अयन त्रिपाठी
श्रीवास्तव जी की सुबह हमेशा की तरह अख़बार और चाय से शुरू हुई, लेकिन आज कुछ अलग था। अख़बार पढ़ते-पढ़ते उनके कान में पाखी की आवाज़ पड़ी, जो अपने मोबाइल पर कुछ दिखा रही थी – “पापा, देखिए, ऑनलाइन में कितनी सेल लगी है!” पहले तो उन्होंने नज़रअंदाज़ किया, लेकिन जब बेटे चिराग ने भी जोड़ दिया, “पापा, आपको तो नए जूते चाहिए थे ना? ऑनलाइन सस्ते मिल रहे हैं,” तब श्रीवास्तव जी का ध्यान उधर गया। मन में थोड़ा डर और थोड़ी जिज्ञासा – आखिर कैसा होता है ये ऑनलाइन ख़रीदारी का अनुभव? अब तक तो हर चीज़ दुकान से ख़रीदते आए हैं, दुकानदार से मोलभाव, देखकर-छूकर परखना, रसीद लेकर घर लौटना – यही उनकी आदत रही। पर इस बार बेटे के कहने पर वो मान गए, मोबाइल उनके हाथ में थमाया गया। स्क्रॉल करते हुए आंखें फैल गईं – सैकड़ों ब्रांड, हज़ारों डिज़ाइन, दाम भी इतने कम कि यक़ीन करना मुश्किल। “ये सस्ते क्यों हैं? इसमें कुछ धोखा तो नहीं?” उन्होंने बेटे से पूछा। चिराग मुस्कुराया, “पापा, सब सही है, रिव्यू भी पढ़ लीजिए।” रिव्यू पढ़ते-पढ़ते वो उलझ गए, कोई कह रहा था ‘बेहतरीन’, तो कोई कह रहा था ‘बेकार’। श्रीवास्तव जी का माथा ठनक गया, “किसकी बात मानें?” तभी चिराग ने समझाया, “ज्यादातर अच्छे रिव्यू हैं, ले लीजिए।” हिचकते हुए, पर दिल में थोड़ी उम्मीद लिए, उन्होंने आखिर कार्ट में एक भूरे रंग का आरामदायक दिखने वाला जूता डाल दिया।
ऑर्डर प्लेस करने का वक्त आया, तो श्रीवास्तव जी के चेहरे पर हल्की चिंता की लकीरें उभर आईं – मोबाइल पर इतने सारे बटन, “Proceed to Pay”, “Select Address”, “Confirm Order” – सब देखकर वो घबरा गए। चिराग ने धैर्य से सब समझाया – “पापा, अपना पता डालिए, फिर पेमेंट मोड चुनिए। चाहें तो कैश ऑन डिलीवरी भी रख सकते हैं।” श्रीवास्तव जी ने मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियाँ हौले से चलाईं, जैसे कोई पुराना टाइपराइटर चला रहा हो। “और ये OTP क्या है?” उन्होंने चौंककर पूछा। चिराग ने हंसते हुए कहा, “वो आपके मोबाइल पर आया होगा, वही डालना है।” श्रीवास्तव जी की आँखों में डर साफ़ झलक रहा था, लेकिन उन्होंने कांपती उंगलियों से नंबर टाइप किया, और आखिरकार ‘Place Order’ पर क्लिक कर दिया। जैसे ही स्क्रीन पर लिखा आया – “Your Order has been placed!”, उनके चेहरे पर एक अनोखी मुस्कान आई, मानो कोई कठिन पहाड़ फतह कर लिया हो। चाय अब तक ठंडी हो चुकी थी, पर उनकी आँखों में नई चमक थी – “अरे, हो गया! देखो भई, हो गया!” उन्होंने बड़े गर्व से पत्नी को आवाज़ दी। श्रीमती श्रीवास्तव रसोई से झांककर बोलीं – “देख लेना, कुछ गड़बड़ मत हो जाए!” लेकिन आज श्रीवास्तव जी को पहली बार लगा कि उन्होंने कुछ नया और बड़ा कर दिखाया है।
ऑर्डर प्लेस होते ही दिल की धड़कनें थोड़ी तेज़ रहीं, पर उत्सुकता उससे भी ज़्यादा थी। मोबाइल बार-बार देखते – “Order Confirmed”, फिर “Packed”, फिर “Shipped” का मैसेज आया, तो जैसे स्कूल में रिपोर्ट कार्ड आने पर होता था, वैसी ही बेचैनी होने लगी। चिराग ने मज़ाक किया, “पापा, अब ऐप खोल-खोलकर मत देखिए, टाइम पर आ जाएगा।” लेकिन श्रीवास्तव जी से रुका नहीं गया – हर कुछ घंटों में डिलीवरी स्टेटस देखते, फिर चश्मा उतारकर सोच में पड़ जाते। घर में सबको पता था कि अब पापा का ध्यान सिर्फ उसी ऑर्डर पर है। पत्नी भी हंसकर कहतीं, “अरे, जूता ही तो है, ताजमहल थोड़े ना आ रहा है!” लेकिन श्रीवास्तव जी की दुनिया में ये छोटा सा जूता एक नई शुरुआत थी – उस डिजिटल दुनिया में पहला क़दम, जहाँ अब तक वो सिर्फ दूसरों को चलते देखते आए थे। मन में डर था कि सच में जूता ही आएगा या कुछ और, लेकिन इस डर में भी एक मीठा रोमांच था – जैसे कोई बच्चा पहली बार साइकिल चलाना सीख रहा हो।
***
ऑर्डर प्लेस करते ही श्रीवास्तव जी की ज़िंदगी में जैसे एक नया अध्याय खुल गया था, जिसके पन्नों पर बेचैनी, उत्सुकता और थोड़ी घबराहट की इबारत लिखी थी। अगली सुबह से ही उनकी आदत बदल गई – पहले जहाँ वो अख़बार पढ़ते हुए बिना देखे चाय के घूँट भर लिया करते थे, अब उनका हाथ चाय के कप की ओर बढ़ने से पहले ही मोबाइल स्क्रीन पर पहुँच जाता। उन्होंने बेटे से सिखा लिया था कि ‘My Orders’ में जाकर कैसे चेक करते हैं कि सामान कहाँ तक पहुँचा। अब दिन में कई बार वो उस ट्रैकिंग पेज को देखते – “Order Confirmed” देखकर मुस्कुराते, फिर “Packed” पर दिल की धड़कनें तेज़ होतीं, और “Shipped” पर तो मन में जैसे कोई ढोलक बजने लगती। शाम को ऑफिस से लौटकर आते ही सबसे पहला काम वही होता – जूते का स्टेटस देखना। श्रीमती श्रीवास्तव भी अब हँसते हुए कहतीं, “इतनी बार तो तुमने अपनी शादी के कार्ड भी नहीं देखे थे जितनी बार इस जूते को देख रहे हो।” पाखी चिढ़ाती, “पापा, कहीं ऐसा ना हो कि जूते की जगह कुछ और आ जाए।” श्रीवास्तव जी थोड़ा गंभीर होकर कहते, “ऐसा क्यों होगा? देखो तो सब ठीक लिखा है!” लेकिन फिर भी मन में एक छोटा सा डर था, जो हर बार चुपके से दस्तक दे जाता।
जैसे-जैसे डिलीवरी की तारीख़ नज़दीक आती गई, श्रीवास्तव जी का उत्साह और घबराहट दोनों बढ़ते गए। ऑफिस में भी ध्यान बँटा-बँटा सा रहता, सोचते कि डिलीवरी बॉय कब आएगा, घर पर कोई होगा या नहीं, कहीं वो लौट तो नहीं जाएगा। उन्होंने दो-तीन बार पत्नी को भी ताकीद कर दी, “सुनो, कल के बाद कभी भी कॉल आ सकता है, घर पर रहना।” श्रीमती श्रीवास्तव मुस्कुराते हुए कहतीं, “हमारे पास और कौन सा इतना बड़ा प्रोग्राम है?” शाम को बेटे के कमरे में जाकर पूछते, “बेटा, वो मैसेज आया क्या?” चिराग अब इन सवालों का आदी हो गया था, वो आराम से कहता, “पापा, अभी भी Shipped ही दिखा रहा है, दो-तीन दिन और लग सकते हैं।” लेकिन श्रीवास्तव जी की नज़र में वो दिन तीन महीने से भी लंबे लग रहे थे। अगले दिन सुबह-सुबह ही बेल बजी, और उनके दिल की धड़कनें बढ़ गईं। दौड़कर दरवाज़ा खोला, पर सामने दूधवाला खड़ा था। श्रीवास्तव जी के चेहरे पर आई मायूसी देखकर दूधवाले ने भी हँसते हुए कहा, “किसी और का इंतज़ार था क्या?” “न-नहीं, कुछ नहीं,” कहकर वो भीतर लौट आए, लेकिन पूरे दिन बेचैनी कम न हुई। हर बेल की आवाज़ पर वो उसी तरह दौड़ते, लेकिन या तो सब्ज़ी वाला आता या पाखी की सहेली।
आख़िरकार वो दिन भी आया जब सुबह ऐप में लिखा दिखा – “Out for delivery”। मानो किसी परीक्षा का रिज़ल्ट आने वाला हो। श्रीवास्तव जी ने पत्नी को भी कह दिया, “आज मुझे खुद ही पैकेट लेना है।” दोपहर के करीब डोरबेल बजी, इस बार वो धीरे-धीरे चलते हुए भी दिल में तेज़ धड़कनों के साथ दरवाज़ा खोलने पहुँचे। सामने एक मुस्कुराता हुआ युवक खड़ा था, हाथ में एक पैकेट लिए – “सर, डिलीवरी है।” ये वही रमेश था, जो मोहल्ले में अक्सर सामान देने आता था। श्रीवास्तव जी ने घबराहट में एक बार फिर पूछा, “जूता ही है ना?” रमेश ने हँसकर कहा, “सर, जो भी है, इसमें ही है!” उन्होंने जल्दी से कैश दिया, रसीद ली, और पैकेट को हाथों में ऐसे पकड़ा जैसे कोई नाज़ुक चीज़ हो। पूरे घर को आवाज़ लगाई, “आओ, आ गया!” पाखी, चिराग और श्रीमती श्रीवास्तव सब ड्राइंग रूम में जमा हो गए। सबकी नज़रें पैकेट पर थीं। श्रीवास्तव जी ने चश्मा ठीक किया, हाथ कांपते हुए पैकेट खोला। इस छोटे से लम्हे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी सुनाई दे रही थी। और फिर जैसे ही पैकेट खुला, सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं – उसमें जूते नहीं, एक चमचमाती परफ्यूम की बोतल रखी थी। पाखी का ठहाका, चिराग की हँसी, और श्रीमती श्रीवास्तव की वो मीठी झिड़की – “मैंने कहा था ना, गड़बड़ हो जाएगी!” – इन सबके बीच श्रीवास्तव जी का चेहरा देखने लायक था, जिसमें हैरानी, निराशा और हल्की शर्म सब कुछ साथ-साथ झलक रहे थे। पर सबसे दिलचस्प बात ये थी कि उनके भीतर का डर सच्चाई बनकर सामने आया था, और अब उनके पास दो ही रास्ते थे – या तो हार मान लें, या फिर इस नई दुनिया से दो-दो हाथ करें।
***
परफ्यूम की बोतल हाथ में थामे खड़े श्रीवास्तव जी कुछ पल के लिए जैसे पत्थर के हो गए थे, उन्हें समझ ही नहीं आया कि हँसें, रोएँ या गुस्सा करें। चेहरे पर पहले तो अविश्वास की परछाई आई, फिर हल्की झुंझलाहट, और फिर पूरे परिवार के सामने एक अजीब सी हताशा। पाखी की हँसी थमने का नाम नहीं ले रही थी, चिराग ने मज़ाक में कहा, “पापा, जूतों से बेहतर है, अब आप महकते रहेंगे!” श्रीमती श्रीवास्तव ने ताना मारा, “मैंने तो पहले ही कहा था, ऑनलाइन में यही होता है!” पर श्रीवास्तव जी की आँखों में उस वक्त मज़ाक की जगह गुस्से और लाचारी का मिला-जुला भाव था। उनके हाथ अब भी उस परफ्यूम की बोतल पर थे, मानो वो यक़ीन ही नहीं कर पा रहे हों कि सैकड़ों जूतों में से उन्होंने जो पसंद किया था, वो उनकी किस्मत से ऐसे बदलकर आया। कुछ पलों के बाद उन्होंने गहरी सांस ली, पर आवाज़ में अभी भी झल्लाहट थी, “ये क्या मज़ाक है? जूते मंगाए थे, इन्होंने इत्र भेज दिया!” पूरे घर में कुछ पल को खामोशी छा गई, पर फिर चिराग ने अपने पिता की झुंझलाहट को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा, “पापा, कोई बात नहीं, रिटर्न कर देते हैं। देखिए, ऐप में ‘Return/Replace’ का ऑप्शन है।” श्रीवास्तव जी ने चश्मा ठीक करते हुए मोबाइल उठाया, स्क्रीन पर उंगलियाँ रखीं, पर तकनीक की वो दुनिया उन्हें अब और जटिल और अनचाही लगने लगी। उनका चेहरा बता रहा था कि वो मन ही मन सोच रहे थे – “दुकान से ही ले लेता, तो ये नौबत न आती।”
चिराग ने धीरे-धीरे समझाते हुए रिटर्न की प्रक्रिया शुरू करवाई – पहले कारण चुनो, फिर फोटो खींचो, फिर सबमिट करो। पर हर कदम पर श्रीवास्तव जी की उंगलियाँ जैसे कांपती रहीं, उनका आत्मविश्वास टूटता दिखा। उन्होंने फोटो खींचने के बाद मोबाइल बेटे को पकड़ा दिया, “तू ही कर दे, बेटा, मुझसे नहीं हो रहा।” पाखी अब भी बीच-बीच में मज़ाक उड़ाती रही, “पापा, अगली बार कुछ ऑर्डर करोगे, तो बर्तन आ जाएंगे।” पर श्रीवास्तव जी के लिए ये मज़ाक नहीं था, ये उनके आत्मसम्मान का सवाल था – उम्र के इस पड़ाव पर, जहाँ उन्होंने हमेशा घर के हर फैसले में विश्वास और अनुभव से काम लिया था, आज वो मोबाइल के एक स्क्रीन के सामने असहाय खड़े थे। जैसे-तैसे रिटर्न रिक्वेस्ट सबमिट हो गई, और ऐप पर लिखा आया – “Your return request has been accepted.” चिराग ने कहा, “पापा, अब डिलीवरी वाला आएगा, और वापस ले जाएगा।” पर श्रीवास्तव जी अब भी आश्वस्त नहीं थे, “और पैसे? पैसे कब मिलेंगे?” चिराग ने समझाया, “जब जूते वापस कंपनी को पहुँच जाएंगे, तभी रिफंड आएगा।” ये सुनकर उनका माथा और भी भारी हो गया।
अगले कुछ दिन उनके लिए और भी उलझन भरे थे। हर बार जब डोरबेल बजती, वो दौड़कर जाते, पर या तो दूधवाला आता, या सब्ज़ी वाला, या पड़ोसी की चिट्ठी। डिलीवरी बॉय रमेश जब वाकई परफ्यूम वापस लेने आया, तो श्रीवास्तव जी ने झिझकते हुए पूछा, “भैया, अब ये जूता कब आएगा?” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “सर, रिटर्न प्रोसेस के बाद नया ऑर्डर करना पड़ेगा।” इस जवाब ने जैसे उनकी थकान और बढ़ा दी। पर हिम्मत हारने की बजाय उन्होंने तय किया – “अबकी बार भी ट्राय करूंगा।” रात को बेटे के पास बैठे, फिर से जूतों की तलाश शुरू की, पर अब हर तस्वीर देखते हुए दिल में संदेह घर कर गया था। रेटिंग देखते, रिव्यू पढ़ते, फिर भी भरोसा नहीं होता। चिराग ने कहा, “पापा, इस बार किसी भरोसेमंद ब्रांड से लीजिए।” पर भरोसा टूटने के बाद हर चीज़ संदिग्ध लगने लगती है। आखिर एक बार फिर हिम्मत करके उन्होंने ऑर्डर किया, इस बार कैश ऑन डिलीवरी रखा, और दिल में दबी हुई उम्मीद की लौ जलाए रखी – “शायद अबकी बार सही आए।” उस रात नींद कम आई, ख्वाबों में भी पैकेट खुलते और उसमें से जूते की बजाय कुछ और निकलता दिखता। और कहीं दूर, खुद पर ही हँसते हुए वो सोचते – “ये ऑनलाइन की दुनिया भी अजीब है, साहब…!”
***
रिटर्न की प्रक्रिया शुरू होते ही श्रीवास्तव जी को लगा था कि अब मुश्किलें खत्म हो जाएंगी, लेकिन असली झंझट तो जैसे अब शुरू हुआ। बेटे चिराग की मदद से जैसे-तैसे परफ्यूम की रिटर्न रिक्वेस्ट डालने के बाद ऐप में लिखा आया – “Pickup scheduled.” उस एक पंक्ति ने थोड़ी राहत तो दी, लेकिन राहत के साथ नई बेचैनी भी आ गई – अब हर डोरबेल की आवाज़ पर वो दौड़कर दरवाज़ा खोलते और हर बार निराश लौटते। कभी सब्ज़ी वाला, कभी दूध वाला, कभी पड़ोसी का बच्चा, और हर बार उनके चेहरे पर वही सवाल – “भैया, क्या रिटर्न लेने आए हो?” घरवालों के लिए ये रोज़ की कॉमेडी बन गई थी, पर श्रीवास्तव जी के लिए ये रोज़ का तनाव था। अगले दिन डिलीवरी बॉय रमेश सच में आया, मुस्कुराता हुआ, जैसे पुराना दोस्त हो। “सर, परफ्यूम वापस लेने आया हूँ,” उसने कहा। परफ्यूम वापस गया, पर अब श्रीवास्तव जी को चिंता सताने लगी – “अब मेरे पैसे कब मिलेंगे?” चिराग ने समझाया कि कंपनी को सामान वापस पहुँचते ही पैसे रिफंड होंगे, पर इस ‘कब’ का जवाब किसी के पास नहीं था। मोबाइल की स्क्रीन पर हर दो घंटे में वो ‘Return Status’ देखते, आँखों पर चश्मा टिकाकर शब्दों को पढ़ने की कोशिश करते, पर शब्द वही रहते – “In transit.” जैसे कोई रेलगाड़ी सफ़र पर निकली हो और पता नहीं कब मंज़िल पर पहुँचेगी।
इस बीच घर में मज़ाक भी चलता रहा। पाखी ने कह दिया, “पापा, अगली बार कुछ ऑर्डर मत करना, हमारे घर का एड्रेस ही गड़बड़ लगता है!” श्रीमती श्रीवास्तव ने भी चुटकी ली, “अब दुकान से ही ले लेते, तो पहन भी चुके होते।” श्रीवास्तव जी के लिए यह मज़ाक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की परीक्षा थी। हर मज़ाक उन्हें अंदर से थोड़ा और दुखी कर देता, पर वो चुप रहते। रात में नींद भी कम आती, मोबाइल की लाइट में बार-बार ऐप चेक करते। एक रात उन्होंने चिराग को नींद से जगा दिया, “बेटा, देख तो, ये रिटर्न कहाँ पहुँचा?” चिराग ने आँखें मलते हुए कहा, “पापा, आप भी ना…” और मोबाइल पर दिखाया कि सामान अभी गोदाम में ही है। “इतना टाइम क्यों लग रहा है?” श्रीवास्तव जी ने पूछा, मगर जवाब किसी के पास नहीं था। दिन बीतते गए, और हर दिन डोरबेल की आवाज़ पर दिल की धड़कन बढ़ती, पर रिफंड का मैसेज नहीं आता। फिर एक दिन आखिर वो मैसेज आ ही गया – “Your refund has been processed.” उस पल उनके चेहरे पर जो सुकून था, वो शब्दों में बयान करना मुश्किल है। उन्होंने चैन की सांस ली, और चिराग से कहा, “चल, अब फिर से जूते ऑर्डर करेंगे।”
मगर इस बार वो पुराने भरोसे के साथ नहीं, बल्कि एक नयी सतर्कता के साथ ऑर्डर कर रहे थे। मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियाँ रुक-रुक कर चलतीं, हर जूते को कई बार ज़ूम करके देखते, रिव्यू पढ़ते, और बार-बार चिराग से पूछते, “ये ठीक लगेगा?” चिराग हँसकर कहता, “पापा, इस बार तो सब देख लिया, अब गड़बड़ नहीं होगी।” ऑर्डर हुआ, इस बार भी कैश ऑन डिलीवरी रखा, ताकि नुकसान कम से कम हो। फिर वही इंतज़ार की घड़ियाँ शुरू हुईं – “Packed,” “Shipped,” “Out for delivery.” घर में सबको पता था कि पापा का मूड इसी पर टिका है। फिर डोरबेल बजी, और रमेश हँसते हुए पैकेट लेकर आया, “सर, इस बार उम्मीद है जूते ही होंगे।” सबकी आँखें पैकेट पर लगी थीं, श्रीवास्तव जी के हाथ काँपते हुए पैकेट खोलने लगे, और जैसे ही पैकेट खुला, पूरे घर में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया – इस बार जूते की जगह एक छोटी सी सिलाई मशीन रखी थी। पाखी हँसते-हँसते गिर पड़ी, चिराग के चेहरे पर भी हँसी थी, पर श्रीवास्तव जी की आँखों में मायूसी के साथ एक हल्की सी हिम्मत भी थी। उन्होंने गहरी साँस ली और धीरे से कहा, “चलो बेटा, फिर से रिटर्न डाल देते हैं।” घर के सब लोग हँसते रहे, पर श्रीवास्तव जी के मन में ये ठान लिया गया था – चाहे कुछ भी हो, वो इस ऑनलाइन की जंग से हार नहीं मानेंगे।
***
सिलाई मशीन हाथ में लिए खड़े श्रीवास्तव जी के चेहरे पर हताशा की लकीरें और गहरी हो गई थीं, जैसे किसी मासूम उम्मीद को बार-बार ठुकरा दिया गया हो। घर में पाखी की हँसी थमने का नाम नहीं ले रही थी, और चिराग भी मुस्कुराकर कह रहा था, “पापा, अब तो ऑनलाइन वालों ने आपको फैशन डिजाइनर समझ लिया होगा!” श्रीमती श्रीवास्तव ने भी ताना कसा, “कहा था ना, दुकान से ले लो, पर नहीं, बड़े आए ऑनलाइन के शौक़ीन!” मगर इस बार मज़ाक और तानों के बीच भी श्रीवास्तव जी के चेहरे पर जो थकान दिखी, वह घर के सब लोगों ने देखी। उन्होंने चुपचाप सिलाई मशीन को मेज़ पर रखा, चश्मा उतारकर आँखें बंद कर लीं, और कुछ देर यूँ ही बैठे रहे जैसे मन ही मन खुद को समझा रहे हों कि ये बस एक गलती है, दुनिया का अंत नहीं। लेकिन अंदर से उनके विश्वास की नींव डगमगा गई थी। उम्र भर उन्होंने जो भी चीज़ खरीदी, वह दुकान से खरीदी, देखकर, परखकर, हाथ में तौलकर खरीदी। यहाँ स्क्रीन पर फोटो देखकर ऑर्डर करना उन्हें शुरू से ही अजीब लगा था, और अब यह अजीबपन भारी पड़ने लगा था। फिर भी उन्होंने बेटे की ओर देखा, जिसमें आज भी उम्मीद बाकी थी, और धीरे से बोले, “बेटा, फिर से रिटर्न डाल देंगे?”
चिराग ने बिना मुस्कुराए सिर हिलाया, “हाँ पापा, डाल देंगे, इस बार भी जैसे डाला था।” और वो फिर से उसी प्रक्रिया में जुट गए – ऐप खोला, ‘Return/Replace’ पर क्लिक किया, कारण चुना, फोटो खींचा, और सबमिट किया। पर इस बार श्रीवास्तव जी की उंगलियाँ पहले से ज़्यादा थकी और हारी हुई दिख रही थीं। पाखी ने मज़ाक में कहा, “पापा, अबकी बार तो शायद प्रेशर कुकर आ जाए!” पर हँसी के बीच भी उसकी आवाज़ में थोड़ी चिंता भी थी, क्योंकि उसने पापा को इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। अगला हफ्ता भी पिछले हफ्ते की तरह ही गुज़रा – बार-बार डोरबेल की आवाज़, बार-बार ‘In transit’ का स्टेटस, बार-बार वही “पता नहीं कब आएगा” की सोच। इस बीच कॉल सेंटर पर भी कई बार बात करनी पड़ी। कॉल सेंटर की महिला ममता जी की मीठी आवाज़ में “सर, प्लीज़ होल्ड कीजिए” सुनते-सुनते श्रीवास्तव जी को फोन के उस पार बैठे लोगों से भी चिढ़ होने लगी थी। मगर फिर भी वह बड़े संयम से कहते, “बीटा, देखिए, हम जूता मंगाए थे, पर सिलाई मशीन आ गई है, अब कब ठीक होगा?” और हर बार ममता जी की आवाज़ में वही जवाब मिलता, “सर, सिस्टम में अपडेट हो रहा है, आप चिंता न करें।”
रात को सब सो जाते, पर श्रीवास्तव जी की नींद उड़ी रहती। मन में यही चलता रहता कि क्या सच में इस बार पैसे वापस मिलेंगे, क्या अगली बार सही जूता आएगा। फिर भी दिल के किसी कोने में एक हल्की सी उम्मीद थी, जो बार-बार कहती थी, “शायद अगली बार सब ठीक हो जाएगा।” एक रात जब सब सो रहे थे, वो चुपचाप उठकर बालकनी में चले गए, ठंडी हवा में खड़े होकर उन्होंने आसमान की ओर देखा, और मन ही मन मुस्कुराकर बोले, “हे भगवान, अगली बार तो जूते ही भेज देना।” जैसे-तैसे दोबारा रिफंड का मैसेज आया, और पैसे वापस मिल गए। पर इस बार जब नए जूते का ऑर्डर देने की बारी आई, तो उनकी उंगलियाँ बहुत धीमे चलीं। चेहरे पर वो पुराना उत्साह नहीं था, पर एक ज़िद ज़रूर थी – इस बार भी कोशिश करनी है। बेटे ने पूछा, “पापा, पक्का?” और उन्होंने हल्की सी थकी मुस्कुराहट के साथ कहा, “हाँ बेटा, पक्का… आखिर जूते भी तो चाहिए ही ना।” और इसी थकान, उम्मीद, और हौसले के बीच उन्होंने फिर से ऑर्डर प्लेस किया – जैसे ज़िंदगी के खेल में फिर से चाल चल दी हो, यह सोचकर कि हार कितनी भी बार हो, अगली बाज़ी तो अभी बाकी है।
***
रिटर्न और रिफंड की थकाऊ प्रक्रिया से गुज़रने के बाद जब तीसरी बार नए जूते का ऑर्डर किया गया, तो श्रीवास्तव जी की हिम्मत तोड़ने के लिए अब ज़्यादा कुछ बाकी नहीं था, पर दिल में एक ज़िद फिर भी बाकी थी जो उन्हें बार-बार यही कहती थी कि इस बार सब ठीक होगा। लेकिन किस्मत को जैसे उनका इम्तिहान लेने में मज़ा आ रहा था। इस बार ऑर्डर करते समय ही ऐप पर कुछ तकनीकी गड़बड़ी हुई, पेमेंट के बाद भी ऑर्डर कन्फर्म नहीं हुआ। स्क्रीन पर बस यही लिखा था – “Payment processing, please wait…” श्रीवास्तव जी की धड़कनें बढ़ गईं, माथे पर पसीना आ गया। बेटे को आवाज़ दी, “चिराग, जरा देख तो बेटा, ये क्या हो गया?” चिराग ने भी देखा, पर जवाब में बस कंधे उचका दिए। “पापा, नेट में शायद दिक्कत होगी… कॉल सेंटर पर बात कर लेते हैं।” इस बार श्रीवास्तव जी ने तय किया कि खुद ही कॉल करेंगे, हर बार बेटे पर निर्भर रहना अब उन्हें अपने आत्मसम्मान को ठेस जैसा लगता था। उन्होंने फोन उठाया, नंबर डायल किया, और कुछ सेकंड्स के बाद ही लाइन पर एक मीठी आवाज़ गूंजी – “नमस्कार सर, मैं ममता बोल रही हूँ, बताइए आपकी क्या सहायता कर सकती हूँ?”
ममता जी की आवाज़ सुनते ही श्रीवास्तव जी का गुस्सा थोड़ी देर के लिए छूमंतर हो गया, जैसे किसी ने ठंडा पानी डाल दिया हो। उन्होंने हकलाते हुए कहा, “बेटा… वो… मैंने जूता ऑर्डर किया था… पैसा भी कट गया, पर ऑर्डर कन्फर्म नहीं हुआ…” ममता जी की आवाज़ में अजीब सी तसल्ली थी, “सर, आप बिल्कुल चिंता न करें, मैं चेक करती हूँ।” कुछ सेकंड्स के लिए खामोशी हुई, जिसमें श्रीवास्तव जी के दिल की धड़कनें तेज़ होती रहीं। फिर ममता जी की आवाज़ आई, “सर, सिस्टम में ऑर्डर पेंडिंग दिखा रहा है, आप दो मिनट होल्ड पर रहिए, मैं अपडेट करवा देती हूँ।” ‘होल्ड’ पर जाने के बाद कानों में हल्का सा संगीत बजने लगा, और उस संगीत के बीच श्रीवास्तव जी ने सोचा – “ये कैसी दुनिया है… सामने इंसान तक नहीं दिखता, पर भरोसा करना पड़ता है।” कुछ देर बाद ममता जी फिर लौटीं, “सर, हो गया, अब आपको ऑर्डर कन्फर्मेशन का मैसेज आ जाएगा।” सच में थोड़ी देर बाद मोबाइल पर ‘Order Confirmed’ का मैसेज चमक उठा। वो राहत की लंबी सांस लेकर बोले, “धन्यवाद बेटा, बहुत-बहुत शुक्रिया…” ममता जी की तरफ़ से भी हल्की सी हँसी आई, “सर, इसमें धन्यवाद की क्या बात है, यही तो मेरा काम है!”
फोन रखते हुए श्रीवास्तव जी के चेहरे पर थकन के बीच एक हल्की सी मुस्कुराहट थी, जैसे किसी ने दिलासा दिया हो कि वो अकेले नहीं हैं। उन्होंने खुद से कहा, “अब शायद इस बार सही आएगा…” पर उम्मीद के साथ-साथ डर भी साथ चला। अगले कुछ दिनों तक वही पुरानी कहानी दोहराई गई – सुबह उठते ही मोबाइल में ट्रैकिंग चेक करना, “Shipped”, “In transit”, “Out for delivery” का इंतज़ार करना। हर बेल की आवाज़ पर दौड़ना, और घरवालों की हँसी के बीच खुद को समझाना कि इस बार कुछ गलत नहीं होगा। आखिर जिस दिन डिलीवरी होने वाली थी, सुबह से ही श्रीवास्तव जी तैयार होकर बैठे थे, बालों में कंघी करके, चश्मा पोंछकर, मानो किसी बड़े मेहमान का इंतज़ार हो। डोरबेल बजी, रमेश मुस्कुराता हुआ पैकेट लिए खड़ा था। श्रीवास्तव जी ने थोड़ा संकोच और बहुत सारी दुआओं के साथ पैकेट खोला, पूरे घर की नज़रें उस पैकेट पर टिकी थीं। बॉक्स खुला, और इस बार सच में जूते ही निकले – वही भूरे रंग के, जो उन्होंने चुने थे। कुछ पलों तक किसी ने कुछ नहीं कहा, फिर पूरे घर में तालियाँ बज उठीं। श्रीवास्तव जी की आँखों में सुकून की हल्की नमी थी, उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “देखा! आखिर ममता जी ने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा…” और उस एक पल में लगा कि सारी थकान, सारी परेशानी किसी मीठी याद में बदल गई है।
***
जूते का पैकेट खुलते ही जैसे घर की हवा बदल गई। सबकी आँखों में हैरानी और हँसी के बीच एक अलग सा सुकून था, लेकिन श्रीवास्तव जी के दिल में वो पल किसी जीत से कम नहीं था। चिराग ने मज़ाक में कहा, “पापा, फोटो खिंचवाइए, इतिहास में दर्ज होगा – आखिर सही चीज़ आई!” पाखी ने भी ताली बजाई, “पापा, अब तो पहनकर देखिए, कहीं साइज गलत ना हो!” थोड़ी हिचकिचाहट के साथ श्रीवास्तव जी ने जूते निकाले, हाथ में उठाकर ग़ौर से देखा – सिलाई ठीक, ब्रांड का टैग भी सही, रंग भी वही जो ऑनलाइन तस्वीर में देखा था। उन्होंने धीरे-धीरे जूता पहनने के लिए पाँव बढ़ाया, और जैसे ही जूता सही फिट हुआ, उनके चेहरे पर वो मुस्कुराहट लौटी जो पिछले कई दिनों से गुम थी। उनके पाँव में नया जूता था, पर दिल में पुराने समय की तरह भरोसे का वही बक्सा खुला था, जिसमें उम्मीदें बंद थीं। कुछ पल को उन्होंने चुपचाप सिर झुकाकर भगवान का धन्यवाद किया, और भीतर ही भीतर खुद से कहा, “देखा, कितनी मुश्किलों के बाद सही चीज़ मिल ही गई…” पर उस पल में भी पिछले ऑर्डर, रिटर्न, कॉल सेंटर की बातें, और दिन-रात की चिंता किसी धुंधली परछाईं की तरह ज़हन में घूम रही थीं।
दोपहर को उन्होंने ऑफिस के लिए तैयार होते हुए नए जूते पहन लिए, और आईने में खुद को देखकर हल्की सी मुस्कुराहट दी, मानो अपने ही आपसे कह रहे हों – “भई, तुम भी अब बदल रहे हो…” घर से निकलते वक्त पाखी ने हँसकर कहा, “पापा, कहीं रास्ते में जूता बदल मत जाए!” और चिराग ने जोड़ा, “और हाँ पापा, इस बार रास्ते में भी फोटो भेजते रहिए!” श्रीवास्तव जी ने नकली गुस्से में कहा, “बहुत हो गया, अब चुप भी रहो!” मगर उनके चेहरे पर अब वो डर नहीं था, बल्कि एक हल्का सा गर्व था कि उन्होंने नई तकनीक को, ऑनलाइन दुनिया को हरा दिया था – या शायद उसे अपना दोस्त बना लिया था। रास्ते में चलते हुए उन्हें वो सारी बातें याद आईं – परफ्यूम वाला डिब्बा, सिलाई मशीन की गड़बड़, कॉल सेंटर वाली ममता जी की आवाज़, और हर बार हार न मानने की ठान। रास्ते में पड़ोसी गुप्ता जी मिले, उन्होंने नए जूते पर नज़र डाली और बोले, “अरे वाह, अच्छे हैं!” श्रीवास्तव जी ने मुस्कुराकर कहा, “ऑनलाइन लिए हैं… थोड़ी मेहनत लगी, पर आ गए।” गुप्ता जी की आँखों में हल्की हैरानी थी, पर श्रीवास्तव जी की आवाज़ में जो आत्मविश्वास था, वो किसी लंबी लड़ाई के बाद जीतने वाले सिपाही का सा था।
ऑफिस पहुँचते ही सहकर्मी मिश्रा जी ने भी टोका, “नए जूते! बड़े स्मार्ट लग रहे हैं!” श्रीवास्तव जी ने हँसते हुए कहा, “हाँ भाई, ऑनलाइन का कमाल है।” उनकी इस बात पर मिश्रा जी ने मज़ाक उड़ाया, “रिस्क नहीं है?” श्रीवास्तव जी ने गंभीर होकर कहा, “रिस्क तो है, पर कोशिश करते रहने में भी मज़ा है।” उस शाम जब घर लौटे तो जूतों में पड़ी धूल झाड़ते हुए उन्हें लगा जैसे ये सिर्फ़ जूते नहीं, बल्कि भरोसे की परतें हैं जो समय के साथ जमती गईं। रात को पाखी ने पूछा, “पापा, अगली बार कुछ और ऑर्डर करेंगे?” श्रीवास्तव जी ने हँसकर कहा, “करूँगा बेटा, पर सब्र के साथ… अब समझ आ गया है कि ऑनलाइन भी भरोसा धीरे-धीरे बनता है।” कमरे में हल्की सी खामोशी थी, जिसमें एक अधूरी कहानी पूरी हो रही थी – वो कहानी जो सिर्फ़ जूते की नहीं थी, बल्कि ज़िद, हौसले और उम्मीद की थी।
नए जूते पहनकर ऑफिस और मोहल्ले में तारीफ़ें बटोरने के बाद भी श्रीवास्तव जी के मन में एक गहरी सीख की परत जम चुकी थी—ऑनलाइन की दुनिया कितनी आसान दिखती है, पर भरोसा कमाते-खोते उसमें वक्त लगता है, हौसला टूटता है, धैर्य की परीक्षा होती है। घर लौटकर उन्होंने रात के खाने के बाद चुपचाप मोबाइल निकाला और बेटे से बोले, “चिराग, मुझे अब ऐप अच्छे से सिखा दे… मैं खुद सीखना चाहता हूँ, हर बार तुम्हें परेशान नहीं करूँगा।” चिराग ने हँसकर कहा, “पापा, ये तो बहुत अच्छी बात है!” और फिर वो दोनों मोबाइल स्क्रीन पर झुककर बैठ गए। श्रीवास्तव जी ने धीरे-धीरे हर फीचर पर ऊँगली रखकर सीखा—कैसे प्रोडक्ट सर्च करते हैं, रिव्यू देखते हैं, कैश ऑन डिलीवरी और प्रीपेड में क्या फर्क है, रिटर्न कैसे करते हैं, और सबसे ज़रूरी बात—कौन से सेलर भरोसेमंद हैं। उस पूरी सीखने की प्रक्रिया में उनकी आँखों में वही चमक लौट आई, जो पहली बार ऑनलाइन ऑर्डर करते वक्त थी, पर इस बार उसमें अनुभव का नर्म उजाला भी था। पाखी रसोई से आवाज़ लगा-लगा कर मज़ाक करती रही, “पापा, अब तो आप ऑनलाइन टीचर भी बन सकते हैं!” मगर श्रीवास्तव जी के कानों में बस बेटे की समझाइश और खुद की धीमी-धीमी प्रैक्टिस की आवाज़ गूंज रही थी, जैसे किसी पुरानी किताब का नया पन्ना पलट रहे हों।
सीखते-सीखते उन्होंने गौर किया कि ऑनलाइन में सब कुछ सिर्फ़ सुविधा नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी है—जैसे दुकान में चीज़ छूकर परखते हैं, वैसे ही ऑनलाइन में भी आँखें और समझ दोनों खोलकर चलना पड़ता है। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आदतें बदलीं—पहले जो चीज़ तुरंत पसंद आती थी, अब उस पर क्लिक करने से पहले रिव्यू ज़रूर पढ़ते; रेटिंग कम दिखे तो कारण खोजते; हर बार ब्रांड और प्राइस की तुलना करते; और सबसे बढ़कर कैश ऑन डिलीवरी पर ही भरोसा करते। इस बदलाव को देखकर चिराग और पाखी भी चुपके से मुस्कुराते थे कि पापा ने सिर्फ़ तकनीक ही नहीं सीखी, बल्कि उसमें सलीका भी जोड़ लिया। एक शाम उन्होंने खुद ही बेटे से कहा, “चिराग, मैं अब एक शर्ट ऑर्डर करूँगा, पर इस बार बिना तुम्हारी मदद के।” बेटे ने मोबाइल हाथ में थमाया, और थोड़ी देर में स्क्रीन पर श्रीवास्तव जी ने ऑर्डर प्लेस कर दिया—बिना हड़बड़ी, बिना डर के, और पूरी तसल्ली से। शर्ट की डिलीवरी भी दो दिन बाद आ गई, और इस बार सचमुच वही आई जो चुनी थी। उस पैकेट को खोलते वक्त उनके चेहरे पर जो आत्मविश्वास था, वो एक पिता के लिए, एक आदमी के लिए और सबसे ज़्यादा उनके अपने लिए बहुत बड़ी जीत थी।
रात को बालकनी में बैठकर उन्होंने गहरी साँस ली और सोचा, “ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है—कभी कुछ गलत मिलता है, तो कभी सही, मगर जब तक हम सीखते रहते हैं, चलते रहते हैं, तब तक मंज़िल बदलती ज़रूर है, पर खोती नहीं।” उन्होंने याद किया वो पहला ऑर्डर, परफ्यूम की वो बोतल जो जूते की जगह आई थी, सिलाई मशीन का झटका, कॉल सेंटर पर ममता जी की तसल्ली भरी आवाज़, और फिर बार-बार का रिटर्न प्रोसेस। वो सब अब परेशानियाँ नहीं, बल्कि मुस्कुराहटें थीं—क्योंकि अब वो सिर्फ़ किस्से बन चुकी थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया, “मुझे हारना सिखाने से पहले सीखना सिखाया।” और जब चुपचाप भीतर लौटे, तो बेटे और बेटी की हँसी, पत्नी की हल्की मुस्कान और खुद के भीतर जगा वो नया भरोसा उनकी थकन को हर रात की तरह आज भी हारने नहीं दे रहा था।
***
कुछ हफ़्तों बाद की एक सुबह थी जब डोरबेल बजी, और दरवाज़े पर डिलीवरी बॉय खड़ा था, हाथ में एक छोटा सा पैकेट लिए हुए। श्रीवास्तव जी को हैरानी हुई क्योंकि उन्होंने हाल ही में कुछ ऑर्डर नहीं किया था, फिर भी उन्होंने मुस्कुराकर पैकेट लिया, और धीरे-धीरे खोलने लगे। पैकेट खुला, तो अंदर वही परफ्यूम की बोतल थी, जो सबसे पहली बार गलती से उनके पास आई थी। कुछ पल के लिए वो चुपचाप उसे देखते रहे, और फिर हल्की हँसी उनके होंठों पर फैल गई—जैसे पुरानी दोस्ती फिर से सामने आई हो। पाखी पास आकर बोली, “पापा! फिर से गड़बड़?” पर श्रीवास्तव जी ने सिर हिलाया, “नहीं बेटा, इस बार मैंने खुद मंगाया है।” पाखी और चिराग दोनों हैरानी से देख रहे थे। उन्होंने परफ्यूम की बोतल को नज़दीक से देखा, उसकी खुशबू को महसूस किया, और बोले, “पहली बार तो ग़लती से आया था, तब गुस्सा आया था, पर फिर भी उस खुशबू में कुछ अच्छा लगा था… सोचा, इस बार दिल से मंगाते हैं।” यह सुनकर घर के सब लोग पहले तो चुप रहे, फिर एक साथ मुस्कुरा उठे—शायद समझ गए थे कि ये परफ्यूम सिर्फ़ परफ्यूम नहीं, बल्कि उस सफर की निशानी थी जिसने पापा को बदल दिया था।
उस दिन शाम को ऑफिस से लौटकर उन्होंने पहली बार वो परफ्यूम इस्तेमाल किया, हल्का सा अपने कॉलर पर लगाया, और जैसे ही खुशबू हवा में घुली, बीते दिनों की सारी यादें भी साथ आईं—पहला ऑनलाइन ऑर्डर, डर, गुस्सा, फिर हँसी, मज़ाक, रिटर्न का झंझट, कॉल सेंटर की मीठी आवाज़, सिलाई मशीन का झटका, और फिर आखिरकार सही जूते का आना। हर पल उनके दिल में जैसे किसी किताब के पन्नों की तरह पलटा, और अब वो सब बोझ नहीं, बल्कि मुस्कुराहट बन चुका था। पाखी ने देखा, तो मज़ाक में बोली, “पापा, अब तो आप सच में स्मार्ट हो गए!” और चिराग ने भी ताली बजाकर कहा, “पापा, ये तो डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन है!” श्रीवास्तव जी ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया, “बेटा, ऑनलाइन शॉपिंग ने एक बात सिखा दी—गलत चीज़ भी अगर दिल से अपनाओ, तो वो भी याद बनकर अच्छी लगती है।” यह कहकर वो कुछ पल के लिए खामोश हो गए, और मन ही मन खुद को धन्यवाद दिया कि हार मानने की बजाय सीखा, और डर को दोस्त बना लिया।
रात को जब सब सो गए, तो श्रीवास्तव जी बालकनी में खड़े होकर ठंडी हवा में वो खुशबू महसूस करते रहे। उन्होंने आसमान की ओर देखते हुए मुस्कुराकर सोचा, “गलती भी अगर हमें कुछ सिखा दे, तो वो वरदान बन जाती है…” उन्होंने मोबाइल की स्क्रीन पर अपना प्रोफाइल देखा—अब उसमें पहले की तरह खालीपन नहीं था, बल्कि हाल की खरीदारी, रिव्यू, और नए-नए सीखे सबक की कहानियाँ थीं। परफ्यूम की बोतल को हाथ में थामकर उन्होंने कहा, “तूने बहुत कुछ सिखा दिया…” और दिल से महसूस किया कि कभी-कभी ज़िंदगी में जो सबसे गलत चीज़ लगती है, वही हमें सबसे ज़्यादा बदल देती है। उस रात परफ्यूम की खुशबू उनके कमरे में भी फैली, और नींद में भी एक हल्की मुस्कुराहट उनके चेहरे पर थी—क्योंकि अब वो सिर्फ़ जूतों के लिए नहीं, बल्कि उस भरोसे के लिए भी शुक्रगुज़ार थे जो लौटकर उनके दिल में बस गया था।
***
कुछ महीने बीत गए, और अब श्रीवास्तव जी की दिनचर्या में ऑनलाइन शॉपिंग कोई डरावना नाम नहीं रह गया था बल्कि एक नया दोस्त बन गया था—वो दोस्त, जिससे पहली बार मिलने में संकोच था, शुरुआत में झगड़ा भी हुआ, पर फिर धीरे-धीरे रिश्ता पक्का हो गया। घर में सब अब हैरान नहीं होते थे जब वो मोबाइल हाथ में लेकर नई चीज़ें देखते; बल्कि पाखी मज़ाक में कहती, “पापा, अब तो आप हमसे भी ज़्यादा अपडेटेड हो गए!” चिराग अक़्सर कहता, “पापा, किसी दिन आपके लिए ही एक यूट्यूब चैनल बना देंगे—‘श्रीवास्तव जी की ऑनलाइन क्लास’!” श्रीवास्तव जी इन बातों पर मुस्कुराते, लेकिन दिल के किसी कोने में उन्हें अच्छा लगता कि बच्चे अब उन्हें सिर्फ़ पुराने ख्यालों वाले पापा नहीं, बल्कि सीखते रहने वाले इंसान के रूप में देख रहे थे। घर में रोज़मर्रा की बातें चलती रहीं—कभी पंखा ख़राब हो जाता, तो कभी बटन टूट जाता; पर अब हर परेशानी में पहला ख्याल दुकान का नहीं, बल्कि ऐप का आता। और सबसे दिलचस्प बात ये थी कि अब वो खुद ही मोबाइल उठाकर सामान ढूँढते, रेटिंग देखते, और पूरी इत्मीनान से ऑर्डर करते।
एक दिन उन्होंने अपनी पुरानी घड़ी के लिए नया पट्टा ऑर्डर किया। सामान सस्ता था, पर उनके लिए ख़ास था—क्योंकि वो घड़ी उनके रिटायरमेंट के दिन बेटे ने तोहफ़े में दी थी। उन्होंने बड़े ध्यान से रिव्यू पढ़े, सही कलर चुना, और कैश ऑन डिलीवरी पर क्लिक किया। पैकेट आया, घड़ी का नया पट्टा देखकर उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “देखा? अब मैं भी किसी से कम नहीं!” उस शाम बालकनी में बैठे हुए उन्होंने वो घड़ी पहन ली, और हल्की हवा में जैसे बीते महीनों की सारी बातें एक-एक कर सामने आने लगीं: पहला ग़लत ऑर्डर, परफ्यूम की खुशबू, सिलाई मशीन की हँसी, कॉल सेंटर की ममता जी की आवाज़, बार-बार रिटर्न की मशक्कत, फिर जूते का सही आना और आखिरकार अपने दम पर पहली सही खरीदारी। हर घटना जैसे किसी किताब के पन्नों की तरह पलटती रही, और अब वो पन्ने बोझ नहीं थे, बल्कि यादें बन चुकी थीं, जिन पर मुस्कुराया जा सकता था। उन्होंने महसूस किया कि ऑनलाइन शॉपिंग से ज़्यादा उन्होंने धैर्य, भरोसा और हारकर भी दोबारा खड़े होने की ताक़त सीखी थी।
रात को बेटे-बेटी के सो जाने के बाद श्रीवास्तव जी फिर मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियाँ घुमाने लगे, और एक पुरानी तमन्ना जाग उठी—वो किताब जो बरसों से ढूँढ रहे थे, जिसे पढ़े अरसा हो गया था। उन्होंने ऐप में टाइप किया, तस्वीर देखकर दिल खुश हो गया, और थोड़े संकोच के बाद ‘Buy Now’ पर क्लिक कर दिया। दिल की धड़कन तेज़ हुई, पर इस बार उसमें डर कम, और हौसला ज़्यादा था। जब ‘Order Confirmed’ लिखा आया, उन्होंने लंबी साँस ली और बालकनी में आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन कहा, “शुक्रिया… मुझे हारना नहीं सिखाया।” और आख़िर में मुस्कुराकर बोले, “ये आख़िरी क्लिक नहीं, शायद नई शुरुआत है।” हवा में ठंडी खुशबू तैर रही थी, पर इस बार वो खुशबू परफ्यूम की नहीं, बल्कि अपने भीतर लौटे भरोसे की थी—जो सबसे बड़ी जीत बनकर श्रीवास्तव जी के चेहरे पर चमक रहा था।
___




