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शिकारी और शिकार

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आकाश गुप्ता


भोपाल की रात उस रोज़ असामान्य रूप से सन्नाटेदार थी। बरसात अभी-अभी थमी थी और सड़कों पर जगह-जगह पानी जमा था, स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी उस पानी में प्रतिबिंबित हो रही थी। पुराने भोपाल की तंग गलियों से लेकर नए शहर की चौड़ी सड़कों तक हर जगह नमी और ठंडक फैली थी। रात के करीब बारह बज रहे थे जब अचानक वीआईपी रोड पर एक कार की तेज़ ब्रेक लगने की आवाज़ गूंजी, फिर किसी के चीखने जैसी हल्की ध्वनि, और उसके बाद टायरों के घिसटने की गंध के साथ एक कार अंधेरे में ग़ायब हो गई। कुछ ही मिनटों में राहगीरों की भीड़ जमा हो गई और वहां ज़मीन पर खून से लथपथ पड़ा था एक अधेड़ उम्र का आदमी, जिसकी सांसें बहुत धीमी थीं। लोगों ने मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना शुरू कर दिया, कुछ ने एम्बुलेंस और पुलिस को फोन किया। और तभी पता चला कि वह शख्स कोई मामूली राहगीर नहीं, बल्कि शहर का जाना-पहचाना नाम — राजीव शुक्ला था, जिसे समाजसेवी और सफल बिज़नेसमैन के रूप में भोपाल में काफी लोग जानते थे। भीड़ में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं, “इतना बड़ा आदमी… इस हाल में?” और दूसरे की आवाज़, “अरे, लगता है किसी ने जानबूझकर टक्कर मारी है…”।

इंस्पेक्टर अरविंद चौहान को जब कंट्रोल रूम से कॉल मिला तो वह पहले तो इसे एक सामान्य एक्सीडेंट समझकर निकल पड़े, लेकिन घटनास्थल पर पहुंचते ही उन्हें अंदाज़ा हो गया कि मामला साधारण नहीं है। पुलिस वैन की लाल-नीली बत्तियां टिमटिमा रही थीं, फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच चुकी थी और क्राइम सीन के चारों ओर भीड़ को रोका जा रहा था। अरविंद ने झुककर शव को देखा — माथे पर गहरी चोट, पसलियों में टूटने के निशान, और पैरों के पास टायर के रबर की घिसी हुई परत। उनके सामने सवाल यह था कि इतनी सुनसान सड़क पर ठीक उसी वक्त राजीव शुक्ला यहां कैसे पहुंचे, और वह गाड़ी कहां गायब हो गई जिसने टक्कर मारी? रोड पर लगे सीसीटीवी कैमरों की दिशा उन्होंने तुरंत नोट की, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जहां हादसा हुआ, वहां कैमरे ठीक उसी दिन से खराब पड़े थे। अरविंद की पेशानी पर बल पड़ गए — “सिर्फ इत्तेफाक? या किसी ने पहले से प्लान किया हुआ था?”। मौके पर मौजूद गवाहों से पूछताछ की गई तो किसी ने बस इतना कहा कि काली एसयूवी तेज़ रफ्तार से आई और सेकंड भर में सब हो गया। किसी ने नंबर नहीं देखा, किसी ने ड्राइवर का चेहरा नहीं। यह वही उलझन थी जो हर हिट-एंड-रन केस को और मुश्किल बना देती है।

अरविंद चौहान ने अपने अनुभव से समझ लिया कि यह सिर्फ एक्सीडेंट नहीं हो सकता। राजीव शुक्ला का नाम आते ही उनके दिमाग़ में कई पुराने किस्से ताज़ा हो गए — सरकारी ठेकों में उसका दखल, रियल एस्टेट डील्स में विवाद, और शहर के अंडरवर्ल्ड से उसके छुपे रिश्तों की चर्चा। बाहर से भले ही वह अनाथालयों में दान देने वाला और चुनावी मंचों पर नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाने वाला समाजसेवी था, लेकिन अंदरखाने उसकी छवि उतनी साफ नहीं थी। अस्पताल ले जाते वक्त ही राजीव दम तोड़ चुका था, और अब केस एक ‘कथित सड़क हादसे’ से बदलकर एक ‘संभावित हत्या’ का रूप ले चुका था। चौहान ने टीम को आदेश दिया कि आसपास के सभी रास्तों के फुटेज और टोल नाकों की जांच की जाए, हर उस गाड़ी की जानकारी निकाली जाए जो उस वक्त वहां से गुज़री थी। भीड़ धीरे-धीरे हटाई गई, लेकिन घटनास्थल की गंध, खून का धब्बा और सड़क पर पड़े टूटे कांच के टुकड़े पुलिस को यह याद दिला रहे थे कि यह रात भोपाल के अपराध इतिहास में एक नया मोड़ लाने वाली है। चौहान की आंखों में एक अजीब-सी चमक थी — एक तरफ थकान, दूसरी तरफ उस रहस्य को सुलझाने की जिद जो सामने था। उन्हें अंदेशा था कि असली कहानी अभी शुरू हुई है, और यह केस उन्हें सीधे शहर के अंधेरे गुप्त गलियारों तक ले जाएगा जहां शिकारी और शिकार का फर्क मिट जाता है।

राजीव शुक्ला की मौत की खबर अगले ही दिन अखबारों की सुर्ख़ियों में थी। “समाजसेवी की सड़क हादसे में मौत”, “भोपाल का दानवीर हिट-एंड-रन का शिकार” — हेडलाइन्स में वही नाम गूंज रहा था जो लंबे समय से शहर की चकाचौंध और राजनीति का हिस्सा रहा था। परंतु इंस्पेक्टर अरविंद चौहान को इन सुर्ख़ियों में लिखे शब्दों से ज्यादा दिलचस्पी उन खाली जगहों में थी जहां सच्चाई दबाई गई थी। उन्होंने सबसे पहले राजीव के बिज़नेस की फाइलें निकलवाने का आदेश दिया। कागज़ों में वह कई कंपनियों का मालिक था — कंस्ट्रक्शन, शराब ठेके, ट्रांसपोर्ट और कुछ एनजीओ भी। सतह पर सब कुछ कानूनी और साफ-सुथरा दिखता था, लेकिन जब इन कंपनियों के पुराने लेन-देन की गहराई में जाया गया तो वहां पैसों के ऐसे खेल सामने आए जो सीधे-सीधे अंडरवर्ल्ड के पैटर्न से मेल खाते थे। कई शेल कंपनियों के ज़रिए काले धन को सफेद किया जा रहा था, ठेकों में धांधली हो रही थी, और सरकारी अफसरों से लेकर नेताओं तक को मोटे कमीशन दिए जा रहे थे। चौहान की टीम ने पुराने पुलिस रिकॉर्ड खंगाले तो सामने आया कि राजीव का नाम कई बार आपराधिक गतिविधियों में जुड़ा था, मगर हर बार सबूत या तो गायब हो जाते थे या गवाह अचानक पलट जाते थे।

जांच के दौरान चौहान ने राजीव के नज़दीकी लोगों से पूछताछ शुरू की। उसके पुराने दोस्त और कारोबारी साझेदारों से लेकर घर के ड्राइवर और चौकीदार तक, सबने वही कहानी दोहराई — “साहब बहुत नेकदिल थे, अनाथ बच्चों की मदद करते थे, गरीब लड़कियों की शादी कराते थे।” लेकिन अरविंद के तजुर्बे ने उन्हें सिखाया था कि जितना कोई शख्स ऊपर से दूध का धुला दिखता है, उतनी ही गहरी उसकी परछाई होती है। ड्राइवर ने दबे शब्दों में एक दिलचस्प बात बताई — “साहब देर रात अक़्सर कुछ अनजान लोगों से मिलते थे, और उन मुलाक़ातों के बाद हमेशा बेचैन दिखते थे।” इस बयान ने चौहान को और चौकन्ना कर दिया। पुलिस ने राजीव के फ़ोन रिकॉर्ड्स और कॉल डिटेल्स निकलवाए तो सामने आया कि उसकी बातचीत शहर के कुछ ऐसे लोगों से हो रही थी जिनका नाम पुलिस फाइलों में लंबे समय से दर्ज था — हथियार सप्लायर्स, अवैध शराब कारोबारी और कुछ ऐसे नाम जो सीधे गैंगवार से जुड़े हुए थे। यह साफ़ हो चुका था कि राजीव का ‘नेकी का चेहरा’ महज़ एक नक़ाब था, और उसके पीछे छुपा था वह आदमी जो शहर के अंडरवर्ल्ड की गहरी जड़ों से बंधा हुआ था।

अरविंद ने जैसे-जैसे फाइलों की तहें खोलीं, वैसे-वैसे यह एहसास गहरा होता गया कि राजीव शुक्ला की मौत किसी इत्तेफाक़ का नतीजा नहीं हो सकती। इस मौत के पीछे न सिर्फ किसी का गुस्सा था बल्कि किसी पुराने हिसाब का बदला भी था। सवाल यह था कि किसने यह खेल रचा — क्या यह शहर का वह उभरता गैंगस्टर था जो राजीव के कारोबार पर कब्ज़ा करना चाहता था, या फिर यह किसी पुराने साथी का धोखा था? चौहान ने अपनी टीम को निर्देश दिया कि राजीव के सभी बैंक खातों, प्रॉपर्टीज़ और साझेदारियों की छानबीन की जाए। इस बीच मीडिया लगातार राजीव को ‘भोपाल का रॉबिनहुड’ बताने पर आमादा थी, लेकिन चौहान जानता था कि मीडिया की चमकदार रोशनी के पीछे जो अंधेरा है, वही असली कहानी है। अब यह जांच केवल एक हत्या या हादसे का रहस्य नहीं रही थी, बल्कि भोपाल की पूरी आपराधिक संरचना को उजागर करने की चुनौती बन चुकी थी। चौहान के मन में यह सवाल लगातार घूम रहा था — अगर राजीव सचमुच इतना खतरनाक खेल खेल रहा था, तो क्या वह खुद ‘शिकारी’ था, या किसी और की बिछाई हुई चाल का ‘शिकार’?

राजीव शुक्ला की मौत के बाद उसका घर भोपाल के तमाम लोगों के लिए शोक का केंद्र बन चुका था। सुबह से लेकर देर रात तक राजनेताओं, व्यापारियों और समाजसेवियों का आना-जाना लगा रहता था। घर के बाहर मीडिया का जमावड़ा था, हर रिपोर्टर कैमरे के सामने खड़ा होकर वही कह रहा था—”भोपाल ने एक नेकदिल इंसान खो दिया।” लेकिन इंस्पेक्टर अरविंद चौहान के लिए यह सब केवल दिखावा था। उनका ध्यान राजीव की पत्नी अदिति मेहरा पर था, जो बाहर से बेहद शांत और संयमित दिखाई देती थी, पर उसकी आंखों की गहराई में कुछ ऐसा था जिसे वह किसी भी कीमत पर बाहर आने से रोकना चाहती थी। जब चौहान पहली बार अदिति से मिला, तो उसने बड़े सधे हुए शब्दों में कहा—”पुलिस आपकी मदद करने आई है, हमें आपके पति के दुश्मनों और उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी चाहिए।” अदिति ने सिर हिलाते हुए कहा—”मुझे उनके बिज़नेस के बारे में कुछ नहीं पता, राजीव जी ने मुझे कभी इन बातों में शामिल नहीं किया।” उसका स्वर कोमल था, लेकिन उसमें झिझक भी साफ़ झलक रही थी। चौहान को यह एहसास हो गया कि अदिति पूरी सच्चाई नहीं बता रही, बल्कि जानबूझकर बातों को टाल रही है।

जैसे-जैसे सवाल गहराते गए, अदिति के जवाब और उलझते चले गए। वह कहती—”राजीव देर रात तक काम करते थे,” लेकिन यह नहीं बताती कि वह किससे मिलते थे। वह मानती थी कि “राजीव के कुछ दुश्मन थे,” लेकिन नाम लेने से बचती थी। उसने यह भी कहा कि राजीव अक़्सर अचानक गुस्से में आ जाते थे और कई बार फोन पर किसी से बहस करते थे, पर जब अरविंद ने पूछा कि वह किससे बात करते थे, तो उसने आंखें झुका लीं और कहा—”मुझे नहीं पता।” चौहान ने देखा कि अदिति बार-बार अपनी उंगलियां मसल रही थी और पानी का गिलास पकड़ते समय उसके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे। यह किसी मासूम शोकाकुल पत्नी की हरकतें नहीं थीं, बल्कि उस औरत की थीं जो भीतर से किसी बड़े बोझ को ढो रही हो। चौहान के भीतर शक गहराने लगा—क्या अदिति सिर्फ राजीव की पत्नी थी, या फिर वह उसके कारोबार के रहस्यों में भी कहीं न कहीं शामिल थी? उसकी चुप्पी एक ढाल की तरह थी, जो पुलिस की हर कोशिश को रोक रही थी।

अदिति की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए चौहान ने टीम को लगाया। यह देखकर वह चौंक गया कि राजीव की मौत के बाद अदिति न सिर्फ कुछ लोगों से गुप्त मुलाकात कर रही थी, बल्कि रात के समय लंबे फोन कॉल भी करती थी। उसकी कॉल डिटेल्स में ऐसे नाम सामने आए जो सीधे राजीव के बिज़नेस पार्टनर्स और अंडरवर्ल्ड से जुड़े थे। जब अरविंद ने फिर से अदिति से सामना किया और पूछा—”क्या आप हमें सब कुछ बताना चाहती हैं, या हमें अपने तरीके से सच निकालना पड़ेगा?”—तो अदिति की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन होंठों पर फिर भी वही आधी-अधूरी बातें थीं। वह बोली—”कुछ बातें ऐसी हैं जो कहने से सबकुछ बिखर जाएगा।” चौहान समझ गया कि अदिति इस केस की सबसे अहम कड़ी है, लेकिन वह किसी कारणवश सच बताने से डर रही है। उसकी यह चुप्पी ही अब जांच को आगे बढ़ाने की कुंजी थी। सवाल यह था कि क्या वह डर किसी और से था, या अदिति खुद इस खेल की खिलाड़ी थी? इस रहस्य ने अरविंद को और बेचैन कर दिया, क्योंकि जितना वह अदिति को समझने की कोशिश करता, उतना ही उसकी चुप्पी गहरी और खतरनाक लगने लगती।

अरविंद चौहान की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे राजीव शुक्ला का चमकदार चेहरा धुंधला पड़ता जा रहा था और उसके पीछे छिपे अंधेरे रिश्ते सामने आते जा रहे थे। फाइलों और कॉल डिटेल्स की परतें खोलते हुए अरविंद को एक नाम बार-बार टकरा रहा था—समीर खान। भोपाल के अंडरवर्ल्ड का यह नाम नया नहीं था। पुलिस रिकॉर्ड में समीर की तस्वीरें और जुर्म की लंबी लिस्ट मौजूद थी—स्मगलिंग, अवैध शराब, वसूली, और छोटे-मोटे गैंगवार। लेकिन खास बात यह थी कि पिछले तीन सालों में समीर का नाम हर बार राजीव के कारोबार से टकराया था। कभी शराब के ठेकों की बोली में, कभी ज़मीन के सौदे में और कभी लोकल नेताओं की सप्लाई चेन में। गवाहों ने भी कई बार पुलिस को बताया था कि समीर खुलेआम राजीव को धमकी देता था कि एक दिन उसका खेल खत्म कर देगा। चौहान के सामने तस्वीर साफ़ होने लगी कि अगर किसी के पास राजीव को सड़क से हटाने का सीधा कारण था, तो वह समीर ही था। लेकिन चौहान यह भी जानता था कि अपराध की दुनिया में चीज़ें इतनी सीधी कभी नहीं होतीं—जितना कोई सामने दिखता है, असल खेल उससे कहीं गहरे होता है।

पुलिस टीम ने समीर के ठिकानों पर दबिश दी, लेकिन वह गायब था। खबरें थीं कि वह शहर छोड़कर कहीं बाहर चला गया है। उसके गुर्गों से पूछताछ में पता चला कि हादसे वाली रात समीर कहीं आसपास था, और उसके लोग राजीव की गाड़ियों की मूवमेंट पर नज़र रखे हुए थे। एक चश्मदीद ने तो यहां तक कहा कि उसने काली एसयूवी समीर के गैंग की देखी थी, जो हादसे से ठीक पहले उसी रास्ते पर दौड़ रही थी। चौहान को पहली बार लगा कि मामला अब पकड़ में आ रहा है—गाड़ी, धमकी और दुश्मनी—सबूत एक ही दिशा में इशारा कर रहे थे। लेकिन तभी जांच का दूसरा पहलू सामने आया। कुछ पुराने सूत्रों ने चौहान को बताया कि राजीव और समीर के बीच पिछले महीने एक गुप्त समझौता हुआ था। दोनों ने अपने-अपने कारोबार की सीमा तय की थी और यह भी वादा किया था कि एक-दूसरे के रास्ते में अब दखल नहीं देंगे। अगर यह सच था, तो फिर सवाल उठता है कि समीर अचानक क्यों दुश्मनी निभाने निकल पड़ा? क्या यह समझौता सिर्फ दिखावा था, या उसके पीछे कोई और चाल चल रही थी?

अरविंद के मन में शक गहराने लगा कि कहीं यह पूरा खेल सिर्फ समीर पर ठीकरा फोड़ने के लिए तो नहीं रचा गया। बहुत संभव था कि किसी तीसरे खिलाड़ी ने, जो अभी तक परछाइयों में छिपा था, समीर और राजीव की दुश्मनी का फायदा उठाकर राजीव को रास्ते से हटाया हो। अरविंद ने महसूस किया कि हर सबूत भले ही समीर की ओर इशारा कर रहा है, लेकिन असली साजिश कहीं और बुनी गई है। अदिति की चुप्पी, राजीव के गुप्त सौदे, और अब समीर का गायब हो जाना—ये तीनों बातें मिलकर संकेत दे रही थीं कि यह केस उतना सरल नहीं जितना दिखता है। चौहान की आंखों में फिर वही बेचैनी लौट आई। उसे अहसास था कि अब वह असली शिकारी के करीब पहुंच रहा है, लेकिन खतरा यह था कि कहीं वह खुद शिकार न बन जाए।

नीलम वर्मा एक ऐसी क्राइम रिपोर्टर थी, जिसने अपने तेज सवालों और बेबाक रिपोर्टिंग से मीडिया जगत में अपनी अलग पहचान बनाई थी। वह उस चैनल के लिए काम करती थी, जो अपराध और सनसनीखेज खबरों पर अपनी पकड़ के लिए जाना जाता था। राजीव की हत्या का मामला उसे जैसे सोने की खान लग रहा था, क्योंकि इसमें राजनीति, अपराध और पुलिस—तीनों का तगड़ा मसाला था। जैसे ही केस की खबर फैली, नीलम मौके पर पहुँच गई। उसकी नजर केवल खबर तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह सच्चाई के उन पहलुओं को खोजने में माहिर थी जिन्हें पुलिस अक्सर दबा देती है। अरविंद चौहान की टीम ने जांच शुरू की ही थी, और उसी समय नीलम अपने कैमरे और माइक्रोफोन के साथ राजीव के पुराने दोस्तों, पड़ोसियों और व्यापारिक साथियों तक पहुँचने लगी। उसकी रिपोर्टिंग ने केस को मीडिया में केंद्र बिंदु बना दिया। लोग सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठा रहे थे कि पुलिस इतनी धीमी क्यों है, जबकि एक पत्रकार ने पहले ही कुछ बड़े राज़ उजागर कर दिए। नीलम की खबरें इस बात को बार-बार दर्शा रही थीं कि राजीव के सिर्फ अपराधियों से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दुश्मनों से भी गहरे रिश्ते थे, जिससे जनता का शक और गहरा होता जा रहा था।

अरविंद चौहान, जो नियम और सबूतों के आधार पर चलने वाले अधिकारी थे, मीडिया की इस लगातार दखलअंदाजी से खफा थे। उन्हें लगता था कि नीलम का काम पुलिस की जांच को और जटिल बना रहा है। कई बार गवाह मीडिया से बात करके खुलकर चीज़ें कह देते, जबकि वही गवाही पुलिस स्टेशन में आने पर गायब हो जाती। इससे अरविंद को न केवल सबूत जुटाने में कठिनाई होती थी, बल्कि अदालत में केस मजबूत करने में भी परेशानी होती। लेकिन दूसरी ओर, नीलम कभी-कभी ऐसे सूत्र पकड़ लेती जो पुलिस के हाथ भी नहीं लग पाते। उसने अपने नेटवर्क और पत्रकारिता की चतुराई से कुछ ऐसे दस्तावेज़ और कॉल रिकॉर्ड्स उजागर किए, जिनसे यह साफ हुआ कि राजीव की हत्या के पीछे सिर्फ गैंगवार नहीं बल्कि एक बड़े स्तर की साजिश है। यह जानकारी अरविंद के लिए भी चौंकाने वाली थी। उसे मानना पड़ा कि नीलम की जिज्ञासा और निर्भीकता कहीं न कहीं इस केस को नई दिशा दे रही है। लेकिन यही स्वीकार करना उसके अहंकार और पेशेवर ईमानदारी के खिलाफ लगता। इसीलिए, उनके बीच सहयोग और टकराव दोनों साथ-साथ चलने लगे। कभी अरविंद नीलम को नजरअंदाज कर देता, तो कभी उसे चुपके से सूचना मिल जाती कि पुलिस ने क्या पाया है।

इस खींचतान के बीच मीडिया का दबाव और भी बढ़ता गया। नीलम की रिपोर्टिंग से जनता का आक्रोश चरम पर था—लोग सड़कों पर उतरने लगे, राजनेताओं पर सवाल उठाए जाने लगे, और पुलिस विभाग पर लापरवाही का आरोप लगने लगा। अरविंद जानता था कि यह दबाव उसके लिए खतरे की घंटी भी है, क्योंकि यदि केस जल्द हल नहीं हुआ तो पूरा दोष उसी पर आ जाएगा। ऐसे माहौल में नीलम और अरविंद की मुलाकातें और चर्चाएँ और भी तीखी हो गईं। नीलम को लगता था कि पुलिस जानबूझकर कुछ पहलुओं को छिपा रही है, जबकि अरविंद को लगता था कि पत्रकारिता का उद्देश्य सच्चाई से ज्यादा टीआरपी कमाना है। फिर भी, दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह दूर भी नहीं हो पाते, क्योंकि सच्चाई तक पहुँचने के लिए दोनों को एक-दूसरे की जरूरत थी। यह एक ऐसा रिश्ता था, जिसमें अविश्वास और सहयोग दोनों का अजीब संगम था। और शायद यही असहज रिश्ता उन्हें धीरे-धीरे उस हकीकत के करीब ले जा रहा था, जो इस केस की परतों में छिपी हुई थी।

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, राजीव की मौत के पीछे का सच और उलझता गया। शुरू में यह मामला एक साधारण गैंगवार का प्रतीत होता था—दो प्रतिद्वंद्वी गुट, पुराने हिसाब-किताब और एक निर्दयी हत्या। लेकिन पुलिस की टीम को जितनी गहराई से सबूत मिले, उतना ही मामला रहस्यमयी होता चला गया। राजीव का मोबाइल रिकॉर्ड खंगालने पर कई ऐसे संपर्क सामने आए, जो उसकी कथित गैंगस्टर छवि से मेल नहीं खाते थे। कई प्रतिष्ठित बिज़नेसमैन, कुछ राजनीतिक चेहरे और यहां तक कि पुराने पुलिस अफसर भी उसके संपर्क में थे। इनमें से एक नाम ने अरविंद को चौंका दिया—राजीव का पुराना दोस्त और अब शहर का एक बड़ा उद्योगपति, जिससे राजीव का रिश्ता लंबे समय से टूटा हुआ था। पुरानी फाइलों को खंगालते हुए अरविंद को 15 साल पुराना एक केस याद आया जिसमें राजीव पर अपने ही गिरोह के साथी को धोखा देकर किसी और के लिए काम करने का आरोप लगा था। उस केस को तब दबा दिया गया था, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में कुछ अधूरी रिपोर्टें अभी भी मौजूद थीं। इन रिपोर्टों से साफ हुआ कि राजीव के अतीत में कई अनकहे राज़ दबे थे—ऐसे राज़ जिनके सामने आने से उसकी मौजूदा छवि और साम्राज्य दोनों ढह सकते थे।

अरविंद को महसूस हुआ कि राजीव की हत्या किसी तात्कालिक दुश्मनी का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से सुलग रहे बदले की आग का हिस्सा थी। उसने पुराने गवाहों और सहयोगियों से संपर्क करना शुरू किया, पर अधिकतर लोग डर या लालच में कुछ कहने को तैयार नहीं थे। कुछ बुजुर्ग स्थानीय लोगों ने इशारों में कहा कि राजीव ने अपने शुरुआती दौर में कई निर्दोषों को बलि चढ़ाया था और उस गुनाह की परछाइयाँ अब तक उसका पीछा कर रही थीं। इस बीच, नीलम वर्मा भी अपने स्तर पर खोजबीन कर रही थी और उसने अरविंद को राजीव की एक पुरानी तस्वीर दिखाई—जिसमें वह एक छोटे से कस्बे के मंदिर के बाहर खड़ा था, साथ में वही उद्योगपति दोस्त भी था। उस तस्वीर के पीछे की तारीख और स्थान जांच की दिशा बदलने के लिए काफी थे, क्योंकि उसी समय और उसी इलाके में एक सामूहिक हिंसा की घटना दर्ज थी, जिसमें कई लोग मारे गए थे। दस्तावेज़ बताते थे कि उस घटना को कभी ठीक से खोला ही नहीं गया, और रिपोर्ट को दबाने में कई शक्तिशाली लोगों की भूमिका थी। अब सवाल यह था कि क्या राजीव की हत्या उसी पुराने खून-खराबे का परिणाम थी, या किसी ने उसकी गुप्त संलिप्तता उजागर होने से पहले ही उसे रास्ते से हटा दिया।

इस खुलासे ने अरविंद को असमंजस में डाल दिया। उसके अनुभव ने हमेशा यह सिखाया था कि अपराध के धागे वर्तमान दुश्मनी और पैसे की राजनीति से जुड़े होते हैं, लेकिन इस केस में हर रास्ता अतीत की ओर जा रहा था। उसे एहसास हुआ कि असली हत्यारा शायद वही है जो राजीव के सबसे पुराने पापों से प्रभावित हुआ था। शक की सुई सिर्फ बाहरी दुश्मनों पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर भी जा रही थी जो कभी उसके करीबी रहे और जिनके जीवन को उसने किसी न किसी रूप में तबाह किया। अरविंद के लिए यह जांच अब व्यक्तिगत चुनौती बन गई थी, क्योंकि उसे हर परत खोलते हुए लगता था कि शहर का आधा सच झूठ की दीवारों में कैद है। नीलम भी इस बात पर जोर दे रही थी कि अगर अतीत की फाइलें सार्वजनिक हों तो यह हत्या सिर्फ एक केस नहीं रहेगी, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक भूचाल ला सकती है। अब अरविंद को मानना पड़ा कि असली दुश्मन वे गैंगस्टर नहीं थे जिनसे राजीव का रोज़ टकराव होता था, बल्कि वह चेहरा था जो अतीत की परछाइयों में छिपा हुआ था, और जिसे ढूँढना किसी भी मौजूदा अपराधी से ज्यादा मुश्किल होने वाला था।

डीएसपी विनोद सक्सेना का व्यवहार उस दिन से अचानक बदल गया था। उन्होंने अरविंद को अपने चेंबर में बुलाया, जहां एसी की ठंडी हवा और फाइलों का ढेर एक औपचारिक सख़्ती का माहौल बना रहा था। उनकी आवाज़ में वह दबाव साफ झलक रहा था जो किसी वरिष्ठ अधिकारी के आदेश का परिणाम होता है। “अरविंद, अब इस केस को ज़्यादा खींचने की ज़रूरत नहीं है। मीडिया पहले ही हंगामा कर रही है, नेताओं की सांस अटकी हुई है। ऊपर से आदेश है कि जल्दी से जल्दी इसका निपटारा हो। समीर पर सबूत मौजूद हैं, वही दोषी है। केस बंद करो और रिपोर्ट जमा कर दो।” सक्सेना ने यह बात इतनी सहजता से कही जैसे सच वही हो और बाकी सब महज़ औपचारिकता। लेकिन अरविंद की आंखों में एक हल्की बेचैनी थी। उसने महसूस किया कि यह बात कहने के पीछे सिर्फ प्रशासनिक दबाव नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं एक सोची-समझी चाल भी है। समीर पर आरोप थोपकर केस को दबा देना आसान रास्ता था, मगर अरविंद जानता था कि जांच की कई परतें अभी खुलनी बाकी हैं। उसे यक़ीन था कि असली अपराधी पर्दे के पीछे से खेल खेल रहा है और अगर वह सच तक पहुंचता है तो यह किसी बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ हो सकता है। लेकिन अब हालात ऐसे थे कि उसके सामने एक विकल्प था—या तो आंख मूंदकर आदेश मान ले, या फिर सच की राह पर चलते हुए अपने करियर को जोखिम में डाल दे।

घर लौटने के बाद भी अरविंद का मन अशांत रहा। बार-बार सक्सेना की सख़्त निगाहें और वह शब्द उसके कानों में गूंजते रहे—“ऊपर से आदेश है।” उसने सोचा कि ‘ऊपर’ आखिर कौन है? कौन लोग हैं जो चाहते हैं कि यह केस जल्द बंद हो जाए? क्या यह सिर्फ नेताओं की छवि बचाने का सवाल है, या इसके पीछे कोई और गहरी साज़िश छिपी है? नीलम वर्मा के साथ उसकी हालिया मुलाकातें उसे याद आईं। नीलम ने जितने तथ्य इकट्ठा किए थे, उनमें कई ऐसे बिंदु थे जो पुलिस की आधिकारिक जांच से मेल नहीं खाते थे। अगर वह सच साबित हुए तो समीर को बलि का बकरा बनाने की कोशिश साफ़ उजागर हो जाएगी। लेकिन नीलम भी बार-बार कह रही थी कि “अरविंद, यह केस साधारण नहीं है। इसमें जितना ऊपर तक हाथ डाला जाएगा, उतना गहरा दलदल मिलेगा।” अरविंद समझ रहा था कि अगर वह सच को सामने लाएगा तो सिर्फ उसका करियर ही नहीं, बल्कि उसकी जान भी दांव पर लग सकती है। यही डर सक्सेना की दोहरी चाल में भी छिपा था। बाहर से वह एक अधिकारी की तरह ‘कानून और व्यवस्था’ का हवाला देते थे, लेकिन भीतर ही भीतर वह एक ऐसे समझौते का हिस्सा थे जिसमें सच्चाई की कोई जगह नहीं थी। अरविंद ने तय किया कि वह फिलहाल किसी को अपनी पूरी योजना नहीं बताएगा। वह खेल दोहरी चाल से खेलना चाहता था—ऊपर से आदेश मानने का दिखावा, और भीतर ही भीतर अपनी अलग जांच जारी रखना।

अगले कुछ दिनों में अरविंद ने वही किया। उसने सक्सेना को दिखाया कि वह केस को जल्द बंद करने की तैयारी कर रहा है। रिपोर्ट का प्रारूप तैयार होने लगा जिसमें समीर पर सारे आरोप ठोक दिए गए थे। मीडिया में धीरे-धीरे यह खबर फैलने लगी कि पुलिस केस सुलझा चुकी है और आरोपी जल्द जेल जाएगा। मगर परदे के पीछे, अरविंद गुपचुप तरीके से उन सबूतों की कड़ियां जोड़ रहा था जिन्हें आधिकारिक फाइलों में दबा दिया गया था। उसने अपने भरोसेमंद कुछ कॉन्स्टेबल्स को गुप्त जांच पर लगाया, ताकि किसी को शक न हो। नीलम से भी उसने छिपे-छिपे मुलाकातें कीं, जहां दोनों ने नए तथ्य और गवाहों पर चर्चा की। अरविंद का दिमाग अब पहले से ज़्यादा सतर्क था—वह जानता था कि अगर उसकी इस दोहरी चाल की भनक सक्सेना या किसी और को लग गई, तो खेल खत्म हो जाएगा। लेकिन भीतर एक आग थी, जो उसे सच तक पहुंचने से रोक नहीं पा रही थी। उसे लग रहा था कि यह केस सिर्फ समीर की बेगुनाही या गुनाह की कहानी नहीं है, बल्कि एक पूरे सिस्टम की पोल खोलने वाला दरवाज़ा है। और यही दरवाज़ा खोलना उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी थी और सबसे बड़ा खतरा भी। इस कशमकश में वह हर दिन, हर रात जी रहा था—कानून का सेवक बनकर और सच का योद्धा बनकर, एक साथ। यही उसकी दोहरी चाल थी, और शायद यही उसके जीवन की सबसे कठिन बाज़ी भी।

जांच के इस नए मोड़ पर अदिति और नीलम ने जो राज़ खोले, उन्होंने पूरे मामले की जड़ों को हिला दिया। अब तक पुलिस और मीडिया राजीव के खून का शक समीर या उसके व्यापारिक दुश्मनों पर डाल रहे थे, लेकिन दोनों महिलाओं ने अपनी-अपनी चुप्पी तोड़कर ऐसे खुलासे किए, जिनसे साफ हुआ कि राजीव की जिंदगी दुश्मनों से घिरी हुई थी। अदिति ने बताया कि राजीव का वैवाहिक जीवन बाहर से जितना परिपूर्ण दिखता था, अंदर से उतना ही बिखरा हुआ था। उसके कई एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर थे, जिनमें से कुछ बेहद खतरनाक लोगों से जुड़े थे। उसने यह भी माना कि राजीव ने अपने फायदे के लिए कई व्यापारिक सौदों में धोखा दिया, जिससे न सिर्फ पैसे का नुकसान हुआ, बल्कि कई लोगों की प्रतिष्ठा और भविष्य भी बर्बाद हुआ। दूसरी ओर, नीलम ने एक और चौंकाने वाला राज़ खोला—वह कई महीनों से राजीव के खिलाफ गुप्त रूप से सबूत इकट्ठा कर रही थी। असल में, वह राजीव की लालच और हिंसक प्रवृत्ति की शिकार हो चुकी थी। उसने बयान दिया कि राजीव ने उसके परिवार पर दबाव डालकर उनकी जमीन हड़पने की कोशिश की थी और जब उसके भाई ने विरोध किया तो उसकी बेरहमी से पिटाई करवाई थी। नीलम के शब्दों में छिपा दर्द और गुस्सा साफ झलक रहा था। इन दोनों के खुलासों ने अरविंद को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर राजीव का दुश्मन कौन नहीं था?

फिर भी, इन तमाम दुश्मनों की लिस्ट में कहीं न कहीं एक अदृश्य छाया मौजूद थी, जिसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया था। अरविंद ने देखा कि सबकी नजरें उन पर टिक गई हैं जो सतह पर राजीव से भिड़े थे—व्यापारी, प्रेमिकाएँ, कर्मचारी या राजनीतिक विरोधी। लेकिन असली शिकारी हमेशा शिकार की परछाइयों में छिपा रहता है। अदिति ने संकोच से बताया कि राजीव का सबसे बड़ा डर बाहर से नहीं, घर के भीतर से था। उसने कहा कि राजीव अपने ही किसी करीबी से हमेशा चौकन्ना रहता था। यह वाक्य अरविंद को झकझोर गया। वह समझ गया कि हत्या करने वाला कोई ऐसा था, जिसे राजीव के जीवन, उसकी कमजोरियों और उसके गुप्त रास्तों की पूरी जानकारी थी। वह कोई ऐसा था जो राजीव के विश्वास के घेरे में था और इसलिए ही अब तक संदेह से बचा हुआ था। जैसे-जैसे यह सच सामने आने लगा, अरविंद को महसूस हुआ कि खेल सिर्फ लालच या बदले का नहीं, बल्कि गहरी नफरत और वर्षों पुरानी दुश्मनी का था। शायद शिकारी वही था जो हमेशा से खामोश रहकर सब देखता रहा—राजीव की जीतें, उसकी गलतियाँ, और उसकी क्रूरता।

इस रहस्योद्घाटन ने जांच का रुख पूरी तरह बदल दिया। अब सवाल यह नहीं था कि राजीव का दुश्मन कौन था, बल्कि यह कि उसके इतने दुश्मनों के बीच असली शिकारी कौन निकला। अदिति और नीलम दोनों ने मान लिया कि राजीव की हत्या अचानक गुस्से में नहीं हुई थी, बल्कि यह एक ठंडी, सुनियोजित चाल थी। सबूत और गवाह धीरे-धीरे इशारा कर रहे थे कि हत्यारा वही था, जिसकी उपस्थिति सबको सामान्य लगती थी—कोई ऐसा, जो हमेशा पर्दे के पीछे रहा, लेकिन जिसके पास हर राज की चाबी थी। अरविंद ने महसूस किया कि यह खेल अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां वह शिकारी और शिकार की पहचान को लेकर खुद उलझता जा रहा था। उसे यह भी अहसास हुआ कि अगर उसने सच तक पहुंचने की कोशिश जारी रखी, तो अगला निशाना वही भी हो सकता है। और तभी उसके मन में एक सवाल गूंज उठा—“क्या शिकारी अब भी छाया में है, या वह पहले ही अगला वार करने के लिए तैयार खड़ा है?”

सारी तहकीकात जैसे अचानक उलटने लगी थी। अब तक पुलिस और सबूतों का झुकाव इस ओर था कि राजीव निर्दोष पीड़ित है, जिसे किसी अज्ञात दुश्मन ने निशाना बनाया, लेकिन अदिति और नीलम की ओर से सामने आए तथ्य और गवाहियों ने धीरे-धीरे तस्वीर पूरी तरह पलट दी। सबूतों के बीच जो धुंध अब तक सच्चाई को ढक रही थी, वह हटने लगी और पुलिस को समझ आया कि शायद उन्होंने शुरुआत से ही सब कुछ गलत कोण से देखा। राजीव की मासूम छवि धीरे-धीरे एक शिकारी के रूप में उभरने लगी। कई पुराने केस फाइलों, गुमशुदा लोगों के रिकॉर्ड और उन घटनाओं को जोड़कर देखा गया तो पाया गया कि राजीव जहाँ-जहाँ रहा, वहाँ कोई न कोई व्यक्ति रहस्यमय तरीके से गायब हुआ था या किसी असामान्य दुर्घटना का शिकार बना था। पहले सब इसे संयोग मानते रहे थे, लेकिन अब यह संयोग नहीं, एक पैटर्न की तरह दिख रहा था। पुलिस जब राजीव के पुराने परिचितों और पड़ोसियों से बात करने लगी तो धीरे-धीरे उनकी झिझक टूटी। कई लोग बोले—राजीव हमेशा बहुत मीठा, बहुत मददगार दिखाई देता था, लेकिन उसके आसपास का माहौल हमेशा भयभीत रहता। कुछ ने कहा कि रातों में उसके घर से अजीब आवाजें आती थीं, कुछ ने कहा कि वह लोगों की आदतें, उनकी कमजोरियाँ बेहद बारीकी से जान लेता था। इन सब बयानों और नए सबूतों ने राजीव की सच्ची तस्वीर खींचनी शुरू कर दी। अब सवाल यह नहीं था कि उसका दुश्मन कौन था, बल्कि यह था कि इतने वर्षों तक उसका शिकार कौन-कौन बना और उसने किस तरह अपनी ‘पीड़ित’ की नकली छवि बनाकर सबको धोखा दिया।

पुलिस को धीरे-धीरे यह समझ आया कि हाल की दुर्घटना कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी योजना का हिस्सा थी। राजीव जानता था कि एक दिन उसकी करतूतें उजागर होंगी, इसलिए उसने खुद को ‘शिकार’ साबित करने के लिए चालाकी से मंच तैयार किया था। उसने सबूत ऐसे बिछाए थे कि जांच का रुख दूसरों की ओर जाए और वह निर्दोष पीड़ित के रूप में सामने आए। लेकिन अदिति और नीलम की जिज्ञासा, उनके सवाल और उनकी जिद ने वह जाल तोड़ दिया। उन्होंने जो कड़ियाँ जोड़ीं, उससे साफ हुआ कि राजीव ने हमेशा कमजोर और अकेले लोगों को निशाना बनाया। वह पहले उनसे दोस्ती करता, उनका विश्वास जीतता, और फिर धीरे-धीरे उन्हें ऐसे हालात में धकेल देता जहाँ से वापसी असंभव हो जाती। कई बार उसने अपने शिकारों को आर्थिक रूप से बर्बाद किया, कई बार मानसिक रूप से तोड़ दिया और कई मामलों में तो उनकी गुमशुदगी की गुत्थी अब जाकर समझ आई। सबसे चौंकाने वाला रहस्य यह था कि राजीव न सिर्फ यह सब करता था, बल्कि अपने ‘शिकार’ की कहानियों को ध्यान से रिकॉर्ड भी करता था, जैसे किसी शिकारी को अपने शिकार का हिसाब रखना जरूरी लगता है। उसकी डायरी और कंप्यूटर से निकले डाटा में कई नाम, कई घटनाओं की तारीखें और छोटे-छोटे विवरण दर्ज थे। यह सब पढ़कर पुलिस और अदिति-नीलम के सामने एक खतरनाक, ठंडे दिमाग वाला शिकारी उभरकर आया।

अब यह खुलासा होना बाकी था कि हाल की ‘दुर्घटना’ में कौन-कौन शामिल था। धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ कि राजीव की चाल को समझने वाले कुछ लोग पहले ही उसके खिलाफ चुपचाप योजना बना चुके थे। यह ‘हादसा’ दरअसल उन लोगों की सोची-समझी चाल थी, जिन्होंने सालों से राजीव के शिकार बने लोगों का दर्द देखा था और जिनके पास अब खोने को कुछ नहीं बचा था। उन्होंने राजीव को उसी के खेल में फंसाने का फैसला किया—ऐसा खेल जहाँ शिकारी खुद शिकार बन जाए। वे जानते थे कि राजीव हर समय अपने चारों ओर जाल बिछाता है, इसलिए उन्होंने उसके ही जाल में नए-नए सुराग डालकर उसे भ्रमित किया और आख़िरकार वही हुआ। इस बार शिकारी की सारी तैयारी उसके खिलाफ इस्तेमाल हुई और जो व्यक्ति हमेशा दूसरों को शिकार बनाता आया था, वही अंततः जाल में फंस गया। जब पुलिस ने यह निष्कर्ष सबके सामने रखा, तो कमरे में सन्नाटा छा गया। हर कोई सोच रहा था कि इतने वर्षों तक सबने कैसे इस नकाब को नहीं पहचाना। राजीव की कहानी अब किसी मासूम आदमी की नहीं रही थी—यह एक ऐसे शिकारी की कहानी थी, जिसने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाकर दूसरों के जीवन को बर्बाद किया और अंततः उसी खेल में अपने पतन का शिकार हुआ। यह खुलासा न सिर्फ एक अपराध की गुत्थी सुलझा गया, बल्कि समाज के उस चेहरे को भी सामने लाया, जहाँ पीड़ित और अपराधी के बीच का फर्क कभी-कभी सबसे बड़ा भ्रम साबित होता है।

१०

धुंधले आसमान के नीचे फैला शहर उस रात और भी भारी लग रहा था। चारों ओर पुलिस की गाड़ियाँ, लाल-नीली बत्तियों की चमक, और दर्जनों कैमरों की फ्लैश लाइटें — सब कुछ एक रंगमंच की तरह था, जहाँ सच और झूठ का नाटक चरम पर पहुँच चुका था। अरविंद ने जब पहली बार इस केस को हाथ में लिया था, तब उसे लगा था कि यह सिर्फ एक सड़क हादसे का मामला है, कुछ दबाव में आई रिपोर्ट्स और कुछ काग़ज़ी हेरफेर। लेकिन जैसे-जैसे धागे खुलते गए, उसने पाया कि यह कोई साधारण दुर्घटना नहीं बल्कि शहर की अंधेरी गलियों में चल रही सत्ता की लड़ाई का परिणाम था। वह कार, जो देखने में बस एक तेज़ रफ़्तार का शिकार बनी थी, दरअसल किसी और की योजना का हिस्सा थी। गवाहों की गवाही, सीसीटीवी फुटेज और गुप्त मुखबिर की सूचना मिलाकर एक ऐसा चित्र उभर आया जिसमें सामने आया कि यह मौत एक गैंगवार का हिस्सा थी, और उसके पीछे छिपा था एक व्यक्तिगत प्रतिशोध जो वर्षों पुराना था। सामने की भीड़ और पीछे की परछाइयों में खड़ा अरविंद महसूस कर रहा था कि वह अब महज़ एक जाँच अधिकारी नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे मोड़ पर खड़ा इंसान है जहाँ कानून, नैतिकता और सत्ता तीनों उसकी ओर सवालिया निगाहों से देख रहे हैं।

इस साजिश के पीछे सिर्फ अपराधी गिरोह ही नहीं थे, बल्कि सत्ता से जुड़े चेहरे भी शामिल थे। नामचीन नेताओं और उद्योगपतियों का गठजोड़, पुलिस के भीतर की गद्दारी, और कुछ ऐसे लोग जिन्हें उसने कभी साथी माना था — सभी धीरे-धीरे इस खेल में शामिल निकले। अरविंद के सामने अब दो रास्ते थे। एक ओर था कानून का वह सीधा रास्ता, जहाँ वह हर सबूत को अदालत में पेश करता, हर दोषी को बेनकाब करता और इस पूरे गैंगवार का सच दुनिया के सामने रखता। मगर उस रास्ते की कीमत भी थी — अपनी नौकरी, अपनी ईमानदारी और शायद अपनी जान। दूसरी ओर वह रास्ता था जो उसके कई वरिष्ठ अधिकारियों ने चुना था: सच को दबा देना, रिपोर्ट में फेरबदल करना और यह दिखाना कि यह वाकई एक साधारण हादसा था। इससे सबके चेहरे बच जाते, व्यवस्था जस की तस बनी रहती, और उसे भी ऊपरी लोगों से सुरक्षा और समर्थन मिल जाता। लेकिन क्या वह यह सब कर पाता? वह रात भर सबूतों को देखते हुए, गवाहों की आवाज़ें सुनते हुए, और मृतक की माँ के आँसू याद करते हुए सोचता रहा कि उसके निर्णय का असर सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित नहीं रहेगा। यह फैसला तय करेगा कि वह एक सच्चा पुलिस अधिकारी है या व्यवस्था का एक और मोहरा। उसके भीतर का संघर्ष उसे अंदर से तोड़ रहा था, मगर उसे पता था कि सुबह तक उसे अपना रुख़ तय करना ही होगा।

अगली सुबह कोर्टरूम में गवाही के वक्त अरविंद ने अपनी आँखें बंद कीं और एक लंबी साँस लेकर सच सामने रख दिया। उसने हर नाम लिया, हर सबूत दिखाया, हर साज़िश का पर्दाफाश किया, चाहे उसमें कितने ही बड़े नाम क्यों न शामिल हों। कोर्ट में सन्नाटा छा गया, और बाहर खबरें जंगल की आग की तरह फैल गईं। मगर सच बोलने का यह कदम आसान नहीं था — कुछ लोग उसकी तारीफ़ कर रहे थे, तो कुछ उसे गद्दार कहकर निशाना बना रहे थे। उसके अधिकारी उसे अलग-थलग करने लगे, और अपराधी गिरोह अब सीधे उसकी जान के पीछे था। लेकिन अरविंद के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, मानो उसने अपने कंधों से बोझ उतार दिया हो। फिर भी एक सवाल उसके भीतर गूंजता रहा: क्या वह सचमुच शिकारी था, जिसने इस साज़िश को उजागर किया, या फिर वह खुद शिकार बन चुका था उस व्यवस्था का, जो सच बोलने वालों को जीने नहीं देती? अदालत से बाहर निकलते वक्त पत्रकारों की भीड़ ने उससे यही सवाल पूछा — “सर, असली शिकारी कौन है और शिकार कौन?” अरविंद ने जवाब नहीं दिया, बस आसमान की ओर देखा। धुंध अभी भी छँटी नहीं थी, लेकिन उसकी आँखों में साफ था कि चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, उसने सच का फैसला कर लिया है।

समाप्त

 

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