथे पर पसीना छलक आया। वह जानते थे कि आज का दिन उनके साधारण जीवन का हिस्सा नहीं रहेगा। यह लिफ़ाफ़ा उनके जीवन का सबसे डरावना अध्याय खोल चुका था। इलाहाबाद का यह पुराना डाकघर अब केवल चिट्ठियों का अड्डा नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे रहस्य का ठिकाना बन चुका था जो आने वाले हफ़्ते में पूरे शहर को हिला देगा।
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इलाहाबाद पुलिस मुख्यालय की उस सुबह की बैठक में माहौल सामान्य से कहीं अधिक गंभीर था। कमरे की दीवारों पर टंगी पुरानी फ़ाइलों और नोटिसों से भरे बोर्ड के बीच बैठे इंस्पेक्टर अरुण सिंह को जब यह मामला सौंपा गया, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के फ़ाइल उठाई। 38 वर्षीय अरुण अपने विभाग में ईमानदार और हठी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक गम्भीरता रहती, जैसे हर बात का गहराई से विश्लेषण कर रहे हों। वे जानते थे कि विभाग की राजनीति, नेताओं की सिफ़ारिशें और ऊपरी दबाव हमेशा उनके काम में अड़चन डालते हैं, लेकिन उनका विश्वास था कि सच और न्याय को ढूँढने का एकमात्र रास्ता पूरी लगन से जांच करना है। उन्हें जब पोस्टमास्टर हरीश चतुर्वेदी द्वारा मिले उस खून से लिखे ख़त के बारे में बताया गया, तो उनके दिमाग़ में तुरंत सवालों की कतार लग गई—क्या यह ख़त वाकई असली है, या फिर किसी का बीमार मज़ाक? अगर असली है, तो यह किसी अपराध की पूर्व-घोषणा है, और यदि नकली है, तो किस मक़सद से इतनी खौफ़नाक चाल चली गई है?
फ़ाइल के काग़ज़ों पर नज़र डालते हुए अरुण ने गहरी सांस ली। ख़त की तस्वीरें, पोस्टमास्टर का बयान और शुरुआती रिपोर्ट सब उनके सामने थीं। उन्होंने तुरंत ही तय किया कि वह इस मामले को रूटीन केस की तरह नहीं, बल्कि शहर की सुरक्षा से जुड़ी आपात स्थिति की तरह देखेंगे। उनका पहला कदम था खुद उस पुराने डाकघर का निरीक्षण करना। जब वे वहाँ पहुँचे, तो धूल और जाले से ढकी इमारत ने उन्हें अजीब-सा सन्नाटा महसूस कराया। हरीश चतुर्वेदी उनके सामने हल्के से झुके और डरते-डरते पूरी बात दोहराई। अरुण ने उनके चेहरे की झुर्रियों और काँपते हाथों को गौर से देखा। अनुभव से वे समझ चुके थे कि बूढ़ा पोस्टमास्टर कोई झूठ गढ़ने वाला आदमी नहीं है, लेकिन इतना डरपोक ज़रूर है कि अगर दबाव पड़ा तो सच्चाई छुपा भी सकता है। उन्होंने खून से लिखे उस खत को सावधानी से अपने दस्ताने पहने हाथों में लिया और सूंघकर देखा। लोहे की गंध साफ़ बता रही थी कि यह स्याही नहीं बल्कि खून है। उनकी आंखें गहरी हो गईं। अब यह मामला किसी मज़ाक का नहीं, बल्कि एक आने वाली त्रासदी का संकेत था।
डाकघर से बाहर निकलते ही अरुण ने अपने दो विश्वसनीय कॉन्स्टेबलों को आदेश दिया कि इलाके के आसपास सीसीटीवी फुटेज और गवाहों की तलाश की जाए। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी, वहां से उन्हें आदेश मिला कि “इस मामले को ज़्यादा तूल मत दो, पहले सत्यता जाँचो।” यही राजनीति का बोझ था जो हर ईमानदार पुलिसकर्मी पर चढ़ा रहता। अरुण जानते थे कि उनके अफ़सर चाहेंगे कि अगर यह मामला महज़ अफवाह निकले तो चुपचाप दबा दिया जाए, ताकि किसी को शर्मिंदगी न उठानी पड़े। लेकिन उनका ज़मीर उन्हें यह स्वीकार करने नहीं देता। वे बार-बार सोचते रहे कि अगर यह खत सच निकला और हत्या हो गई, तो क्या उनकी चुप्पी निर्दोष खून की ज़िम्मेदार नहीं होगी? उसी रात अरुण ने अपनी लाल डायरी में लिखा—“ख़त झूठा हो सकता है, लेकिन सच मानकर जांच न करना सबसे बड़ा अपराध होगा।” यही उनकी जिद थी जिसने उन्हें और गहराई में धकेला।
आने वाले दिनों में अरुण की जिज्ञासा और बढ़ती गई। उन्होंने खत के हर शब्द का विश्लेषण किया, उसमें इस्तेमाल लेखनी की रफ़्तार, लिखावट का दबाव और खून के धब्बों का फैलाव तक देखा। उनके अनुभव ने उन्हें बताया कि लिखने वाला कोई साधारण इंसान नहीं था, बल्कि बहुत ठंडे दिमाग़ से यह सब लिखा गया था। उन्हें लगने लगा कि यह किसी ‘मास्टर प्लान’ का हिस्सा है, जिसमें पुलिस को पहले से संदेश भेजकर डर और असमंजस में डालना शामिल है। सवाल यह था कि किसे चेतावनी दी जा रही है—पुलिस को, शिकार को, या पूरे शहर को? अरुण अब इस केस को महज़ फ़र्ज़ी समझकर छोड़ नहीं सकते थे। उनके लिए यह एक व्यक्तिगत चुनौती बन चुकी थी। उनके दिल की गहराई में कहीं यह अहसास था कि इलाहाबाद का यह केस उनके करियर की दिशा तय करेगा। चाहे विभाग दबाव बनाए, नेता नाराज़ हों, या अपराधी उन्हें फँसाने की कोशिश करें—वे अब पीछे हटने वाले नहीं थे। यही सोचकर उन्होंने उस रात थाने में अकेले बैठकर फैसला किया—“इस खत का सच, चाहे जितना गहरा हो, मैं उसे ढूँढ निकालूँगा। हत्या होगी या नहीं, यह रहस्य अब मेरी जिम्मेदारी है।”
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इलाहाबाद के बीचोंबीच स्थित छोटे-से न्यूज़ ऑफिस की खिड़की पर जब सुबह की पहली धूप ने दस्तक दी, तब तक अंजलि वर्मा अपनी डेस्क पर झुकी कलम चला रही थी। वह शहर की जानी-मानी क्राइम रिपोर्टर थी, जिसकी तेज़ नज़रें और सूंघने की क्षमता पुलिस से भी कहीं आगे मानी जाती थी। उसके बाल अक्सर बंधे नहीं रहते, चेहरे पर थकान की लकीरें रहतीं, और नोटबुक हमेशा उसके साथ रहती थी। जैसे ही उसे अपने एक स्रोत से खबर मिली कि पुराने डाकघर में खून से लिखा कोई अजीबो-ग़रीब ख़त मिला है, उसकी रगों में रोमांच की लहर दौड़ गई। ऐसे केस उसके लिए सिर्फ़ खबर नहीं, बल्कि जुनून होते थे। उसने तुरंत ही फोन उठाकर अपने पुराने संपर्कों से बातचीत शुरू की—किसी ने बताया कि पुलिस इसे गंभीरता से ले रही है, तो किसी ने इसे मज़ाक कहकर टाल दिया। लेकिन अंजलि के अनुभव ने तुरंत उसे कह दिया कि जहाँ पुलिस “मज़ाक” कह रही है, वहीं सबसे बड़ा सच छुपा होता है। उसने अपने बैग में कैमरा, नोटबुक और रिकॉर्डर रखा और सीधे डाकघर की ओर निकल पड़ी।
डाकघर पहुँचकर उसने देखा कि वहाँ पुलिस की हल्की हलचल है। इंस्पेक्टर अरुण सिंह बाहर खड़े होकर किसी कॉन्स्टेबल से बात कर रहे थे। अंजलि उन्हें दूर से जानती थी—ईमानदारी और जिद के लिए मशहूर, लेकिन मीडिया से दूरी बनाए रखने वाले। उसने पहले दरवाज़े से भीतर झाँककर माहौल का अंदाज़ा लिया। पोस्टमास्टर हरीश चतुर्वेदी किसी तरह अपने काँपते हाथों को रोकने की कोशिश कर रहे थे और लगातार इधर-उधर देख रहे थे। अंजलि को तभी एहसास हुआ कि मामला वाकई बड़ा है। वह जानती थी कि अगर उसे सच पाना है तो उसे पुलिस की आधिकारिक रिपोर्ट का इंतज़ार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी खोजबीन पर भरोसा करना होगा। उसने अपनी चिर-परिचित चपलता से एक पुराने डाकिये से बात शुरू की, कुछ रुपए और ढेर सारी बातों के बाद उसे यह पता चला कि ख़त में जिस हत्या का जिक्र है, उसका सीधा संबंध एक नाम से है—राघव मेहरोत्रा। यह नाम सुनते ही अंजलि का चेहरा बदल गया। उसकी आंखों में कुछ पल के लिए अतीत की छाया उतर आई।
राघव मेहरोत्रा—इलाहाबाद का नामचीन वकील, जिसकी गिनती शहर के सबसे प्रभावशाली लोगों में होती थी। बाहर से वह एक नेकदिल समाजसेवी की छवि बनाए रहता, मगर अंजलि जानती थी कि उसके सफ़ेद कपड़ों के नीचे कई काले धब्बे छुपे हैं। अंजलि का कॉलेज का दौर उसके नाम से जुड़ा हुआ था—कभी वह राघव की बहन सुष्मिता की घनिष्ठ मित्र रही थी, और उन्हीं दिनों उसने कई बार राघव को पास से देखा था। तब भी उसमें एक ठंडी चालाकी झलकती थी, और समय के साथ वह चालाकी सत्ता में बदल चुकी थी। अंजलि ने सोचा कि यह संयोग नहीं हो सकता कि जिस वकील के बारे में वह पहले से शंकित थी, उसी का नाम इस खून से लिखे खत में सामने आ रहा है। सवाल यह था—क्या राघव शिकार बनने वाला है, या यह सब उसकी ही रची हुई साजिश है? अंजलि के मन में अनगिनत प्रश्न उठने लगे। उसे महसूस हुआ कि इस केस में उसकी भूमिका अब सिर्फ़ रिपोर्टर की नहीं, बल्कि किसी ऐसी इंसान की है जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ चुकी है।
उस रात जब वह अपने छोटे-से फ्लैट में लौटी, तो लंबे समय तक खिड़की से बाहर झांकती रही। उसकी मेज़ पर खत की कॉपी, डाकघर के नोट्स और राघव की पुरानी तस्वीरें बिखरी हुई थीं। उसके मन में अतीत और वर्तमान टकरा रहे थे। पत्रकार के नाते उसे सच लिखना था, लेकिन एक दोस्त और इंसान के नाते वह जानती थी कि यह कहानी उसकी आत्मा को झकझोर सकती है। अगर राघव सचमुच हत्या का निशाना है, तो क्या वह उसे बचाने की कोशिश करेगी? और अगर वह खुद इस साजिश का खिलाड़ी है, तो क्या वह उसे बेनक़ाब करने की हिम्मत रखेगी? अंजलि की कलम थम गई थी। उसके सामने केवल एक ही रास्ता था—इस रहस्य की गहराई तक जाना। क्योंकि वह जान चुकी थी कि यह सिर्फ़ एक खबर नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी रिपोर्ट बनने वाली है। और शायद, उसके अतीत का हिसाब चुकाने का एक मौक़ा भी।
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पुराना डाकघर गाँव के चौक से थोड़ा हटकर, पीपल के पेड़ की छाया में बना हुआ था। लाल ईंटों से बनी इमारत अब समय की मार झेलकर पीली पड़ चुकी थी और दीवारों पर झाड़-झंखाड़ चढ़ आए थे। अरुण और अंजलि जब उसके सामने पहुँचे, तो वहाँ पसरी हुई वीरानी में एक अजीब-सी बेचैनी थी, मानो दीवारें खुद किसी राज़ को छुपाए बैठी हों। बरामदे में पड़ी टूटी लकड़ी की बेंच और जंग लगे लोहे के गेट से साफ झलकता था कि वर्षों से इस जगह को किसी ने गंभीरता से इस्तेमाल नहीं किया। दरवाज़ा खोलने पर भीतर हल्की-सी सीलन और पुराने काग़ज़ की गंध फैली, जैसे समय ने यहाँ अपनी साँसें रोक दी हों। हरीश चतुर्वेदी, जो अब इस डाकघर का देखरेख करने वाला था, पहले से वहाँ मौजूद मिला। उसने दोनों का स्वागत तो किया, मगर उसकी आँखों की घबराहट और चेहरे पर चढ़ी कृत्रिम मुस्कान से साफ झलक रहा था कि उनके आने से वह सहज नहीं था। वह बार-बार बात बदलने की कोशिश करता, कभी झाड़ू उठाकर कोने में धूल झाड़ने लगता, तो कभी पुराने दराज़ों को बिना कारण खोलकर देखने का बहाना करता। अंजलि ने एक पैनी नज़र से सबकुछ देख लिया, जबकि अरुण सीधे सवाल करने में यक़ीन रखता था। जब अरुण ने पूछा कि यह डाकघर इतने लंबे समय तक बंद क्यों रहा, हरीश ने टालते हुए कहा—“बस काम कम हो गया था… लोग चिट्ठियाँ लिखना छोड़ गए।” उसकी आवाज़ में ऐसी हिचकिचाहट थी कि दोनों समझ गए, यहाँ कोई गहरी बात छुपी है।
जैसे-जैसे वे भीतर बढ़े, उन्हें डाकघर के भीतर अलग-अलग हिस्सों में बंटे कमरे दिखाई दिए। एक तरफ़ लोहे की अलमारियाँ थीं, जिनमें पुराने रजिस्टर और पत्रों के बंडल रखे थे। धूल और मकड़ी के जालों से भरे इन काग़ज़ों को देखकर लगता था कि वर्षों से इन्हें किसी ने छुआ तक नहीं। अचानक अंजलि की नज़र एक बंद कमरे पर पड़ी। उस कमरे का ताला नया और मज़बूत था, जबकि बाकी जगह सब टूटा-फूटा था। यह विरोधाभास उसकी जिज्ञासा को और बढ़ा गया। उसने सीधे हरीश से पूछा—“इस कमरे में क्या है?” हरीश एक पल को चौंका और बोला—“कुछ ख़ास नहीं… बस पुराने सामान पड़े हैं।” लेकिन उसके हाथों की उँगलियों का कांपना और माथे पर पसीने की बूंदें उसकी झूठ की पोल खोल रहे थे। अरुण ने दरवाज़े को गौर से देखा, वहाँ ताले के नीचे कई बार खोले-बंद किए जाने के निशान थे। इसका मतलब साफ़ था कि यह कमरा हाल-फिलहाल भी इस्तेमाल हो रहा है। अंजलि ने अरुण को इशारे से चुप कराया और भीतर बाकी सामान देखने का दिखावा करने लगी। तभी एक कोने में पड़े पत्रों के ढेर ने उनका ध्यान खींचा। पत्रों पर तारीखें पुराने ज़माने की थीं, लेकिन उनमें से कुछ लिफ़ाफ़े एक जैसे काले रंग के मोम से सील किए गए थे। अंजलि ने एक लिफ़ाफ़ा उठाया, जिस पर कोई पता नहीं लिखा था, केवल अजीब-सी आकृति बनी थी—मानो किसी गुप्त संगठन का चिह्न हो।
अरुण और अंजलि ने जब उन पत्रों को गौर से देखा, तो उनमें साधारण भाषा की जगह कोड में लिखे गए संदेश थे। कुछ अक्षर बार-बार दोहराए गए थे, कुछ प्रतीक किसी गुप्त भाषा की तरह थे। यह देखकर अंजलि का माथा ठनका। उसे याद आया कि इतिहास की किताबों में उसने पढ़ा था कि आज़ादी की लड़ाई के दिनों में कई छोटे गाँवों और कस्बों के डाकघर गुप्त संदेशों के अड्डे हुआ करते थे। हो सकता है यह वही जगह हो, जहाँ से क्रांतिकारी आपस में संदेशों का आदान-प्रदान करते रहे हों। यह सोचकर उसकी रगों में रोमांच दौड़ गया। लेकिन सवाल यह था कि इतने वर्षों बाद भी यह कमरा बंद क्यों रखा गया है और हरीश इसे छुपाने की कोशिश क्यों कर रहा है। तभी हरीश अचानक उनके पास आया और बोला—“देखिए, इन पुराने कागज़ों में कुछ नहीं रखा। बस बेमतलब की चीज़ें हैं। आप चाहें तो बाहर चलें, यहाँ बहुत धूल है।” उसकी आवाज़ में ऐसी जल्दी थी मानो वह उन्हें वहाँ से हटाना चाहता हो। लेकिन अरुण अब चुप रहने वाला नहीं था। उसने साफ़ कहा—“हरीश जी, सच बोलिए। यह डाकघर कभी सिर्फ चिट्ठियाँ पहुँचाने की जगह नहीं था। यहाँ कुछ और भी चलता था, और आप उसे जानते हैं।” यह सुनते ही हरीश बुरी तरह घबरा गया। उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं, मानो कोई उसे देख रहा हो।
धीरे-धीरे हरीश की आवाज़ काँपने लगी। उसने अनमने ढंग से कहा—“आप लोग नहीं जानते… इस डाकघर में ऐसी बातें छुपी हैं जिनके बारे में बोलना मना है। पुराने ज़माने में यहाँ सिर्फ चिट्ठियाँ नहीं, बल्कि गुप्त संदेश भेजे जाते थे। कई बड़े लोग इसमें शामिल थे। आज भी कुछ लोग चाहते हैं कि यह रहस्य बाहर न आए।” उसकी बात सुनकर अरुण और अंजलि के रोंगटे खड़े हो गए। अब यह साफ़ था कि ताले लगे कमरे और उन काले मोम से सील किए गए पत्रों का संबंध किसी गहरे रहस्य से है। हरीश ने और कुछ कहने से मना कर दिया, मगर उसकी आँखों में डर साफ झलक रहा था। अरुण और अंजलि समझ गए कि यह रहस्य बहुत पुराना है, लेकिन इसके धागे अब भी किसी अदृश्य शक्ति से बँधे हुए हैं। बाहर निकलते समय जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो डाकघर की दीवारें और भी रहस्यमयी लग रही थीं—जैसे वे अब भी बीते दिनों की फुसफुसाहटें समेटे बैठी हों। दोनों ने तय किया कि इस रहस्य की तह तक जाना ही होगा, क्योंकि यह केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान से भी गहराई से जुड़ा हुआ राज़ हो सकता है।
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लालू पानवाला उस छोटे कस्बे का पुराना चेहरा था, जिसके बिना चौक अधूरा लगता था। उसका पान का खोखा सड़क के उस मोड़ पर था, जहां से डाकघर साफ दिखाई देता था। रात-दिन लोगों की चहल-पहल, पुलिस की गाड़ियाँ, रिक्शों की घंटियाँ और गपशप का सिलसिला—सब कुछ उसकी आँखों के सामने से गुजरता। इसीलिए जब चोरी और रहस्यमयी घटनाओं का मामला तूल पकड़ने लगा, तो पुलिस ने उसी की ओर देखा। इंस्पेक्टर वर्मा और कांस्टेबल शंकर देर शाम लालू के खोखे पर पहुँचे। लालू पहले तो घबराया, लेकिन फिर अपनी लाल आँखों और चेहरे पर फैली अजीब मुस्कान के साथ बोला—“साहब, मैंने कुछ-कुछ देखा है। लेकिन जो मैंने देखा वो सबको हिला देगा।” पुलिसवालों ने उसके इशारे पर ध्यान दिया और उसे बैठाकर विस्तार से पूछताछ शुरू की। लालू ने बीड़ी सुलगाई, धुआं छोड़ते हुए धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया—“डाकघर के बाहर रात को अक्सर सन्नाटा रहता है, लेकिन पिछले महीने कई रातें मैंने अजीब छायाएँ देखी हैं। कोई-कोई आदमी देर रात आता-जाता था। कभी लगता जैसे दरवाज़े के पास ठहर गया हो, कभी लगता जैसे खिड़की से झाँक रहा हो।”
लालू की बात सुनकर इंस्पेक्टर वर्मा की भौंहें तन गईं। उसने पूछा—“कौन था वो? पहचान सका तू?” लालू ने बड़ी चालाकी से जवाब टाल दिया—“साहब, पूरी तरह पहचान नहीं पाया। अंधेरा होता है न, छाया लंबी दिखती है। लेकिन इतना कह सकता हूँ कि अकेला आदमी था, दुबला-पतला, और उसके हाथ में हमेशा एक बोरी जैसी चीज़ रहती थी। मैंने सोचा शायद मजदूर होगा, लेकिन मजदूर रात को डाकघर क्यों आएगा?” वर्मा ने नोट किया, शंकर ने भी उसे घूरा। दरअसल लालू सब कुछ सच नहीं बता रहा था। उसने कई बार उस छाया वाले आदमी को डाकघर के पास रुककर इधर-उधर टटोलते देखा था, लेकिन पुलिस से डर और खुद के फायदे के लिए उसने आधी बात छुपा ली। लालू जानता था कि सच बताने पर वो खुद भी शक के घेरे में आ सकता है। इसलिए उसने अपनी गवाही में केवल उतना ही बताया जिससे पुलिस का ध्यान किसी “संदिग्ध” छाया पर टिक जाए। उसने यह भी जोड़ा कि कई बार उसे लगा जैसे वो आदमी दरवाज़े पर ताला खोलने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जैसे ही कोई गाड़ी या राहगीर आता, वो भाग जाता। लालू ने कसम खाकर कहा कि जो कुछ देखा वही कह रहा है, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान और आँखों की चमक साफ बता रही थी कि अभी बहुत कुछ छुपा हुआ है।
पुलिस ने लालू की बातों को गंभीरता से लिया। कस्बे में अफवाहें और फैल गईं—“लालू ने रात में भूत जैसी छाया देखी है” कोई कहता, तो कोई जोड़ता—“नहीं-नहीं, जरूर चोरों का गिरोह डाकघर पर नजर गड़ाए बैठा है।” पुलिस को पहली बार कोई ठोस सुराग मिला था। वर्मा ने सोचा कि लालू ने जो बताया, उसके आधार पर रात में गश्त बढ़ाई जाएगी। शंकर ने सुझाव दिया कि शायद लालू को पैसे का लालच देकर और जानकारी निकाली जा सकती है, क्योंकि वह हर चीज़ को अपनी कमाई से जोड़कर देखता था। इंस्पेक्टर ने लालू को कुछ रुपये थमाए और चेतावनी दी—“देख लालू, अगर कुछ और पता चले तो तुरंत बताना। वरना तुझे ही अंदर कर देंगे।” लालू ने मुस्कुराकर नोट अपनी जेब में डाल लिए और सिर हिलाया। लेकिन जैसे ही पुलिसवाले चले गए, उसने धीरे से अपने होंठ चाटे और मन ही मन बुदबुदाया—“साहबों को सब बता दूँ तो खेल खराब हो जाएगा। अभी वक्त आने दो।” उसके इस अजीब आत्मविश्वास ने इशारा किया कि लालू केवल गवाह ही नहीं, कहीं न कहीं कहानी का हिस्सा भी है।
उस रात चौक पर हलचल बढ़ गई। लोग लालू के पास इकट्ठा होकर बार-बार वही सवाल पूछते—“कौन था वो आदमी? कैसा दिखता था?” और लालू हर किसी को अलग-अलग जवाब देता। किसी को कहता आदमी लंगड़ाता था, किसी को कहता लंबा सा कोट पहनता था, तो किसी को कहता उसका चेहरा कभी साफ नहीं दिखा। उसकी हर बात से रहस्य और गहराता गया। लेकिन असलियत यह थी कि लालू ने उस छाया वाले व्यक्ति का चेहरा एक बार देखा था। वह कस्बे का ही एक आदमी था, जो अक्सर डाकघर के पास चक्कर लगाता था। लालू ने उसे पहचान भी लिया था, लेकिन पुलिस को नाम नहीं बताया। शायद वह किसी सौदे की प्रतीक्षा कर रहा था, या शायद उस रहस्यमयी आदमी से उसका कोई पुराना हिसाब बाकी था। लालू का लालच और डर दोनों उसके अंदर टकरा रहे थे। पुलिस को तो बस “एक संदिग्ध छाया” का सुराग मिला, लेकिन असली सच्चाई अब भी लालू की नज़र और उसके बंद होंठों के पीछे कैद थी। यही छुपा हुआ सच आने वाले दिनों में पूरे कस्बे को हिलाकर रख देने वाला था।
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राघव मेहरोत्रा की ज़िंदगी हमेशा से रहस्यों के पर्दों में ढकी रही थी। शहर की अदालतों में उसकी पहचान एक नेकदिल और ईमानदार वकील की थी, जो गरीबों और बेबसों के लिए मुफ्त केस लड़ता था, जो समाजसेवा की आड़ में अक्सर समाचारों की सुर्खियों में आता था। अख़बारों में उसकी तस्वीरें मुस्कराती हुई छपती थीं—अनाथ बच्चों के साथ, अस्पताल में दान देते हुए, या किसी वृद्धाश्रम में खाना परोसते हुए। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे का आदमी कोई और ही था। धीरे-धीरे उन परतों का खुलना शुरू हुआ जब उसके क्लाइंट्स की लिस्ट पर गहरी नज़र डाली गई। वही राघव, जो समाज का मसीहा बना घूमता था, असल में शहर के कई नामी अपराधियों का कानूनी सहारा था। ड्रग माफिया से लेकर रियल एस्टेट के गोरखधंधों तक, राजनेताओं से लेकर हथियारों के दलालों तक—उसके क्लाइंट्स की सूची एक ऐसे जाल को उजागर करती थी जो इस शहर की नींव तक हिला सकता था। सवाल उठने लगा कि यह नेकदिल वकील किसके लिए काम कर रहा है—सचमुच इंसाफ़ के लिए, या सिर्फ़ उन ताक़तवरों के लिए जिन्होंने अदालत को खेल बना रखा है।
धीरे-धीरे उसके नकली आवरण में दरारें नज़र आने लगीं। अदालत में उसके तर्क कितने भी मज़बूत हों, अब लोग कानाफूसी करने लगे थे कि उसकी जीत इंसाफ़ की वजह से नहीं, बल्कि उसकी चालाकी और धंधे की गंदी कमाई की वजह से है। मीडिया में उसकी दोहरी छवि को लेकर बहस छिड़ गई—क्या वह सच्चा समाजसेवी है या अपराध जगत का हथियार? रात को जब वह अपने आलीशान बंगले की बालकनी में बैठकर सिगार पीता, तो उसके चेहरे पर वह संतुष्टि नहीं होती जो अख़बारों की तस्वीरों में दिखती थी। उसके भीतर का राघव बेचैन था। शायद इसलिए कि उसके सबसे क़रीबी दुश्मन भी अब दोस्त का मुखौटा पहनकर उसके पास बैठे थे। कुछ ऐसे केस जिनमें उसने अपराधियों को बचाया, अब उन्हीं अपराधियों के सिर पर मौत मंडरा रही थी। कहीं न कहीं यह शक भी उठने लगा कि उन हत्याओं की कड़ी उसी तक जाकर रुकती है। क्या वह खुद शिकार बनने वाला है, या वह ही इस पूरे खेल का सूत्रधार है?
जैसे-जैसे परतें खुलती गईं, शहर का विश्वास उससे डगमगाने लगा। अदालत में उसके हर तर्क को अब शक की नज़र से देखा जाने लगा। उसके सहयोगी भी अब पीछे हटने लगे। मीडिया की रिपोर्ट्स ने उसकी छवि को पूरी तरह हिला दिया था। लेकिन राघव इन सबके बावजूद शांत और संयमित बना रहा। उसकी चालें इतनी सधी हुई थीं कि कोई भी सीधे-सीधे उसके खिलाफ़ सबूत पेश नहीं कर पा रहा था। जब उससे किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या वह अपराधियों का वकील बनकर समाज के साथ ग़द्दारी कर रहा है, तो उसने मुस्कराकर जवाब दिया—“वकील का काम किसी का पक्ष लेना नहीं, कानून का पक्ष लेना है। अगर कानून उन्हें बचाता है, तो मैं सिर्फ़ कानून का पालन कर रहा हूँ।” उसके इस जवाब ने बहस को और गहरा कर दिया। मगर दिलचस्प बात यह थी कि जितना वह खुलकर सामने आता गया, उतना ही उसका रहस्य और गहराता गया। अब लोगों के मन में सिर्फ़ एक ही सवाल गूंज रहा था—क्या अगली हत्या उसी की होगी, या यह सब उसकी ही बनाई हुई चाल है?
रात के अंधेरे में जब वह अपनी कार से अकेले निकलता, तो सड़कों पर उसकी छवि किसी शिकारी की तरह लगती। उसके फोन कॉल्स रहस्यमयी हो गए थे, और अक्सर देर रात तक कोई अनजान नंबर उसे कॉल करता जिसे वह कुछ ही शब्दों में निपटा देता। उसकी डायरी में लिखे नोट्स इशारा करते थे कि वह सिर्फ़ अदालत का वकील नहीं बल्कि इस पूरे खेल का निर्देशक हो सकता है। फिर भी, कोई सबूत ऐसा नहीं था जो उसकी गुनाहों की पोल खोल सके। धीरे-धीरे उसके आसपास खतरे का घेरा कसने लगा। विरोधी वकील, पत्रकार, यहां तक कि उसके अपने क्लाइंट्स भी अब उस पर शक करने लगे थे। ऐसा लग रहा था जैसे यह शतरंज की बिसात पर राघव सबसे बड़ा खिलाड़ी भी था और सबसे बड़ा मोहरा भी। और यहीं से अध्याय का असली मोड़ आता है—राघव मेहरोत्रा की असली पहचान अब खुलने ही वाली है, लेकिन सवाल यह है कि वह खुद गिरकर सच्चाई उजागर करेगा, या किसी और को गिराकर अपनी गद्दी बचा लेगा।
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डाकघर की पुरानी इमारत में जैसे ही एक और लिफ़ाफ़ा बरामद हुआ, पूरा माहौल अचानक भारी और बेचैन हो उठा। डाकपाल ने डरते-डरते उस ख़ून से लिखे कागज़ को बाहर निकाला और तुरंत पुलिस को खबर दी। अरुण और अंजलि वहाँ पहुँचते ही समझ गए कि यह कोई साधारण चिट्ठी नहीं है। पहली नज़र में ही उसमें खून के धब्बे ताज़ा दिखाई दे रहे थे, और उन पर से उठती लोहे जैसी गंध पूरे कमरे में फैल गई थी। कागज़ पर टेढ़े-मेढ़े शब्दों में लिखा था—“अगली तारीख़ बदल गई है, और अब खेल और भी बड़ा होगा। अगर पुलिस ने बीच में आने की कोशिश की, तो मौतों की गिनती बढ़ जाएगी।” इस एक पंक्ति ने पूरे मामले की दिशा बदल दी। पहले अरुण और अंजलि को लगा था कि यह किसी सनकी हत्यारे का खेल है जो तारीख़ें तय करके डर फैलाना चाहता है, लेकिन अब साफ़ हो गया था कि इसके पीछे एक संगठित दिमाग़ और गहरी साज़िश छुपी हुई है। कमरे में मौजूद पुलिसकर्मी और डाकघर के कर्मचारी एक-दूसरे को आशंकित नज़रों से देख रहे थे, मानो सभी को अचानक यह एहसास हो गया हो कि उनका अपना शहर अब किसी अदृश्य शिकारी के शिकंजे में है।
अरुण ने ख़त को ध्यान से पढ़ा और उसमें छुपे अर्थ को समझने की कोशिश की। तारीख़ बदलने का मतलब था कि अपराधी न सिर्फ़ अपनी योजना के साथ खेल रहा है बल्कि पुलिस की रणनीति को भी चुनौती दे रहा है। यह मनोवैज्ञानिक दबाव डालने का एक तरीका था ताकि हर कोई असमंजस में रहे। अंजलि ने धीरे से कहा—“यह इंसान हमें डराकर अपने इशारों पर नचाना चाहता है। वह जानता है कि हम पहली हत्या की तारीख़ पर निगरानी बढ़ाने वाले थे, इसलिए उसने इसे बदल दिया। अब वह चाहता है कि हम असुरक्षा और उलझन में पड़ जाएँ।” अरुण ने उसकी बात पर सहमति में सिर हिलाया और जोड़ा—“लेकिन असली ख़तरा सिर्फ़ तारीख़ बदलने में नहीं है। इस बार उसने साफ़ शब्दों में लिखा है कि अगर हमने हस्तक्षेप किया तो मौतें बढ़ जाएँगी। यानी यह सिर्फ़ एक अकेली हत्या का मामला नहीं है, बल्कि कहीं बड़ी चाल चल रही है।” यह सोचकर दोनों के माथे पर पसीना छलक आया। वे जानते थे कि अगर यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो शहर जल्द ही खौफ़ और खामोशी की गिरफ्त में डूब जाएगा।
उस रात अरुण और अंजलि देर तक बैठकर चिट्ठी का विश्लेषण करते रहे। अंजलि ने सुझाव दिया कि शायद ख़ून से लिखने का उद्देश्य सिर्फ़ डर पैदा करना नहीं, बल्कि पुलिस को यह जताना है कि हत्यारा हर बार अपने शिकार के खून से ही संदेश लिखता है। इसका मतलब हुआ कि यह दूसरा ख़त मिलने तक एक और शिकार हो चुका है—लेकिन सवाल यह था कि वह शिकार कौन है और पुलिस को अभी तक इसकी खबर क्यों नहीं मिली? अरुण को यह संभावना सुनकर अंदर तक झटका लगा। उन्होंने तुरंत अगले दिन की अख़बारों, गुमशुदगी की रिपोर्टों और अस्पतालों के रिकॉर्ड खंगालने का प्लान बनाया। वहीं अंजलि का मन लगातार इस बात पर अटका रहा कि इस हत्यारे को पुलिस की हर चाल की जानकारी कैसे मिल रही है। क्या पुलिस विभाग में ही कोई मुखबिर है जो उसे सूचनाएँ पहुँचा रहा है? या फिर अपराधी इतना चालाक है कि वह उनके हर कदम की पहले से भविष्यवाणी कर लेता है? दोनों सवाल खतरनाक थे, और दोनों के जवाब शहर के लिए घातक साबित हो सकते थे।
आधी रात बीत चुकी थी जब अंजलि ने एक और डरावना निष्कर्ष निकाला। उसने धीरे से कहा—“अरुण, अगर यह सिर्फ़ हत्या नहीं बल्कि कोई बड़ी साज़िश है, तो हमें यह समझना होगा कि असली मक़सद क्या है। यह कोई पागल आदमी नहीं है जो यूँ ही मार रहा हो। इसके पीछे या तो बदला है, या फिर कोई संदेश जो पूरे समाज को देना चाहता है। और सबसे खतरनाक स्थिति यह होगी अगर इसका मक़सद शहर को अराजकता में धकेलना हो।” अरुण ने उसकी आँखों में देखा और गंभीर स्वर में बोला—“तुम सही कह रही हो। यह खेल अब हमारी सोच से कहीं बड़ा है। हमें यह भी मानकर चलना होगा कि अगली हत्या की तारीख़ सिर्फ़ भ्रम फैलाने के लिए है, असली वार तो किसी और समय और किसी और जगह पर होगा।” यह एहसास होते ही दोनों को भीतर तक झुरझुरी महसूस हुई। दूसरा ख़त उनके लिए सिर्फ़ चेतावनी नहीं था, बल्कि एक ऐसा दरवाज़ा था जो उन्हें उस अंधेरी सुरंग में खींच रहा था, जहाँ से लौटना आसान नहीं होगा। अब यह मामला उनके करियर की चुनौती से कहीं बढ़कर शहर की ज़िंदगी और मौत का सवाल बन चुका था।
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शहर का माहौल दिन-ब-दिन भारी होता जा रहा था। अख़बारों और चैनलों पर लगातार हेडलाइन बन रही थी कि “अंधेरे का शिकारी” अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर है। अफ़वाहों का ऐसा जाल फैल चुका था कि लोग रात को घरों से बाहर निकलने में कतराने लगे थे। इसी बीच, राघव—जिसे पुलिस ने कुछ अहम गवाहियों के आधार पर निगरानी में रखा था—पर एक सुनियोजित हमला होता है। वह उस रात कोर्ट से लौट रहा था जब अचानक एक तेज़ रफ्तार गाड़ी ने उसे टक्कर मारने की कोशिश की। किसी चमत्कार की तरह राघव बच गया, लेकिन उसकी आंखों में उस गाड़ी के शीशे के पीछे छुपे चेहरे की एक झलक दर्ज हो चुकी थी। पुलिस ने इसे महज़ एक हादसा मानकर जांच आगे बढ़ाई, मगर अरुण के लिए यह साफ था कि कोई चाहता है राघव सच तक न पहुँच पाए। इस हमले ने शहर के लोगों के मन में और भी डर पैदा कर दिया—अब ये मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक खेल बन चुका था जिसमें शिकार और शिकारी के बीच की रेखा धुंधली हो रही थी।
उधर लालू अचानक कहीं ग़ायब हो गया। मोहल्ले में उसके बारे में तरह-तरह की बातें उठने लगीं—किसी ने कहा पुलिस ने उसे दबोच लिया है, किसी ने कहा कि वह सच छुपाने के डर से कहीं भाग गया है। लेकिन अरुण को शक था कि लालू का गायब होना किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा है। लालू भले ही एक छोटा गुंडा था, मगर उसके पास कई रहस्य थे जो इस केस को खोल सकते थे। अंजलि, जो लगातार अपनी रिपोर्टिंग के कारण पुलिस और अपराधियों दोनों के निशाने पर थी, अब और भी उलझन में थी। एक तरफ उसका प्रोफेशनल कर्तव्य था कि वह हर सच सामने लाए, दूसरी तरफ उसका निजी जीवन बिखर रहा था। देर रात घर लौटने पर उसका परिवार सवाल करता, मगर उसे जवाब देने की हिम्मत नहीं होती। मोबाइल पर लगातार अनजान नंबर से कॉल आते, जिनमें सिर्फ़ खामोशी होती। अंजलि समझ चुकी थी कि उसे डराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन उसने चुप्पी तोड़ने के बजाय अपने काम पर और ध्यान देना शुरू किया—शायद यही उसकी सबसे बड़ी गलती साबित होने वाली थी।
अरुण की जांच अब एक मोड़ पर थी। उसने देखा कि केस में बार-बार ऐसे सुराग मिलते हैं जो बाद में झूठे साबित हो जाते हैं। यह महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता था—कोई पुलिस को जान-बूझकर ग़लत दिशा में घुमा रहा था। हर बयान, हर सबूत, हर गवाह किसी न किसी तरह से जांच को भटकाता। उसे यह एहसास होने लगा कि असली अपराधी बेहद चालाक है और वह पुलिस के हर कदम से वाक़िफ़ है। अरुण को लगने लगा कि इस शिकारी ने न सिर्फ़ शहर को, बल्कि पुलिस की व्यवस्था को भी अपने खेल का हिस्सा बना लिया है। अब यह केस व्यक्तिगत होता जा रहा था, क्योंकि अरुण समझ चुका था कि वह और उसकी टीम भी इस अदृश्य शिकारी के निशाने पर हैं। यह एक शतरंज की बिसात थी, और हर मोहरा बिना जाने ही हिलाया जा रहा था। लेकिन सवाल यही था—क्या अरुण शिकारी है या वह भी एक अनजान शिकार बन चुका है?
रात गहराते ही शहर और भी सन्नाटे में डूब जाता। सड़क के कोनों पर लगी लाइटें धुंधली छाया डालतीं और हर छाया जैसे किसी कहानी की गवाही देती। राघव अपने कमरे में बंद होकर बेचैनी से सिगरेट पीता, लालू की तलाश में पुलिस की गाड़ियां गलियों में घूमतीं, और अंजलि अपनी डेस्क पर बैठकर नोट्स लिखते-लिखते खिड़की से बाहर अंधेरे को ताकती। इन तीनों की ज़िंदगी अब एक ही धागे से बंध चुकी थी—एक ऐसे शिकारी से, जो कहीं छिपा बैठा था और उनके हर कदम पर नज़र रख रहा था। अरुण को साफ दिख रहा था कि खेल का असली मक़सद किसी को मारना नहीं, बल्कि सबको डराना है—डर की पकड़ में बांधकर सच्चाई से दूर ले जाना। लेकिन इस अंधेरे के खेल में, शिकारी और शिकार दोनों को एक ही सवाल परेशान कर रहा था—अगला निशाना कौन होगा?
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हरीश चतुर्वेदी का चेहरा पीला पड़ चुका था, उसकी आंखों में पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और होंठ काँप रहे थे। अरुण ने उसे बार-बार शांत रहने को कहा, लेकिन भीतर से हरीश इतना टूट चुका था कि शब्द गले से फूट रहे थे जैसे कोई बांध अचानक टूट जाए। वह धीरे-धीरे बताने लगा कि कई साल पहले, इसी पुराने डाकघर से जुड़ा एक ऐसा खौफनाक सच था जिसे दबाने के लिए कई लोगों ने मिलकर षड्यंत्र रचा था। एक हत्या हुई थी—नाजुक और निर्दोष जान की हत्या, जिसे “दुर्घटना” बताकर पुलिस ने फाइल बंद कर दी थी। लेकिन असलियत यह थी कि उस वक्त के कुछ ताकतवर लोग, जिनमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और नगर परिषद का नेता शामिल था, अपने फायदे के लिए इस अपराध को दबा गए। हरीश ने बताया कि वह उन चंद गवाहों में से एक था, जिसने उस रात खून के धब्बे और शव को डाकघर की गाड़ी से बाहर जाते देखा था। वह डरा हुआ था, चुप रहा, और बाद में अफसरों ने उसे पैसा और डर दोनों देकर इस राज़ को छिपाने पर मजबूर किया। सालों से यह बोझ उसके भीतर दबा हुआ था, लेकिन अब यह रहस्यमयी लेखक, जो पत्रों में अतीत की परतें उघाड़ रहा था, उसकी नींद और चैन छीन चुका था।
अरुण ध्यान से हर शब्द सुन रहा था। उसकी आँखों के सामने एक नई तस्वीर उभर रही थी—यह मामला किसी साधारण मनोविक्षिप्त व्यक्ति का खेल नहीं था, बल्कि एक लंबे समय से छिपे हुए अपराध का परिणाम था। वह समझ गया कि इस खेल में न केवल शिकार और कातिल शामिल थे, बल्कि पुलिस भी इस गंदे जाल का हिस्सा रही थी। पत्रों में लिखी हर पंक्ति अब उसे एक गहरे घाव की चीख लग रही थी, जिसे समाज ने अनदेखा कर दिया था। “तुम्हें अब क्यों लगा कि सब कुछ बताना चाहिए?” अरुण ने हरीश से पूछा। हरीश ने भारी सांस लेते हुए कहा, “क्योंकि अब मैं उस लेखक की छाया हर जगह देखता हूँ। वह सिर्फ मुझे नहीं, बल्कि हम सबको, उन सबको जिन्होंने कभी सच को दबाया था, सजा दिलाना चाहता है। मैंने सोचा अगर सच उगल दूँ तो शायद मेरी आत्मा का बोझ हल्का हो जाएगा।” उसकी आवाज में एक टूटे हुए इंसान की कराह थी। कमरे का माहौल इतना भारी हो चुका था कि दीवारों पर लटकती घड़ी की टिक-टिक भी किसी कब्र की घंटी जैसी लग रही थी।
अरुण के भीतर सवालों का तूफ़ान उठ रहा था। अगर यह सब सच है, तो उस समय की पुलिस रिपोर्टें क्यों खामोश हैं? क्या वास्तव में ऊपर तक सब मिला हुआ था? और यह रहस्यमयी लेखक कौन हो सकता है? कोई प्रतिशोधी आत्मा? या वही बच्चा/परिजन, जो उस हत्या में अपना कोई खो चुका था? हर संभावना अरुण को और गहरे अंधेरे में धकेल रही थी। उसने महसूस किया कि अब वह खुद भी इस खेल का हिस्सा बन चुका है—एक ऐसा मोहरा जो शायद सच्चाई तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उसे याद आया कि लेखक ने शुरू से ही अपने पत्रों में इशारे दिए थे कि “खेल अभी अधूरा है।” यह अधूरापन अब साफ हो रहा था—सच की दरारें खुल चुकी थीं और उनके पीछे का अंधेरा पूरे शहर को निगलने के लिए तैयार था। अरुण ने तय किया कि अब वह सीधे इस पुराने केस की फाइल खंगालेगा, चाहे इसके लिए उसे उन ताकतवर नामों से टकराना क्यों न पड़े, जिनकी परछाइयाँ अभी भी शहर पर राज कर रही थीं।
हरीश ने कांपते हाथों से पानी का गिलास उठाया और बमुश्किल पी पाया। उसने कहा, “अरुण, यह मामला तुझसे भी बड़ा है। अगर तूने इसमें हाथ डाला, तो वे तुझे कभी जिंदा नहीं छोड़ेंगे।” लेकिन अरुण की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि एक ठंडी दृढ़ता झलक रही थी। उसने शांत स्वर में कहा, “सच चाहे जितना पुराना हो, उसकी गंध दबाई नहीं जा सकती। अगर यह लेखक हिसाब मांग रहा है, तो किसी को तो उसका जवाब देना होगा।” उसी क्षण कमरे की खिड़की से आती हवा अचानक तेज हो गई और कागज़ के कुछ पन्ने उड़कर फर्श पर बिखर गए। उन पर पुराने, पीले पड़ चुके कुछ समाचार की कतरनें थीं—शीर्षक में लिखा था: “डाकघर कर्मचारी की रहस्यमयी मौत—पुलिस ने बताया दुर्घटना।” अरुण ने उन कटिंग्स को उठाया और एक लंबी सांस ली। उसे लगा कि अब यह सिर्फ एक केस नहीं रहा, यह उस अनसुने इंसाफ़ की लड़ाई बन चुका था, जो वर्षों से चुप्पी की जेल में कैद था। सच की दरारें अब खुल चुकी थीं, और उनमें से निकलती चीखें अरुण के भीतर गूंज रही थीं।
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रात की हवा में एक अजीब सी नमी थी, मानो पूरे शहर ने अपनी सांसें रोक रखी हों। अरुण और अंजलि तेज़ क़दमों से उस पुराने हवेलीनुमा घर की ओर बढ़ रहे थे, जहां आज सब कुछ तय होना था। चारों ओर सन्नाटा पसरा था, सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ और कभी-कभार कुत्तों के भौंकने की गूँज सुनाई दे रही थी। अंधेरे में वह घर और भी डरावना लग रहा था, जैसे अपनी दीवारों के भीतर सदियों के रहस्यों को कैद किए बैठा हो। अंजलि के चेहरे पर तनाव साफ़ झलक रहा था, पर उसकी आँखों में वही जिजीविषा भी थी जो अरुण ने पहले दिन नोटिस की थी—यह मामला सिर्फ़ एक हत्या को रोकने का नहीं था, बल्कि उन परतों को हटाने का था जो सालों से सच को ढके हुए थीं। दरवाज़ा धक्का देने पर खुद-ब-खुद चरमराते हुए खुला और एक भारी-सी सर्द हवा उनके सामने आकर खड़ी हो गई। अंदर हर चीज़ धूल से ढकी हुई थी, दीवारों पर लगी तस्वीरें टेढ़ी हो चुकी थीं, और फर्श पर गिरा टूटा हुआ झूमर किसी पुराने हादसे की गवाही दे रहा था। अरुण ने धीमे स्वर में कहा—“यहीं खत्म होगा सब।”
अंदर घुसते ही उन्हें वो खत याद आए जो लगातार उन्हें मिलते रहे थे—खून से लिखे गए डरावने शब्द, जिनमें किसी अनकहे बदले की चीख़ छुपी होती थी। अरुण ने अपनी जेब से आख़िरी खत निकाला जो उसी शाम उन्हें मिला था। उस पर लिखा था—“अंतिम परदा यहीं गिरेगा, और आज सच किसी न किसी की जान लेकर ही सामने आएगा।” अंजलि ने खत को गौर से देखा और कहा—“यह वही लिख सकता है जो सब कुछ जानता है, जो हर पल हमें देखता रहा है।” तभी अचानक ऊपर की मंज़िल से कदमों की आहट गूँजी। अरुण और अंजलि ने एक-दूसरे को देखा और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। हर कदम भारी होता जा रहा था, मानो दीवारें भी उन्हें रोकने की कोशिश कर रही हों। ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला है और अंदर से मोमबत्ती की हल्की लौ टिमटिमा रही है। अरुण ने धीरे से दरवाज़ा धकेला। अंदर वही शख़्स खड़ा था—सालों से जिसे सब नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे, वही इंसान जिसे किसी ने कभी शक की नज़रों से नहीं देखा था। उसका चेहरा शांत था लेकिन आँखों में भयानक आग जल रही थी।
वह व्यक्ति धीरे-धीरे उनकी ओर मुड़ा और ठंडी आवाज़ में बोला—“तुम सबको सच सुनना था ना? तो सुनो… ये खत मैं ही लिख रहा था। हर शब्द, हर लकीर उस दर्द से भरी थी जिसे मैंने सालों तक दबाकर रखा। तुम सबने उसे अनदेखा किया, उस ज़ुल्म को भुला दिया जो मेरे परिवार पर हुआ था। लेकिन मैं कैसे भूल जाता? मैंने तय किया कि ये खेल वहीं खत्म होगा जहां से शुरू हुआ था।” उसकी आवाज़ में एक अजीब संतुलन था, जैसे बदले की आग ने उसे पागलपन के बजाय एक दृढ़ संकल्प से भर दिया हो। उसने बताया कि जिस हत्या को सब रोकने की कोशिश कर रहे थे, वह असल में न्याय की मांग थी—उस अन्याय के खिलाफ़ जिसने कभी किसी की ज़िंदगी छीन ली थी और समाज ने उसे चुपचाप ढक दिया था। अंजलि की सांसें तेज़ हो गईं। उसे लगा जैसे उसके सामने खड़ा व्यक्ति सिर्फ़ इंसान नहीं बल्कि उन सबकी आवाज़ है जिन्हें सालों से दबाया गया, जिनके दर्द पर कभी किसी ने कान नहीं धरे। अरुण ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—“बदले से सिर्फ़ खून की लकीरें बनती हैं, न्याय कानून से मिलता है।” मगर वह शख़्स हँस पड़ा, एक कड़वी हँसी जो कमरे की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “कानून? जिसने मुझे कभी कुछ नहीं दिया? जो सिर्फ़ ताक़तवरों का साथी बना रहा? मेरा न्याय मुझे खुद लेना पड़ा।”
कमरे का वातावरण भारी होता गया। मोमबत्ती की लौ तेज़ी से कांप रही थी, जैसे वह भी इस टकराव का गवाह बनना चाहती हो। अरुण और अंजलि समझ चुके थे कि अब सब कुछ साफ़ हो गया है—यह कहानी सिर्फ़ हत्या रोकने की नहीं थी, बल्कि उन जख्मों को उजागर करने की थी जिन्हें समाज ने वर्षों तक ढक कर रखा। यह आदमी हत्यारा होने के बावजूद पीड़ित भी था, और यही इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना थी। अचानक उसने अपनी जेब से चाकू निकाला और कहा—“आज रात या तो मैं जीतूंगा, या सब कुछ हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।” अरुण ने तुरंत आगे बढ़कर उसे रोकने की कोशिश की, अंजलि ने भी साहस जुटाकर कदम बढ़ाया। झड़प शुरू हुई, कमरे की पुरानी खिड़की टूट गई और बाहर की हवा अंदर भर आई। मोमबत्ती बुझ गई और सब कुछ अंधेरे में डूब गया। सिर्फ़ आवाज़ें गूँज रही थीं—संघर्ष की, आंसुओं की, और उस दर्द की जो अब चुप नहीं रहना चाहता था। जब आखिरकार सब शांत हुआ तो साफ़ था कि अंतिम परदा गिर चुका है। किसी ने जीत हासिल नहीं की थी, बल्कि सच ने अपना रास्ता बना लिया था। और वही सच इस पूरी कहानी का असली नायक बनकर सामने आया था।
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