विवेक यादव
१
दिल्ली की हल्की सर्दियों की उस सुबह अर्जुन सिंह की आंखें अलार्म घड़ी की कानफाड़ू आवाज़ से खुलीं, पर दिलो-दिमाग में जो बेचैनी थी, वह किसी अलार्म से नहीं जागी थी। अपने छोटे से किराये के फ्लैट में अर्जुन ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा—सुबह के सात बजने वाले थे। बाहर से दूधवाले की साइकिल की घंटी, अखबार के लड़के की पुकार और पड़ोसी की चाय के प्याले की खनक सुनाई दे रही थी, मगर अर्जुन का मन इन साधारण आवाजों से परे किसी और ही दुनिया में भटक रहा था। वो दुनिया, जो सपनों में रातभर उसकी नींदें उड़ाती रही। अर्जुन पेशे से एक पत्रकार था, मगर दिल से वह एक सच्चाई का राही था—वह सच्चाई जो अक्सर धूल, झूठ और डर के पर्दों के पीछे छुपी होती थी। चाय बनाते-बनाते उसकी नजर दरवाजे के नीचे से सरकी एक सफेद लिफाफे पर पड़ी। बिना किसी प्रेषक के, साधारण कागज का लिफाफा, जिस पर बड़े साफ अक्षरों में लिखा था—”अर्जुन सिंह के लिए”। अर्जुन ने चाय का प्याला मेज पर रखा और उस लिफाफे को उठाया। लिफाफे की स्याही कुछ धुंधली थी, शायद बारिश की बूंदों से भीग गई थी या फिर वक्त की गर्द उस पर जम गई थी। उसके भीतर का रोमांचक पत्रकार जाग उठा। उसने लिफाफा खोला और भीतर से एक पुराना सा मुड़ा-तुड़ा कागज निकला। कागज पर सिर्फ एक ही पंक्ति थी—”अगर सच्चाई चाहिए तो शिवगढ़ की हवेली आओ। अंधेरे में छुपा सच उजाले का इंतजार कर रहा है।” अर्जुन की उंगलियां अनायास ही काँप उठीं। कागज की बनावट, स्याही की गंध और शब्दों की रहस्यमयता ने उसके भीतर सिहरन दौड़ा दी। उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपने भरोसेमंद दोस्त और पुरातत्वविद मीरा शुक्ला को कॉल किया। मीरा उस वक्त राष्ट्रीय संग्रहालय में किसी प्राचीन मूर्ति की सफाई कर रही थी। अर्जुन की आवाज में जो घबराहट और उत्सुकता थी, वह मीरा से छुपी न रह सकी। मीरा ने बिना देर किए अर्जुन से मिलने का समय तय किया। दोनों उसी शाम कनॉट प्लेस के एक छोटे से कैफे में मिले। अर्जुन ने लिफाफा और पत्र मीरा के सामने रख दिया। मीरा ने बड़े गौर से कागज का निरीक्षण किया—उसकी आंखें जो सामान्यतः प्राचीन शिलालेखों और पांडुलिपियों पर टिकी रहती थीं, अब इस साधारण कागज में कोई इशारा खोजने लगीं। मीरा बोली, “कागज की बनावट और स्याही से लगता है कि यह कोई बहुत पुराना पत्र नहीं है, लेकिन लिखने वाले ने जान-बूझकर इसे प्राचीन दिखाने की कोशिश की है। और ये शिवगढ़ हवेली… इस नाम को सुनते ही मेरी यादों में धुंधली-सी तस्वीरें उभरती हैं, कहीं पढ़ा या सुना था इस हवेली के बारे में।” अर्जुन ने गहरी सांस ली और बोला, “मीरा, मैं इस सच की तह तक जाना चाहता हूं। क्या तुम मेरे साथ चलोगी?” मीरा कुछ देर तक खामोश रही, फिर उसकी आंखों में वही चमक लौटी जो हर रहस्य की परत खोलने से पहले आती थी। उसने धीरे से सिर हिलाया, और दोनों ने अगले ही दिन शिवगढ़ की ओर सफर पर निकलने का फैसला कर लिया।
अगले दिन सुबह दिल्ली से शिवगढ़ की ओर जाने वाली ट्रेन के साधारण डिब्बे में दोनों बैठे थे। डिब्बे में इक्का-दुक्का लोग थे—एक बूढ़ा किसान, जो अपने खेतों की बातें कर रहा था; एक युवती, जो खिड़की के बाहर खेतों और गांवों को एकटक निहार रही थी; और एक बूढ़ी औरत, जो लगातार रामायण की चौपाइयां बुदबुदा रही थी। ट्रेन की खिड़की से ठंडी हवा का झोंका अंदर आया और अर्जुन को उस पत्र की याद दिला गया, जो अब उसकी जैकेट की जेब में सुरक्षित रखा था। मीरा अपने साथ लाई डायरी में हवेलियों के इतिहास से जुड़ी कुछ नोट्स पढ़ रही थी। अर्जुन ने खिड़की से बाहर झांका—खेतों के बीच से गुजरती ट्रेन, दूर-दूर तक फैला नीला आसमान और धरती से उठती धूल की परतें। पर इस सुंदर नजारे के पीछे उसका मन बेचैन था। तभी ट्रेन के एक मोड़ पर बूढ़ी औरत ने उनकी ओर देखते हुए धीमी आवाज में कहा, “शिवगढ़ हवेली की तरफ जा रहे हो क्या बाबूजी?” अर्जुन ने चौंककर उसकी ओर देखा और हां में सिर हिलाया। बूढ़ी औरत की आंखों में डर का साया था। उसने आगे कहा, “उस हवेली में रात को दिया जलता है… मगर कोई इंसान नहीं होता। बहुत साल पहले मेरे भतीजे ने वहां जाने की भूल की थी… फिर वो लौटा ही नहीं। अब उसका नाम भी कोई नहीं लेता।” मीरा ने अर्जुन की ओर देखा, जैसे दोनों को यह अहसास हो गया हो कि जिस सफर पर वे निकल पड़े हैं, वह सामान्य नहीं है। ट्रेन की सीटें अब और सख्त लगने लगी थीं, और खामोशी और भी गाढ़ी। ट्रेन की सीटी और पहियों की आवाज इस अजीब सन्नाटे में गूंज रही थी। शिवगढ़ स्टेशन पर उतरते ही दोनों ने महसूस किया कि यह जगह समय की रफ्तार से कट चुकी है—पुराना स्टेशन भवन, पान की गुमटी, मिट्टी की सोंधी महक, और दूर कहीं एक मंदिर की घंटियां। एक तांगा लिया गया, जो उन्हें हवेली की ओर ले चला। रास्ते में गांव के लोग तांगे की ओर देख कर कानाफूसी करते और फिर निगाहें फेर लेते। हवेली की ओर बढ़ते ही पेड़ों की शाखाएं जैसे और भी सघन होती जा रही थीं, सूरज की रोशनी कम होती जा रही थी। हवेली की पहली झलक ने दोनों को स्तब्ध कर दिया—विशाल दरवाजे पर पड़ा ताला जंग खा चुका था, दीवारों पर बेलें उग आई थीं, और छत का एक हिस्सा जैसे आसमान से बातें कर रहा था। मगर हवेली के सन्नाटे में भी जैसे कोई हलचल थी, कोई अनकहा आमंत्रण, कोई अज्ञात चेतावनी।
अर्जुन और मीरा ने हवेली के बाहर खड़े होकर एक-दूसरे की ओर देखा। अर्जुन ने जेब से वो गुमनाम पत्र निकाला और हवेली की ओर देखा, जैसे हवेली को दिखाना चाहता हो कि वह यहां आ गया है। हवेली की टूटी खिड़कियों से सूरज की आखिरी किरणें झांक रही थीं। मीरा ने कहा, “रात यहीं रुकना होगा, अगर सच का सामना करना है तो।” अर्जुन ने सहमति में सिर हिलाया। दोनों ने हवेली का बड़ा दरवाजा धीरे-धीरे खोला। दरवाजे की चरमराहट जैसे हवेली की आत्मा की चीख थी। भीतर कदम रखते ही धूल की मोटी परतें उड़ीं, जालों से लदी दीवारों ने जैसे उनका स्वागत किया। हवेली के भीतर की हवा ठंडी थी, जैसे सदियों से बंद कमरे की सांसें अभी भी महफूज थीं। लकड़ी की टूटी मेज, फर्श पर गिरे पत्थर के टुकड़े और दीवारों पर बनी धुंधली आकृतियाँ—सब मिलकर हवेली की खामोश कहानी सुना रहे थे। अर्जुन ने कैमरा निकाला और चारों ओर तस्वीरें लेने लगा। मीरा ने एक पुराने दीपक को देखा, जो दीवार पर टंगा था, और धीमे स्वर में कहा, “कितनी अजीब बात है अर्जुन, यहां कोई रहता नहीं, फिर भी सब कुछ जस का तस है, जैसे हवेली को अपनी कहानी कहने का इंतजार हो।” रात धीरे-धीरे अपनी चादर ओढ़ने लगी थी। हवेली की परछाइयाँ लंबी हो रही थीं, और दोनों के दिलों में एक अजीब सा डर और उत्सुकता घर कर रही थी। हवेली के बाहर सूखी पत्तियाँ हवा के झोंके से सरसरातीं, और भीतर अंधेरे में छुपी परछाइयाँ जैसे अपने मेहमानों को पहचान रही थीं। अर्जुन और मीरा ने तय किया कि वे इसी हवेली में रात गुजारेंगे और उस गुमनाम पत्र के सच को उजागर करेंगे, चाहे वह सच जितना भी डरावना क्यों न हो।
२
रात का स्याह अंधेरा जैसे शिवगढ़ की हवेली को अपनी बाहों में समेट चुका था। हवेली के भीतर अर्जुन और मीरा, दोनों की आंखें अंधेरे में देखने की कोशिश कर रही थीं। मोबाइल की टॉर्च की हल्की रोशनी चारों ओर फैली धूल और जालों पर पड़ती, तो परछाइयाँ और भी डरावनी लगतीं। हवेली के मुख्य कक्ष में वे एक पुराने लकड़ी के तख्त पर बैठ गए। खिड़कियों से आती ठंडी हवा में सीलन की महक घुली थी। बाहर कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाजें और पास के किसी मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि इस सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। मीरा ने अर्जुन की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा, “क्या तुम्हें भी लग रहा है अर्जुन, जैसे हम पर कोई नजर रखे हुए है?” अर्जुन ने चारों ओर देखा, दीवारों पर उभरी आकृतियाँ, जाले और दरारें सचमुच किसी आंख की तरह ही उन्हें घूरती दिख रही थीं। तभी हवा का एक तेज झोंका भीतर आया और हवेली का एक टूटा दरवाजा जोर की आवाज के साथ भिड़ा। दोनों चौंक पड़े, दिलों की धड़कनें तेज हो गईं। अर्जुन ने अपने कैमरे को कस कर पकड़ा और कहा, “अगर डर से जीतना है, तो इसी अंधेरे में उतरना होगा।” दोनों ने टॉर्च की रोशनी में हवेली की दीवारों पर बनी पुरानी चित्रकृतियों को देखना शुरू किया। वहां हाथियों की सवारी करते राजाओं की आकृतियाँ थीं, तलवारें उठाए सैनिक, और एक चित्र में एक भव्य रत्नजड़ित संदूक, जिसके चारों ओर कुछ अजीब चिन्ह उकेरे हुए थे। मीरा ने उन चिन्हों को देखकर अपनी नोटबुक निकाली और उन्हें उतारने लगी। वो बोली, “ये शायद हवेली में छुपे किसी खजाने या रहस्य की ओर इशारा करते हैं।” तभी एक कोने से किसी धातु के गिरने की आवाज आई। दोनों का शरीर सिहर उठा। अर्जुन ने टॉर्च उस ओर घुमाई, पर वहां सिर्फ टूटी ईंटें और एक लोहे का पुराना दीपक पड़ा था। पर दिल की धड़कनों ने जैसे ये चेतावनी दी कि हवेली में सिर्फ वो दोनों नहीं थे।
रात बढ़ती रही और हवेली का अंधेरा और भी गाढ़ा होता गया। अर्जुन और मीरा अब हवेली की दूसरी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे, जहां सीढ़ियों पर जमी धूल उनके कदमों के निशान छोड़ रही थी। लकड़ी की कमजोर सीढ़ियाँ हर कदम पर चरमरातीं, मानो उन्हें चेतावनी दे रही हों कि और आगे न जाएं। ऊपर पहुंचते ही एक लंबा गलियारा मिला, जिसके दोनों ओर पुराने कमरों के दरवाजे थे। दरवाजों पर लगी जंग लगी कुंडियां और टूटे ताले समय की मार की गवाही दे रहे थे। अर्जुन ने एक दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा चरचराता हुआ खुला और भीतर की ठंडी हवा का झोंका जैसे उनकी रूह तक उतर गया। कमरे में बिखरी पुरानी किताबें, फटी चादरें और एक लकड़ी की अलमारी का टूटा दरवाजा लटक रहा था। अलमारी के भीतर एक पुरानी डायरी पड़ी थी, जिस पर धूल की मोटी परत थी। अर्जुन ने वो डायरी उठाई और धीरे से पन्ने पलटने लगा। पन्नों पर उर्दू और फारसी की मिली-जुली लिखावट में कुछ नोट्स थे—शायद उस जमाने के किसी मालिक या मंत्री की यादें। मीरा ने गौर से एक पंक्ति पढ़ी—”रत्न संदूक हवेली के तहखाने में सुरक्षित रखा गया है। इसकी रक्षा मृत्यु के भय से की जाती है।” मीरा ने अर्जुन की ओर देखा, उसकी आंखों में रोमांच था। अर्जुन बोला, “तो हवेली के तहखाने में सचमुच कुछ छुपा है। वही खजाना या रहस्य जिस पर ये हवेली खड़ी है।” तभी हवा ने खिड़की के पल्ले को जोर से भड़का दिया और कमरा एक बार फिर सिसकियों से गूंज उठा। दोनों ने महसूस किया कि हवेली की आत्मा जैसे उन्हें बुला रही है, सच को उजागर करने के लिए।
हवेली के दूसरे तल से लौटते वक्त दोनों की नजर एक छोटे दरवाजे पर पड़ी, जो सीढ़ियों के नीचे की दीवार में छुपा था। दरवाजा आधा खुला था और भीतर अंधेरे का गहरा सागर फैला था। अर्जुन ने टॉर्च भीतर घुमाई, पर रोशनी दूर तक नहीं पहुंच सकी। मीरा बोली, “यह तहखाने का रास्ता हो सकता है।” अर्जुन ने दरवाजे को पूरी तरह खोला। एक लंबी पत्थरों की सीढ़ी नीचे उतर रही थी। सीढ़ियों पर नमी थी और हर कदम पर पानी की बूंदें टपकतीं। दोनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे। नीचे पहुंचते ही एक विशाल कक्ष मिला, जहां छत से टपकता पानी हर तरफ छोटे-छोटे गड्ढों में जमा हो रहा था। दीवारों पर जली हुई मशालों के निशान थे और कक्ष के बीचों-बीच एक पत्थर का चबूतरा था। चबूतरे पर वही संदूक रखा था, जैसा चित्र में देखा था। रत्नों से जड़ा, पर अब धूल से ढका हुआ। मीरा ने धीमे से कहा, “यह वही संदूक है अर्जुन… शायद इसी की वजह से ये हवेली शापित हुई।” अर्जुन ने हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक हवेली में जोर की गर्जना हुई, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उनकी मौजूदगी से गुस्सा हो उठी हो। तहखाने की दीवारों से हवा की तेज सरसराहट गूंजने लगी, और दोनों को ऐसा महसूस हुआ जैसे सैकड़ों अदृश्य आंखें उन पर टिकी हों। अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ा और बोला, “अब हम पीछे नहीं हट सकते। इसी संदूक में छुपा है वो सच, जिसे जानने के लिए हम यहां आए हैं।” और हवेली की परछाइयाँ चुपचाप देखती रहीं, जैसे इस रात का सच धीरे-धीरे उजागर होने को था।
३
हवेली के तहखाने में फैला सन्नाटा अब धीरे-धीरे अपनी खौफनाक सच्चाई दिखाने लगा था। अर्जुन और मीरा उस रत्नजड़ित संदूक के चारों ओर खड़े थे, जिसे वक्त की धूल और इतिहास की कहानियों ने छुपा रखा था। हवेली की दीवारों से टपकती पानी की बूंदों की आवाज़ जैसे एक विचित्र लय में गूंज रही थी। दोनों की सांसें भी धीमी पड़ गई थीं, जैसे डर और रोमांच का मिला-जुला असर उनके दिलों की धड़कनों को थामे हुए था। अर्जुन ने टॉर्च की रोशनी संदूक पर केंद्रित की—रत्नों की चमक अब भी धूल की परतों के भीतर से झिलमिल कर रही थी। मीरा ने अपनी नोटबुक से उस चित्र की तुलना की, जो हवेली की दीवार पर बना था। संदूक के चारों ओर अजीब से चिन्ह उकेरे हुए थे, जिनकी भाषा उन्हें समझ नहीं आ रही थी। मगर उन चिन्हों में एक चेतावनी सी थी, जिसे दिल महसूस कर सकता था पर जुबां बयान नहीं कर सकती थी। अर्जुन ने धीमे हाथों से संदूक पर रखा जंग लगा ताला टटोला। तभी दीवारों से आती हवा की सरसराहट तेज हो गई और हवेली की पुरानी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। दोनों के शरीर जैसे पथरा गए। अर्जुन ने तेजी से टॉर्च का रुख सीढ़ियों की ओर किया मगर वहां कोई नहीं था। हवेली का अंधेरा जैसे उन्हें अपनी आगोश में लेने को बेताब था। मीरा फुसफुसाई, “क्या हमें यह संदूक खोलना चाहिए? क्या सचमुच हम इसके लिए तैयार हैं?” अर्जुन की आंखों में जुनून और जिज्ञासा की आग थी। उसने कहा, “सच के लिए डर को जीतना होगा।” और उसने ताले पर हाथ रख दिया।
ताले की जंग खाई कुंडी अर्जुन की ताकत से चरमराई और एक तेज आवाज के साथ खुल गई। जैसे ही संदूक का ढक्कन थोड़ा सा उठा, हवेली के तहखाने में एक जोरदार गूंज हुई। दीवारें जैसे कंपकंपा उठीं और तहखाने की हवा और भी भारी हो गई। संदूक के भीतर पड़ी चीजें धुंधली टॉर्च की रोशनी में चमक उठीं। सोने की कुछ मूर्तियां, चांदी के सिक्कों की थैलियां, और एक पुरानी म्यान में जड़ी तलवार। पर सबसे रहस्यमय चीज थी एक तांबे की पट्टी, जिस पर उर्दू में कुछ लिखा था। मीरा ने उसे उठाया और धीमे-धीमे पढ़ने लगी—“जिसने भी इस खजाने को जगाया, उसकी रातें चैन से नहीं गुजरेंगी। रक्त का कर्ज रक्त से चुकता होगा।” मीरा की आवाज कांपने लगी। हवेली जैसे उनकी मौजूदगी से और भी बेचैन हो उठी थी। तभी तहखाने की एक दीवार से खटखटाने की आवाज आई। ये कोई हवा की हरकत नहीं थी, ये आवाज ऐसी थी जैसे कोई अंदर से उस दीवार को पीट रहा हो। अर्जुन और मीरा ने टॉर्च की रोशनी उस ओर घुमाई और देखा कि दीवार पर हल्की सी दरार दिख रही थी, मानो किसी समय यह कोई दरवाजा रहा हो। अर्जुन ने पास पड़ी लोहे की छड़ उठाई और दीवार पर प्रहार करने लगा। हर प्रहार के साथ दीवार की दरारें और गहरी होती गईं, और हवा में गंध और भी तेज हो गई। दीवार टूटते ही भीतर एक और छोटा कक्ष दिखा, जिसकी हवा सड़े हुए मांस की तरह बदबूदार थी। भीतर कंकालों का ढेर पड़ा था, जैसे किसी जमाने में लोगों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया हो। दोनों के रोंगटे खड़े हो गए। मीरा की आंखों से आंसू बह निकले। वो बोली, “ये हवेली महज खजाने का ठिकाना नहीं, ये तो किसी भयानक अन्याय का गवाह है।” अर्जुन ने चारों ओर देखा और महसूस किया कि अब हवेली की परछाइयाँ और पास आ गई हैं।
अर्जुन और मीरा ने तय किया कि यह रात अब हवेली के भीतर नहीं काटी जा सकती। पर जैसे ही वे तहखाने से बाहर निकलने को मुड़े, हवेली ने अपनी सच्चाई की एक और परत उनके सामने खोल दी। सीढ़ियों की ओर जाने वाला रास्ता धूल और गिरते पत्थरों से भर गया था, मानो हवेली ने खुद अपने दरवाजे उनके लिए बंद कर लिए हों। हवा में सिसकियों और फुसफुसाहटों की आवाजें गूंजने लगीं। “मुक्त करो हमें…” ये शब्द जैसे हवेली की आत्माओं की पुकार थे, जो बार-बार दोनों के कानों में गूंजते। अर्जुन ने मीरा का हाथ थामा और बोला, “हमें इस हवेली के अन्याय की कहानी को दुनिया के सामने लाना होगा। तभी ये आत्माएं शांति पाएंगी।” मीरा ने उसकी ओर देखा, उसकी आंखों में डर की जगह अब दृढ़ निश्चय था। दोनों ने अपने कैमरों और नोटबुक्स में हर निशान, हर चिन्ह और हर संकेत को दर्ज करना शुरू किया। हवेली के तहखाने की ठंडी हवा, दीवारों पर खून के निशान जैसे धब्बे, और कंकालों के ढेर—ये सब अब उनकी कहानी का हिस्सा बनने जा रहे थे। रात अपनी गहराई पर थी। हवेली की परछाइयाँ अब भी उनके चारों ओर मंडरा रही थीं। लेकिन अब अर्जुन और मीरा दोनों के दिलों में सिर्फ डर नहीं, एक मिशन की आग जल रही थी—अंधेरे की इन परछाइयों को सच्चाई के उजाले में लाने का।
४
हवेली के तहखाने में बंद अर्जुन और मीरा के लिए हर गुजरता पल जैसे सदियों सा लंबा हो गया था। दीवारों पर टिमटिमाती टॉर्च की रोशनी, चारों ओर फैला सन्नाटा और हवा में घुली बदबू—सब कुछ मिलकर उस माहौल को और भी डरावना बना रहे थे। अर्जुन ने पास पड़ी एक पुरानी लोहे की जंजीर उठाई और रास्ता साफ करने के लिए गिरी हुई ईंटों को हटाने लगा। मीरा ने अपने कैमरे से तहखाने की हर दीवार, हर कोने की तस्वीरें लेना शुरू किया ताकि बाद में वह इन चिन्हों, दरारों और कंकालों का अध्ययन कर सके। अचानक एक तेज हवा का झोंका आया, जिसने टॉर्च की रोशनी को डगमगा दिया और मिट्टी-धूल की परत हवा में तैरने लगी। उसी धूल के बीच एक धुंधली परछाई सी उभर आई, मानो किसी की आकृति उन दोनों को देख रही हो। मीरा की सांसें थम गईं। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “अर्जुन, तुम्हें भी दिख रहा है?” अर्जुन ने नजरें घुमाईं और देखा कि सचमुच धुंध में एक इंसानी आकृति का आभास हो रहा था—सिर झुकाए खड़ा कोई, जिसने सदियों से मुक्ति का इंतजार किया हो। हवेली की दीवारों से जैसे फिर से वह सिसकियों की आवाजें आने लगीं—“मुक्त करो हमें… मुक्त करो…”। अर्जुन ने अपने दिल को कड़ा किया और उस आकृति की ओर बढ़ा, पर अगले ही पल वह धुंध में विलीन हो गई। पर उसकी जगह तहखाने की एक दीवार पर खून जैसे लाल रंग की ताजा रेखा उभर आई थी, जो सीधे उस संदूक की ओर इशारा कर रही थी।
अर्जुन और मीरा ने महसूस किया कि हवेली की रूहें अब खुलकर संवाद कर रही थीं, अपने दर्द की दास्तान कह रही थीं। संदूक के भीतर से आती धीमी खड़खड़ाहट और दीवारों की कंपन उनके दिलों में खौफ भरने लगी थी। मीरा ने संदूक के पास जाकर देखा—अब उसका ढक्कन थोड़ा और खुल गया था, और भीतर से हवा का एक ठंडा झोंका बाहर निकल रहा था। संदूक में पड़ी तलवार की म्यान पर अचानक धूल हट गई, और उस पर खुदा शब्द उभर आए—”धोखा, खून, शाप”। मीरा का गला सूखने लगा। उसने कहा, “अर्जुन, ये हवेली खजाने की हवेली नहीं, ये गुनाह की गवाही है। यह खजाना उन सिपाहियों का है जिन्हें धोखा देकर यहां मारा गया और जिंदा दफना दिया गया।” अर्जुन ने संदूक से तलवार निकाली। तलवार पर खून के जमे धब्बे अब भी थे, जैसे वक्त भी उस पर लगे दाग मिटा नहीं पाया था। तभी तहखाने के एक कोने से किसी के रोने की आवाज आई। अर्जुन और मीरा ने टॉर्च घुमाई और देखा—एक दीवार से सटी परछाई बैठी थी, सिर घुटनों में छुपाए। मीरा ने साहस जुटाकर पूछा, “कौन हो तुम? क्या चाहते हो?” आवाज आई—“इन्साफ…” और फिर वो परछाई हवा में घुल गई। हवेली की फिजा अब और भी भारी हो गई थी। तहखाने की दीवारें जैसे उनकी सांसों को भी कैद कर लेना चाहती थीं।
अर्जुन और मीरा अब ये समझ चुके थे कि हवेली का सच केवल तहखाने में दफन नहीं था, बल्कि उसकी आत्माएं, उसकी हर दीवार, हर पत्थर इस अन्याय की कहानी कह रहा था। दोनों ने मिलकर तहखाने से बाहर निकलने का रास्ता साफ करना शुरू किया। ईंटें हटाते-हटाते अचानक उन्हें एक लकड़ी का पुराना संदूकचा मिला, जो मिट्टी में आधा दबा था। संदूकचा खोला तो उसमें पुराने दस्तावेज़, सिक्के और एक पत्र मिला। पत्र पर लिखा था—“अगर कोई इसे पढ़े, तो जान ले कि यह हवेली शापित है। इस हवेली के मालिक ने लालच में अपने ही सिपाहियों को मौत दी, और उनका खजाना हड़प लिया। उनकी रूहें अब तक भटक रही हैं।” पत्र पढ़ते-पढ़ते मीरा की आंखों से आंसू बह निकले। अर्जुन ने कहा, “हम इस कहानी को दुनिया तक पहुंचाएंगे। ये हवेली अब चुप नहीं रहेगी।” बड़ी मेहनत से उन्होंने रास्ता साफ किया और तहखाने से बाहर निकल आए। हवेली की पहली मंजिल पर चढ़ते ही बाहर से आती भोर की हल्की किरणें हवेली के अंधेरे में समा रही थीं। हवेली की परछाइयाँ अब भी दीवारों से चिपकी थीं, पर जैसे वे दोनों को अलविदा कह रही थीं—शायद इस उम्मीद में कि अब उनका सच दुनिया के सामने आएगा। हवेली के बाहर खड़े होकर अर्जुन और मीरा ने एक बार फिर उस प्राचीन इमारत को देखा। हवेली की टूटी खिड़कियों से आती सुबह की किरणें अब वहां एक नई शुरुआत का संकेत दे रही थीं।
५
हवेली से बाहर निकलकर जब अर्जुन और मीरा ने पहली बार खुले आसमान को देखा, तो दोनों को जैसे राहत की सांस मिली। भोर की सुनहरी किरणें हवेली की टूटी खिड़कियों और दरवाजों पर पड़कर अजीब सा उजाला फैला रही थीं। पर हवेली की दीवारों पर वह उजाला ठहर नहीं पा रहा था, जैसे वहां अंधेरे की कोई मोटी परत जमी हो, जिसे सूर्य की रोशनी भी भेद नहीं पा रही थी। अर्जुन ने अपने कैमरे में कैद तस्वीरों को देखा, और उन तस्वीरों के पीछे छुपी सच्चाई को सोच कर उसका मन और भी बेचैन हो उठा। मीरा ने अपनी नोटबुक निकाली, जिसमें रातभर उसने हवेली की हर दीवार, चिन्ह और परछाई के निशान दर्ज किए थे। दोनों ने फैसला किया कि अब हवेली का इतिहास खंगालना होगा—वो इतिहास जो किताबों में नहीं लिखा, वो इतिहास जो हवेली की दीवारों में दफन है। वे कस्बे के पुराने पंडित श्रीधर बाबू से मिलने पहुंचे, जो गांव का चलता-फिरता इतिहास माने जाते थे। श्रीधर बाबू एक जीर्ण-शीर्ण मकान के बरामदे में बैठे थे, पीतल के लोटे में तुलसी का जल रखते और रामायण के श्लोक बुदबुदाते। अर्जुन ने उन्हें प्रणाम कर हवेली का जिक्र छेड़ा। पंडित जी की आंखों में एक अजीब सी चमक उभरी और उनके चेहरे पर भय की रेखाएं उभर आईं। वे बोले, “तुम दोनों उस हवेली से लौट आए, ये किसी चमत्कार से कम नहीं। वो हवेली कोई आम इमारत नहीं है बेटा। वो खून से सनी हुई ज़मीन पर बनी थी। उसका मालिक जमींदार बलराम सिंह था, जिसने 1857 की क्रांति के दौरान अपने ही सिपाहियों को धोखा दिया। क्रांतिकारियों को शरण देने का वचन देकर उसने उनके खजाने को हड़प लिया और उन्हें हवेली के तहखाने में कैद कर मौत के घाट उतार दिया। तभी से वो हवेली शापित है। उसकी दीवारें उन आत्माओं की चीखें अब तक समेटे हुए हैं।” अर्जुन और मीरा अवाक रह गए। हवेली की रात में जो आवाजें उन्होंने सुनी थीं, उनकी सच्चाई अब सामने थी।
श्रीधर बाबू ने उठकर अपनी अलमारी से एक पुरानी किताब निकाली, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे और जिल्द जगह-जगह से फटी हुई थी। किताब में हवेली का एक पुराना चित्र था, जिसमें हवेली पूरी भव्यता के साथ खड़ी थी, और सामने बलराम सिंह घोड़े पर सवार दिखाया गया था। पंडित जी ने कहा, “इस हवेली में बलराम सिंह ने अपनी हवस और लालच के लिए न जाने कितनों की जान ली। उसने सोचा था कि क्रांतिकारियों का खजाना उसका भाग्य बदल देगा। पर वो खजाना उसके लिए शाप बन गया। रातों रात हवेली में उसकी पत्नी और बच्चे भी रहस्यमयी तरीके से मारे गए। तब से हवेली वीरान है। कई लोग गए उसे देखने, पर लौटे नहीं। और जो लौटे, वे फिर कभी पहले जैसे न रहे।” मीरा ने अर्जुन की ओर देखा। उसकी आंखों में सवाल थे—क्या वे भी अब इस हवेली के शाप का हिस्सा बन चुके थे? अर्जुन ने अपनी नोटबुक निकाली और पंडित जी से पूछा, “क्या हवेली के तहखाने के बारे में कुछ लिखा है इस किताब में?” पंडित जी ने किताब के कुछ पन्ने पलटे और एक पन्ना दिखाया जिसमें हवेली का तहखाना और संदूक का चित्र बना था। उसके नीचे लिखा था—“रत्न संदूक: जिसमें क्रांतिकारियों की अमानत दफन है। जिसने भी इसे छेड़ा, वो चैन की नींद न सो सका।” मीरा ने गहरी सांस ली और कहा, “अर्जुन, अब हमें ये तय करना होगा कि इस हवेली की सच्चाई को दुनिया के सामने कैसे लाएं। ये सिर्फ एक कहानी नहीं, ये उन आत्माओं की पुकार है।”
अर्जुन और मीरा ने ठान लिया कि हवेली का इतिहास, वहां दफन सच और तहखाने की रहस्यमय चीजों को लेकर वे एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे। वे कस्बे के अन्य बुजुर्गों से भी मिले, जिन्होंने हवेली से जुड़े अपने-अपने अनुभव सुनाए—किसी ने वहां रात को रोशनी देखी थी, किसी ने सिसकियों की आवाजें सुनी थीं, तो किसी ने हवेली की दीवारों से आती किसी अदृश्य ताकत को महसूस किया था। अर्जुन ने सब कुछ अपने कैमरे में रिकॉर्ड किया। मीरा ने तहखाने में मिले चिन्हों की फोटो दिल्ली ले जाकर विशेषज्ञों को दिखाने की योजना बनाई। दोनों जब दोबारा हवेली लौटे तो सूरज ढल रहा था। हवेली की परछाइयाँ लंबी हो गई थीं और हवेली के सन्नाटे में फिर वही पुकार गूंज रही थी—“इन्साफ…” हवेली की टूटी खिड़कियों से आती हवा में एक दर्द था, एक पुकार थी जो कह रही थी कि इस हवेली के रहस्य को दुनिया तक पहुंचाना ही इसका एकमात्र समाधान है। अर्जुन और मीरा अब उस मिशन पर निकल चुके थे, जहां उनके कदम हवेली के इतिहास को उजागर करने और अंधेरे की परछाइयों को उजाले में लाने वाले थे।
६
दिल्ली लौटकर अर्जुन और मीरा ने हवेली की रातों, तहखाने की डरावनी परछाइयों और उन आत्माओं की पुकार को जैसे अपनी सांसों में बसाकर रखा था। उनका मन चैन नहीं पा रहा था। अर्जुन ने अपनी तस्वीरों, वीडियो रिकॉर्डिंग और मीरा की नोटबुक में दर्ज हर संकेत को एक रिपोर्ट का रूप देना शुरू किया। उसके कमरे की दीवारें उन तस्वीरों से भर गईं—हवेली की टूटी खिड़कियां, तहखाने का संदूक, दीवारों पर उकेरे गए चिन्ह, और सबसे ज्यादा, वो कंकालों का ढेर जो हवेली के अन्याय की गवाही थे। मीरा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर शाहनवाज से संपर्क किया, जो पुरानी हवेलियों और क्रांति-कालीन दस्तावेजों पर शोध करते थे। प्रोफेसर जब मीरा और अर्जुन से मिले और सबूत देखे तो उनके चेहरे पर अविश्वास और रोमांच का मिला-जुला भाव था। उन्होंने कहा, “अगर ये सब सच है, तो ये सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं है। ये उस समय के एक बड़े विश्वासघात की परतें खोलने जा रहा है, जिसे इतिहास की किताबों में दबा दिया गया था।” उन्होंने हवेली के चिन्हों और तहखाने में मिली तांबे की पट्टी पर लिखे शब्दों का विश्लेषण करने का काम अपने छात्रों को सौंपा। हर गुजरता दिन जैसे हवेली की परछाइयों को और भी पास खींच लाता था। अर्जुन और मीरा रातों को जागकर रिपोर्ट तैयार करते, तस्वीरों को बार-बार देखते और हवेली की घटनाओं को जोड़ते। कमरे की खिड़की से आती सर्द हवा में भी हवेली की दीवारों की सिसकियाँ जैसे सुनाई देतीं।
रिपोर्ट तैयार होते ही अर्जुन ने अपने चैनल के एडिटर से संपर्क किया। एडिटर ने पहले तो इसे एक और भूतिया कहानी मानकर टालना चाहा, मगर जब अर्जुन ने तस्वीरें, दस्तावेज और वीडियो रिकॉर्डिंग दिखाई, तो उसकी आंखों में गंभीरता उतर आई। उन्होंने कहा, “अगर ये सच है, तो ये रिपोर्ट इतिहास रच देगी। मगर हमें इसके हर पहलू की पुष्टि करनी होगी।” अर्जुन और मीरा ने तय किया कि वे फिर से शिवगढ़ जाएंगे—इस बार कैमरों की टीम और इतिहास विशेषज्ञों के साथ। दो दिन बाद एक छोटी टीम लेकर वे फिर से हवेली पहुंचे। हवेली की दीवारों पर सूरज की किरणें पड़ रही थीं, मगर हवेली का सन्नाटा वही था। कैमरों ने हर कोना, हर दरवाजा, हर दरार को रिकॉर्ड करना शुरू किया। प्रोफेसर शाहनवाज हवेली की दीवारों पर उकेरे चिन्हों का अनुवाद करने लगे। उन्होंने कहा, “ये सब संकेत बलराम सिंह के लालच और उस रात की सच्चाई को बयां कर रहे हैं। ये चिन्ह बलराम सिंह की हवेली के शाप की कहानी हैं।” तहखाने में टीम ने एक बार फिर उस संदूक को देखा। प्रोफेसर ने संदूक में पड़ी तलवार को उठाया और कहा, “ये तलवार किसी राजा की नहीं, बल्कि क्रांतिकारी दल की है। इसकी म्यान पर जो लिखा है वो साफ इशारा कर रहा है कि ये उन वीरों की याद है, जिनकी आत्माएं आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं।” हवेली के तहखाने की हवा जैसे फिर से सिसकने लगी थी। टीम के कुछ सदस्य डर से पीछे हट गए। मगर अर्जुन और मीरा ने कैमरों के सामने हवेली की कहानी को सचाई से बयां किया।
शूटिंग खत्म होते ही रिपोर्ट का प्रसारण पूरे देश में हुआ। चैनलों पर हवेली की रहस्यमयी दीवारें, तहखाने का खजाना, कंकालों का ढेर और आत्माओं की पुकार देशभर के लोगों तक पहुंच गई। लोग हैरान थे कि इतिहास की किताबों में दबी इतनी बड़ी सच्चाई सामने आई है। रातों रात हवेली पर डॉक्यूमेंट्री वायरल हो गई। लोग शिवगढ़ पहुंचने लगे, कोई इतिहास को जानने तो कोई हवेली के रहस्य को देखने। मगर हवेली अब भी वहीं खड़ी थी, अपनी परछाइयों में लिपटी, अपने भीतर की कराह और दर्द को समेटे। अर्जुन और मीरा को चैनल से बधाइयां मिलीं। मगर उनके दिल में अब भी एक टीस थी—हवेली की रूहों को सच्चा इन्साफ कौन देगा? क्या सिर्फ रिपोर्ट बना देना, सच दिखा देना काफी है? या उन आत्माओं की शांति के लिए कुछ और करना होगा? हवेली की दीवारें अब भी जैसे उन्हें पुकार रही थीं—एक अधूरे मिशन की याद दिलातीं। और अर्जुन और मीरा ने तय कर लिया कि उनकी अगली मंजिल होगी—बलराम सिंह के वंशजों को खोजना और हवेली की आत्माओं को वो इन्साफ दिलाना, जिसका वे डेढ़ सौ सालों से इंतजार कर रही हैं।
७
रात के सन्नाटे में अर्जुन की खिड़की से आती हवा में हवेली की परछाइयों की सिसकियाँ अब भी गूंजती रहतीं। डॉक्यूमेंट्री ने देशभर में तहलका मचा दिया था, मगर अर्जुन और मीरा की आत्मा को चैन नहीं था। हवेली की आत्माओं ने जैसे दोनों के दिल और सपनों में घर कर लिया था। मीरा अपनी डायरी में लगातार कुछ लिखती रहती—कभी हवेली की दीवारों पर बने चिन्हों की व्याख्या, कभी तहखाने में देखे कंकालों की करुण दास्तान। अर्जुन अब बलराम सिंह के वंशजों का पता लगाने में जुट गया था। उसने पुराने रिकॉर्ड खंगाले, जिला कचहरी के दस्तावेज़ निकाले और ब्रिटिश काल की पर्चियों को खंगाला। हफ्तों की मेहनत के बाद वो उस नाम तक पहुंचा—राणा प्रताप सिंह। बलराम सिंह का परपोता, जो अब मुंबई में किसी आलीशान बंगले में रहता था और बड़े उद्योगपति के रूप में जाना जाता था। अर्जुन और मीरा ने फैसला किया कि वे मुंबई जाकर राणा प्रताप सिंह से मिलेंगे। वे चाहते थे कि हवेली की सच्चाई उसी के वंशज की जुबानी भी दर्ज हो और उस हवेली के पाप का प्रायश्चित शुरू हो। मुंबई की गगनचुंबी इमारतों और जगमगाती सड़कों के बीच राणा प्रताप सिंह का बंगला किसी किले जैसा भव्य था। अर्जुन और मीरा जब उसके दफ्तर पहुंचे तो राणा प्रताप सिंह एक सजी-धजी बड़ी कुर्सी पर बैठा हुआ था। उसके चेहरे पर गर्व और ठहराव था। मगर जब अर्जुन ने हवेली का जिक्र किया तो उसकी आंखों में एक पल को हल्की बेचैनी उभरी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “उस हवेली का नाम मत लो। वो हमारे खानदान का कलंक है। मेरे परदादा के पाप की सजा हम पीढ़ियों से भुगत रहे हैं। मेरी मां उस हवेली की परछाइयों को देख कर पागल हो गई थी। मैं नहीं चाहता वो इतिहास दोहराया जाए।”
अर्जुन और मीरा स्तब्ध रह गए। ये वो सच था जो किताबों से परे था—खानदान की रगों में दौड़ती एक अपराधबोध की पीड़ा। मीरा ने कहा, “राणा साहब, हवेली की आत्माएं अब भी भटक रही हैं। क्या आप नहीं चाहते कि उनकी शांति के लिए कुछ किया जाए?” राणा प्रताप सिंह की आंखें भर आईं। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैं चाहता हूं। मगर मुझे डर है। वो हवेली एक बार फिर हमें तबाह न कर दे। मैंने सुना है हवेली का खजाना शापित है। और जो भी उसे छुएगा, वो बर्बाद हो जाएगा।” अर्जुन ने राणा प्रताप को हवेली की डॉक्यूमेंट्री दिखाई, तहखाने की तस्वीरें दिखाईं। राणा प्रताप की आंखों में अब दर्द और पछतावे का समंदर उतर आया। उसने कहा, “अगर सचमुच उन आत्माओं को मुक्ति मिल सकती है, तो मैं तैयार हूं। मैं उस हवेली को सरकार को सौंप दूंगा। वो एक स्मारक बने, ताकि लोग जानें कि लालच और विश्वासघात का अंजाम क्या होता है।” अर्जुन और मीरा ने राहत की सांस ली। अब उनकी मुहिम एक नए मोड़ पर थी। राणा प्रताप सिंह के हस्ताक्षर के बाद हवेली को ऐतिहासिक धरोहर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई। मगर हवेली की दीवारें अब भी सिसकती रहीं, मानो कह रही हों कि सिर्फ कागजों पर नहीं, न्याय हकीकत में हो।
हवेली की आत्माओं की मुक्ति का रास्ता अब खुल गया था, मगर अर्जुन और मीरा जानते थे कि अब उन्हें अंतिम कदम उठाना होगा। उन्होंने तय किया कि एक विशेष यज्ञ और प्रार्थना का आयोजन हवेली के आंगन में किया जाएगा, जहां बलराम सिंह ने अपने सिपाहियों का खून बहाया था। शिवगढ़ के पुजारियों और गांव के बुजुर्गों को बुलाया गया। चारों ओर दीपक जलाए गए। हवेली, जो वर्षों से अंधेरे में डूबी थी, पहली बार उजाले से नहाई। मंत्रों की ध्वनि, शंखों की आवाज़ और हवन की अग्नि की आभा में हवेली की दीवारें जैसे कांप उठीं। हवेली के आंगन में खड़े अर्जुन, मीरा और राणा प्रताप सिंह ने मिलकर आत्माओं की शांति की प्रार्थना की। रातभर यज्ञ चला और सुबह की पहली किरण के साथ हवेली के तहखाने से आती हवा में वो सिसकियाँ शांत हो गईं। हवेली की दीवारों पर टंगी परछाइयाँ जैसे विदा हो गईं। हवेली अब भी खड़ी थी—गवाह की तरह, मगर अब वहां कराह नहीं थी, बल्कि सच्चाई के उजाले की चमक थी। अर्जुन और मीरा की आंखों में नमी थी। उन्होंने उस हवेली के आगे सिर झुकाया। हवेली की परछाइयाँ अब उजाले में समा गई थीं। एक काली कहानी अब इतिहास के पन्नों में न्याय के अध्याय में बदल चुकी थी।
८
सूरज की पहली किरण ने हवेली की वीरान दीवारों को ऐसे छुआ मानो सदियों की कालिख को धो देना चाहती हो। हवेली अब वैसी डरावनी नहीं रही थी जैसी पहले थी। हवेली के आंगन में किए गए यज्ञ और प्रार्थनाओं ने जैसे उस पर लगे शाप का प्रभाव कम कर दिया था। अर्जुन और मीरा अब वहां खड़े होकर हवेली को किसी पुरानी पीड़ा में डूबी रूह की तरह नहीं, बल्कि इतिहास की एक जीवित गवाही की तरह देख रहे थे। राणा प्रताप सिंह के सहयोग और सरकार की सहमति से हवेली को ऐतिहासिक स्मारक में बदलने का काम शुरू हो गया था। पुरातत्व विभाग की टीमें हवेली के हर पत्थर, हर चिन्ह और तहखाने की दीवारों का सावधानी से अध्ययन करने लगीं। तहखाने में पड़ी तलवार, रत्नजड़ित संदूक और कंकालों के अवशेषों को सुरक्षित किया जाने लगा ताकि उन्हें संग्रहालय में रखा जा सके। गांव के लोग, जो वर्षों तक हवेली के आसपास जाने से डरते थे, अब आंगन में आकर दीये जलाने लगे। बच्चों की किलकारियां हवेली की वीरान हवा को एक नई जिंदगी दे रही थीं। अर्जुन और मीरा ने महसूस किया कि हवेली की आत्माएं शायद इसी दिन की प्रतीक्षा कर रही थीं। हवेली अब भी खामोश थी, मगर उस खामोशी में सुकून था, डर नहीं।
अर्जुन और मीरा ने मिलकर एक प्रदर्शनी की योजना बनाई—हवेली का सच, उसके तहखाने का रहस्य और बलराम सिंह की कहानी को चित्रों, दस्तावेजों और विडियो के जरिए दुनिया के सामने लाने की। डॉक्यूमेंट्री को नए तथ्य और शोध के साथ फिर से तैयार किया गया और एक भव्य प्रदर्शनी दिल्ली के एक बड़े हॉल में लगाई गई। उस प्रदर्शनी में वो तस्वीरें थीं जिनमें हवेली की दीवारों पर उकेरे गए चिन्ह, तहखाने का संदूक, बलराम सिंह की दुर्लभ पेंटिंग और उस यज्ञ की झलक थी जो हवेली में आत्माओं की शांति के लिए किया गया था। दर्शक जब इन तस्वीरों को देखते तो सिहर उठते। हवेली की कहानी अब केवल एक भयावह रहस्य नहीं थी, बल्कि एक सबक बन चुकी थी—कि लालच और विश्वासघात का अंजाम कितना भयानक हो सकता है। राणा प्रताप सिंह भी इस प्रदर्शनी में शामिल हुआ। उसकी आंखों में संतोष और शांति की मिलीजुली चमक थी। उसने मंच पर आकर कहा, “आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि मेरे खानदान का कलंक अब एक ऐतिहासिक सीख में बदल गया है। हवेली अब उन आत्माओं की करुण पुकार नहीं, बल्कि उनके इन्साफ की कहानी कहती है।” दर्शकों ने तालियों से स्वागत किया और उस रात हवेली की कहानी पूरे देश में फिर से गूंज उठी।
हवेली के स्मारक बनने के बाद हर साल वहां एक मेले का आयोजन होने लगा, जिसमें इतिहास प्रेमी, छात्र, और पर्यटक शामिल होने लगे। हवेली के आंगन में दीपों की रौशनी से रातें जगमगाने लगीं। तहखाने के ऊपर बने छोटे संग्रहालय में वो संदूक, तलवार और तांबे की पट्टी रखी गई, जिन्हें देख कर लोग इतिहास के उन भटके वीरों को याद करते जिनकी आत्माएं कभी वहां भटकी थीं। हवेली की परछाइयाँ अब अंधेरे की साथी नहीं रहीं। हवेली का नाम अब डर की कहानियों से नहीं, बल्कि उस इतिहास से जुड़ गया था जिसने सत्य, न्याय और प्रायश्चित की मिसाल पेश की। अर्जुन और मीरा, जिन्होंने इस कहानी की परतें खोली थीं, अब नए रहस्यों को उजागर करने की यात्रा पर निकल पड़े थे। मगर हर बार जब वे किसी नई हवेली या किले की ओर कदम बढ़ाते, तो शिवगढ़ की हवेली की वो करुण पुकार, वो परछाइयाँ और वो यज्ञ की अग्नि की लपटें उनके दिल में फिर से गूंज उठतीं—स्मरण करातीं कि सच की तलाश कभी खत्म नहीं होती। हवेली की रूहें अब आजाद थीं, और हवेली एक जीवंत गाथा बन चुकी थी।
९
हवेली अब एक स्मारक बन चुकी थी। मगर हवेली की दीवारों, तहखाने के पत्थरों और संदूक के नीचे दबी मिट्टी में शायद अब भी कोई अनकही कहानी दबी थी। अर्जुन और मीरा जब एक दिन हवेली के संग्रहालय में दस्तावेजों की जांच कर रहे थे, तो पुरातत्व विभाग के एक कर्मचारी ने आकर उन्हें बताया कि तहखाने की पिछली दीवार पर हाल ही में हुई सफाई में एक अजीब सी दरार नजर आई है, जो किसी सुरंग का संकेत देती है। अर्जुन और मीरा की आंखों में फिर वही जिज्ञासा और उत्सुकता की चमक लौट आई। वे तुरंत तहखाने में पहुंचे। पुरानी दीवार पर हाथ फेरते हुए मीरा ने पाया कि पत्थर की परतें किसी नकली आड़ की तरह लग रही थीं। अर्जुन ने पुरातत्व विभाग की टीम से विशेष उपकरण मंगवाए और दीवार पर हल्का प्रहार करना शुरू किया। पत्थरों की परत धीरे-धीरे गिरती गई और उसके पीछे एक संकरी, अंधेरी सुरंग का मुंह दिखाई देने लगा। हवेली की हवा जैसे फिर से सिहर उठी थी। सुरंग से ठंडी, सीली मिट्टी की गंध और सदियों की नमी का अहसास हो रहा था। अर्जुन ने टॉर्च जलाई और सुरंग के भीतर कदम बढ़ा दिए। मीरा ने भी साहस जुटाया और उसके पीछे हो ली। दोनों धीरे-धीरे उस संकरे रास्ते में आगे बढ़ते गए, जहां हर कदम पर अजीब सी सरसराहट और हवा की सीटी जैसी आवाज़ें गूंज रही थीं।
सुरंग बेहद लंबी थी और जमीन के काफी नीचे जा रही थी। रास्ते में जगह-जगह छोटे पत्थर और लकड़ी की सड़ी-गली बल्लियाँ पड़ी थीं, जो शायद कभी इस सुरंग को सहारा देती हों। अर्जुन और मीरा ने दीवारों पर हाथ फेरते हुए महसूस किया कि कहीं-कहीं पर उर्दू और संस्कृत के मिले-जुले शब्द खुदे हुए थे। टॉर्च की रोशनी में उन शब्दों को पढ़ने पर मालूम हुआ कि ये रास्ता न सिर्फ हवेली से बाहर निकलने के लिए बनाया गया था, बल्कि ये सुरंग खजाने को गुप्त रूप से किसी और जगह ले जाने के लिए बनाई गई थी। चलते-चलते अचानक मीरा का पैर किसी लोहे की वस्तु से टकराया। नीचे देखा तो एक छोटा लोहे का संदूकचा पड़ा था, जिस पर अब भी जंग लगी कुंडी लगी थी। अर्जुन ने उसे उठाकर खोलने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद कुंडी टूटी और संदूकचे के भीतर से एक ताम्रपत्र और कुछ पुराने सिक्के मिले। ताम्रपत्र पर लिखा था—“यह खजाना उस वीरता की निशानी है जो विश्वासघात के अंधकार में बुझा दी गई। जो भी इसे पाए, वो इसे न्याय की राह में लगाए।” मीरा की आंखों में आंसू भर आए। हवेली की परछाइयाँ, आत्माओं की पुकार, सब फिर से उस सुरंग की हवा में गूंजने लगी थीं।
सुरंग आखिरकार गांव के बाहर एक पुराने कुएं के पास खुली। ये वही कुआं था जिसके बारे में गांव में कहावत थी कि उसमें झांकने वाला अपनी परछाईं खो बैठता है। अर्जुन और मीरा उस खुली जगह पर पहुंचे तो महसूस हुआ जैसे हवेली की आत्माएं उनकी खोज से संतुष्ट हो गई हों। उन्होंने तय किया कि इस सुरंग और खजाने के बारे में भी स्मारक का हिस्सा बनाया जाएगा। ताम्रपत्र, सिक्के और सुरंग की कहानी अब हवेली के संग्रहालय में प्रदर्शित होने लगी। हवेली अब सिर्फ अतीत का गवाह नहीं, बल्कि न्याय और सच्चाई के लिए की गई खोजों की मिसाल बन चुकी थी। अर्जुन और मीरा के कदम अब भी थमे नहीं थे। हवेली की इस नई परत ने उन्हें सिखाया था कि हर ईंट, हर पत्थर के पीछे एक कहानी छुपी हो सकती है, जिसे उजागर करना उनका कर्तव्य था। हवेली की परछाइयाँ अब उनकी यात्रा की प्रेरणा बन चुकी थीं—एक ऐसी यात्रा जो अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती रही।
१०
हवेली की परछाइयाँ अब शांत थीं। हवेली का हर पत्थर, हर ईंट, हर सुरंग और तहखाना अब न्याय की कहानी कह रहा था। हवेली के संग्रहालय में लोगों की भीड़ लगी रहती, और हर कोई वहां की तस्वीरों, दस्तावेजों, ताम्रपत्र और खजाने के अवशेषों को देखकर अतीत की उन गलियों में खो जाता जहां हवेली की आत्माओं ने सदियों तक मुक्ति की प्रतीक्षा की थी। अर्जुन और मीरा, जिन्होंने हवेली की परतें खोली थीं, अब गांव के बच्चों को हवेली की कहानी सुनाते। हवेली की टूटी खिड़कियों से छनकर आती रोशनी अब डर नहीं, बल्कि उम्मीद की किरणें बिखेरती। हवेली के आंगन में हर साल उस रात विशेष यज्ञ का आयोजन होने लगा, जब पहली बार हवेली की आत्माओं को शांति मिली थी। अर्जुन और मीरा जब हवेली की दीवारों को देखते, तो महसूस करते जैसे उन दीवारों में बसी आत्माएं उन्हें आशीर्वाद दे रही हों। मगर उनके मन में कहीं न कहीं यह सवाल अब भी था—क्या हवेली की कहानी सचमुच पूरी हो चुकी थी? क्या सचमुच हर आत्मा मुक्त हो चुकी थी? या अंधेरे की परछाइयाँ अब भी कहीं किसी गुप्त कोने में सोई हुई थीं, किसी और खोज की प्रतीक्षा में?
एक दिन हवेली के संग्रहालय के निरीक्षण के दौरान मीरा की नजर एक पुरानी पेंटिंग पर पड़ी, जो संग्रहालय के कोने में धूल में सनी पड़ी थी। वह पेंटिंग बलराम सिंह के दरबार की थी। मगर पेंटिंग के एक कोने में एक रहस्यमयी आकृति खड़ी थी—एक महिला, जिसके चेहरे पर घूंघट था, और आंखों से झांकता दर्द साफ दिखता था। पेंटिंग के पीछे लिखा था—“वो जिसने सब देखा, मगर कुछ कह न सकी।” अर्जुन और मीरा की जिज्ञासा फिर जाग उठी। ये कौन थी? क्या हवेली की कहानी में कोई और किरदार था जिसकी दास्तान अब तक अनकही थी? अर्जुन ने गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति से इस पेंटिंग का सच जानना चाहा। बुजुर्ग ने कांपती आवाज़ में बताया कि बलराम सिंह की एक दासी थी, जो उस रात तहखाने में हुई हर घटना की गवाह थी। मगर बलराम सिंह ने उसे भी सुरंग में कैद कर मौत के घाट उतार दिया था ताकि वो उसका राज कभी उजागर न कर सके। उसकी आत्मा भी अब तक हवेली में भटकती थी। अर्जुन और मीरा ने तय किया कि अब उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव उस गुमनाम आत्मा की मुक्ति होगी। उन्होंने फिर से हवेली के तहखाने और सुरंग की जांच शुरू की, और सुरंग की एक बंद शाखा में कंकाल की चूड़ियों और एक लोहे के पायल का ढेर मिला, जो उस दासी की निशानी थी।
उस रात हवेली में फिर से दीपक जलाए गए। गांव के लोग, पुजारी और हवेली की कहानी से जुड़े सभी लोग वहां इकट्ठा हुए। विशेष प्रार्थना और यज्ञ का आयोजन हुआ—इस बार उस गुमनाम आत्मा की शांति के लिए। हवेली की हवा फिर से सिहर उठी थी। हवेली की दीवारों से धीमे स्वर में जैसे सिसकियाँ गूंज रही थीं—आखिरी बार। और फिर भोर की पहली किरण के साथ हवेली की हवा एकदम शांत हो गई। हवेली की परछाइयाँ अब सचमुच उजाले में समा चुकी थीं। हवेली अब सिर्फ एक स्मारक नहीं थी, बल्कि न्याय, सत्य और साहस की एक जीवंत गाथा थी। अर्जुन और मीरा ने हवेली के सामने खड़े होकर सिर झुकाया। उनकी आंखों में संतोष था, मगर दिल में ये भी पता था कि सच की खोज कभी खत्म नहीं होती। हवेली की रूहें अब मुक्त थीं, मगर दुनिया में और भी कई हवेलियाँ, किले और अंधेरे अपनी कहानी कहने को तैयार थे। अर्जुन और मीरा की यात्रा खत्म नहीं हुई थी—वो बस एक नए रहस्य की ओर बढ़ चली थी, जहां फिर से परछाइयों को उजाले में लाना था।
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