तृषा मिश्रा
१
दिल्ली की भीड़भाड़ और धूल-धक्कड़ भरी गलियों से निकलकर जब डॉ. वेदिका माथुर उत्तर प्रदेश के उस सुदूर गाँव ‘बड़ागाँव’ पहुँची, तो सुबह के आठ बजे थे। बस स्टैंड पर बस ने झटके से ब्रेक लगाया था और साथ बैठे ग्रामीणों की बातचीत एक पल को थम गई थी। हाथ में जंग खाया लोहे का सूटकेस और कंधे पर लैपटॉप बैग लटकाए वेदिका जब उतरी, तो गाँव की गलियों ने उसका स्वागत सन्नाटे से किया। उसका उद्देश्य सीधा था—इस गाँव के मंदिर के पास रखे लोहे के एक रहस्यमयी पिंजरे के बारे में जानना, जिसके बारे में लोककथाएँ कहती थीं कि उसमें एक चुड़ैल की आत्मा कैद है। उसने अपनी थीसिस के लिए पहले ही एक महीना गाँव में रहने की अनुमति ले ली थी, और प्रधान रामस्वरूप ठाकुर ने अनिच्छा से ही सही, पर सरकारी आदेश के आगे सिर झुका दिया था। गाँव के स्कूल के अध्यापक गौरव सिंह ने उसे मंदिर तक पहुँचाने का वादा किया था, और जब वह उसे लेने आया, तो उसकी आँखों में स्पष्ट संशय और भय झलक रहा था।
मंदिर गाँव के उत्तर कोने पर स्थित था—खेतों के पार, एक पुराना, टूटा-फूटा मार्ग, जो बरसात के दिनों में कीचड़ से भर जाता था। रास्ते में गौरव ने कहा था, “डॉक्टर साहिबा, वो पिंजरा…वो बस कहानी नहीं है। कई साल पहले जब एक बाबा ने उसे छूने की कोशिश की थी, तो तीन दिन बाद उसकी देह कुएँ से मिली थी—आँखें बाहर निकली हुईं, जैसे कुछ अंदर से देख रहा हो।” वेदिका ने हँसते हुए उसका मज़ाक उड़ाया था, “मृत्यु भय और मनोविकृति के साथ मिल जाए, तो ऐसे ही किस्से जन्म लेते हैं।” लेकिन जब वह मंदिर पहुँची, तो उसके सामने खड़ा वह जंग लगा पिंजरा, जिसकी सलाखों पर राख और सूखी नींबू-मिर्च की माला लटक रही थी, उसके मन के अंदर कहीं एक सिहरन पैदा कर गया। पिंजरे में कोई नहीं था—पर फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे किसी की आँखें भीतर से घूर रही हों। उसने अपने कैमरे से कई एंगल से तस्वीरें लीं, नोट्स बनाए, और ध्यान नहीं दिया कि मंदिर की दीवारों पर बनी पुरानी चित्रकथाएँ धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही थीं, मानो वर्षों की नींद से कोई जाग रहा हो।
अगले दिन गाँव में खबर फैली कि बिट्टो—गाँव की 16 साल की लड़की, जो पिछली शाम तक वेदिका से कह रही थी कि वह भी “दिल्ली पढ़ने” जाना चाहती है—मंदिर के पीछे एक बबूल के पेड़ पर झूलती मिली। चेहरा काला पड़ चुका था, होंठों से खून टपक रहा था और उसके पैरों के नीचे मिट्टी में जले हुए कुछ नींबू और टूटी चूड़ियाँ पड़ी थीं। वेदिका का मन दहल गया, लेकिन वह अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटी। उसने गाँव वालों से बात करनी चाही, लेकिन सबने या तो मुँह फेर लिया या सीधे कह दिया, “तूने पिंजरा छुआ, अब सजा आएगी।” गौरव, जो पहले तर्क करता था, अब खुद मंदिर के सामने दिए जलाकर माथा टेकने लगा। रात में वेदिका को नींद नहीं आई। उसकी खिड़की के बाहर कोई हल्की-सी खराश कर रहा था, और जब उसने झाँका, तो उसे लगा कि एक औरत की परछाई खड़ी है—लंबे खुले बाल, लाल साड़ी, और आँखें…ठंडी, धधकती हुई आँखें, जैसे किसी ने उसमें सदियों की पीड़ा बंद कर रखी हो। हवा में एक गंध तैर रही थी—जली हुई चूड़ियों और नींबू की। पिंजरा खाली था, पर अब उस गाँव में हर घर के भीतर एक नया पिंजरा बन रहा था—डर का पिंजरा, जिसमें एक-एक करके सभी कैद होने वाले थे।
२
सुबह होते ही गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा रहा, जैसे हर घर ने अपनी साँसें रोक रखी हों। बिट्टो की मौत ने पूरे गाँव को हिला दिया था, लेकिन सबसे ज़्यादा विचलित थी वेदिका। उसने सारी रात आँखों में काटी थी—पलकों के पीछे लाल साड़ी में लिपटी उस छाया का चेहरा बार-बार उभरता रहा। वह समझ नहीं पा रही थी कि ये केवल मानसिक भ्रम था या वास्तव में कोई अदृश्य शक्ति उसके आस-पास है। उसने अपने शोध नोट्स को फिर से देखा—पिंजरे की उत्पत्ति, माधवी नाम की उस औरत का ज़िक्र, जिसे दो सौ साल पहले गाँव की औरतों के गर्भपात और फसलों के सूखने के लिए दोषी ठहराकर उसी लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया गया था। गाँव के पुजारी, पंडित घनश्याम बाबा ने तब उसे मंदिर के बाहर कैद करने का सुझाव दिया था, ताकि उसका “अशुभ स्पर्श” कभी मंदिर की पवित्रता को न छुए। उसे ज़िंदा जला दिया गया था। और अब, दो सौ साल बाद, उसकी कहानी केवल किताबों तक सीमित नहीं रही थी।
गाँव के एकमात्र बुजुर्ग, शिब्बू काका, जो अक्सर पेड़ के नीचे बैठकर बड़बड़ाते रहते थे, आज पहली बार वेदिका से सीधे बोले। “तूने उसे देख लिया है, अब वो तुझे देख रही है,” उन्होंने कांपते हुए कहा। “माधवी को जब जिंदा जलाया गया था, तब उसने कसम खाई थी कि जिस दिन पिंजरे की साँकल खुलेगी, वह बेटियों की माँगों से सिंदूर चुरा लेगी।” वेदिका को यह सब पागलपन लगा, पर शिब्बू काका ने उसे एक पुराना ताम्रपत्र दिया, जिसमें उस रात की कथा खुदी हुई थी—माधवी को पिंजरे में बंद करने से पहले गाँव की चार ब्राह्मण औरतों ने उसके चेहरे पर नींबू घिसा था, उसके बालों में राख भरी गई थी और उसकी ज़ुबान काट दी गई थी ताकि वह मरते समय शाप न दे सके। पर शायद वे असफल रहे। वेदिका के सामने अब दो रास्ते थे—या तो सब कुछ बकवास मानकर लौट जाए, या वह सच्चाई का सामना करे। उसने दूसरा रास्ता चुना। उसी शाम वह फिर मंदिर के पास गई, कैमरे और एक माचिस की डिबिया लेकर। और जब उसने पिंजरे की मिट्टी खोदनी शुरू की, तो उसमें से राख, चूड़ी के टुकड़े और एक सूखी हुई, बँधी हुई चोटी निकल आई।
अगली सुबह गाँव में फिर से कोहराम मच गया। पंडित घनश्याम बाबा का पोता, जो रात को गाय चराने गया था, लौटकर नहीं आया। मंदिर के पीछे की दीवार पर किसी ने राख से एक आकृति बनाई थी—एक औरत की आकृति, जिसके बाल पिंजरे से बाहर निकलते दिखाए गए थे। पास ही एक नींबू पड़ा था, जिसमें चार कीलें ठुकी थीं। वेदिका अब डर और जिज्ञासा के उस बिंदु पर पहुँच चुकी थी, जहाँ से पीछे लौटना नामुमकिन था। गौरव अब उससे दूर रहने लगा था, गाँव वाले उसकी परछाई से भी घबरा रहे थे। लेकिन वेदिका ने तय कर लिया था—वह माधवी की कहानी पूरी तरह समझे बिना नहीं जाएगी। और शायद…माधवी भी यही चाहती थी।
३
मंदिर के पीछे पड़ी राख, नींबू और वह बँधी हुई सूखी चोटी अब वेदिका के कमरे में थीं—काले रंग के प्लास्टिक बॉक्स में बंद, उसकी रिसर्च डायरी के साथ। उसने सोचा था कि सबूत इकट्ठा करना एक अकादमिक प्रक्रिया होगी, लेकिन अब जब हर वस्तु से एक अजीब-सी गंध उठती थी और कमरे की हवा भारी लगने लगती थी, तब उसे अहसास हुआ कि यह कोई सामान्य अध्ययन नहीं रह गया है। रात होते ही उस कमरे में कुछ बदलने लगता था। दीवार पर एक हल्की छाया उभरती थी, जो स्थिर नहीं रहती—कभी दायीं ओर खिसकती, कभी बायीं। खिड़की के पर्दे हिलते नहीं थे, फिर भी हवा चलती रहती थी। तीसरी रात जब उसने नींद की गोलियाँ लेने की कोशिश की, तो उसकी टेबल पर रखे गिलास का पानी खुद-ब-खुद उलट गया—और उसकी डायरी की उस पृष्ठ को भिगो गया, जिसमें माधवी की कहानी लिखी थी।
गाँव अब सन्नाटे में डूब चुका था। लोगों ने अपने दरवाज़ों पर नीम की पत्तियाँ और राख की रेखाएँ खींचनी शुरू कर दी थीं। महिलाओं ने लाल रंग पहनना बंद कर दिया था, और मंदिर में पूजा रोक दी गई थी। वेदिका को अकेली देखकर बच्चे रोने लगते थे, और बड़ों की आँखों में अब डर के साथ-साथ घृणा भी थी। केवल शिब्बू काका ही कभी-कभार बातें करते थे, और अब उन्होंने बताया कि माधवी वास्तव में कोई साधारण स्त्री नहीं थी—वह वनदेवी की उपासक थी, औषधियों और जड़ी-बूटियों की जानकार। जब गाँव में बार-बार स्त्रियाँ गर्भ गिरा रहीं थीं और बच्चे मर रहे थे, तब पंडित और प्रधान ने इसका दोष माधवी पर डाल दिया। उसकी शक्ति को काला जादू बताया गया, और लोगों ने उसे दानवीणि ठहरा दिया। “सच को जब झूठ के पिंजरे में बंद किया जाता है, तब वह आत्मा नहीं बनती—वह बदला बन जाती है,” शिब्बू ने धीमे स्वर में कहा था।
तीसरी मौत हुई थी उस रात। स्कूल की शिक्षिका मंजरी देवी—जिसने बिट्टो की माँ को ताने मारे थे कि “तुम्हारी लड़की शहर के सपने देखती थी, अब भुगतो”—सुबह अपनी रसोई में मृत पाई गई। उसके मुँह से राख निकल रही थी, और उसकी खोपड़ी के सारे बाल गायब थे, जैसे किसी ने जड़ से खींच लिए हों। उसके पास एक छोटी चोटी मिली थी—संग वही, जो वेदिका ने मंदिर के पीछे पाई थी। अब वेदिका के पास यह मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं था कि माधवी की आत्मा मुक्त हो चुकी है और वह सिर्फ़ मार नहीं रही—वह सज़ा दे रही है, उन सभी को जिन्होंने उसकी आवाज़ को दबाया था। लेकिन सज़ा की यह श्रृंखला कहाँ थमेगी? क्या माधवी की आत्मा केवल प्रतिशोध चाहती है या कुछ और? और अगर वेदिका खुद इस कहानी को उजागर कर रही है, तो क्या वह अगली हो सकती है? उस रात, वेदिका के सपने में माधवी आई—आँखें लाल, होंठ सीले हुए, और एक सड़ा हुआ पिंजरा उसके पीछे लटक रहा था। माधवी ने कुछ नहीं कहा—बस वेदिका की ओर अपनी बिना जुबान की ज़ुबान से इशारा किया… जैसे कह रही हो, “अब तू बोलेगी।”
४
सुबह होते ही वेदिका ने अपनी डायरी में माधवी के सपने का पूरा विवरण लिखा, लेकिन उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। सपने का दृश्य असहनीय रूप से सजीव था—माधवी की बिना होंठों की मुस्कान, खून से लथपथ आँखें, और हवा में तैरती राख। कमरे की खिड़की के बाहर नीम का पेड़ अब सूख चुका था, जैसे कोई उसकी जड़ें भीतर से चूस गया हो। और एक बात और थी—बिस्तर के पास की दीवार पर किसी ने राख से लिखा था: “अब तेरी बारी।” वेदिका पहले इसे मानसिक भ्रम मानती थी, लेकिन जब उसने दीवार को छूआ, तो राख की सच्ची सर्दी उसकी उंगलियों में उतर गई। वह एक रिसर्च स्कॉलर थी, पर अब वह रिसर्च से कहीं ज़्यादा गहरे दलदल में फँस चुकी थी—एक ऐसी कहानी में, जहाँ शब्दों से ज़्यादा असर मृत आत्माओं की चुप्पी का था।
गाँव का वातावरण अब पूरी तरह बदल चुका था। छोटे बच्चे घरों से बाहर नहीं निकलते थे, माएँ लाल कपड़े जलाकर गड्ढों में गाड़ रही थीं, और मंदिर की घंटियाँ खामोश थीं। यहाँ तक कि गौरव सिंह, जो शुरू में वेदिका की मदद कर रहा था, अब उससे नज़रें चुराने लगा था। वेदिका ने एक रात गौरव से जबरदस्ती बात की, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ा। “उस रात जब तूने पिंजरा छुआ था, मैंने देखा था… कुछ बाहर आया था। हवा भारी हो गई थी, और मंदिर की मूर्ति से सिंदूर टपकने लगा था।” उसने डरते हुए बताया कि उसकी माँ—जो कभी माधवी की पड़ोसन हुआ करती थी—उसे हमेशा बताती थी कि माधवी कोई चुड़ैल नहीं थी, परंतु गाँव के मर्दों ने मिलकर उसे उस रूप में बदल दिया था। वेदिका को लगा कि यह कहानी सिर्फ़ लोककथा नहीं, बल्कि एक दबाई हुई सच्चाई है—एक स्त्री की कहानी, जिसे जब बोलने नहीं दिया गया, तो वह मरकर भी चुप नहीं हुई।
उस रात वेदिका ने एक आखिरी साहसिक कदम उठाया। वह पिंजरे के पास एक टेप रिकॉर्डर लेकर गई और वहाँ ध्यान मुद्रा में बैठ गई। हवा में झुरझुरी थी, पत्तों की सरसराहट नहीं, बल्कि कोई और ध्वनि थी—जैसे कोई धीमी फुसफुसाहट। जैसे ही उसने टेप चालू किया, राख की परतें उड़ने लगीं, और पिंजरे के आसपास की ज़मीन में दरारें बनने लगीं। अचानक एक ठंडी लहर आई, और उसके ठीक सामने एक लाल साड़ी लहराई—मगर कोई शरीर नहीं था। अगले दिन जब उसने रिकॉर्डिंग सुनी, तो उस फुसफुसाहट में एक स्वर था—धीमा, पर स्पष्ट: “सुनो मेरी बात, नहीं तो तुम भी वही बनोगी जो मैं थी—बिन जुबान की एक आवाज़।” वेदिका को अब यकीन हो गया था—माधवी की आत्मा चाहती है कि उसकी कहानी दुनिया सुने। लेकिन सवाल था: क्या केवल सुनना काफी होगा, या उसे न्याय भी दिलाना होगा? और अगर हाँ, तो किससे? उन लोगों से जो अब खुद छाया बन चुके हैं?
५
रात बीतने के बाद सुबह की पहली किरणें जब वेदिका के कमरे की खिड़की से टकराईं, तब तक वह टेप रिकॉर्डिंग को कम-से-कम दस बार सुन चुकी थी। हर बार वह एक नई परत खोजती—कभी किसी औरत की सिसकी, कभी बर्तनों की आवाज़, और कभी एक फुसफुसाती हुई हँसी जो रूह को कंपा देती थी। लेकिन जो सबसे ज़्यादा स्पष्ट था, वह था माधवी का वह जला-बुझा स्वर: “सुनो मेरी बात, नहीं तो तुम भी वही बनोगी जो मैं थी…”। वेदिका को लगने लगा कि माधवी की आत्मा केवल बदला नहीं, बल्कि न्याय चाहती है—ऐसा न्याय जो दो सौ साल पहले उससे छीन लिया गया था। पर यह न्याय मिलेगा कैसे? उस गाँव में जहाँ आज भी सच्चाई को अंधविश्वास के पिंजरे में बंद कर दिया जाता है? उस समाज में जहाँ एक औरत की ज़ुबान काट देने से लोग खुद को धार्मिक मानते हैं?
उसने तय किया कि उसे गाँव की ज़मीन में दबी स्मृतियों को खंगालना होगा। उसने गौरव से पूछा कि क्या गाँव के पास कोई पुरानी कुठरिया या भट्ठा है जहाँ माधवी को ले जाया गया था। गौरव ने पहले तो मना किया, लेकिन जब वेदिका ने शपथ ली कि वह सब छोड़कर वापस लौट जाएगी, अगर जवाब नहीं मिला, तब वह चुपचाप गाँव के उत्तर छोर पर ले गया—एक बंजर ज़मीन, जहाँ अब केवल सूखी घास और कटीली झाड़ियाँ थीं। वहाँ एक टूटा हुआ चबूतरा था और उसके नीचे एक पत्थर की तख्ती, जिस पर कई नाम मिट चुके थे, पर एक नाम अब भी उभर रहा था: “माधवी, पुत्री सोमवती”। वेदिका की साँसें अटक गईं। यह वही माधवी थी। गौरव ने धीमे स्वर में कहा, “यहाँ उसे जिंदा जलाया गया था… उसके बाद इस ज़मीन को ‘अपवित्र’ कहकर छोड़ दिया गया।” वेदिका ने चबूतरे की मिट्टी को हाथ से हटाया, और नीचे से एक जल चुकी चूड़ी, एक टूटा सिंदूरदान और राख में लिपटी एक छोटी चिट्ठी निकली—संभवतः माधवी की आख़िरी कोशिश।
चिट्ठी पुरानी ब्रजभाषा में लिखी गई थी, लेकिन वेदिका ने जैसे-तैसे शब्दों को जोड़ा। उसमें लिखा था: “मैंने कभी किसी स्त्री का बच्चा नहीं छीना। मैं औषधि देती थी, पूजा करती थी। पंडितों ने मुझे शैतान कहा, क्योंकि मेरी पूजा उनकी पूजा से अलग थी। मुझे पिंजरे में बंद किया गया, मगर मैं अब भी जीवित हूँ। अगर कोई मेरी बात सुन सके, तो मेरी राख को गंगा में बहा दे—मेरी आत्मा को मुक्ति चाहिए, न कि और खून।” चिट्ठी ने वेदिका को भीतर तक हिला दिया। जो आत्मा गाँव में हत्याएँ कर रही थी, वह कोई दानवी नहीं थी—वह एक पीड़िता थी, जिसे इंसानों ने चुड़ैल बना दिया। अब वेदिका के लिए यह रिसर्च नहीं रही—यह उसका कर्तव्य बन चुका था। वह जान गई थी कि जब तक माधवी की राख को सही विधि से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक गाँव की बेटियाँ चैन से साँस नहीं लेंगी। लेकिन क्या गाँव वाले उसे ऐसा करने देंगे? और क्या माधवी खुद इतनी पीड़ा के बाद वाकई मुक्ति चाहती है… या उसकी आत्मा अब सिर्फ़ न्याय नहीं, हिसाब पूरा करने आई है?
६
गाँव की हवा अब और भी भारी हो चली थी—जैसे हर साँस राख में घुली हो। पिछले चार दिनों में तीन जवान लड़कियाँ और एक वृद्ध पंडित रहस्यमयी हालात में मारे जा चुके थे। गाँव के मंदिर पर ताला पड़ गया था, और हर घर के दरवाज़े पर गोबर से हाथ छाप बनाए जा रहे थे, नीम की पत्तियाँ बालकनी से झूल रहीं थीं। लेकिन वेदिका अब भय से नहीं, उद्देश्य से बंधी हुई थी। उसने माधवी की चिट्ठी पढ़ने के बाद निर्णय ले लिया था कि वह उस चिट्ठी में लिखे अंतिम वाक्य को पूर्ण करेगी—माधवी की राख को गंगा में विसर्जित कर मुक्ति दिलाएगी। पर एक प्रश्न बार-बार उसके भीतर उठता—क्या अब भी माधवी मुक्त होना चाहती है? या यह आत्मा अब इतनी टूटी, इतनी पीड़ित, इतनी काली हो चुकी है कि मुक्ति से ज़्यादा उसे प्रतिशोध की आग में जलना अच्छा लगने लगा है?
गौरव ने पहले मना किया था, लेकिन अंततः वेदिका के दृढ़ संकल्प के सामने वह झुक गया। वे दोनों रात के अंधेरे में उस टूटे चबूतरे पर पहुँचे जहाँ माधवी को जलाया गया था। हाथ में मिट्टी का दीपक, चिट्ठी, राख और चूड़ी के टुकड़े। वेदिका ने गंगा तक जाने का रास्ता जानने के लिए गाँव के पुराने नक्शे खंगाले थे और जाना कि तीन किलोमीटर दूर एक सूखा हुआ घाट है, जिसे लोग ‘माधवी घाट’ कहते हैं—इत्तफाक? शायद नहीं। जब वे उस घाट पर पहुँचे, तो चाँदनी बहुत फीकी थी, और घाट पर खड़े सूखे पीपल के पेड़ की शाखाएँ मानो कोई चेतावनी दे रही थीं। वेदिका ने राख को गंगाजल से भरे कलश में डाला और दीपक जलाया। लेकिन जैसे ही वह दीपक पानी में बहाने लगी, हवा एकदम तेज़ हो गई। राख हवा में उड़ने लगी, और उसी राख से बनी छाया ने एक औरत की आकृति ले ली—लंबे बाल, झुलसा हुआ चेहरा, और सुलगती आँखें। माधवी प्रकट हो चुकी थी।
माधवी की आत्मा कुछ कह नहीं रही थी, बस देख रही थी—वेदिका को, गौरव को, और उस दीपक को जो अब पानी में डगमगा रहा था। उसके होंठों से आवाज़ नहीं निकली, लेकिन उसकी आँखें बोल रहीं थीं—क्रोध, वेदना, और एक दबी हुई याचना। वेदिका ने काँपते हाथों से चिट्ठी उसकी ओर बढ़ाई। “मैंने पढ़ा है तुम्हारा संदेश, माधवी। मैं जानती हूँ तुम्हारे साथ क्या हुआ। अब तुम्हें मुक्त होना होगा—इसलिए नहीं कि गाँव को बचाना है, बल्कि इसलिए कि तुम अब और यह बोझ मत उठाओ,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन दृढ़ थी। माधवी की आकृति धीरे-धीरे बुझती राख में बदलने लगी, और जैसे ही दीपक गंगा की धारा में बहा, एक शांत लहर घाट से टकराई। पेड़ की पत्तियाँ फिर से हिलने लगीं। मगर उस क्षण वेदिका को कुछ महसूस हुआ—जैसे माधवी की आत्मा केवल आधी मुक्त हुई हो। घाट की सीढ़ियों पर एक अंतिम निशान उभरा—चूड़ी के दो अधूरे घेरे और बीच में एक खून का कतरा। शायद हिसाब अब भी बाकी था। शायद कोई अब भी ज़िंदा था जो उस अन्याय का भागीदार था। और शायद… अगली सुबह जब गाँव जागेगा, तब फिर कोई लड़की नहीं बचेगी।
७
गाँव अब पूरी तरह डर की गिरफ्त में था। हर घर का दरवाज़ा साँझ से पहले बंद हो जाता, और रात में कुत्तों की भौंक के सिवाय कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती थी। मंदिर के पास का इलाक़ा अब पूरी तरह वीरान हो चुका था, वहाँ अब कोई झाँकने भी नहीं जाता। रेवती का चेहरा सूख गया था, आँखों में नींद नहीं, आत्मा में चैन नहीं। हर रात वह सपना देखती थी — वही पिंजरा, वही झुकी हुई परछाई, और एक के बाद एक जलती चिताएँ। वह अब रोज़ घर के मंदिर में घंटों बैठकर जप करती, मगर भीतर एक अजीब बेचैनी थी — जैसे कुछ और आने वाला हो। एक दिन शाम को, जब वह पुरानी चौपाल के पास से गुज़र रही थी, अचानक उसके कानों में किसी लड़की के रोने की धीमी आवाज़ आई। पहले तो उसने सोचा कि यह भ्रम है, मगर फिर वह रुक गई। आवाज़ बहुत स्पष्ट थी — जैसे कोई मदद माँग रहा हो। वह धीरे-धीरे उस टूटी हुई कोठरी की ओर बढ़ी, जहाँ कभी गाँव के बुज़ुर्ग बैठा करते थे। कोठरी के भीतर अँधेरा था, लेकिन जैसे ही उसने भीतर झाँका, उसकी चीख़ निकलते-निकलते रह गई — कोने में बैठी एक लड़की, गीली चूड़ियाँ, बिखरे बाल, और लाल साड़ी पहने धीरे-धीरे ज़मीन खुरच रही थी।
रेवती की आँखें फटी रह गईं। वह वही लड़की थी जिसे उसने सपना देखा था। लेकिन यह कोई सपना नहीं था। जैसे ही वह पीछे मुड़ी, कोठरी का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया और भीतर घुप अंधेरा छा गया। रेवती की साँस अटक गई। वह चीख़ना चाहती थी, मगर गला सूख गया था। उस लड़की की आँखें अब चमकने लगी थीं, और उसकी हँसी किसी गहरे कुएँ से आती प्रतीत हो रही थी। “पिंजरा खोल दिया न?” वह बोली, और उसका स्वर जैसे सैकड़ों रेत में दबे गलों की गूंज थी। “अब तुम भी पिंजरे में बंद होगी।” रेवती ने दरवाज़ा खोलने की बहुत कोशिश की, मगर दरवाज़ा जैसे लोहे का हो गया था। तभी लड़की धीरे-धीरे हवा में उठी, और उसकी उंगलियाँ रेवती की ओर बढ़ीं। एक झटके में बिजली चमकी और दरवाज़ा अपने आप खुल गया। रेवती ज़मीन पर गिर पड़ी, और जब होश आया, तो वह गाँव के तालाब के पास पड़ी थी, उसके शरीर पर मिट्टी और पत्तियाँ चिपकी हुई थीं, और हाथ में एक काले धागे की माला थी — वैसी ही माला जो उसने उस दिन मंदिर के पिंजरे में देखी थी।
अगले दिन सुबह गाँव में अफ़वाह फैल गई कि पिंजरे की आत्मा ने अब रेवती को छू लिया है। लोग उसके घर से दूर रहने लगे। लेकिन रेवती अब शांत नहीं बैठने वाली थी। उसने तय किया कि अब वह वापस दिल्ली नहीं जाएगी, जब तक इस रहस्य को सुलझा नहीं लेती। उसने गाँव के सबसे पुराने तांत्रिक बाबा से मिलने का निर्णय लिया, जो जंगल के भीतर एक कुटिया में रहते थे। बाबा ने उसकी कहानी ध्यान से सुनी, फिर आँखे बंद कर के कुछ बुदबुदाया, और बोला, “जिस आत्मा को पिंजरे में बंद किया गया था, वह कभी इंसान नहीं थी। वह एक भटकी हुई छाया है, जिसने बलि लेकर अपना अस्तित्व बनाया। उसे बंद करने के लिए बलि दी गई थी, और अब जब पिंजरा खुल गया है, तो वह फिर से बलि माँगेगी।” रेवती काँप गई, लेकिन बाबा ने उसे एक भस्म दी और कहा, “इसको अपने माथे पर रोज़ लगाना, और जब अगली बार वह आए, तो उसका नाम लेना — लेकिन पूरा नाम, जो इस गाँव की धरती से मिटा दिया गया है।” रेवती के मन में अब एक ही प्रश्न था — उस छाया का नाम क्या था, और उसे आख़िरी बार किसने देखा था? जवाब अब गाँव की सबसे बूढ़ी औरत के पास था, जो अब तक किसी से नहीं मिली थी, लेकिन आज रेवती उसके दरवाज़े की ओर बढ़ रही थी…
८
गाँव की गलियों में सन्नाटा पसर चुका था, लेकिन पिंजरे के पास उस रात हवा कुछ ज्यादा ठंडी थी, और मंदिर के पीपल पर कौए असामान्य रूप से चिल्ला रहे थे। वैदेही के चेहरे पर तनाव की गहराइयाँ साफ़ झलक रही थीं — उसकी आँखों में नींद नहीं, चिंता थी। वह रजनी की आखिरी बातें याद कर रही थी — “वो तुम्हारी आवाज़ में बोलती है अब…”। उसकी नींद बार-बार एक ही स्वप्न से टूट रही थी — मंदिर की मूर्ति आँखें खोल रही थी, और पिंजरे से धुआँ निकल कर उसके शरीर में समा रहा था। सुबह होते ही वह मंदिर पहुँची, लेकिन वहाँ उसे सिर्फ़ पुराना पुजारी और एक नया चेहरा मिला — गाँव की नई नियुक्त महिला डॉक्टर, डॉ. शिखा, जो पिछले शव परीक्षण के बाद वहीं रुकी हुई थी। शिखा ने बताया कि मृत लड़कियों की नसों में कोई पुराना, विलुप्त हो चुका ज़हर मिला है, जो “तांत्रिक” प्रयोगों में इस्तेमाल होता था। वैदेही को शक गहराता गया कि यह सब अतीत के उस तांत्रिक काल की किसी अधूरी प्रथा का परिणाम हो सकता है — लेकिन उसकी वैज्ञानिक दृष्टि उसे अब तक समझा नहीं पा रही थी कि आत्मा जैसी कोई चीज़ सच में कैसे काम करती है। उसने डॉक्टर शिखा से गाँव की प्राचीन दंतकथाओं के बारे में बात की, और शिखा ने बताया कि पास के जंगल में एक ‘नागिन शिला’ है जहाँ औरतें जाती नहीं — कहते हैं वहाँ चुड़ैल का असली निवास है, और पिंजरा बस प्रतीक है।
उसी रात वैदेही और शिखा बिना किसी को बताए टॉर्च लेकर जंगल की ओर निकलीं। रास्ता डरावना था, झाड़ियों से सांप जैसी आवाज़ें आ रही थीं और चमगादड़ आसमान में घूम रहे थे। लेकिन शिला पर पहुँचते ही वैदेही को कुछ महसूस हुआ — जैसे किसी ने उसके मन के भीतर झाँक लिया हो। पत्थर पर रक्त से बनी आकृति अब भी ताज़ा दिख रही थी, और चारों ओर राख फैली थी, जैसे किसी ने हाल ही में कोई अनुष्ठान किया हो। तभी शिखा ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा, “ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि पिंजरा खोला गया… और वो तुम्हारे भीतर झाँक चुकी है।” वैदेही चौंकी, और उससे पहले कि वो कुछ पूछती, उसके कानों में किसी लड़की के हँसने की धीमी मगर स्पष्ट आवाज़ गूँजने लगी — वही आवाज़ जो पिछले कई सपनों में थी। अब वैदेही को समझ आने लगा था कि उसका दिमाग नहीं, उसकी आत्मा धीरे-धीरे किसी और के अधीन जा रही थी। वापसी के रास्ते में वैदेही को हर झाड़ी, हर दरख़्त किसी स्त्री की आकृति जैसा लगने लगा, और जब मंदिर के पास पहुँची, तो उसने देखा — पिंजरे का दरवाज़ा फिर से खुला था… जबकि उसने उसे सुबह बंद किया था।
अगली सुबह गाँव में फिर एक लड़की की लाश मिली — इस बार मंदिर की सीढ़ियों पर, और उसकी हथेली पर वैदेही का नाम रक्त से लिखा हुआ था। गाँव वालों का गुस्सा फूट पड़ा, और अब वे वैदेही को शक की नज़र से देखने लगे। प्रधान के घर पंचायत बैठी — कुछ ने कहा उसे गाँव से निकाल देना चाहिए, कुछ ने कहा पुलिस को बुलाओ। लेकिन उसी वक्त मंदिर का घंटा खुद-ब-खुद बज उठा, और एक बूढ़ी औरत — जिसकी दादी तांत्रिक विद्या में माहिर थी — वहाँ पहुँची। उसका नाम था लच्छो बुआ, और उसने कहा, “ये कोई सामान्य आत्मा नहीं, ये ब्रह्मराक्षसी है। इसकी मुक्ति नहीं, इसकी समाप्ति ही समाधान है।” वैदेही ने हिम्मत करके बुआ से विनती की कि वह उसे मार्ग दिखाए, क्योंकि अब वह खुद महसूस कर रही थी कि उसके भीतर कुछ पल रहा है — और वो चीज़ उस आत्मा की नहीं, बल्कि उसकी इच्छा की थी। बुआ ने कहा कि अंतिम अनुष्ठान नागिन शिला पर पूर्ण चंद्रमा की रात किया जा सकता है, जहाँ वैदेही को ‘स्वयं’ उस आत्मा का आमंत्रण देना होगा — ताकि वह प्रकट हो और बंधन में बँध सके। लेकिन जोखिम यह था कि अगर वैदेही की आत्मा कमज़ोर पड़ी, तो वो चुड़ैल पूर्ण रूप से उसी का शरीर ले लेगी।
अब समय आ गया था, जब डर के साथ ज्ञान भी खड़ा था। गाँव, परंपरा और अंधविश्वास की परतों में जो सच छिपा था, वह वैदेही के सामने नंगा हो चुका था। वह जान चुकी थी कि पिंजरे की लड़की अब बाहर थी — और उसकी नई कैद वही खुद थी। लेकिन क्या वैदेही उस आत्मा को मात दे पाएगी? क्या नागिन शिला पर होगा अंतिम द्वंद्व? या फिर गाँव की मिट्टी एक और लड़की का रक्त पी जाएगी…?
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