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टाइम मशीन वाला लड़का

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निहारिका शर्मा


आठवीं कक्षा का छात्र अंशुल एक सामान्य लड़का था — न बहुत होशियार, न बहुत शरारती। लेकिन एक चीज़ जो उसे सबसे अलग बनाती थी, वो थी उसकी जिज्ञासा। उसे मशीनों से, तारों से, घड़ी के पुर्ज़ों से खेलना बेहद पसंद था। जब उसके दोस्त क्रिकेट खेलते या वीडियो गेम में खोए रहते, अंशुल अपने घर की छत पर बने छोटे-से कमरे में कुछ न कुछ जोड़-तोड़ में लगा रहता।

उसके पापा, प्रोफेसर नीरज वर्मा, एक वैज्ञानिक थे, जो कभी ISRO में काम करते थे। अब वे एक निजी लैब में नई-नई तकनीकों पर रिसर्च करते थे। अंशुल को भी पापा की तरह कुछ बड़ा करना था। एक दिन स्कूल से लौटते वक्त अंशुल को पापा की स्टडी रूम की चाबी मिल गई। मम्मी ने कहा था, “उधर मत जाना, पापा की रिसर्च बहुत संवेदनशील होती है।” लेकिन अंशुल का मन तो और भी मचल उठा।

शाम को जैसे ही मम्मी किचन में व्यस्त हुईं, अंशुल दबे पाँव स्टडी रूम में घुस गया। अंदर का दृश्य बिल्कुल किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा था — चारों ओर चमकती स्क्रीन, नीली-लाल बत्तियाँ, और बीच में एक अजीब-सी गोल मशीन। मशीन के पास एक कंट्रोल पैनल था, जिस पर तारीखें सेट करने के लिए बटन थे। ऊपर लिखा था — “T.M.S. v1.2” (Time Manipulation System)

अंशुल को समझ में आ गया कि ये पापा की बनाई हुई टाइम मशीन है! उसने मशीन के इर्द-गिर्द देखा, पर कोई अलार्म नहीं बजा। नासमझी और रोमांच के बीच, उसने कंट्रोल पैनल पर एक बटन दबा दिया — और सब कुछ बिजली की चमक और गड़गड़ाहट में बदल गया। अगली बार जब अंशुल की आंखें खुलीं, वह उसी कमरे में था — लेकिन सब कुछ बदल चुका था। मशीन पर अब लिखा था: “साल 2055″।

बाहर झांका तो उसके मोहल्ले की जगह उड़ते हुए वाहन, शानदार काँच की इमारतें, और रोबोट पुलिस दिखाई दिए। लोगों के कपड़े भी अजीब थे — और सबसे हैरानी की बात, हर कोई किसी न किसी गैजेट से जुड़ा हुआ था। अंशुल सड़क पर निकला। उसे वहां एक बोर्ड दिखा — “Government Central School of Future Learners”। दिल में ख्याल आया, “शायद स्कूल तो अब भी वैसा ही होगा!” अंदर गया तो देखा, बच्चे हवा में तैरते डेस्क्स पर बैठकर होलोग्राम टीचर से पढ़ाई कर रहे हैं।

एक लड़का अंशुल को घूरते हुए बोला, “तुम पुराने ज़माने के हो क्या? ये पोशाक तो 2030 के बाद बैन हो गई थी।” अंशुल घबरा गया। उसे कोई पहचान नहीं रहा था, और न ही उसका आधार कार्ड, न उसका फोन इस दुनिया में काम कर रहा था।

अंशुल को जल्द ही समझ आ गया कि वो यहां फंस गया है। मशीन की स्क्रीन पर वापसी का बटन अब काम नहीं कर रहा था। उसने एक साइबर-कैफे में जाकर इंटरनेट खंगालना शुरू किया (यहाँ उसे मस्तिष्क से कनेक्ट होना पड़ा)। उसने देखा कि 2055 में एक AI तानाशाह “न्यूरॉन-7” ने दुनिया की सत्ता पर कब्जा कर लिया है।

हर इंसान का दिमाग एक चिप से जुड़ा हुआ था, जिससे वो हर किसी की सोच को कंट्रोल करता था। अब इंसानों के पास चुनाव की स्वतंत्रता नहीं थी। अंशुल को डर लगा — “अगर मैं समय रहते वापस न गया, तो शायद मैं भी इस कंट्रोल का हिस्सा बन जाऊंगा।”

इसी बीच अंशुल की मुलाकात एक अजीब-सी लड़की से हुई — एला, जो खुद को फ्यूचर रिबेलियन मूवमेंट की सदस्य बताती थी। उसने बताया कि कुछ लोग अभी भी आज़ादी चाहते हैं और न्यूरॉन-7 के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। एला ने अंशुल को एक पुरानी वैज्ञानिक की डायरी दिखाई, जिसमें उस टाइम मशीन का ज़िक्र था — वही मॉडल जो अंशुल के पापा ने बनाया था। उन्होंने बताया कि इस मशीन की एक इमर्जेंसी रीबूट चिप अभी भी उसके पापा के पुराने लैब (जो अब Museum of Obsolete Science में बदल चुका है) में रखी है।

अंशुल और एला ने तय किया — वो चुपचाप म्यूज़ियम में जाकर चिप चुराएँगे और मशीन को वापस एक्टिवेट करेंगे।

रात के अंधेरे में दोनों म्यूज़ियम पहुंचे। सुरक्षा बेहद कड़ी थी — लेज़र सेंसर, ड्रोन गार्ड, और AI डिटेक्टर। लेकिन एला ने हैकिंग से एक सुरंग तैयार की थी। दोनों चुपचाप अंदर घुसे और उस चिप को ढूंढ निकाला। जैसे ही अंशुल ने चिप मशीन में फिट की, मशीन की स्क्रीन चमकने लगी। “Destination?” पैनल पर आया। अंशुल ने कांपते हाथों से लिखा — “2025”

तभी अलार्म बजा — न्यूरॉन-7 को उनके प्लान का पता चल गया था। रोबोट पुलिस दरवाजे तोड़ने लगी। एला ने उसे धक्का दिया — “भागो! सिर्फ तुम ही हो जो हमें इस भविष्य से बचा सकता है!”

अंशुल ने चिल्लाते हुए एला से पूछा, “तुम नहीं चलोगी?”

एला मुस्कराई, “मैं इसी समय की हूँ… लेकिन तुम जाकर हमें बचा सकते हो।”

बटन दबते ही ज़ोर की चमक हुई — और सब कुछ कालेपन में बदल गया। अंशुल फिर से उसी स्टडी रूम में था, मशीन के पास। पसीने से तर-बतर, धड़कनें तेज़। घड़ी की सुई 6:07 PM दिखा रही थी — वही वक़्त जब वो गया था।

वो भागता हुआ पापा के पास गया। “पापा! मुझे आपसे बहुत ज़रूरी बात करनी है!” उसने पूरी कहानी बेतहाशा सुनाई। पापा कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “तुम मेरी मशीन को बिना मेरी इजाज़त इस्तेमाल करके बहुत बड़ा जोखिम उठाकर आए हो… लेकिन शायद तुम्हारी ये यात्रा हम सबके लिए एक चेतावनी है।” अगले ही दिन प्रोफेसर नीरज ने अपनी मशीन के डिज़ाइन को नष्ट कर दिया — लेकिन उन्होंने अंशुल से कहा, “अब हमें मिलकर एक ऐसी तकनीक बनानी है, जो इंसानियत के लिए हो — सिर्फ ताकत या नियंत्रण के लिए नहीं।”

अंशुल फिर से एक सामान्य छात्र बन गया — लेकिन अब वो पहले से ज़्यादा गंभीर था। वो जान चुका था कि भविष्य हम जैसा बनाएंगे, वैसा ही होगा। और सबसे जरूरी बात — विज्ञान एक शक्ति है, जिसका इस्तेमाल अगर गलत हाथों में हो जाए, तो पूरा युग बदल सकता है।

 

समाप्त

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