कविता राठौड़
भाग १: हवेली के द्वार पर
अद्वैता के हाथ में कैमरा और बैग था, और दिल में एक अजीब सी उत्सुकता। दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर थी वो—थीसिस का विषय था: “राजस्थान की लोककथाओं में भूत–प्रेत की उपस्थिति और उसका सामाजिक प्रभाव“। इस सिलसिले में वह पहुँची थी झुंझुनूं जिले के पास बसे एक छोटे से गाँव—आकनपुर। इस गाँव के बाहरी छोर पर स्थित थी—वो काली, विशाल, वीरान ठाकुर हवेली, जहाँ पिछली आधी सदी से कोई नहीं रहता। पर जहां हर रात दीयों की रौशनी और किसी औरत के रोने की आवाज़ आती थी—ऐसा गाँव वाले कहते थे।
बस से उतरते ही गाँव की गलियों में सन्नाटा था। दोपहर ढल रही थी, और सूर्य की किरणें मिट्टी के मकानों की दीवारों पर धीमे-धीमे उतर रही थीं। गाँव के छोटे से चाय की दुकान पर बैठकर अद्वैता ने गरम चाय का घूंट लिया और दुकानदार से पूछा, “ठाकुर हवेली किधर है?”
दुकानदार ने चौंककर उसकी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर बोला, “काहे जाना है बिटिया उस खंडहर में? रात में वहां गाना बजता है… कोई है जो दीवारों के बीच ज़िंदा है, पर साँस नहीं लेता।”
अद्वैता ने शांत स्वर में कहा, “मैं रिसर्च कर रही हूँ। वहाँ जाकर रहूँगी कुछ दिन। अगर किसी से मिलवा सकें जो हवेली के बारे में जानता हो, तो मदद कीजिए।”
चायवाले ने सिर हिलाया, फिर किसी को आवाज़ दी—“लक्ष्मी बाई! ऐ लक्ष्मी बाई! इधर आइए ज़रा!”
एक बुज़ुर्ग औरत पास आई। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, चेहरा झुर्रियों से भरा और चाल में सावधानी थी। वह अद्वैता को घूरते हुए बोली, “ठाकुर हवेली? मैं जानती हूँ उस घर को… मैं वहाँ नौकरानी थी, जब आख़िरी बार वहाँ कोई ज़िंदा रहा था।”
अद्वैता ने उत्साह से पूछा, “क्या आप मेरे साथ चलेंगी?”
लक्ष्मी ने सिर झुका लिया। “नहीं बेटी, मैं अब नहीं जाती उधर। पर एक बात याद रखना—अगर हवेली की चौखट पार करोगी तो लौटना तुम्हारे हाथ में नहीं रहेगा।”
शाम होते-होते अद्वैता एक जीप में बैठ हवेली के पास पहुँच गई। हवेली तक कोई पक्की सड़क नहीं थी। सूखे पेड़ों से घिरी, एक जर्जर लोहे की फाटक से बंद हवेली जैसे किसी लंबे इंतज़ार में सो रही थी। पर एक बात अजीब थी—फाटक पर जाले नहीं थे। दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे पार किया हो।
अद्वैता ने कैमरा ऑन किया और दरवाज़े की तस्वीर ली। तभी हवा में एक फुसफुसाहट गूंजी—“वापस लौट जाओ…”
उसने सिर घुमा कर देखा—कोई नहीं। हवा चल रही थी, लेकिन वह आवाज़ हवा नहीं थी। वह चेतावनी थी। अद्वैता के रोंगटे खड़े हो गए, पर उसने खुद को संयमित किया। “हवेलियाँ डरावनी होती हैं, पर कहानियाँ उन्हें और डरावना बना देती हैं,” उसने खुद से कहा।
हवेली में कदम रखते ही पुराने लकड़ी के फर्श ने चरमराहट भरी। अंदर चारों ओर धूल और सन्नाटा था। दीवारों पर पुरानी पेंटिंग्स अब लगभग धुँधली हो चुकी थीं, लेकिन एक तस्वीर अब भी साफ थी—एक युवा महिला, रेशमी घाघरा में, आँखों में गहराई, माथे पर सिंदूर… और होंठों पर एक दर्दभरी मुस्कान।
अद्वैता उस तस्वीर की ओर बढ़ी। तभी उसके पीछे से एक धीमी सी खटाखट की आवाज़ आई, जैसे किसी ने दरवाज़ा बंद किया हो। उसने मुड़कर देखा—दरवाज़ा सचमुच बंद था। उसने कोशिश की, पर वो टस से मस नहीं हुआ।
वो हवेली में फँस गई थी।
उसने कैमरा वापस ऑन किया, डर को काबू में रखा और सोचने लगी—”कहीं ये सब उसी आत्मा की शुरुआत तो नहीं है जिसकी दास्तानें मैंने किताबों में पढ़ीं?”
रात उतर रही थी। हवेली के अंदर से एक धीमा सुर उभरा—जैसे किसी ने चुपचाप कोई राग छेड़ दिया हो। और फिर, उसी तस्वीर वाली औरत की आवाज़… “मैं अब भी यहीं हूँ… कोई सुनेगा मेरी बात?”
अद्वैता की साँसें थम गईं।
भाग २: दीवारों में छुपी आवाज़ें
हवेली की दीवारें साँस ले रही थीं। अद्वैता को ऐसा महसूस हुआ, जैसे हर ईंट उसकी मौजूदगी को महसूस कर रही हो। बाहर की दुनिया अब सिर्फ एक सपना थी, और वो अंदर एक दूसरी दुनिया में क़ैद थी—जिसका वजूद सिर्फ कहानियों और अफवाहों में था। लेकिन अब वो उसे देख रही थी, सुन रही थी।
कमरे में धूल भरी हवा तैर रही थी। पुराने झूमर से जाले लटक रहे थे, और बीचोंबीच रखे झाड़-फानूस से कभी रौनक रही होगी, अब बस साया बचा था। अद्वैता के कैमरे की बैटरी आधी खत्म हो चुकी थी। उसने मोबाइल निकाला—कोई नेटवर्क नहीं।
उसे भूख लगी थी, लेकिन डर ने उसकी भूख को जैसे निगल लिया था।
वो धीरे-धीरे उस तस्वीर की ओर लौटी। वही औरत, वही आँखें। लेकिन अब तस्वीर की मुस्कान कुछ अलग थी। या शायद उसे ऐसा महसूस हुआ। वह तस्वीर के नीचे रखे एक लकड़ी के बॉक्स को खींचने लगी। बॉक्स धूल से ढंका था लेकिन ताले पर कोई जंग नहीं थी। उसे अजीब लगा।
ताले को घुमाते ही ‘टक’ की आवाज़ हुई और बॉक्स खुल गया। अंदर एक लाल रंग की साड़ी, एक टूटी हुई कंघी, और एक पुराना पत्र। हाथ कांपते हुए उसने पत्र खोला।
“चेतन,
अगर तुमने ये पत्र पाया है, तो समझो मैं अब नहीं रही। हवेली की दीवारें अब मेरी हैं। मेरा स्वर, मेरी पीड़ा, मेरा अधूरा प्रेम, सब यहीं बंधा है। मत आना यहाँ… ये हवेली मुझे निगल गई है।
— रागिनी”
रागिनी… यही नाम था उस तस्वीर की स्त्री का, अद्वैता को याद आया, लक्ष्मी बाई ने हवेली की आखिरी मालकिन का यही नाम लिया था। अद्वैता का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसे लगा, जैसे कोई उसके कान के पास सांस ले रहा हो। उसने तेज़ी से पीछे देखा—कोई नहीं। लेकिन तभी दीवार के दूसरी ओर से हल्की-सी खट-खट की आवाज़ आई। जैसे कोई दीवार पर हाथ फेर रहा हो, या कोई उँगलियाँ दीवारों के अंदर से चल रही हों।
उसने ध्यान से सुना।
“चेतन… कहाँ हो?”
ये आवाज़ आई थी।
एकदम धीमी, टूटी-फूटी, लेकिन साफ़। नाम उसी पत्र वाला था। चेतन।
अद्वैता ने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की और दीवार की दरारों को देखने लगी। दीवार में एक जगह थोड़ी अलग लग रही थी—जैसे पत्थर को हाल ही में हटाया गया हो। उसने धीरे से हाथ बढ़ाया। वो जगह कुछ नरम थी। जैसे किसी ने उस पर मिट्टी से परत चढ़ाई हो।
उसे झटका तब लगा जब दीवार की दरार से किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।
सर्द, बर्फ जैसी उँगलियाँ।
उसने चीखना चाहा लेकिन आवाज़ नहीं निकली। उसके मुँह से बस साँसों की भाप निकली।
कलाई छुड़ाने की कोशिश करते-करते दीवार अचानक थरथराई और फिर शांत हो गई। उँगलियाँ वापस खिंच गई थीं।
वो ज़मीन पर गिर पड़ी। उसकी साँसें अनियमित थीं। दिल उसके सीने से बाहर कूदने को तैयार। लेकिन अगले ही क्षण, हवा में वही सुर गूंजा—हल्का, लयबद्ध, जैसे कोई स्त्री कागज़ पर कुछ लिख रही हो और हर अक्षर के साथ एक राग उभर रहा हो।
“तू मेरी आवाज़ है… तू मेरा मुँह है…”
अद्वैता अब डर से ज़्यादा जिज्ञासा में डूब चुकी थी। वो जानना चाहती थी—रागिनी कौन थी, चेतन कौन था, और क्या वास्तव में आत्मा उसे पुकार रही थी?
वो उठी और हवेली के भीतर के गलियारे की ओर बढ़ी, जहाँ रात और रहस्य दोनों उसका इंतज़ार कर रहे थे।
भाग ३: सीढ़ियों के नीचे दबी चीख़
हवेली की सीढ़ियाँ लकड़ी की थीं—पुरानी, कर्कश और साँस सी लेती हुईं। हर पायदान पर पाँव रखने से पहले अद्वैता झिझक रही थी। ऊपर जाने से डर लग रहा था, नीचे से एक सिसकी आती थी—मानो कोई बार-बार पुकार कर रोकना चाहता हो। मगर अद्वैता ने तय कर लिया था—अब पीछे लौटना नहीं है।
वो गलियारे की ओर बढ़ी। दाईं तरफ एक पुराना झूला था जो हवा के बिना भी हिल रहा था। बाईं ओर दीवारों पर पिचके हुए दीये लगे थे, जिनमें कभी रोशनी होती होगी। अब सिर्फ राख और मायूसी बची थी। अचानक उसकी नजर सीढ़ियों के नीचे के एक संकरे कोने पर गई, जहाँ दीवार से सटी एक पुरानी अलमारी अजीब कोण में खड़ी थी।
अद्वैता के अनुभव ने उसे बताया—यहाँ कुछ छुपाया गया है।
उसने अलमारी को धीरे-धीरे खींचा। अलमारी ज़मीन से चिपकी सी थी, जैसे कोई अदृश्य बल उसे पकड़ कर बैठा हो। ज़ोर लगाने पर वह हिली, और पीछे खुला एक पतला सा रास्ता, दीवार में एक खुफिया दरवाज़ा।
रास्ते में घुप्प अंधेरा था, पर एक अजीब सी सोंधी-सी गंध आ रही थी—पुरानी लकड़ी, नमी और किसी के छुपे आँसुओं की मिली-जुली बू।
अद्वैता ने मोबाइल की टॉर्च ऑन की और अंदर घुसी। ये जगह एक तहख़ाना थी—छोटा, अजीब आकार का, दीवारें कुछ ज्यादा ही मोटी और फर्श पर अजीब लकीरें बनी हुई थीं। जैसे किसी ने उन्हें नाखूनों से खरोंचा हो। अचानक उसकी टॉर्च की रोशनी एक कोने में अटक गई—वहाँ एक छोटी सी लकड़ी की संदूकड़ी थी।
उसने धीरे से ढक्कन खोला।
भीतर से एक पुरानी डायरी मिली। धूल और स्याही में भीगी हुई। पहले पन्ने पर नाम लिखा था—”चेतन सिंह राठौड़”।
उसका दिल धक-धक करने लगा। वही चेतन? वो जो पत्र में था?
उसने पहला पन्ना खोला—
“रागिनी से मिलना मेरे जीवन की सबसे बड़ी सौगात थी। और उससे बिछड़ना… सबसे बड़ा अभिशाप। इस हवेली ने मुझे उससे छीना… और अब हर रात वो लौटती है, उसी कमरे में, जहां मैंने उसे खोया था।”
अद्वैता पढ़ती गई—डायरी में रागिनी की आत्महत्या की नहीं, बल्कि हत्या की कहानी थी। ठाकुर साहब, हवेली के मालिक, ने अपनी ही बहू को बंद कमरे में ज़िंदा जला दिया था, जब उसे शक हुआ कि उसका बेटा चेतन अपनी पत्नी से प्रेम नहीं, बल्कि उससे भय खाता था।
डायरी का आख़िरी पन्ना खून से सना था—
“मैंने दीवार में कुछ छुपाया है। रागिनी की चूड़ियाँ, उसकी आखिरी चिट्ठी, और उस रात का रहस्य। सीढ़ियों के नीचे… जहाँ उसकी चीख़ अब भी कैद है…”
अद्वैता के हाथ काँपने लगे। तभी एक ज़ोरदार धक्का लगा—जैसे किसी ने पीछे से धकेल दिया हो। वो गिरते-गिरते दीवार से टकराई। उसकी टॉर्च बंद हो गई।
अंधेरे में किसी की हँसी गूंजी।
“तू भी जानना चाहती है ना? तो सुन मेरी चीख़… देख मेरी मौत…”
और तभी सीढ़ियों के नीचे से आई एक भयानक चीख़—इतनी कर्कश, इतनी तीखी कि अद्वैता के कान सुन्न हो गए।
वो तहखाने से बाहर भागी, लेकिन अलमारी फिर से अपनी जगह पर खुद-ब-खुद आ गई थी। बाहर जाने का रास्ता बंद था।
अद्वैता अब जानती थी—ये कहानी सिर्फ रिसर्च की नहीं थी। ये उसके भाग्य की कहानी बन चुकी थी।
भाग ४: झूमर के नीचे लटकी परछाई
हवेली की हवाओं में अब कुछ बदल गया था। तहख़ाने की चीख़ों ने अद्वैता के भीतर जो डर भर दिया था, वो अब जिज्ञासा से अधिक एक जीवित खौफ़ बन गया था—कुछ ऐसा जिसे वह महसूस कर सकती थी, सुन सकती थी, लेकिन छू नहीं सकती थी। बाहर का दरवाज़ा अब भी बंद था, और उसकी टॉर्च दोबारा जलने से इनकार कर चुकी थी।
उसे याद आया—हवेली में बड़े दरबार हॉल के बीच एक झूमर था, जो कभी इस ज़मीनदार परिवार की शानो-शौकत का प्रतीक हुआ करता था। गाँव वालों की कहानियों में एक बात हमेशा दोहराई जाती थी—झूमर के नीचे मत खड़े होना। वहाँ कोई लटका है।
उसने खुद से कहा—”अगर उस राज़ को खोलना है, तो उसी जगह जाना होगा।”
वो सीढ़ियों से ऊपर की ओर बढ़ी, अपने कदमों की आवाज़ गूँजती रही—”टक…टक…टक…”। हवेली का बड़ा दरबार हॉल खुला हुआ था—उसका आकार विशाल, दीवारों पर घोड़े, तलवारें और रियासत की पुरानी पेंटिंग्स टंगी थीं। पर सबका रंग बुझा हुआ था। जैसे समय ने उन्हें निगल लिया हो।
झूमर अब भी लटका था—भारी क्रिस्टल का बना, आधा टूटा हुआ, उसके नुकीले कांचों से रोशनी की जगह परछाइयाँ झर रही थीं। अद्वैता उसके ठीक नीचे जा खड़ी हुई।
सन्नाटा।
अचानक हवा तेज़ चली, झूमर हिलने लगा। उसकी चेन चरमराई, और झूमर के काँचों से एक धुँधली, लंबी, अधरक्त परछाई ज़मीन पर पसर गई। अद्वैता के शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
वह पीछे हटने लगी, तभी झूमर अपने आप ज़ोर से झनझना उठा। जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो। रोशनी की एक धुंधली परत फर्श पर बनी, और उसमें एक स्त्री का आकार उभर आया—लंबे बाल, चेहरा नहीं दिखता, पर उसके घाघरे की छोर से गिरती राख साफ़ दिख रही थी।
“चेतन… तूने मुझे जलाया नहीं था… तूने बस मुँह मोड़ लिया था।”
ये आवाज़ अब अद्वैता के भीतर गूंज रही थी, जैसे कोई याद उसकी आत्मा में उतर रही हो।
झूमर अचानक तेज़ी से कांपने लगा और उसकी चेन छूटने लगी। अद्वैता जानती थी—अगर वो अभी नहीं हटी, तो ये झूमर उसके ऊपर गिर सकता है। वह झपटकर बाहर की ओर दौड़ी, और जैसे ही दरबार हॉल के बाहर कदम रखा—पीछे भयंकर आवाज़ के साथ झूमर ज़मीन पर आ गिरा। काँच चटख गए, आवाज़ पूरे हवेली में गूंज गई।
हवा रुक गई। फिर एक धीमी-सी सिसकी…
“अब कोई सुन तो रहा है…”
उसने पीछे मुड़कर देखा—फर्श पर काँच के टुकड़ों के बीच एक साया बैठा था, और उसकी उँगलियों से खून नहीं, राख बह रही थी। वह रागिनी थी—पर अधूरी, धुंधली, और पिघलती हुई।
“सिर्फ वो जानता है… जो ऊपर नहीं, नीचे है…”
अद्वैता समझ नहीं पा रही थी—नीचे क्या है? तहख़ाना? या कुछ और?
फिर अचानक—दरबार हॉल के एक कोने से एक छोटी-सी घंटी बजी। तीन बार। और फिर… एक दरवाज़ा अपने आप खुला—सीढ़ियाँ नीचे उतरती थीं। लेकिन वो तहख़ाना नहीं था।
यह कोई और रास्ता था।
भाग ५: जिन्हें ज़िंदा दफ़नाया गया
अद्वैता उस खुलते दरवाज़े के सामने खड़ी थी—साँस थमी हुई, मस्तिष्क अजीब से संदेहों और डर में उलझा। यह दरवाज़ा तहख़ाने के विपरीत दिशा में खुला था, हवेली के पूर्वी भाग की ओर, जहाँ गाँव वाले भी जाने से डरते थे। कहा जाता था, वहाँ एक हिस्सा है जिसे “मृत कक्ष” कहते हैं—जहाँ ठाकुर साहब के ज़माने में ज़िंदा लोगों को कैद किया जाता था।
दरवाज़े के पार सीढ़ियाँ थीं—पत्थर की, संकरी, और दीवारों से रिसता पानी। हल्की नमी, सड़ांध और राख की मिली-जुली गंध ने वातावरण को भारी कर दिया था। अद्वैता के कदम धीरे-धीरे उतरने लगे। हर कदम जैसे समय को पीछे मोड़ता जा रहा था।
नीचे पहुँचते ही सामने एक लंबा गलियारा खुला—दाएं-बाएं छोटे-छोटे कक्ष, सबके दरवाज़े लोहे के और ज़ंग लगे हुए। हर कक्ष में बस एक छोटी खिड़की, जिसमें से कोई आह भी बाहर नहीं निकल सकती थी।
अद्वैता ने देखा—एक कमरे की दीवार पर नाखूनों से खरोंची एक लाइन अब भी स्पष्ट थी:
“मैं ज़िंदा हूँ… मुझे मत भूलो…”
उसका कलेजा काँप गया।
अचानक बाएँ तरफ़ के एक कमरे से झनझनाहट हुई। जैसे किसी ने ज़ंजीर खींची हो। अद्वैता झपटकर उस कमरे के पास गई और झाँका।
वहाँ अंधेरे में बैठा था एक साया। घुटनों में चेहरा छुपाए। उसने धीरे से सर उठाया।
उसका चेहरा—अधजला था। आँखे पिघलती मोम की तरह बह रही थीं। होंठ जैसे किसी ने सी दिए हों। और फिर भी… वो बोला।
“रागिनी को मैंने नहीं मारा…”
अद्वैता का शरीर सुन्न पड़ गया। ये कौन था?
“मैं उसका भाई था… उसने बताया था कि ठाकुर साहब… रात में…”
वो हकलाने लगा, लेकिन अद्वैता समझ गई थी—हवेली में जो हुआ, वो बस एक हत्या नहीं थी। वो एक साज़िश थी। एक सत्ता की, पुरुष अहंकार की, और स्त्री की आवाज़ को हमेशा के लिए दबा देने की।
“रागिनी ने रोशनी माँगी थी… और उसे आग दे दी गई…”
कमरे की दीवार से जैसे सिसकियों की गूंज उठने लगी।
“हम सब ज़िंदा थे, दीदी के लिए बोले थे… और यहीं दफ़ना दिए गए…”
अब अद्वैता ने देखा—गलियारे के अंत में एक बड़ा पत्थर का प्लेटफॉर्म था, उस पर कुछ नाम खुदे हुए थे—सभी एक ही तारीख़: 15 अगस्त 1963।
“स्वतंत्र देश… पर स्त्रियाँ अब भी ज़ंजीरों में थीं…” वो साया बोला।
अचानक गलियारे की सभी खिड़कियों से हवा चलने लगी। दरवाज़े अपने आप खुलने-बंद होने लगे। रोशनी टिमटिमाई, और दीवारों पर साये उभर आए—स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे—सबके चेहरे जैसे चीख रहे हों, “हमारे नाम कोई नहीं जानता… कोई नहीं जानता…”
अद्वैता ने घबराकर दरवाज़े की ओर भागना चाहा, पर गलियारे की रोशनी बुझ गई। अब सिर्फ एक ही दिशा थी—सीधा आगे, जहाँ एक पुराना तांबे का दरवाज़ा था। और उस पर लिखा था—
“जहाँ आत्माएँ इतिहास बन जाती हैं“
उसने गहरी साँस ली।
वो जानती थी—अब जो आगे होगा, वो उसकी ज़िंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल देगा।
भाग ६: साँस लेते दीवारों का कमरा
तांबे का वह दरवाज़ा जैसे अद्वैता को देख रहा था—उस पर उकेरे अक्षर अब चमकने लगे थे, जैसे दीवार ने उन्हें अपने भीतर से ज़िंदा कर दिया हो। “जहाँ आत्माएँ इतिहास बन जाती हैं”—यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक वादा था। अद्वैता ने दरवाज़े की चौखट छूते हुए गहरी साँस ली और भीतर कदम रखा।
भीतर का कमरा पूरी हवेली से अलग था। वहाँ न तो जाले थे, न सड़ांध, न धूल। दीवारें साफ़ थीं, मगर उनमें कुछ अजीब था। वे कुछ ज़्यादा ही चिकनी लग रही थीं, और उन पर धड़कन जैसी थिरकती हुई ध्वनि महसूस हो रही थी। अद्वैता ने धीरे से दीवार पर हाथ रखा।
ठंडी नहीं थी।
गरम भी नहीं।
वो जीवित थी।
उसका स्पर्श जैसे किसी की पीठ छूने जैसा लगा—जैसे कोई दीवार नहीं, बल्कि किसी का शरीर हो।
“तुम आई हो,” कमरे के बीच से एक स्त्री स्वर निकला, धीमा, गूंजता हुआ, मानो किसी गहरे कुएँ से उभरा हो। अद्वैता चौक गई।
सामने कमरे के केंद्र में एक आयताकार पत्थर की वेदी थी, जिस पर एक लाल रेशमी साड़ी रखी थी, साड़ी पर सिंदूर, चूड़ियाँ, और एक पुराना शीशा। अद्वैता जैसे उस शीशे की ओर खिंच गई। उसमें कोई चेहरा नहीं था, सिर्फ अँधेरा। लेकिन अँधेरे के भीतर अचानक एक आँख झपकी।
“तू मेरी कहानी पूरी करने आई है। तुझे अब वही देखना होगा जो मुझे मार कर मिटा दिया गया।”
अद्वैता की आँखें खुद-ब-खुद बंद हो गईं।
और तभी सब कुछ बदल गया।
वह अब हवेली में नहीं थी। अब वो उस रात में थी—15 अगस्त 1963।
चारों तरफ़ मशालों की रोशनी थी, हवेली सजाई गई थी, लेकिन भीतर चीखों की एक धारा बह रही थी। ठाकुर साहब किसी को घसीटते हुए ले जा रहे थे—वो रागिनी थी। उसकी आँखें लाल, चेहरे पर खरोंचें, और होंठों पर लहू। चेतन उसे रोकने की कोशिश कर रहा था लेकिन ठाकुर ने उसे थप्पड़ मारकर गिरा दिया।
“एक विधवा बहू हवेली के पुरुष से नज़दीकियाँ बढ़ाएगी? ये हवेली के नियमों के खिलाफ़ है!” ठाकुर साहब गरजे।
“मैंने कोई अपराध नहीं किया!” रागिनी चीखी।
“तेरी सजा इस हवेली की दीवारों में लिखी जाएगी,” उन्होंने कहा और नौकरों को इशारा किया।
रागिनी को उसी कमरे में कैद किया गया जहाँ अद्वैता खड़ी थी।
और तभी आग लगाई गई। दीवारें धधकने लगीं, लेकिन रागिनी की चीखें दीवारों में समा गईं। उसके शरीर की राख, उसकी आत्मा, सब इस कमरे की साँसों में तब्दील हो गए।
“मैं ज़िंदा थी… और मुझे दीवार बना दिया गया…”
अद्वैता की आँखें खुलीं। उसका शरीर कंपकंपा रहा था।
“अब तू मेरी गवाह है। तू बताएगी दुनिया को कि सज़ा किसे मिली थी, और अपराधी कौन था।”
कमरे की दीवारों ने जैसे एक अंतिम सांस ली और फिर स्थिर हो गईं।
अद्वैता बाहर निकलने को मुड़ी तो देखा—तांबे का दरवाज़ा खुला है। लेकिन बाहर की हवेली अब शांत नहीं थी। कुछ बदल गया था।
शायद वो आत्माएँ… अब जाग गई थीं।
भाग ७: ठाकुर साहब की वापसी
अद्वैता तांबे के दरवाज़े से बाहर निकली तो हवेली उसे वैसी नहीं लगी जैसी वो पहले थी। गलियारे की हवा गाढ़ी हो चुकी थी, मानो उसमें राख घुल गई हो। हर दीवार पर रागिनी की छवि तैर रही थी—कभी आँखों में आँसू लिए, कभी हथेलियों से दरवाज़ा पीटती हुई, और कभी सीधी खड़ी, जैसे अपनी कहानी सुना रही हो।
लेकिन तभी हवा में एक और गंध फैलने लगी—इत्र और धुएँ की तीखी मिलावट। जैसे किसी ज़मींदार के कमरे में देर रात कोई शिकार पार्टी हो और उसके बाद पसीने और साज़िश की गंध तैर रही हो।
“वो लौट आया है…” हवा में किसी ने फुसफुसाया।
अद्वैता ने मुड़कर देखा—बाएं कोने से आती रोशनी अब अजीब पीली हो चली थी, और दीवार की छाया अब किसी और की बन चुकी थी। एक भारी शरीर, झबरीली मूँछें, लंबा अँगरखा, और हाथ में एक बेंत। वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा था।
ठाकुर साहब।
लेकिन यह कोई स्मृति नहीं थी। यह कोई दृश्य नहीं था। यह उसका आत्मिक पुनरागमन था।
“इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रही हो?” उसकी आवाज़ में कर्कशता नहीं, बल्कि क्रूर आत्मविश्वास था। “उसका सच वही है जो मैं चाहूँ। रागिनी की चीख़ें अब भी मेरी हवेली की दीवारों में दबी हैं। और मैं उन्हें वहीं रखना चाहता हूँ।”
अद्वैता पीछे हटने लगी। पर उसके पैर ठिठक गए। झूमर के पास पड़ा काँच अब हल्का-हल्का हिलने लगा था। दीवार पर रागिनी की परछाईं उभरी।
“अब नहीं,” वह बोली।
ठाकुर साहब रुके। उनकी आँखें लाल हो गईं।
“मैंने तुम्हें जला दिया था। तुम्हारी अस्थियाँ इस हवेली की नींव में हैं!”
“और अब मेरी राख तेरी सत्ता को खा जाएगी,” रागिनी की आवाज़ जैसे हवेली के हर कोने से गूंजी।
अद्वैता ने देखा—हवेली की दीवारें अब चटकने लगी थीं। जैसे हर ईंट, हर पत्थर अब जाग गया हो। ठाकुर साहब ने चीख़ कर कुछ कहना चाहा, लेकिन उनके चारों ओर दीवारें सिमटने लगीं।
उनके कदमों के नीचे से खून की लकीरें निकलने लगीं, जो हवेली की दीवारों में चढ़कर उनके नाम को मिटाने लगीं।
“ये हवेली अब तेरा मक़बरा बनेगी,” अद्वैता ने कहा, उसकी आवाज़ खुद रागिनी की आत्मा से सजी हुई लग रही थी।
ठाकुर साहब की परछाईं झूमर की रोशनी में टूटने लगी, जैसे कोई तिलिस्मी परदा फट रहा हो।
और फिर—एक विस्फोट की तरह झूमर से तेज़ रोशनी निकली, हवेली हिली, और उस रोशनी में ठाकुर साहब का साया एक आख़िरी बार चिल्लाया…
“यह मेरा घर है!”
लेकिन हवेली अब उसकी नहीं रही थी।
सिर्फ राख… और एक सिसकी बची थी।
भाग ८: लाल कमरे का रहस्य
हवेली अब पूरी तरह जाग चुकी थी। दीवारें कुछ कह नहीं रही थीं, लेकिन अब उनका मौन भी कुछ छुपा नहीं रहा था। अद्वैता की आँखों में रागिनी की आत्मा उतर चुकी थी, और उसके अंदर एक अजीब शक्ति भर गई थी—डर अब था नहीं, सिर्फ गहराई से उठता हुआ एक आग्रह था कि कहानी अधूरी न रह जाए।
लेकिन अब सवाल था—क्या ये सब खत्म हो गया था?
उसी समय हवेली के दूसरे छोर से एक खड़खड़ाहट सुनाई दी। एक बंद दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था—जिस पर कभी लाल रंग से लिखा गया था: “राधा का कमरा – कोई प्रवेश न करे”।
अद्वैता चौंकी। राधा? यह नाम पहली बार सामने आया था।
वह आगे बढ़ी, और दरवाज़े पर हाथ रखा। लकड़ी ठंडी थी, मगर जैसे किसी ने भीतर से साँस रोक रखी थी। उसने धीरे से धक्का दिया—दरवाज़ा चरमराता हुआ खुला। कमरा अंधेरे में डूबा था, पर दीवारें खून जैसी लाल थीं। चारों तरफ़ पुराने परदे, फर्श पर टूटे काँच, और एक खाट… जिस पर कुछ ढंका हुआ था।
अद्वैता ने धीरे से चादर हटाई।
एक औरत का कंकाल। मगर असामान्य बात ये थी—उसके हाथों में एक औरत की चोटी लिपटी हुई थी, और उसकी उँगलियों में सिंदूर भरा हुआ था।
पास में एक तख्ती रखी थी।
“मैं राधा हूँ। रागिनी की छोटी बहन।
मुझे नहीं जलाया गया, लेकिन मुझे भूल गए।
जब रागिनी चीखी, मैं खिड़की से सब देखती रही।
मैं जानती थी—ठाकुर साहब अकेले नहीं थे।
चेतन ने भी… मुँह फेर लिया था।”
अद्वैता की रूह काँप गई।
तो कहानी में एक और परत थी। राधा… वो जिसने देखा सब, लेकिन बोला कुछ नहीं।
“मैं हर रात इसी खाट पर रागिनी के नाम की माला फेरती रही। और अंततः, मैं उसी की चोटी अपने सीने पर रख कर मर गई। ताकि हम अलग न रहें…”
कमरे की दीवारों पर अब राधा की छाया उभर आई। उसकी आँखें पथराई हुई, चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर हवा में उसके शब्द तैर गए—
“मैं दोषी नहीं थी। मैं सिर्फ डर गई थी। लेकिन अब मैं भी बोलना चाहती हूँ…”
अचानक कमरे के कोने से एक दीवार खुली। अंदर एक छोटा सा आलमारीनुमा स्थान था—जिसमें रागिनी की असली डायरी रखी थी। अद्वैता ने कांपते हाथों से उसे उठाया।
पहला पन्ना खुलते ही दीवार से आवाज़ आई—“अब आख़िरी पन्ना लिखो… अब कोई और भूले में न जिए।”
कमरे की हवा ठंडी हो गई।
अद्वैता जान गई—ये कहानी अब किताब की नहीं रही। ये एक चेतावनी बन गई थी।
और उसका काम अब सिर्फ सुनना नहीं, बचाना था।
भाग ९: आत्माओं का न्याय
रागिनी की डायरी अद्वैता के हाथ में थी, लेकिन जैसे ही उसने पहला पन्ना पलटा, हवा का एक झोंका कमरे में घुसा और लाल परदे फड़फड़ाने लगे। हवेली फिर से जीवित हो उठी थी, मगर इस बार उसमें डर से ज़्यादा एक उग्रता थी—जैसे वर्षों से दबी आवाज़ें अब एक साथ फूट पड़ने को तैयार थीं।
अद्वैता डायरी के शब्दों को पढ़ती रही, और हर वाक्य उसके अंदर किसी पुराने युग की आग की तरह धधकने लगा:
“मुझे जलाया गया, क्योंकि मैंने सवाल पूछे।
मुझे चुप कराया गया, क्योंकि मैंने सच बोला।
और मुझे दफ़नाया गया, क्योंकि मैं औरत थी।
लेकिन मेरी आत्मा ज़िंदा है, और अब उसे न्याय चाहिए।”
अद्वैता अब समझ गई थी—ये सिर्फ एक हवेली की आत्मा की कहानी नहीं थी। यह हर उस स्त्री की चीख थी जिसे समाज ने चुप कराया, डराया, मिटाया। और आज… वो सब लौट आए थे।
अचानक हवेली की दीवारें हिलने लगीं। गूंजती हुई आवाज़ें उभरीं—पुरुषों की हँसी, स्त्रियों की सिसकियाँ, और बीच-बीच में ठाकुर साहब की गूंजती दहाड़—“ये हवेली मेरी है!”
अद्वैता ने ज़ोर से कहा—“नहीं, अब नहीं!”
उसी क्षण, हवेली के बीचोंबीच दीवारों ने खुद-ब-खुद एक दरबार का रूप ले लिया। फर्श पर लाल गलीचा, चारों तरफ़ दीये जल गए, और बीच में एक कुर्सी पर बैठे ठाकुर साहब की आत्मा—आंखें जलती हुईं, चेहरा गर्व से भरा, लेकिन धीरे-धीरे पिघलता हुआ।
उसके सामने खड़ी थीं—रागिनी, राधा, और दर्जनों दूसरी औरतों की आत्माएँ, जो दीवारों से निकलकर न्याय की मांग कर रही थीं।
“आज फैसला होगा,” रागिनी की आत्मा ने कहा।
“कौन करेगा न्याय?” ठाकुर साहब हँसा।
रागिनी ने अद्वैता की ओर देखा।
“ये करेगी। ये वो है जो न डरी, न झुकी। अब इसका ही फैसला आखिरी होगा।”
अद्वैता काँप रही थी, लेकिन उसने आगे बढ़कर कहा—
“ठाकुर साहब, आपने एक नहीं, कई ज़िंदगियाँ छीनीं। आप सिर्फ एक पुरुष नहीं, एक विचार थे—जो हर औरत को मौन चाहता था। और अब… उस विचार का अंत ज़रूरी है।”
ठाकुर साहब की आत्मा चीख़ी—“मैं अमर हूँ!”
“नहीं,” अद्वैता बोली, “अब तुम केवल धुआँ हो, जिसे इतिहास से मिटा दिया जाएगा।”
उसने डायरी को हवेली के केंद्र में रख दिया। और उसी जगह, जहाँ रागिनी को जलाया गया था, वहाँ चिता की राख से एक दीपक जल उठा।
दीपक की लौ से उठी रौशनी पूरे कमरे में फैल गई। और जब वो रौशनी शांत हुई, तो ठाकुर साहब की आत्मा वहाँ नहीं थी।
दीवारें स्थिर हो गईं।
आवाज़ें शांत हो गईं।
रागिनी, राधा और बाकी आत्माएँ अब मुस्कुरा रही थीं। उनकी परछाइयाँ रोशनी में विलीन होने लगीं।
रागिनी ने अंतिम बार अद्वैता से कहा—
“अब तू मेरी कहानी दुनिया को सुना। ताकि कोई और हवेली फिर शापित न हो।”
राख से उगती सुबह
सुबह की पहली किरण जब हवेली की टूटी खिड़कियों से भीतर आई, तो हवेली वैसी नहीं थी जैसी अद्वैता ने पहली बार देखी थी। दीवारें अब चुप थीं, मगर उस डर वाली चुप्पी में नहीं—एक शांति थी, एक संतोष, जैसे हवेली ने बहुत कुछ सहने के बाद अब चैन की साँस ली हो।
अद्वैता अभी भी उसी जगह बैठी थी जहाँ रात भर रागिनी की आत्मा ने न्याय माँगा था। उसकी आँखें लाल थीं, शरीर थका हुआ, लेकिन मन… पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत।
धीरे-धीरे उसने उठकर अंतिम बार हवेली के अंदर देखा। दीवारें अब बोल नहीं रही थीं, लेकिन उनमें अब कोई थरथराहट भी नहीं थी। झूमर ज़मीन पर टूटा पड़ा था, मगर सूरज की रोशनी अब उसके काँच के टुकड़ों पर पड़कर इंद्रधनुष बिखेर रही थी।
वो तांबे के दरवाज़े की ओर मुड़ी, जिसे अब उसने भीतर से कभी न भूलने वाली आत्माओं की समाधि बना दिया था। उस दरवाज़े पर उसने रागिनी की डायरी का अंतिम पन्ना चिपका दिया—
“मुझे जलाया गया, पर मेरी राख ने हवेली को जगा दिया।
मैं मरी नहीं, मैं बस इतिहास में दर्ज हो गई।”
अद्वैता ने कैमरा उठाया, कुछ तस्वीरें लीं—अब शोध के लिए नहीं, बल्कि साक्ष्य के लिए। वो सब कुछ जो लोग अफवाह समझते थे, अब सच था। और वह सच अकेले उसके पास था।
गाँव लौटने पर लोगों ने देखा—हवेली की छत से अब कोई धुआँ नहीं उठता, न ही रात को कोई गाना सुनाई देता। लक्ष्मी बाई ने जब अद्वैता को देखा तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“तूने सुना उसको?” वह बोली।
“सुना भी, और जवाब भी दिया,” अद्वैता ने मुस्कुराकर कहा।
दिल्ली लौटने के बाद अद्वैता ने अपने शोध को किताब की शक्ल दी—“शापित हवेली: एक स्त्री की अधूरी कहानी”। किताब ने हलचल मचा दी। हर अख़बार, हर चैनल उसकी बात कर रहा था। लेकिन किताब के पहले पन्ने पर लिखा था—
“ये कहानी किसी एक आत्मा की नहीं,
हर उस आवाज़ की है जो दबा दी गई थी।
और हर उस लड़की की, जो एक दिन
किसी हवेली में अकेली जाती है…
डरने नहीं, जगाने।”
उस रात अद्वैता ने अपना लैपटॉप बंद किया। खिड़की से बाहर देखा—सड़क पर चाँदनी बिछी थी।
और फिर एक हल्की, बहुत धीमी-सी हवा चली।
“धन्यवाद…” जैसे कोई फुसफुसाया।
अद्वैता मुस्कुराई।
राख से एक सुबह सचमुच उग आई थी।
समाप्त




