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समंदर के किनारे इश्क

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कविता प्रधान


मुंबई की बारिश किसी पुराने फ़िल्मी गीत की तरह होती है — धीमी, भीगी, और दिल में उतरती हुई। शहर की रफ्तार थोड़ी थम जाती है, पर दिलों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। जुहू चौपाटी की रेत उस दिन भीगी हुई थी, हवा समंदर से नमक चुराकर ला रही थी, और आसमान का रंग एक भूले-बिसरे वादे जैसा धुंधला था।

मैं अर्जुन, एक फ्रीलांस फोटोग्राफर, जो हर बारिश में अपने कैमरे के पीछे कुछ अधूरी कहानियाँ तलाशता है। उस दिन भी मैं घर से निकला था बिना किसी तय मंज़िल के, बस एक उम्मीद लिए कि शायद कोई नई कहानी मिल जाए — कोई चेहरा, कोई एहसास, कोई साया।

और फिर, जैसे किसी फिल्म का क्लाइमैक्स अचानक आ जाता है, वो आई।

नीली सलवार सूट में, एक हाथ में काली छतरी, दूसरे में किताब। बाल खुले हुए, बारिश में भीगते हुए लहराते। वो समंदर की ओर पीठ किए खड़ी थी, जैसे कुछ सोच रही हो, कुछ याद कर रही हो या शायद किसी इंतज़ार में हो। वो इतनी शांत थी कि भीड़ भी उसे देखकर ठहर जाती।

मैंने अपने कैमरे से लेंस एडजस्ट किया और एक फ्रेम में उसे कैद कर लिया। शटर की हल्की सी आवाज़ आई, और जैसे ही क्लिक हुआ, वो पलटी।

“Excuse me, आपने मेरी फोटो ली?” उसकी आँखों में नमी नहीं, सवाल था। गुस्सा भी था, लेकिन जिज्ञासा ज़्यादा।

“हाँ, दरअसल… मैं फोटोग्राफर हूँ। और ये पल बहुत खूबसूरत था। लेकिन अगर आपको बुरा लगा हो तो मैं डिलीट कर देता हूँ।”

उसने कुछ पल मेरी ओर देखा। फिर होंठों पर एक धीमी मुस्कान आई, “अगर अच्छी आई है तो भेज दीजिए। Instagram पे टैग कर दीजिएगा।”

उसके इस जवाब ने मुझे चौंका दिया। मैंने हँसकर कहा, “जरूर। मैं @MumbaiShutterbug हूँ। और आप?”

“@SeaOfSiya,” उसने कहा, और फिर दोनों हँस पड़े — जैसे दो अजनबी एक ही कहानी के किरदार बन गए हों।

हम दोनों समंदर के पास एक चाय वाले के स्टॉल पर जा बैठे। वो अदरक वाली चाय मांग रही थी, और मैं उसके शब्दों की गरमाहट में डूबता जा रहा था।

“क्या करती हो?” मैंने पूछा।

“Creative writing पढ़ रही हूँ। और खुद भी थोड़ा लिखती हूँ। कविताएँ, अधूरी कहानियाँ, बारिश में भीगते लोग,” उसने कहा।

“तो तुम बारिश को भी लिखती हो?”

“हाँ, क्योंकि बारिश सिर्फ मौसम नहीं होती, ये दिल का हाल भी होती है।”

मैं चुप रह गया। फिर जेब से एक पुराना फोटो दिखाया — एक बुढ़ा कपल, छतरी के नीचे भीगते हुए।

“ये मेरी पहली क्लिक थी,” मैंने कहा।

उसने ध्यान से देखा और धीरे से बोली, “कहानी कहाँ है इसमें?”

“एक पूरी ज़िंदगी,” मैंने कहा। “एक छतरी, दो लोग, और बहुत सारा इंतज़ार।”

हमारी बातों के बीच समंदर की लहरें चुपचाप गवाही दे रही थीं। कहीं दूर कोई बच्चा कागज़ की नाव बहा रहा था, और उस दिन मेरी ज़िंदगी में एक नाव बह चली थी — सिया के नाम की।

उसने कहा, “तुम्हारी तस्वीरें बात करती हैं।”

“और तुम्हारे शब्द सुनते हैं,” मैंने जवाब दिया।

फिर वो अचानक बोली, “Next time, मेरी फोटो अच्छे से लेना, मुस्कुराते हुए।”

मैंने उसकी आँखों में देखा और कहा, “Next time, सिर्फ फोटो नहीं… पूरी कहानी पूरी करेंगे।”

उसने चाय खत्म की, किताब उठाई और चल दी। मैं वहीं बैठा रहा, कैमरा हाथ में लिए, लेकिन अब लेंस से नहीं — दिल से देखने लगा था।

रात को जब घर लौटा, तो इंस्टा पर उसका मेसेज था —
“बारिश के मौसम में अजनबी नहीं मिलते, कहानियाँ मिलती हैं।”

मैंने जवाब दिया —
“कहानी बस शुरू हुई है।”

हमारी पहली मुलाकात एक शॉट थी, जो परफेक्ट नहीं थी — लेकिन दिल से ली गई थी।

उस रात समंदर थोड़ा ज़्यादा शोर कर रहा था, जैसे वो भी जान गया हो — कहानी शुरू हो चुकी है।

***

मुंबई की पहचान अगर समंदर है, तो उसकी धड़कनें लोकल ट्रेनों में बसती हैं। सुबह 8:26 की चर्चगेट फास्ट हो या शाम की विरार स्लो, हर डिब्बे में एक-एक दुनिया बैठती है—किसी की अधूरी नींद, किसी की सुबह की चाय, और कुछ लोग… जो बस एक चेहरा ढूंढते हैं, भीड़ में।

मैं अर्जुन, CST से चर्चगेट के बीच की इस जिंदगी का हिस्सा था, लेकिन अब एक नई वजह थी हर स्टेशन पर ध्यान देने की—सिया।

पहली मुलाकात के बाद हमारे बीच चैट्स शुरू हो गए। उसकी कविताएं, मेरी तस्वीरें—हमने इंस्टाग्राम की डोर से एक-दूसरे की दुनिया में झाँकना शुरू किया। वो सांताक्रूज़ से कॉलेज जाती थी, और मैं अक्सर अपने प्रोजेक्ट्स के लिए चर्चगेट की तरफ निकलता था। एक दिन यूँ ही मैंने पूछ लिया—

“कभी लोकल में मिलोगी?”

उसने जवाब दिया—“शायद Platform नंबर 3 पे… 9:14 की Churchgate फास्ट।”

अगली सुबह मैं नहा-धोकर, बालों में जेल लगाकर, पहली बार लोकल ट्रेन के लिए तैयार हुआ जैसे कोई डेट पे जा रहा हूँ। CST की भीड़ मुझे धकेलती रही, लेकिन मेरा मन Platform 3 पर अटका हुआ था।

9:10 — ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आई।

9:12 — भीड़ दरवाजे की तरफ भागी।

9:13 — मैंने लटकते हुए दरवाजे के पास खुद को समेटा।

और 9:14 — वो आई।

सिया, खादी की सफ़ेद कुर्ता और नीले जींस में, आंखों में काजल और कंधे पर वही किताब — “The God of Small Things”। वो जैसे लोकल ट्रेन के शोर में भी किसी कविता की तरह धीरे चल रही थी।

“Seat नहीं मिलेगी,” मैंने कहा।

“कोई बात नहीं, खड़े होकर चलेंगे। सफ़र लंबा नहीं है,” उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया।

हम दोनों ट्रेन के दरवाजे पर खड़े हो गए, हवा चेहरे पर पड़ रही थी, और नीचे प्लेटफॉर्म पीछे छूट रहा था। सिया खामोश थी, मैं भी चुप। पर ये चुप्पी बोझिल नहीं थी — ये वो ख़ामोशी थी जो सिर्फ दो लोग बाँट सकते हैं, जिनके बीच कुछ कहना बाकी हो।

“तुम्हारी तस्वीरें देखकर लगता है जैसे हर एक में कहानी छुपी हो,” सिया बोली।

“और तुम्हारी कविताएं पढ़कर लगता है जैसे हर कहानी को शब्द मिल गए,” मैंने जवाब दिया।

उसने किताब निकाली और एक पन्ना खोलकर पढ़ा—
“If you’re a woman, you have to be twice as good to be seen half as worthy.”
फिर वो मेरी तरफ देखकर बोली, “मुझे लगता है मुंबई भी ऐसी ही है—तुम्हें खुद को हर रोज़ साबित करना पड़ता है।”

मैंने सिर हिलाया। “लेकिन कभी-कभी… किसी एक की नज़र ही काफ़ी होती है।”

वो मेरी तरफ कुछ पल देखती रही, फिर खिड़की की ओर देखती हुई बोली, “जब से तुमसे मिली हूँ, लगता है जैसे कोई अधूरी कविता को मुकम्मल कर रहा हो।”

इतने में ट्रेन दादर पहुँच गई। भीड़ अंदर घुसी, हमें थोड़ी जगह पीछे हटनी पड़ी। उसके हाथ मेरे कंधे से छू गए — एक हल्का सा स्पर्श, पर दिल की रफ्तार बढ़ाने वाला।

उसने हँसते हुए कहा, “इतने लोगों में सिर्फ हम दो ही तो हैं जो मुस्कुरा रहे हैं।”

“क्योंकि हमारे पास वजह है,” मैंने कहा।

“क्या वजह है?” उसने आँखें सिकोड़ते हुए पूछा।

मैंने उसकी ओर झुककर कहा, “वजह तुम हो।”

उसकी मुस्कान कुछ पल के लिए रुक गई। फिर उसने मेरी ओर देखा और कहा, “Don’t fall too fast, अर्जुन। लोकल ट्रेन है ये, कभी भी ब्रेक लग सकती है।”

मैंने उसकी आंखों में झाँका और बोला, “लेकिन कभी-कभी, सफ़र सिर्फ स्टेशन तक नहीं होता… दिल तक भी जाता है।”

ट्रेन चर्चगेट पहुँच चुकी थी। भीड़ उतर रही थी, और हमारी बातों का सिलसिला भी। हम स्टेशन के बाहर एक कोने में जा खड़े हुए, जहाँ एक चायवाला रोज़ खड़ा होता है।

“कॉफी नहीं मिलेगी यहाँ,” मैंने मज़ाक किया।

“चाय में भी जादू होता है,” उसने जवाब दिया। “जैसे तुममें।”

मैं कुछ बोलने ही वाला था कि उसका फोन बजा। उसने देखा, चेहरा थोड़ा सा बदल गया।

“मुझे जाना होगा,” वो बोली। “माँ की तबियत थोड़ी ठीक नहीं है।”

“सब ठीक है?” मैंने पूछा।

उसने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आंखों में कुछ और था — जैसे कोई कहानी जिसे उसने अब तक नहीं बताया था।

“मैं तुम्हें कॉल करूँगी,” कहकर वो चली गई।

मैं वहीं खड़ा रह गया, चाय का कप हाथ में लिए, और दिल में एक अधूरी धुन।

उस दिन पहली बार एहसास हुआ कि ये जो कुछ शुरू हुआ है, वो सिर्फ बारिश या लोकल ट्रेन की कहानी नहीं है — ये एक ऐसा रिश्ता है जो हर मोड़ पर कुछ नया बताएगा, कभी धड़कनों से, कभी ख़ामोशी से।

मैंने जेब से अपना कैमरा निकाला, और सामने जाती भीड़ की एक तस्वीर ली।

कैप्शन लिखा —
“In the city that never stops, sometimes your heartbeat does.”

उस रात इंस्टाग्राम पर उसकी एक नई पोस्ट थी —
“She met a stranger in the rain, and a poet in the crowd.”
@SeaOfSiya

मैंने रिप्लाई किया —
“Strangers fade, poets stay.”
@MumbaiShutterbug

***

मुंबई की शामें कुछ खास होती हैं — थोड़ी भीगी, थोड़ी भीड़ से भरी, लेकिन फिर भी अकेली। और अगर उस शाम की शुरुआत एक किताब की दुकान से हो, तो मानो शहर की सारी कहानियाँ किसी पन्ने में समा जाएँ।

उस दिन मैंने सिया को बांद्रा स्टेशन के पास एक पुरानी बुकशॉप में बुलाया था — ‘Pustak Wale Uncle’ की दुकान, जहाँ किताबें सिर्फ बेची नहीं जाती थीं, सुनाई भी जाती थीं। यहाँ के पुराने फर्श, लकड़ी की अलमारियाँ और दीवार पर चाय की चुस्कियों के धब्बे भी कहानियों जैसे थे।

सिया वक्त पर आई। उसके हाथ में एक कॉटन का बैग था, जिसमें किताबें झाँक रही थीं। उसने नीली छींटवाली साड़ी पहनी थी — पहली बार मैंने उसे पारंपरिक कपड़ों में देखा, और कुछ देर तक मैं बस देखता रह गया।

“क्या हुआ?” उसने मुस्कुराकर पूछा।

“बस… कुछ शब्दों के बिना रह गया,” मैंने कहा।

वो हँस दी, “आज किताबों के बीच हूँ, तो शायद मैं भी कहानी जैसी लग रही हूँ।”

हम दुकान के अंदर गए। किताबों की खुशबू, पुराने कवरों की सोंधी महक, और दीवारों पर लटके रवींद्रनाथ टैगोर और वर्जीनिया वुल्फ़ के पोस्टर — सब मिलकर एक अलग ही दुनिया बना रहे थे।

मैंने एक पुरानी डायरी निकाली और कहा, “मैं यहाँ जब भी आता हूँ, कुछ लाइनें लिखता हूँ। तुम्हारे लिए कुछ है।”

सिया ने डायरी खोली। उसमें लिखा था:
“हर शहर में एक कोना होता है, जहाँ दिल खुद को पढ़ लेता है। और हर दिल में एक अजनबी, जो पढ़ने लायक बन जाए — वो तुम हो।”

वो कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “मैंने भी कुछ लिखा है।”

उसने बैग से एक छोटा कागज़ निकाला — उसमें एक कविता थी:

“तेरे शहर की गलियों में जब चलते हैं ख़्वाब
हर मोड़ पर तू मुस्कुराता है।
तेरी तस्वीर नहीं, तेरी तासीर है,
जो हर किताब में बसी मिल जाती है।”

हम दोनों एक टेबल के पास बैठ गए। पास ही एक छोटी सी टीन की केतली में चाय बन रही थी। मैंने दुकान वाले अंकल से दो कप ‘कटिंग चाय’ मंगवाई।

सिया ने किताबों की अलमारी की तरफ इशारा करते हुए पूछा, “तुम्हें सबसे प्यारी किताब कौन सी लगती है?”

मैंने एक किताब उठाई — Love in the Time of Cholera।

“इसमें इश्क़ धीरे पकता है, इंतज़ार में… जैसे हम,” मैंने कहा।

“पर तुम तो कभी किसी चीज़ का इंतज़ार नहीं करते, अर्जुन। तुम्हारी तस्वीरें तेज़ होती हैं, एक पल में सब कैद कर लेती हैं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“शायद इसलिए तुम्हारा साथ चाहिए — ताकि सीख सकूं धीमे चलना,” मैंने कहा।

चाय आ चुकी थी। हमने कप उठाए, और वहीं ज़मीन पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ किताबों की बातें करने लगे।

“क्या कभी तुम्हें लगा कि तुम किसी के लिए लिख रहे हो?” मैंने पूछा।

उसने बिना सोचे जवाब दिया, “अब लगने लगा है।”

उसके उस एक वाक्य ने मुझे थाम लिया। मैं उसे सिर्फ तस्वीरों में कैद नहीं करना चाहता था, मैं उसके शब्दों में उतरना चाहता था। उसके ‘पंक्चुएशन’ में छुपे ठहराव को समझना चाहता था।

“तुम्हारा कोई ऐसा राज़ है जो किसी को नहीं बताया?” मैंने धीरे से पूछा।

सिया चुप हो गई। फिर एक लंबी साँस लेकर बोली, “माँ को कैंसर है… लास्ट स्टेज। इसी वजह से मैं अक्सर जल्दी चली जाती हूँ। अब बचा बहुत कम है, और मैं हर लम्हा उनके साथ जीना चाहती हूँ।”

मैं कुछ कह नहीं पाया। शब्द बेमानी लगे। बस हाथ उसके हाथ पर रखा — बिना किसी वादा, बिना किसी सहानुभूति — सिर्फ साथ।

“मैंने कभी सोचा नहीं था कि किसी अजनबी से इतना कह पाऊँगी,” उसने कहा।

“कभी-कभी अजनबी ही वो होते हैं जो हमें बिना पूछे समझ जाते हैं,” मैंने जवाब दिया।

उसने मेरी आँखों में देखा — उस नजर में कोई रोमांस नहीं था, कोई फिल्मी इश्क़ नहीं — बस एक खामोश जुड़ाव था।

उसने कहा, “तुम मेरे साथ थे जब मेरी दुनिया सबसे कमजोर थी। ये मैं नहीं भूलूंगी।”

मैंने उसका हाथ और कसकर थाम लिया। चाय ठंडी हो गई थी, पर हमारी खामोशी गरम।

थोड़ी देर बाद हम बुकशॉप से निकले। बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी। सिया ने छतरी निकाली, और मेरे सिर के ऊपर कर दी।

“आज बारिश में भीगने का मन नहीं?” मैंने पूछा।

“नहीं,” उसने कहा। “आज तुम्हारे साथ सूखा रहना भी अच्छा लग रहा है।”

हम दोनों सड़क किनारे धीरे-धीरे चलते रहे। किसी ने कुछ नहीं कहा। शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

उस रात जब मैं घर पहुँचा, सिया का एक मैसेज आया —
“शब्दों के बीच जो जगह खाली रहती है, वहाँ तुम हो।”

मैंने जवाब दिया —
“तुम्हारे हर अधूरे वाक्य में, मैं एक मुकम्मल कहानी हूँ।”

***

मुंबई की बारिश जितनी अचानक आती है, उतनी ही अचानक चली भी जाती है। और उसके बाद जो धूप निकलती है, वो किसी उम्मीद की तरह होती है — गर्म, हल्की, और जरूरी। उस धूप में शहर की भीगी दीवारें फिर से सूखने लगती हैं, और दिलों में कुछ नये ख्वाब अंकुरित होते हैं।

सिया की माँ की तबीयत के बारे में जानने के बाद, मैं कुछ बदल गया था। अब हमारी मुलाकातें ज़्यादा संजीदा हो गई थीं। पहले जहाँ हम फिल्मों और किताबों की बातें करते थे, अब चुपचाप साथ बैठना ही काफी हो जाता था। कई बार सिया बस खिड़की के पास बैठती, बाहर देखती रहती, और मैं उसके पास चाय लिए खामोशी से बैठा रहता।

एक रविवार की सुबह उसका मैसेज आया —
“क्या आज कहीं चल सकते हैं? माँ सो रही हैं, और मैं थोड़ी देर खुद से दूर जाना चाहती हूँ।”

मैंने तुरंत जवाब दिया —
“चलो चलें। सूरज निकल आया है। तुम्हारे चेहरे पर भी थोड़ा उजाला चाहिए।”

हमने मिलने की जगह तय की — हॉर्निमन सर्कल गार्डन, एक ऐसा कोना जहाँ शहर की भागदौड़ थोड़ी धीमी हो जाती है। सिया हल्के पीले रंग का सूट पहनकर आई थी। उसके बाल खुले थे, और आंखों के नीचे हल्के काले घेरे थे — लेकिन उसमें एक गहराई थी, जैसे वो हर दिन कुछ नया सीख रही हो जीवन से।

“तुम्हें यहाँ आना पसंद है?” मैंने पूछा।

उसने मुस्कुरा कर कहा, “यहाँ पेड़ हैं जो मुझे माँ की तरह लगते हैं — शांत, मजबूत, और हमेशा मौजूद।”

हम दोनों एक पत्थर की बेंच पर बैठ गए। सामने बच्चे खेल रहे थे, कुछ बूढ़े लोग अखबार पढ़ रहे थे, और एक छोटा सा कैफे पास ही था जहाँ से कॉफी की महक आ रही थी।

मैंने पूछा, “माँ की तबीयत कैसी है आजकल?”

सिया ने गहरी साँस ली, “कुछ दिन अच्छे होते हैं, कुछ बहुत खराब। लेकिन अब मैं दिन नहीं गिनती, लम्हे जीने लगी हूँ।”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने कोई विरोध नहीं किया।

“तुम्हें पता है अर्जुन,” उसने कहा, “माँ जब जागती हैं तो मुझसे पूछती हैं, ‘वो लड़का कौन है जिससे अब तुम कम रोती हो?’”

मैं मुस्कुरा दिया, “तो तुम कम रोने लगी हो?”

“हाँ,” उसने धीमे से कहा, “क्योंकि जब कोई तुम्हारे साथ चुपचाप बैठ जाए और तुम्हारी तकलीफ़ के बारे में कुछ न पूछे — सिर्फ उसका साथ दे — तो आँसू खुद ही रुक जाते हैं।”

हम दोनों थोड़ी देर चुप रहे। पास ही एक छोटी लड़की किताब पढ़ रही थी। सिया ने उसे देखा और कहा, “कभी-कभी मैं सोचती हूँ, अगर ज़िंदगी इतनी सीधी होती, तो क्या मैं तुम्हें ऐसे ही मिलती?”

“शायद नहीं,” मैंने जवाब दिया। “हम जिस मोड़ पर मिले, वही हमारी कहानी को ख़ास बनाता है।”

सिया ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन चेहरा शांत।

“मुझे डर लगता है,” उसने कहा।

“किससे?”

“तुमसे नहीं… खुद से। कि मैं तुम्हें आदत की तरह चाहने लगी हूँ। और जब आदतें छूटती हैं, तो बहुत दर्द होता है।”

मैंने धीमे से कहा, “मैं आदत नहीं बनना चाहता… तुम्हारी ज़रूरत बनना चाहता हूँ।”

उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ अपने हाथ में और कसकर थाम लिया।

उस दिन हमने पास के कैफे से कॉफी ली, और पार्क के एक कोने में बैठ गए। सूरज अब पूरी तरह से चमक रहा था। उसके चेहरे पर किरणें पड़ रही थीं — जैसे धूप उसके भीतर की उदासी से लड़ रही हो।

“तुम्हें पता है अर्जुन,” उसने कहा, “मैंने अब लिखना फिर से शुरू किया है।”

“अरे वाह! क्या लिखा है?”

उसने फोन निकाला और एक नोट पढ़ा:

“वो हाथ जो थामे रखे बिन कुछ कहे,
वो आँखें जो हर बात समझ जाएं,
वो प्यार जो इज़हार से पहले एहसास दे जाए —
बस वही चाहिए अब।”

मैंने कहा, “तुम्हारे शब्दों में सुकून है। जैसे किसी ज़ख्म पर धीरे से मरहम रखा गया हो।”

“और तुम्हारे साथ वो सुकून असल लगता है,” उसने कहा।

शाम होते-होते हम वहाँ से उठे। पार्क से बाहर निकलते वक्त उसने अचानक रुक कर कहा, “अगर मेरी ज़िंदगी एक किताब होती, तो तुम्हारा नाम हर चैप्टर में होता।”

मैंने उसकी तरफ देखकर कहा, “तो चलो ये कहानी साथ में पूरी करें।”

उसने मुस्कुराकर कहा, “अभी कुछ पन्ने बाकी हैं… लेकिन हाँ, तुम साथ रहो।”

हम दोनों सड़क किनारे चलते रहे। आसपास गाड़ियों का शोर था, लेकिन हमारे बीच खामोशी में भी एक संगीत था।

रात को जब मैं घर पहुँचा, उसका एक वॉइस नोट आया। सिया की आवाज़ थकी हुई थी, लेकिन उसमें एक मिठास थी।

“आज पहली बार ऐसा लगा कि ज़िंदगी थोड़ी रुक गई है… और मैं उस रुकावट में भी मुस्कुरा पा रही हूँ। शायद तुम इसलिए हो। थैंक यू अर्जुन, मेरी उदासी में धूप बनने के लिए।”

मैंने जवाब नहीं दिया। सिर्फ अपना कैमरा उठाया, अपनी एक पुरानी तस्वीर निकाली — जिसमें दो लोग बारिश में एक ही छतरी के नीचे खड़े हैं — और उसे भेज दी।

नीचे लिखा:
“मैं धूप नहीं, तुम्हारा मौसम बनना चाहता हूँ।”

***

मुंबई की दीवारों पर वक़्त की दरारें अक्सर दिखती नहीं, महसूस होती हैं। सीलन की तरह धीरे-धीरे चुपचाप उतरती हैं, और जब तक आप समझें, दिल की दीवारों में भी जड़ें जमा लेती हैं।

उस हफ़्ते सिया का कोई मैसेज नहीं आया।

ना गुड मॉर्निंग, ना कोई शायरी, ना “आज बारिश हुई तुम्हारी याद में” जैसा कोई वाक्य। मैंने पहले सोचा, शायद व्यस्त होगी। फिर खुद को समझाया कि माँ की तबीयत बिगड़ गई होगी। लेकिन तीन दिन बीत गए और हर घंटे की खामोशी एक बेचैनी बन गई।

चौथे दिन मैंने खुद फोन किया। घंटी गई, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

मैंने इंस्टाग्राम खोला। उसकी आख़िरी पोस्ट एक हफ़्ते पुरानी थी —
“And then she disappeared into the silence, just like poetry.”

मैंने दिल ही दिल में खुद को डांटा — “वो तुम्हें बताकर नहीं जाएगी। क्योंकि वो तुम्हें आदत कह चुकी है। और आदतें बिना अलार्म के टूट जाती हैं।”

पाँचवे दिन मैंने उसके घर जाने की ठानी।

उसका पता मुझे पहली मुलाकात में ही मिल गया था, जब उसने खुद हँसते हुए कहा था, “अगर कभी मेरी माँ की लिखी पुरानी डायरी पढ़नी हो तो आ जाना।” तब वो एक मजाक था। अब वही मेरी उम्मीद थी।

मैं वर्सोवा पहुँचा। बिल्डिंग का नाम था “गुलमोहर एनक्लेव।” एक पुराना, शांत अपार्टमेंट, जिसकी दीवारें सीलन से हल्की भूरी हो चुकी थीं। चौकीदार ने मुझे ऊपर जाने दिया जब मैंने सिया का नाम लिया।

दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था।

मैंने खटखटाया।

कोई जवाब नहीं आया।

“सिया?” मैंने धीमे से आवाज़ दी।

फिर एक हल्की सी चुप्पी के बीच, दरवाज़े से एक बूढ़ी औरत बाहर निकली — बहुत कमज़ोर, लेकिन चेहरे पर वही शकुन्तला देवी जैसी गर्मी।

“आप अर्जुन हैं?” उन्होंने पूछा।

मैंने चौंककर पूछा, “आपको कैसे पता?”

“सिया कई बार आपका ज़िक्र करती थी… और आपकी तस्वीरें भी दिखाती थी। आज सुबह ही अस्पताल से लौटी है। बहुत थक गई है… सो रही है।”

“क्या मैं मिल सकता हूँ?”

उन्होंने सिर हिलाया और अंदर बुला लिया।

कमरे में हल्की सी लैवेंडर की खुशबू थी। दीवार पर किताबों की अलमारी थी, एक खिड़की खुली थी जहाँ से समंदर का एक कोना दिखता था।

बिस्तर पर सिया सो रही थी। उसका चेहरा पीला लग रहा था, होंठ सूखे, आँखों के नीचे गहरे घेरे और माथे पर पसीना।

मैं चुपचाप पास जाकर कुर्सी पर बैठ गया।

उसकी माँ ने धीमे से कहा, “कैंसर अब शरीर में फैल चुका है। डॉक्टर्स ने कह दिया है… ज़्यादा दिन नहीं बचे।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैं कुछ बोल नहीं सका। सिर्फ उसकी ओर देखता रहा। उस लड़की की ओर जिसने ज़िंदगी को कविता की तरह जिया, और अब खुद वक़्त की पंक्तियों से हार रही थी।

थोड़ी देर में सिया की आँख खुली। उसने मुझे देखा, और होंठों पर एक थकी सी मुस्कान आई।

“तुम आ गए?” वो फुसफुसाई।

मैंने उसका हाथ थामा। “इतने दिन कहाँ थी?”

“वक़्त की दरारों में फँस गई थी,” उसने कहा।

“तुमने बताया क्यों नहीं?”

“क्योंकि तुम धूप हो, अर्जुन। और मैं नहीं चाहती थी कि मेरी उदासी तुम्हारे चेहरे की रोशनी ले जाए।”

मैंने उसकी ओर झुककर कहा, “मैं तुम्हारी उदासी में रहना चाहता हूँ, तुम्हारी हर साँस में, हर खामोशी में। मुझे पूरा चाहिए, अधूरा नहीं।”

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

“लेकिन अर्जुन… मैं अब ज़्यादा दिन नहीं रहूँगी। ये मत कहना कि मैंने नहीं बताया।”

मैंने कहा, “मैं तुमसे वादा करता हूँ, जितने दिन रहोगी, मैं रहूँगा। उसके बाद भी, तुम्हारे शब्दों में, तुम्हारी यादों में… मैं रहूँगा।”

उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया और धीमे से कहा, “मेरे पास एक कहानी है जो कभी पूरी नहीं हुई। मेरी माँ की डायरी में है — अधूरी प्रेम कहानी। मैंने उसे कभी किसी को नहीं पढ़ने दिया… लेकिन अब चाहती हूँ कि तुम पढ़ो। शायद तुम उसे पूरा कर सको।”

मैंने सिर हिलाया।

उसकी माँ ने अलमारी से एक पुरानी नीली डायरी निकाली — ऊपर लिखा था, “नीर और अदिति की कहानी”।

मैंने पहली पन्ना खोला। शब्द पुराने थे, लेकिन भाव अभी भी ताजे। उसमें एक लड़की थी जो एक स्वतंत्रता सेनानी से प्रेम करती थी। लेकिन हालात, ज़माना और समाज ने उन्हें अलग कर दिया। डायरी वहीं रुकी थी जहाँ वो दोनों एक स्टेशन पर एक-दूसरे को आख़िरी बार देखते हैं।

“ये मेरी माँ की कहानी है,” सिया ने कहा। “और मुझे हमेशा लगता रहा कि हर अधूरी कहानी के पीछे एक लेखक होता है जो उसे मुकम्मल कर सकता है। क्या तुम बनोगे वो?”

मैंने किताब को सीने से लगा लिया। “मैं बनूँगा, सिया। तुम्हारे लिए… और उस प्रेम के लिए जो कभी पूरा नहीं हो सका।”

उसने आँखें मूँद लीं। उसकी सांसें हल्की चल रही थीं। लेकिन अब उसके चेहरे पर शांति थी।

मैंने उसकी माँ से कहा, “मैं रोज़ आऊँगा। डायरी पढ़ूँगा, कहानी लिखूँगा, और सिया को सुनाऊँगा।”

उस दिन रात मैंने पहली बार कागज़ पर लिखा —
“ये कहानी किसी और की नहीं, हमारी है। क्योंकि अधूरी कहानियाँ ही सबसे सच्ची होती हैं।”

***

अधूरी कहानियाँ अक्सर ज़्यादा गहरी होती हैं। पूरी होने की हड़बड़ी में नहीं होतीं, बस चुपचाप साँस लेती हैं, किसी की याद में, किसी की उम्मीद में। उस दिन जब मैं पहली बार सिया की माँ की डायरी लेकर घर लौटा, मेरी उंगलियाँ काँप रही थीं। लगा, जैसे मैं किसी की आखिरी ख्वाहिश अपने बैग में लेकर चल रहा हूँ।

डायरी के पहले पन्ने पर एक हल्का-सा इत्र छपा था। अक्षर स्याही से नहीं, भावनाओं से भरे थे। “नीर और अदिति” की कहानी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से शुरू होती थी। अदिति, एक तेजस्वी बंगाली युवती, जो कॉलेज में पढ़ती थी, और नीर, एक कवि, जो बम बनाना नहीं, शब्द लिखना जानता था। वो दोनों एक खादी की दुकान में पहली बार मिले थे — किताब खरीदते हुए।

जैसे-जैसे मैंने पन्ने पलटे, मैं महसूस कर पा रहा था कि ये प्रेम कहानी सिर्फ स्वतंत्रता की लड़ाई की पृष्ठभूमि में नहीं थी, ये एक ऐसी स्त्री की आत्मा थी जो प्रेम और त्याग के बीच झूलती रही।

मैं रोज़ डायरी लेकर सिया के घर जाता। वो कभी पूरी नींद में होती, कभी आधी खुली आँखों से मुझे देखती और हल्की मुस्कान देती। उसकी माँ मुझे चाय देती और पूछती, “आज कहाँ तक पहुँचे नीर और अदिति?”

“आज वो स्टेशन तक पहुँचे हैं, जहाँ अदिति को बनारस भेजा जा रहा है,” मैं कहता।

“उस स्टेशन का नाम मत बदलना,” सिया की माँ कहती, “उस स्टेशन पर मैंने खुद किसी को आखिरी बार देखा था।”

धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि ये डायरी, ये कहानी, सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं थी — ये एक स्मृति थी, एक स्वीकारोक्ति।

मैंने डायरी से आगे की कहानी लिखना शुरू किया। हर शब्द के साथ मैं खुद को नीर की जगह रखता, और अदिति में मुझे सिया की झलक मिलती।

“उस शाम जब अदिति ट्रेन में चढ़ी, नीर ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी पीठ देखता रहा।
क्योंकि कभी-कभी इज़हार से ज़्यादा ज़रूरी होता है इंतज़ार।
और नीर इंतज़ार करेगा, हर अगले स्टेशन पर…”

हर रात मैं अपनी लिखी पंक्तियाँ पढ़कर सिया को सुनाता। वो आंखें बंद रखती, लेकिन होठों पर मुस्कान आ जाती। एक दिन उसने कहा—

“कभी-कभी लगता है, मैं अदिति हूँ। और तुम… नीर। क्या तुम भी इंतज़ार कर पाओगे अर्जुन? उस स्टेशन पर… जहाँ मैं शायद लौटकर न आ सकूं?”

मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा, “मैं हर स्टेशन पर खड़ा रहूँगा, जब तक मेरी सांस चलेगी।”

उस दिन पहली बार सिया ने मुझे अपने सीने से लगाया। उसकी साँसें धीमी थीं, लेकिन उस आलिंगन में जो अपनापन था, वो वक़्त से परे था।

डायरी की आखिरी अधूरी पंक्ति थी—
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो, नीर… तो जान लो, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गई थी। वक़्त ने मुझे छीन लिया था।”

उसके बाद का पन्ना कोरा था। और वही कोरा पन्ना मुझे चुनौती दे रहा था — इस कहानी को मुकम्मल करने की।

मैंने लिखा—

“फरवरी 1943
नीर बनारस पहुँचा। वो जानता था कि अदिति अब वहाँ नहीं है। लेकिन उसने वहाँ एक कविता छोड़ी — उस मंदिर की दीवार पर, जहाँ अदिति पूजा किया करती थी।
‘मैंने तुम्हारे नाम से जिया, और तुम्हारे बिना जीना सीखा।’
उसके बाद नीर कभी नहीं मिला।
लेकिन बनारस की गलियों में आज भी जब कोई चुपचाप मुस्कुराता है, लोग कहते हैं — वो नीर की आत्मा है, जो आज भी अदिति के नाम पर साँस लेती है।”

मैंने वो पूरा हिस्सा प्रिंट कराया और सिया के तकिए के पास रख दिया।

उस रात मैंने उससे पूछा, “क्या तुम्हें अब ये कहानी पूरी लगी?”

उसने कमजोर मुस्कान के साथ कहा, “अब ये सिर्फ माँ की नहीं, मेरी भी कहानी है। और तुमने दोनों को मुकम्मल कर दिया, अर्जुन।”

मैंने देखा कि उसकी आँखों में चमक थी — वैसी जो हर अधूरी स्त्री को तब मिलती है, जब कोई उसकी कहानी सुने बिना काटे, पूरा करे।

अगले कुछ दिन शांत बीते। मैं रोज़ आता, उसे अपनी कविताएं सुनाता, कभी उसके बालों में उंगलियाँ फिराता, कभी उसकी माँ के साथ छत पर बैठता और चाय पीता।

एक शाम जब मैं घर लौट रहा था, उसका मैसेज आया—
“अगर मेरी कहानी में एक आखिरी चैप्टर बचा हो, तो उसमें हमारा नाम लिखना। और ये मत सोचना कि मैं चली गई हूँ — मैं तुम्हारे हर शब्द में हूँ। हर बारिश की बूंद में, हर लोकल की भीड़ में, और हर उस तस्वीर में जो तुम बिना वजह खींचते हो।”

मैंने पढ़ा… और कुछ पल रोया।

उस रात मुझे सिया की माँ का कॉल आया।

“अर्जुन… वो सो गई है। हमेशा के लिए। लेकिन जाते-जाते उसने तुम्हारा नाम लिया… मुस्कुरा कर। तुम उसे पूरा कर गए, बेटा।”

मैं खामोश था।

अगले दिन मैंने उसके अंतिम संस्कार में वो डायरी भी जलती चिता में रख दी। क्योंकि अब वो कहानी कागज़ पर नहीं, मेरे दिल में थी।

***

मुंबई का सांताक्रूज़ स्टेशन अब वैसा नहीं लगता था। पहले जहाँ हर ट्रेन की आवाज़ में एक उम्मीद होती थी, अब हर सिटी में एक खामोशी थी। मैं प्लेटफॉर्म के उसी कोने पर बैठा था, जहाँ कभी सिया मेरे साथ खड़ी होती थी — आँखों में मुस्कान, हाथ में किताब, और होठों पर कोई नई कविता।

आज वो नहीं थी। और फिर भी हर ओर वही थी।

मैंने अपनी डायरी खोली, जिसमें अब सिर्फ तस्वीरें नहीं, शब्द भी थे — सिया के लिए, सिया के बारे में, और सिया की वजह से।

“एक दिन वो आई थी,
कहानी की तरह…
और अब वो नहीं है,
तो मैं लेखक बन गया हूँ।”

सिया की मौत को तीन महीने हो चुके थे। लेकिन मेरी सुबहें अब भी उसके गुड मॉर्निंग वाले नोट्स से शुरू होती थीं — जिन्हें मैंने सेव करके रखा था। मेरी रातें अब भी उसकी आख़िरी आवाज़ में लिपटी रहती थीं — उस वॉइस नोट में जिसमें वो कहती थी,
“तुम्हारा साथ ही मेरी सबसे लंबी कविता है।”

लोग कहते हैं वक़्त सब कुछ ठीक कर देता है। लेकिन वक़्त तो बस आगे बढ़ता है, पीछे रह जाता है — वो मुस्कुराता चेहरा, वो अधूरी कॉफी, वो प्ले-लिस्ट जो अब भी तुम्हारा नाम लेती है।

मैंने फैसला किया — अब कहानी को बंद नहीं करूँगा।
मैंने एक किताब लिखनी शुरू की — “समंदर के किनारे इश्क”।

पहला चैप्टर वही था, जहाँ हमने पहली बार बारिश में चौपाटी पर एक-दूसरे को देखा था।
दूसरा, लोकल ट्रेन के उस दरवाज़े पर जहाँ हमारे हाथों की पहली छुअन हुई थी।
तीसरा, किताबों की दुकान, कॉफी, और उसकी माँ की अधूरी डायरी।
और फिर वो अंतिम दिन — जब उसने मेरा नाम लिया था और हमेशा के लिए सो गई थी।

लेकिन मैं उस किताब में अंत नहीं लिख पा रहा था।

क्या एक प्रेम कहानी का अंत मृत्यु होता है?
या स्मृति?

एक दिन, मैं उसके पुराने मैसेजेस पढ़ रहा था। उसमें एक नोट था, जो शायद मैं पहले कभी नहीं देख पाया था।

“अगर मैं कभी न रहूं, तो अर्जुन… मेरी आखिरी इच्छा यही है कि तुम लिखना मत छोड़ना। और एक दिन, उस किताब को मेरे नाम के साथ किसी लाइब्रेरी में छोड़ आना — ताकि जब कोई लड़की उसे पढ़े, तो वो जाने कि इश्क़ सिर्फ इज़हार नहीं, इंतज़ार भी होता है।”

मैंने उसी पल तय कर लिया — इस प्रेम को एक किताब नहीं, एक धरोहर बनाऊँगा।

मैंने ‘सी-फेस’ के पास एक शांत कैफे में बैठकर वो किताब पूरी की। हर पन्ने पर सिया थी। हर संवाद में उसका अक्स। हर सीन में उसकी खुशबू।

“तुम्हें पाने की कोशिश नहीं की मैंने,
क्योंकि तुम हर उस जगह थे
जहाँ मेरी आँखें बंद होती थीं।”

किताब पूरी हुई। और फिर मैंने वही किया जो उसने चाहा था।

मैंने एक दिन अपनी पीठ पर वो किताब का फाइनल प्रूफ रखा और वर्सोवा लाइब्रेरी गया — जहाँ कभी सिया जाया करती थी। वहाँ की लायब्रेरियन, एक बूढ़ी औरत, ने जब उसका नाम सुना तो धीरे से मुस्कुरा दी।

“सिया वर्मा?” उसने पूछा।

“हाँ,” मैंने कहा, “ये किताब उसी के नाम है।”

वो किताब ली, और एक अलग शेल्फ में रख दी — “Unfinished Stories that Found Endings” — उस खंड में जहाँ लोग आकर भावनाओं की किताबें पढ़ते थे।

मैंने देखा, एक लड़की उस शेल्फ के पास खड़ी थी। उसकी उम्र लगभग वही थी, आँखों में वही सवाल, जो कभी सिया की आँखों में थे। उसने किताब निकाली, पहले पन्ने पर पढ़ा:

“ये कहानी एक अधूरे इश्क़ की है,
जो पूरी नहीं हुई,
लेकिन कहीं खत्म भी नहीं हुई।”
– अर्जुन

लड़की ने मुझे देखा, मैं मुस्कुरा दिया।

वो बोली, “क्या आप ही लेखक हैं?”

मैंने सिर हिलाया।

“कहानी बहुत सच्ची लगती है,” उसने कहा।

“क्योंकि ये सच्ची है,” मैंने जवाब दिया।

उसने किताब सीने से लगा ली। और उस वक्त मुझे महसूस हुआ — सिया चली गई, लेकिन उसका प्यार रह गया। उसकी सांसें अब शब्दों में थीं। उसकी मुस्कान अब हर पाठक की आँखों में थी।

कुछ दिन बाद मैंने चौपाटी जाना शुरू किया — हर शुक्रवार की शाम। मैं एक बेंच पर बैठता, कैमरा और डायरी साथ होती। कभी बारिश होती, कभी नहीं। लेकिन हर बार मैं वहाँ उसकी उपस्थिति को महसूस करता।

एक दिन अचानक बारिश आई। और उसी लहरों के बीच, जहाँ मैंने सिया को पहली बार देखा था, मैंने खुद से कहा:

“ये कहानी खत्म नहीं हुई।
क्योंकि इश्क़, जब सच्चा होता है,
तो अंत नहीं चाहता — बस एक और पन्ना।”

मैंने एक नई डायरी खोली। पहला वाक्य लिखा —

“उसके जाने के बाद,
मैं जीना नहीं भूला…
मैं बस उसे महसूस करते हुए
हर दिन थोड़ा और प्यार करने लगा।”

***

मुंबई का समंदर कभी चुप नहीं रहता। वो बोलता है—कभी लहरों में, कभी सीपियों की खनक में, और कभी उन आँखों की नमी में जो किनारे पर खड़े किसी बीते लम्हे को ढूँढ़ रही होती हैं। आज भी मैं जुहू चौपाटी के उसी पत्थर पर बैठा था जहाँ पहली बार सिया को देखा था। उसके जाने को महीनों बीत चुके थे, लेकिन उसका नाम अब भी मेरे हर विचार में गूँजता था।

कभी-कभी लगता था कि सिया अब भी यहीं है—किसी भीड़ में, किसी किताब की पंक्ति में, या फिर बारिश की उस पहली बूंद में जो मेरी हथेली पर गिरती थी।

किताब की पब्लिशिंग हो चुकी थी। “समंदर के किनारे इश्क” अब बस मेरी कहानी नहीं रही, वो उन हज़ारों दिलों की आवाज़ बन चुकी थी जो अपने-अपने सिया या अर्जुन को खो चुके थे। एक शाम जब मैं एक बुक साइनिंग इवेंट में गया, एक लड़की आई और बोली, “सर, आपकी किताब ने मुझे वो कहने की हिम्मत दी जो मैं सालों से खुद से भी नहीं कह पाई थी — कि इश्क़ अधूरा हो सकता है, लेकिन वो कम नहीं होता।”

मैंने उसे देखा और धीमे से कहा, “कभी-कभी अधूरा इश्क़ ही हमें पूरा बना देता है।”

पर कहीं ना कहीं, मैं जानता था—मेरी जिंदगी अब बस एक लेखक की नहीं, एक इंतज़ार करने वाले की बन चुकी थी।

और फिर एक दिन, समंदर फिर बोला।

वो दिन था रविवार का। मैं चौपाटी पर एक लघु कहानी प्रतियोगिता का आयोजन कर रहा था — “कहानी समंदर से”, जिसमें लोग अपनी सबसे सच्ची कहानी 500 शब्दों में लिखते और एक बोतल में बंद कर समंदर में बहा देते।

इवेंट के आखिर में, एक लड़की आई—लंबे खुले बाल, आँखों में गहराई और पहनावे में साधारणपन। उसने कहा, “मैं लिखना नहीं जानती ठीक से, पर ये कहानी मेरी है।”

मैंने मुस्कराकर कहा, “यहाँ पर सबका सच ही कहानी है।”

उसने एक पुरानी डायरी से एक पन्ना फाड़ा और बोतल में डालकर मुझे सौंप दिया। मैंने बोतल लिया, पर जाने क्यों, उस कागज से एक जानी-पहचानी खुशबू आई—जैसे सिया की डायरी की सोंधी महक।

मैंने पूछा, “आपका नाम?”

“नीरा,” उसने मुस्कराकर कहा।

मैं चौंका। वही नाम… जो सिया की माँ की अधूरी कहानी में था — नीर और अदिति।

मैंने पूछा, “आपको पढ़ना अच्छा लगता है?”

“बहुत,” उसने जवाब दिया। “सिया वर्मा मेरी पसंदीदा लेखिका थी… उनकी डायरी की कहानी मैंने एक ब्लॉग पर पढ़ी थी। और फिर आपकी किताब मिली। लगा जैसे सिया अब भी बोल रही है, आपके शब्दों में।”

मैंने उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखों में वो ही संजीदगी थी, जो सिया की आँखों में थी। उसकी मुस्कान में वैसी ही थमी हुई बेचैनी।

हम बात करने लगे। फिर कॉफी, किताबें, मुंबई की बारिश—हमारे बीच सब धीरे-धीरे खुलने लगा। लेकिन मैं चुप रहा… दिल में एक दीवार अब भी थी—सिया की दीवार।

एक शाम नीरा ने कहा, “तुम अब भी सिया को लिखते हो?”

मैंने कहा, “हाँ… क्योंकि वो अब भी मुझमें है।”

“तो क्या तुम कभी मुझमें सिया को ढूँढ़ते हो?”

मैं चुप रहा। कुछ सवाल जवाब नहीं चाहते, सिर्फ मौन।

लेकिन नीरा समझ गई। उसने हाथ पकड़ कर कहा, “मैं सिया नहीं हूँ। और कभी बन भी नहीं सकती। लेकिन मैं तुम्हारी कहानी का अगला पन्ना बन सकती हूँ — अगर तुम चाहो।”

उस रात मैं समंदर किनारे बैठा। लहरें फिर कह रही थीं—“क्या तुम फिर से जीना चाहोगे?”

मैंने आँखें बंद कीं और सिया की आवाज़ सुनी—
“इश्क़, अर्जुन, दोबारा भी हो सकता है… अगर तुम उसे मेरे नाम से मत तौलो।”

मैंने नीरा को अगली सुबह कॉल किया।

“कॉफी?”

उसने जवाब दिया, “तुम देर कर चुके हो… मैं पहले ही कॉफी बना चुकी हूँ। आ जाओ।”

हम मिले, मुस्कराए, और इस बार मैंने उसके हाथ को थाम लिया—पूरे विश्वास के साथ।

सिया की याद अब भी मेरे साथ थी। लेकिन अब वो एक स्मृति थी, एक कविता जो पूरी हो चुकी थी।

नीरा… अब मेरी नई कविता थी—जिसे मैं हर दिन जीना चाहता था।

और जब मैं अपनी अगली किताब लिखने बैठा—उसका नाम रखा:
“जहाँ कहानी फिर शुरू हुई”

उसकी भूमिका में लिखा:
“कुछ कहानियाँ मरती नहीं… वो बस अगले मौसम का इंतज़ार करती हैं।”

अंत नहीं…
शुरुआत।

[समाप्त]

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