मनीष कुमार तिवारी
भोपाल की शाम में एक अजीब सी खामोशी थी, जैसे कोई पुरानी आवाज़ शहर की हवाओं में छुपी हुई हो। रामस्वरूप मिश्रा, पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त हवलदार, का पार्थिव शरीर श्मशान से घर वापस नहीं आया था — वह वहीं राख बन चुका था, और अब केवल स्मृतियों में बचा था। उनके बेटे अभिषेक मिश्रा ने अनगिनत हाथ मिलाए, नम आँखें देखीं और एक अजीब से खालीपन को अपने भीतर महसूस किया। पंडित, रिश्तेदार और कुछ पुराने सहयोगी भी आए थे, लेकिन सबसे ज़्यादा चुभती थी वह चुप्पी जो उनकी माँ संध्या के चेहरे पर थी — वर्षों से उन्होंने अपने पति को एक जुनून के साथ जीते देखा था, और अब वही आदमी एक मूक राख बनकर संसार से विदा हो गया था। दिनभर की थकावट और रीतापन लेकर जब अभिषेक रात को अपने पुराने कमरे में सोने गया, तब वह एक अलमारी के पास ठिठक गया — वही लकड़ी की भारी अलमारी जिसमें उसके पिता अपने पुलिसिया दिनों की यादें, फाइलें और बक्से रखते थे।
उसे खुद नहीं पता था कि क्यों, लेकिन उसने उस अलमारी को खोला, जैसे कोई अदृश्य धागा उसे वहां खींच रहा हो। अंदर बहुत सी चीज़ें थीं — पुरानी टोपी, बेल्ट, कुछ खाकी कपड़े, दो संदूक और एक मोटी-सी डायरी। डायरी पर धूल की एक मोटी परत थी, और ऊपर के कोने में नाम लिखा था — ‘ह. रामस्वरूप मिश्रा’। उसने डायरी खोली, तो पहले पन्ने पर लिखा था: “कुछ केस इंसान के साथ मरते नहीं हैं, वे उसकी आत्मा में रह जाते हैं।” डायरी का पहला पन्ना ही जैसे किसी पुराने राज़ का दरवाज़ा था। धीरे-धीरे पढ़ते हुए अभिषेक को अहसास हुआ कि उसके पिता ने एक विशेष केस को लेकर अपने निजी अनुभव दर्ज किए थे — एक हत्या, जिसे आत्महत्या कहा गया, लेकिन उसके पिता का मानना था कि सच्चाई कुछ और थी। केस का साल था 1994, और पीड़िता का नाम था रेखा शर्मा — एक छात्रा जिसकी मौत आज भी हवलदार मिश्रा की आत्मा में धँसी थी।
डायरी में लिखा था कि केस के सारे सबूत धीरे-धीरे गायब होते गए, गवाहों ने चुप्पी साध ली, और आला अधिकारियों ने केस को “बंद फाइल” घोषित कर दिया। रामस्वरूप ने लिखा था कि उन्हें तब की व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा था, इसलिए उन्होंने चुपचाप सारी जानकारी अपने पास रखने की ठानी। हर पन्ना जैसे चीख-चीख कर कह रहा था कि यह आत्महत्या नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी हत्या थी, जिसमें किसी शक्तिशाली व्यक्ति का हाथ था। अभिषेक ने डायरी को हाथ में थामे हुए कमरे की बत्ती बुझाई, लेकिन नींद उसके आसपास भी नहीं फटकी। उस रात उसके मन में सवालों की एक आँधी थी — क्या उसके पिता सचमुच एक ऐसे रहस्य के गवाह थे जिसे दुनिया ने नजरअंदाज़ कर दिया था? क्या वह अब उस केस को दोबारा जगा सकता है? क्या 30 साल पुरानी फाइल को फिर से खुलवाया जा सकता है?
उसने खिड़की से बाहर झाँका — भोपाल की गलियों में रात का सन्नाटा पसरा था, लेकिन उसके भीतर जैसे एक गूंज उठी थी। डायरी अब उसके हाथ में नहीं, उसकी आत्मा में समा चुकी थी। उसने तय कर लिया था — चाहे जो भी हो, वह इस केस की तह तक जाएगा। यह अब सिर्फ उसके पिता की अधूरी कहानी नहीं थी, बल्कि उसके अपने अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन चुका था। वह जानता था कि उसे मुश्किलें आएंगी, सवाल उठेंगे, डर भी सताएगा, लेकिन वह पीछे नहीं हटेगा। क्योंकि यह कहानी अब उसकी थी, और अंत तक उसका पीछा करेगी — जब तक कि वह आखिरी पन्ना भी खुद अपने हाथों से न लिख दे।
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अगली सुबह अभिषेक की आंखें सूरज की रौशनी से नहीं, बल्कि डायरी में लिखे उन शब्दों की गर्मी से खुलीं जो रातभर उसके मन में घूमते रहे थे। किचन से चाय की खुशबू और माँ की खांसी की हल्की आवाज़ आ रही थी, लेकिन उसका मन अभी भी उसी अलमारी के सामने रुका था, जहाँ से वह भूली हुई डायरी मिली थी। उसने डायरी के अगले कुछ पन्ने पढ़ने शुरू किए, और जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया, मामला और उलझता गया। रेखा शर्मा — एक होनहार छात्रा, भोपाल यूनिवर्सिटी की टॉपर, जिसकी अचानक मौत को आत्महत्या बताया गया था। डायरी में दर्ज था कि पुलिस को शव रेखा के किराए के फ्लैट में मिला था, दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन खिड़की टूटी हुई थी। रामस्वरूप ने लिखा था कि उन्होंने पहली नजर में ही कुछ असामान्यता महसूस की थी — कमरे में कोई संघर्ष के निशान नहीं थे, लेकिन फर्श पर जूते के दो अलग-अलग निशान थे, एक महिला का और एक पुरुष का।
सबसे चौंकाने वाली बात थी पोस्टमार्टम रिपोर्ट — जो पहले दिन “फांसी से मृत्यु” कहती थी, वह अगले दिन संशोधित होकर “जहर की संभावना” बन गई थी। डायरी में साफ लिखा था कि फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट कुछ घंटे में बदल दी गई थी, और जब रामस्वरूप ने सवाल उठाया, तो उन्हें सीन से हटा दिया गया। तब के डीएसपी सुरेश चौहान ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें फाइल से बाहर कर दिया, और केस को “बंद आत्महत्या केस” घोषित कर दिया गया। अभिषेक ने डायरी पढ़ते हुए नोट किया कि उसके पिता ने जिन बिंदुओं को लिखा था, वे एक पेशेवर जाँच अधिकारी की आंखों से निकले थे — जूते के निशान, दीवार पर खरोंच, अलमारी की टूटी कुंडी, और एक अधजली चिट्ठी जो मौके से मिली थी लेकिन बाद में फाइल में मौजूद नहीं रही। ऐसा लग रहा था जैसे कोई हर सबूत को व्यवस्थित ढंग से मिटा रहा हो।
अभिषेक ने अपनी टेबल पर डायरी फैलाई, और एक नोटबुक निकाली — उसने लिखना शुरू किया: “रेखा शर्मा – मृत्यु की तारीख 12 जून 1994, लोकेशन – न्यू मार्केट के पास किराए का फ्लैट, केस बंद – 20 जून 1994, रिपोर्ट – आत्महत्या। विरोधाभास – पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बदलाव, गवाहों की चुप्पी, सबूतों का गायब होना।” फिर उसने रेखा के कॉलेज का नाम खोजा, और फोन किया — वह वहाँ अगले दिन जाना चाहता था। यह सब करते समय उसके मन में पिता का चेहरा घूम रहा था — एक ऐसा इंसान जिसे सच की भूख थी, लेकिन व्यवस्था ने उसका मुँह बंद कर दिया।
उस रात डायरी उसके सिरहाने थी, जैसे कोई पुराना सिपाही चुपचाप पहरा दे रहा हो। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी, लेकिन अभिषेक के भीतर एक आग जल रही थी — सवालों की, न्याय की, और अपने पिता के अधूरे संघर्ष को पूरा करने की। वह जानता था कि अब वह सिर्फ एक डायरी नहीं पढ़ रहा था — वह उस सच्चाई का पीछा कर रहा था जिसे समय ने दबा दिया था। लेकिन वह यह भी जानता था कि अगर उसका पिता झूठ के खिलाफ खड़ा हो सकता है, तो वह भी पीछे नहीं हटेगा — चाहे वह “बंद फाइल” हो या बंद दरवाजे।
अगले दिन भोपाल विश्वविद्यालय का परिसर बहुत कुछ वैसा ही लगा जैसे डायरी में वर्णित था — लंबे गलियारे, पुरानी ईंटों की इमारतें, और क्लासरूम के बाहर खामोश सी लाइब्रेरी। लेकिन इन ईंटों के बीच अब कोई रेखा शर्मा नहीं थी, सिर्फ उसकी स्मृतियाँ और कुछ धुंधले सवाल थे। अभिषेक ने खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताते हुए रजिस्ट्रार से रेखा शर्मा का नाम पूछा। वर्षों पुराना रिकॉर्ड ढूँढ़ा गया — नाम मिला, एडमिशन मिला, लेकिन पासिंग ईयर का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं था। “माफ कीजिए, कुछ पुरानी फाइलें यूनिवर्सिटी शिफ्टिंग के दौरान नष्ट हो गई थीं,” रजिस्ट्रार ने लाचारी से कहा। लेकिन किसी ने धीरे से बताया कि प्रोफेसर सेन आज भी यहाँ पढ़ाते हैं — वही जो रेखा की फेवरिट प्रोफेसर हुआ करते थे।
प्रोफेसर सेन का कमरा भी उतना ही पुराना था, जितनी यह कहानी। एक मध्यम उम्र का आदमी, सफेद बालों और धुँधली आँखों वाला, जब अभिषेक ने उसे रेखा शर्मा का नाम लिया तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें जम गईं। “आप उसके पिता के बेटे हैं?” उसने धीमे स्वर में पूछा। अभिषेक ने सिर हिलाया और डायरी दिखाई। प्रोफेसर की आँखें नम हो गईं। “रेखा बहुत होशियार थी… लेकिन वह कुछ परेशान रहने लगी थी… खासकर आखिरी कुछ महीनों में,” उसने कहा। “क्या कारण था?” अभिषेक ने पूछा। प्रोफेसर कुछ पल चुप रहे, फिर बोले — “उसका एक रिश्ता था, किसी राजनेता के बेटे से… शायद राजीव नाम था। वह रिश्ता रेखा को तोड़ रहा था। और मुझे शक है… उसने ही…” उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई। फिर वे बोले, “रेखा ने मुझे एक चिट्ठी दिखाई थी, जिसमें उसने लिखा था कि अगर उसे कुछ हो जाए, तो किसी पर भरोसा न किया जाए… लेकिन वो चिट्ठी बाद में पुलिस को दी गई, और फिर मैंने उसे कभी नहीं देखा।”
अभिषेक का दिल तेजी से धड़कने लगा। डायरी में भी उस अधजली चिट्ठी का जिक्र था, जो केस फाइल से गायब हो गई थी। अब वह व्यक्ति सामने था जिसने वह चिट्ठी खुद देखी थी। “आप मेरे साथ पुलिस स्टेशन चल सकते हैं?” अभिषेक ने पूछा। प्रोफेसर हँसे — एक थकी हुई हँसी। “बेटा, मैंने एक बार कोशिश की थी… लेकिन उस समय के डीएसपी ने मुझे धमकाया, कहा कि मुझे अपने परिवार की सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए। तब से मैंने सब कुछ छोड़ दिया।” वह उठे, किताबों की अलमारी खोली, और एक पुराना रजिस्टर निकालकर बोले, “अगर तुम सच में कुछ करना चाहते हो, तो ये लो — ये रेखा की क्लास की अटेंडेंस शीट है, और राजीव का नाम भी इसमें मिलेगा, बतौर गेस्ट विज़िटर। शायद ये कुछ मदद करे।”
अभिषेक रजिस्टर लेकर बाहर निकला, और अपने स्कूटर पर बैठते हुए उसने डायरी को फिर से देखा — उसका मन कह रहा था कि वह धीरे-धीरे उसी रास्ते पर चल रहा है जिस पर कभी उसके पिता चले थे। फर्क बस इतना था कि अब उनके पास समय नहीं था, लेकिन उसके पास जुनून था। भोपाल की गलियों में लौटते हुए उसे लग रहा था जैसे कुछ अदृश्य आँखें उसे देख रही हों — पर वह अब डर नहीं रहा था। वह जानता था, उसने पहली परत हटा दी है — अब नीचे की सच्चाई दिखेगी, चाहे कितनी भी स्याही से ढकी हो।
भोपाल के बाहरी इलाके में एक पुराना फार्महाउस, जहाँ अब जीवन की गति नहीं, सिर्फ एक बीते समय की परछाई चलती थी। अभिषेक वहाँ पहुंचा जहाँ डायरी के अनुसार डीएसपी सुरेश चौहान अपने रिटायरमेंट के बाद एकांत में रह रहे थे। लोहे का गेट जंग खा चुका था, घासें उग आई थीं और दरवाज़े के बाहर एक पुराना कुत्ता बिना भौंके अभिषेक को देखता रहा। उसने धीरे से घंटी दबाई। कुछ मिनट बाद एक वृद्ध व्यक्ति ने दरवाज़ा खोला — हल्के सफेद बाल, सूजी हुई आँखें और थके हुए कंधे। “आप सुरेश चौहान हैं?” अभिषेक ने पूछा। उन्होंने बिना कुछ बोले सिर हिलाया। “मैं रामस्वरूप मिश्रा का बेटा हूँ।” उस वाक्य को सुनते ही चौहान जैसे कुछ पल के लिए जड़ हो गए। फिर वे बिना कुछ कहे दरवाज़ा खोलकर पीछे हट गए, इशारा किया — “आओ।”
अंदर का कमरा अंधेरे से भरा हुआ था, पर्दे गिरे हुए थे और दीवारों पर पुराने मेडल और फोटो जड़े थे। सुरेश चौहान एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गए और बोले, “तुम्हारा बाप बहुत जिद्दी आदमी था… बहुत सी बातों को लेकर जुनूनी।” अभिषेक ने डायरी की प्रतिलिपि उनके सामने रखी और कहा, “पर वो गलत नहीं था।” कुछ देर तक चौहान पन्ने पलटते रहे, फिर गहरी सांस लेकर बोले, “उस केस को बंद कराना मेरी गलती नहीं थी… मजबूरी थी।” अभिषेक ने पूछा, “किसकी मजबूरी? कौन था जो सच दबा रहा था?” चौहान की आँखें अब झुकी हुई थीं। “तुम्हें नहीं पता, उस वक़्त भोपाल की राजनीति कैसी थी। राजीव मेहरा सिर्फ एक लड़का नहीं था, वो विधायक त्रिलोक मेहरा का बेटा था। रेखा केस के अगले ही दिन मेरे ऑफिस में मंत्री का आदमी आया — बोला कि ‘केस को शांत कर दो, वरना ट्रांसफर नहीं, तुम्हारी नौकरी खत्म हो जाएगी।’”
“तो आपने सच्चाई छुपा दी?” अभिषेक का स्वर कठोर था। चौहान बोले, “हम सब डरते हैं बेटा… डर परिवार का होता है, अपनी जान का होता है। मैंने भी वही किया जो हर कोई करता है — चुप्पी। तुम्हारे पिता अकेले लड़े, उन्होंने चुप नहीं रहना चाहा, इसलिए उन्हें केस से हटाया गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी — वो डायरी इस बात का सबूत है।” एक लंबा मौन छाया रहा। फिर चौहान बोले, “मैंने अपने पाप को चुपचाप जी लिया है। हर रात रेखा का चेहरा सपनों में आता है, और तुम्हारे पिता की आंखें… जैसे वो पूछ रहे हों — ‘अब भी चुप रहोगे?’”
अभिषेक उठ खड़ा हुआ, उसकी आंखों में मिश्रण था — आक्रोश और करुणा का। “आप चाहें तो अब भी चुप रह सकते हैं… लेकिन मैं नहीं रहूंगा।” चौहान ने सिर झुका लिया, और धीमे से बोले, “अगर तुम केस खोलना चाहते हो, तो मेरे एक पुराने ट्रंक में कुछ कागज़ हैं — रेखा की ऑटोप्सी रिपोर्ट की असली कॉपी, जो मैं दबाव में बदल नहीं पाया। शायद अब वो किसी काम आ जाए।” उन्होंने एक चाबी दी, जो उस फार्महाउस के नीचे रखे लोहे के संदूक को खोलती थी। अभिषेक ने वो रिपोर्ट निकाली, और उसकी आँखों में एक चमक थी — यह सबूत था कि उसके पिता ने जो सोचा था, वह कल्पना नहीं था। जब वह फार्महाउस से बाहर निकला, सूरज ढलने को था। पर उसके भीतर एक नई रोशनी उग चुकी थी — एक गवाह मिला था, एक सबूत मिला था, और अब अगला कदम था — उस नाम से टकराना, जिसे सबने छुआ भी नहीं था: राजीव मेहरा।
संध्या के चेहरे पर चिंता की हल्की रेखाएं थीं जब अभिषेक ने उन्हें बताया कि वह शहर के बाहर एक पुराने चौकीदार को खोजने जा रहा है — वही रमेश, जिसका जिक्र डायरी में बार-बार आया था। “उस केस का गवाह…?” उन्होंने चौंककर पूछा। अभिषेक ने सिर हिलाया, “पिता जी ने लिखा था कि रमेश ने रेखा के फ्लैट के बाहर कुछ देखा था, लेकिन बाद में अचानक सब कुछ भूल गया, जैसे कुछ डर उसे खा गया हो।” माँ ने धीमे से कहा, “तुम्हारे पापा कई बार उसे ढूँढ़ने गए थे… लेकिन रमेश गायब हो गया था।” अभिषेक ने पुराने संपर्कों से जानकारी जुटाई, और आखिरकार एक नाम उभरा — रमेश तिवारी, गाँव – सिहोर के पास, करोंद। अगले ही दिन, धूल भरे रास्तों और धूप से चमकते खेतों के बीच, एक पुराना कच्चा मकान मिला, जिसके बाहर एक आदमी टूटी चारपाई पर लेटा था — शराब की बोतल उसके पास पड़ी थी और आँखें सूजी हुई थीं।
“रमेश तिवारी?” अभिषेक ने पूछा। बूढ़ा आदमी उठकर बैठा, नजरें टेढ़ी-मेढ़ी लेकिन सावधान। “कौन हो?” “रामस्वरूप मिश्रा का बेटा,” सुनते ही जैसे किसी ने उसके सीने में बिजली डाल दी हो। वह चुप हो गया, होंठ सूखने लगे। अभिषेक ने कहा, “मेरे पिता की डायरी में तुम थे… उस रात तुम ड्यूटी पर थे… तुमने कुछ देखा था।” रमेश की आँखें डर से भर गईं। “मैंने कुछ नहीं देखा साहब… कुछ नहीं देखा…” वह बड़बड़ाने लगा। अभिषेक ने उसकी ओर डायरी बढ़ाई, जिसमें उसका नाम स्पष्ट लिखा था। “झूठ बोल रहे हो… ये देखो, पापा ने लिखा है कि तुमने एक आदमी को रेखा के फ्लैट से भागते देखा था। जूते के निशान, खिड़की का टूटना… सब तुम्हारी निगाह में था।” रमेश की आँखें डबडबा गईं। उसने गर्दन झुकाई, और बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। फिर धीमे से फुसफुसाया, “मैंने देखा था… देखा था साहब… रात करीब साढ़े दस बजे, एक आदमी आया था… ऊँचा, सफेद शर्ट में… वो अक्सर आता था… उस रात भी आया… पर इस बार वह गुस्से में था… और जब निकला… तो खून के छींटे उसके कुर्ते पर थे।”
“तुमने पुलिस को बताया क्यों नहीं?” अभिषेक ने पूछा। रमेश ने अपने थरथराते हाथों को देखा, जैसे वे अब भी उसी रात के खून में डूबे हों। “बताने गया था… लेकिन चौहान साहब ने ही कहा — चुप रहो, वरना अंदर कर दूँगा। एक दिन मुझे दो लोग आए, बोले — बीवी-बच्चे हैं न? भूल जा जो देखा… मैंने डर के मारे गाँव छोड़ दिया।” उसकी आँखों में अब पश्चाताप की लकीर थी। “अगर तुम्हारे पापा मुझे बार-बार ना ढूंढ़ते, तो मैं कब का मर गया होता। पर वो आते रहे… जैसे कोई यकीन दिला रहा हो कि मैं सिर्फ गवाह नहीं, इंसान भी हूँ।”
अभिषेक ने उसका हाथ थामा और कहा, “अब तुम्हारा सच सुना जाएगा… अब तुम्हें नहीं छुपना पड़ेगा।” रमेश कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला, “अगर तुम कोर्ट ले जाओगे, तो मैं सब बताऊँगा… मैं अब और नहीं डरता।” अभिषेक के पास अब एक गवाह था — डर से टूटा हुआ, लेकिन सच से भरा हुआ। उसी शाम जब वह लौट रहा था, उसकी जेब में रमेश का बयान रिकॉर्ड था और दिल में यह अहसास कि उसकी जाँच अब एक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। उसके पिता ने जिस गवाह को ज़िंदा रखने की कोशिश की थी, अब वह फिर बोलने को तैयार था — 30 साल की चुप्पी के बाद।
हवलदार किशोर यादव की डायरी के अगले पन्नों ने सौरभ को उस रात की असल कहानी में और गहराई से खींच लिया। उसने पढ़ा—“10 जनवरी 1994, रात 11:45 बजे, हम केस को बंद करने ही वाले थे, जब मुझे एक नाम सुनाई दिया: ‘मुकुंद मेहता’।” यह नाम उसके लिए नया नहीं था। मुकुंद, भोपाल के सबसे रसूखदार व्यापारियों में से एक था, जिसकी ऊपरी छवि समाजसेवा और चैरिटी की थी, लेकिन कई सालों से उसके खिलाफ ठोस सबूत न होने के कारण पुलिस उसे छू नहीं सकी थी। किशोर यादव ने लिखा था कि उस रात जब बाकी अफसर केस बंद करने के लिए फाइलें समेट रहे थे, वह अकेले मुकुंद के पुराने गोदाम की तरफ गया। वहाँ उसे पुराने खून के धब्बे, एक टूटी हुई चूड़ी और एक औरत की दबी चीख की आवाजें सुनाई दी थीं — या शायद उसका वहम था। लेकिन यादव ने वो सब नोट किया, और अपने सुपरियर्स को बताया, जिन्होंने उस पर केस में ‘गड़बड़ी फैलाने’ का आरोप लगाकर उसे सस्पेंड करवा दिया।
सौरभ ने माथा पकड़ लिया। यानी ये केस केवल एक हत्या का नहीं था, बल्कि किसी बड़े व्यक्ति के प्रभाव के चलते दबा दिया गया मामला था। सौरभ को अब मुकुंद के बारे में और जानना था। वह अगली सुबह पुराने अखबारों की कटिंग्स और लाइब्रेरी फाइलें खंगालने निकल पड़ा। जनवरी 1994 की खबरों में एक अजीब सी चुप्पी थी—ना कोई रिपोर्ट, ना कोई शव की जानकारी, ना मुकदमा। सिर्फ एक छोटी सी खबर मिली, जिसमें लिखा था: “गोविंदपुरा में युवती की रहस्यमयी गुमशुदगी, पुलिस जांच कर रही है।” उस युवती का नाम “सुमेधा त्रिपाठी” था। और उसी नाम को यादव ने अपनी डायरी के अगले पन्ने में दर्ज किया था: “सुमेधा की आँखों में डर था, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। शायद डर उसे खा गया।”
सौरभ अब इस सुमेधा के परिवार से मिलना चाहता था। काफी पूछताछ के बाद उसे शहर के बाहरी इलाके में एक पुराना मकान मिला, जहां सुमेधा की छोटी बहन अब भी रहती थी—नेहा त्रिपाठी, अब 40 के करीब। सौरभ ने जब खुद को हवलदार यादव का बेटा बताया, तो नेहा की आँखों में आंसू आ गए। “आपके पापा ही थे जिन्होंने हमें बताया था कि ये कोई सामान्य लापता केस नहीं था,” नेहा ने कहा। “लेकिन उसके बाद वो खुद गायब से हो गए… फिर कभी नहीं लौटे। हमें लगा केस बंद हो गया। हमें कोई इंसाफ नहीं मिला।” सौरभ ने नेहा को यादव की डायरी दिखाई। नेहा कांपती उंगलियों से पन्ने पलटती रही, मानो वर्षों का जहर उतर रहा हो। सौरभ ने पूछा, “क्या मुकुंद मेहता ही जिम्मेदार था?” नेहा का चेहरा एकदम सख्त हो गया। उसने कहा, “मैं कुछ नहीं जानती… लेकिन मेरी बहन मुकुंद के चैरिटी स्कूल में पढ़ाती थी। और वह अक्सर कहती थी कि वहाँ सब कुछ वैसा नहीं है जैसा दिखता है।”
उसी रात सौरभ ने यादव की डायरी के आखिरी कुछ पन्ने पढ़े। उसमें लिखा था: “मैं अब अकेला हूँ, विभाग ने मुझसे मुँह मोड़ लिया। लेकिन मैं जानता हूँ कि मुकुंद मेहता कुछ छिपा रहा है। और अगर मैं कुछ हुआ, तो मेरी डायरी ही मेरी गवाही होगी।” सौरभ की रूह काँप गई। उसने दीवार पर उन सब संकेतों और तारीखों का चार्ट बना दिया—सुमेधा की गुमशुदगी, मुकुंद का गोदाम, यादव की सस्पेंशन, और अब उसका खुद का सफर। डायरी अब एक दस्तावेज नहीं, एक मिशन बन चुकी थी। और ये मिशन अब उसे उस सच तक ले जाएगा जिसे छुपाने में एक पूरा सिस्टम लगा था।
दीपक की आँखें रात भर नहीं लगीं। डायरी में जिस “सीता नगर” का ज़िक्र था, वह अब एक नया इलाका बन चुका था — आधुनिक इमारतों से भरा हुआ, लेकिन वहाँ की पुरानी गलियों और उन गलियों में छिपी कहानियों की परछाइयाँ अब भी जीवित थीं। सुबह होते ही वह वहीं पहुँच गया। उसने अपने पिता की लिखी बातों के अनुसार उस पुराने घर की तलाश शुरू की, जहाँ किसी समय “अब्दुल हाफिज़” नाम का एक व्यक्ति रहा करता था — वही आदमी जिससे आख़िरी बार मृतक सुभाष मिश्रा की बहस हुई थी। उस इलाके में अब शायद ही कोई अब्दुल रहता हो, पर एक चायवाले से पूछने पर एक बुज़ुर्ग ने बताया कि हाँ, वहाँ एक अब्दुल हुआ करता था जो अचानक एक रात परिवार समेत गायब हो गया था। कहा जाता था कि उसने कोई गुनाह किया था या फिर किसी से डरकर भागा था। पर आज तक उसका कोई सुराग नहीं मिला।
दीपक उस बुज़ुर्ग — जिसका नाम बृजमोहन था — से और बात करने बैठा। बृजमोहन ने बताया कि उस ज़माने में पुलिस की गाड़ी रात में वहाँ बहुत आई थी, और एक लाश भी उसी घर के पिछवाड़े से मिली थी, पर पुलिस ने जल्दी ही मामला बंद कर दिया। दीपक को यकीन हो गया कि यह वही केस है जिसे उसके पिता ने अपनी डायरी में दर्ज किया था। अब्दुल के घर की जगह अब एक मोबाइल टॉवर खड़ा था, लेकिन नीचे का तहखाना अब भी मौजूद था — बंद और सीलन से भरा हुआ। दीपक ने खुदाई शुरू करवाने के लिए प्रशासन से संपर्क किया, लेकिन किसी सरकारी अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकता था। वह जानता था कि सिस्टम में देर है, लेकिन सच्चाई को दफ़न नहीं रहने दे सकता।
उसी रात, वह अकेले ही उस तहखाने की जाली तोड़कर नीचे उतर गया। टॉर्च की रोशनी में चारों ओर धूल और जाले थे, पर एक कोने में उसे कुछ ऐसा दिखा जिसे देखकर उसकी साँस अटक गई — एक पुराने ट्रंक में बंद कुछ दस्तावेज़ और एक ख़ून से सना हुआ कुरता। दस्तावेज़ में कुछ नाम थे, जिनमें एक नाम पुलिस विभाग के एक अधिकारी का भी था — वही इंस्पेक्टर जिसने उस समय केस बंद किया था। दीपक को अब यकीन हो चला था कि यह केवल एक हत्या नहीं थी — यह एक गहरी साजिश थी जिसमें पुलिस के कुछ लोग भी शामिल थे। वह सबूत लेकर बाहर आया, पर जैसे ही उसने घर लौटने की तैयारी की, किसी ने पीछे से उस पर वार कर दिया और अंधेरा छा गया।
जब उसकी आँखें खुलीं, वह अपने कमरे में था — सर पर पट्टी बंधी हुई, और उसकी माँ की आँखों में डर और चिंता दोनों साफ़ दिख रहे थे। पुलिस ने कहा कि वह किसी लुटेरे का हमला था, लेकिन दीपक को यकीन था कि ये उन लोगों की चेतावनी थी जो नहीं चाहते थे कि वो केस दोबारा खुलवाए। लेकिन अब दीपक पीछे हटने वाला नहीं था। वह जान चुका था कि उसके पिता सिर्फ़ एक हवलदार नहीं थे — वो एक सच्चे पुलिसवाले थे जो आखिरी साँस तक न्याय की तलाश में लगे रहे। अब यह लड़ाई दीपक की थी — अपने पिता के अधूरे सच को दुनिया के सामने लाने की।
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विक्रम की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, सामने खुली डायरी की अंतिम प्रविष्टि उसे लगातार घेर रही थी—”जिसे सबने आत्महत्या कहा, वो था एक हत्या — और कातिल हमारी वर्दी के भीतर था।” इस एक पंक्ति ने पूरी कहानी को उलट कर रख दिया था। रातभर वह पुलिस हेडक्वार्टर के पुराने रिकॉर्ड खंगालता रहा, वह सब कुछ जो “फाइल नंबर 379-B” के तहत बंद कर दिया गया था। भूतपूर्व इंस्पेक्टर शेखावत, जिनका नाम अंतिम पृष्ठ पर उल्लेखित था, अब एक वृद्ध हो चुके थे और शहर के बाहरी इलाके में रहते थे। अगली सुबह विक्रम उनके दरवाज़े पर खड़ा था। दरवाज़ा खोलते ही बूढ़े शेखावत ने पहले तो चौंककर विक्रम को देखा, फिर एक गहरी साँस लेकर बोले, “मुझे पता था, एक दिन कोई न कोई पूछने आएगा।”
शेखावत ने विक्रम को अंदर बुलाया और धीमे स्वर में कहा, “तुम्हारे पिता मेरे सबसे काबिल अफ़सरों में से एक थे, लेकिन ये केस… ये एक ऐसा ज़हर था जिसे निगल भी नहीं सकते थे और उगल भी नहीं सकते थे।” उन्होंने बताया कि लड़की की मौत को खुदकुशी की तरह दिखाना दरअसल भीतर की साज़िश थी — एक आईपीएस अधिकारी का नाम उस केस में सामने आ रहा था, जो सत्ता से सीधा जुड़ा था। “हमारे पास सबूत थे, तुम्हारे पिता ने सब कुछ इकट्ठा किया था, लेकिन जब रिपोर्ट ऊपर भेजी गई, तो सब कुछ दबा दिया गया। तब से तुम्हारे पिता टूट गए थे।” शेखावत की आँखों में अफ़सोस और ग्लानि की लहर थी। उन्होंने एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकालकर विक्रम को दिया — एक सीलबंद चिट्ठी और कुछ फोटो, जिनमें मृत युवती की हालत और एक संदिग्ध के साथ उसकी आखिरी तस्वीर थी।
चिट्ठी में लिखा था — “अगर मेरी मृत्यु के बाद कोई इस केस को फिर से उठाए, तो जान लो कि यह अकेले की लड़ाई नहीं होगी। यह जाल बहुत बड़ा है।” विक्रम अब तय कर चुका था कि वह अपने पिता की अधूरी लड़ाई को पूरा करेगा। उसने एक याचिका तैयार की, मीडिया में केस को उठाया और आरटीआई के तहत वह सबूत निकाले जिनका जिक्र डायरी में था। जल्द ही यह मामला स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन गया — ‘90 के दशक की आत्महत्या दरअसल हत्या थी?’— शीर्षक के साथ। दबाव बढ़ा तो गृह मंत्रालय ने केस को दोबारा खोलने की अनुमति दे दी और विक्रम को विशेष जांच दल में शामिल किया गया। लेकिन जैसे ही वह गहराई तक जाने लगा, उसे धमकियाँ मिलने लगीं। एक रात उसकी बाइक के ब्रेक काट दिए गए — सौभाग्य से वह बच गया। उसे अब पूरी तरह यकीन हो गया था कि अपराधी आज भी ताक़तवर स्थिति में हैं।
विक्रम को अंतिम सुराग पुराने सरकारी बंगले में मिला, जहाँ लड़की की लाश मिली थी। वहाँ की दीवार पर अब भी खून के धब्बे हल्के रूप में बाकी थे, जिन्हें जांच में “साफ़-सुथरी जगह” बताया गया था। लेकिन आधुनिक फॉरेंसिक तकनीक से विक्रम ने उन धब्बों का डीएनए विश्लेषण करवाया, जो आज के संदिग्ध आईपीएस अधिकारी से मिलते थे — वह आज एक सेवानिवृत्त डीजीपी थे। केस का रुख अब बदल गया था। विक्रम ने न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें उसने सारे सबूत, डायरी की प्रतियाँ और चिट्ठी को पेश किया। अदालत ने प्राथमिक सुनवाई में यह मान लिया कि केस को दबाया गया था और आरोपी को समन जारी किया गया। वर्षों बाद, हवलदार अर्जुन की आत्मा को शायद कहीं चैन मिला होगा। विक्रम कोर्ट से बाहर आया, सामने हल्की बारिश हो रही थी — जैसे आकाश भी जानता हो कि अंततः सत्य ने अपना रास्ता ढूंढ ही लिया।




