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वापसी की राह

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अनिकेत तिवारी


सुबह की भीड़भाड़ भरी दिल्ली, उसकी चिल्ल-पों और भागती ज़िंदगी की आवाज़ें जब भी खिड़की से भीतर आतीं, आदित्य के मन में एक खालीपन भर देतीं। उसकी ग्यारहवीं मंज़िल की बालकनी से दिखाई देता था ट्रैफिक का रेंगता हुआ सर्प, जिसके बीच वो भी रोज़ अपनी कार में फँसा रहता—सोचता हुआ कि आखिर ये दौड़ क्यों है, किसलिए है, और वो इस दौड़ में क्या खो रहा है। उसने एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सालों मेहनत की थी, कामयाबी की ऊँचाई पर था, हर महीने अच्छा खासा वेतन, स्टेटस, कार, ऑफिस कैबिन, सबकुछ था—सिवाय चैन के। उस सुबह, जैसे ही उसने मोबाइल पर अगले हफ्ते की मीटिंग्स की लंबी लिस्ट देखी, एक झल्लाहट सी उसकी नसों में दौड़ गई। उसने मोबाइल को बंद किया, बालकनी में कुर्सी खींची और आंखें बंद कर लीं। हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन उसमें पहाड़ों की खुशबू नहीं थी—वही खुशबू जो वो बचपन में अपने नाना-नानी के गांव में महसूस करता था। कौसानी—एक छोटा सा पहाड़ी गांव, जहां सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों के साथ आंख खुलती थी, और धूप ओस से भीगी चाय की प्याली में उतर आती थी। वह जगह अब उसके जीवन से धुंधली होती जा रही थी, जैसे किसी पुराने एल्बम की फीकी होती तस्वीर। लेकिन उस दिन, बालकनी में बैठे-बैठे, उसे महसूस हुआ कि अगर वो अब भी नहीं लौटा—तो शायद जीवन भर नहीं लौट पाएगा।

दोपहर होते-होते आदित्य ने एक फैसला कर लिया। बिना किसी को बताए, बिना ईमेल का उत्तर दिए, उसने अलमारी से अपना पुराना ट्रैवल बैग निकाला—जिसमें बचपन की एक डायरी अब भी पड़ी थी, उसकी माँ की आखिरी लिखी चिट्ठी के साथ। उसने कुछ ऊनी कपड़े, एक कैमरा, और एक फाउंटेन पेन रखा—जो अब भी चल रहा था, जैसे उसकी स्मृतियाँ। टैक्सी बुलाकर वह स्टेशन पहुँचा, और वहाँ से पहली ट्रेन पकड़ी हल्द्वानी के लिए। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उसे अचानक वो लुका-छिपी के दिन याद आ गए जब वह और माया, उसके गांव की पड़ोसन, पेड़ों के पीछे भागते थे, चिढ़ाते थे, और फिर हँसते-हँसते खेतों में लोट जाते थे। माया—जिसकी आंखों में पहाड़ों की चुप्पी थी और आवाज़ में किसी पुराने लोकगीत की कोमलता। वह आज कहाँ होगी? क्या वह अब भी वहीं रहती होगी? क्या उसने उसे याद किया होगा इन सालों में? ट्रेन की रफ्तार के साथ-साथ आदित्य के मन में सवालों की धड़कन भी बढ़ रही थी। उसने आंखें मूंद लीं, पर नींद नहीं आई—बल्कि कई अधूरे दृश्य, टूटी-बिखरी यादें और पहाड़ी सड़कों की गंध उसके भीतर उमड़ने लगी। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, यह जैसे अपने ही बीते हुए समय से मिलने की शुरुआत थी।

रात के करीब तीन बजे हल्द्वानी पहुंचते ही ठंडी हवा ने उसे अपने आगोश में ले लिया। स्टेशन से बाहर निकलते ही वह ठिठक गया—वहां का माहौल अब भी वैसा ही था, धीमा, सधा हुआ, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था, जैसे वहां की हवा उसे पहचान रही हो। उसने एक छोटी सी जीप बुक की और ड्राइवर को बताया—”कौसानी चलना है।” ड्राइवर ने मुस्कराकर कहा, “सुबह निकलते हैं साहब, अभी रास्ता खाली नहीं मिलेगा, कोहरा भी है।” वह पास के एक ढाबेनुमा गेस्टहाउस में रुका, लेकिन नींद अब भी दूर थी। उसने कमरे की खिड़की से बाहर झांका—अंधेरे में लिपटे पहाड़, दूर कहीं जलती एक टिमटिमाती रोशनी, और बीच-बीच में किसी रातरानी के फूल की गंध। उसने अपनी डायरी खोली, और पहला वाक्य लिखा—”मैं लौट रहा हूँ, उसी जगह जहां मैं पहली बार खुद को भूल आया था।” उन शब्दों में एक हल्की थरथराहट थी, जैसे कोई अनकही बात वर्षों बाद फिर से सजीव हो गई हो। बाहर से एक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, और दूर पहाड़ी सड़क पर किसी ट्रक की हेडलाइट झलक कर गायब हो गई। उसने अपनी हथेलियों को गर्म चाय के कप से ढँक लिया और दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर को देखा—जिसमें हिमालय की चोटी पर उगता सूरज मुस्करा रहा था। क्या वही सूरज अगले दिन फिर से उसे देखेगा, वही पहली किरणें उसे वापस जीवन के उस मोड़ पर ले जाएँगी, जहाँ से सब कुछ छूट गया था?

***

भोर के चार बजे जब गेस्टहाउस के दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई, आदित्य पहले से ही जागा हुआ था। पूरी रात उसने नींद की कोशिश की, लेकिन जैसे पहाड़ की पुकार ने उसे भीतर से इतना बेचैन कर दिया था कि वह लेटे-लेटे ही अपने बचपन की आवाज़ें सुनता रहा—घंटियों की टनटनाहट, माया की हँसी, और दूर किसी रेडियो पर बजता कोई पुराना गीत। जीप का ड्राइवर, नाम था नरेश, एक दुबला-पतला लेकिन मुस्कराता हुआ आदमी था जो हर बात में “ठीक है साहब” कहता और फिर अपनी ऊनी टोपी में मुँह छुपा लेता। जब उन्होंने हल्द्वानी छोड़ा, तब आकाश अब भी नीला नहीं हुआ था, लेकिन सड़क के दोनों ओर घने देवदार के पेड़ नींद से जागने को तैयार थे। आदित्य खिड़की से बाहर देखते हुए चुप था, लेकिन भीतर उसके मन में हलचल थी। रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कभी-कभी डरावना था, लेकिन हर मोड़ पर पहाड़ अपने नए रंग में खुलता गया—कहीं से धुंध लिपटी हुई, कहीं से सूरज की हल्की किरणें पेड़ों के बीच छनकर आतीं, और कहीं-कहीं चुपचाप खड़े गाँव जो नींद से जैसे हौले-से जाग रहे थे। करीब तीन घंटे की चढ़ाई के बाद जब गाड़ी कौसानी के बोर्ड के पास पहुँची, आदित्य ने साँस रोक ली। बोर्ड पर लिखा था—”कौसानी: देवताओं का निवास, मन की शांति का स्थान।” और सचमुच, जैसे ही गाड़ी वहाँ से आगे बढ़ी, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दूर क्षितिज पर चमकने लगीं।

गाड़ी से उतरते ही पहली चीज जो आदित्य ने महसूस की, वह थी हवा में बसी हुई मिट्टी की वह गंध, जो सिर्फ पहाड़ में होती है—गीली, शुद्ध और आत्मा को छू लेने वाली। उसके सामने फैला था एक लंबा पगडंडी, जिसके एक ओर चाय के बागान थे और दूसरी ओर दूर-दूर तक दिखती घाटियाँ। वह वहीं खड़ा रहा, जैसे कोई सपना जी रहा हो। “यही वो जगह है जहाँ मैं पहली बार माया से मिला था,” उसने मन ही मन सोचा। उसकी आँखें उसी पुराने स्कूल की दिशा में गईं, जहाँ वह कुछ समय पढ़ा था जब गर्मियों में वह गाँव आता था। पास ही मंदिर की घंटी बजी, और एक पहाड़ी औरत अपने सिर पर लकड़ियों का बोझ लिए गीत गुनगुनाते हुए नीचे उतरती दिखी। यह वही संसार था—शब्दों से परे, शांति से भरा हुआ, लेकिन उसके लिए आज यह एक नई शुरुआत थी। उसने नरेश से कहा, “मुझे यहीं छोड़ दो। मैं आगे पैदल जाऊँगा।” ड्राइवर ने मुस्कराकर सलाम किया और कहा, “कभी-कभी आदमी को अपने पैरों से ही खुद तक पहुँचना पड़ता है, साहब।”

आदित्य अपने पुराने घर की दिशा में बढ़ा, लेकिन रास्ते में वह उस मंदिर के पास रुका जहाँ वह बचपन में नाना-नानी के साथ जाया करता था। मंदिर अब भी वैसा ही था—छोटा, सफेद रंग से पुता हुआ, और उसके दरवाज़े पर एक छोटा सा पीतल का घंटा लटक रहा था। उसने जूते उतारे और सीढ़ियों पर बैठ गया। हवा में अगरबत्ती की हल्की खुशबू थी और भीतर से पुजारी की गुनगुनाहट आ रही थी—शायद वही बूढ़े बाबा जो तब भी वहाँ थे। वह वहाँ बैठा रहा, आँखें बंद किए, जब तक सूरज की पहली किरणें उसके चेहरे पर नहीं पड़ीं। और जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसे मंदिर के पीछे की छत पर एक लड़की खड़ी दिखी—काले बाल, हल्की नीली शॉल, और आँखों में वैसी ही शांति, जैसे बचपन की कोई तस्वीर। एक पल के लिए उसका दिल तेजी से धड़क उठा। क्या यह माया थी? क्या इतने सालों बाद वह अचानक… लेकिन अगले ही पल वह लड़की मुड़कर चली गई, और आदित्य सिर्फ उसकी परछाईं देख सका। पर अब यह तय था—कुछ था इस जगह में जो उसे बुला रहा था, उसे याद दिला रहा था कि वापसी केवल एक सफ़र नहीं, एक अधूरी कहानी का अगला अध्याय है।

***

मंदिर से उतरते हुए आदित्य की चाल धीमी हो गई थी, जैसे हर पत्थर, हर पेड़ उसे पहचान रहा हो और उसके कंधे पर पुरानी स्मृतियों का हाथ रखकर रोक लेना चाहता हो। पगडंडी से कुछ ही दूरी पर एक टूटी-फूटी सीढ़ियाँ एक पुराने घर की ओर जाती थीं, जहाँ कभी उसकी नानी की कच्ची रसोई से दाल की खुशबू आती थी और माया पास के आँगन में तुलसी पर पानी देती मिलती थी। वह वहाँ नहीं गया, बल्कि बाईं ओर मुड़कर उस रास्ते पर बढ़ा जो एक छोटे कला-केंद्र की ओर जाता था—जो वर्षों पहले गाँव के एक बुज़ुर्ग चित्रकार ‘धरम दा’ ने शुरू किया था। बताया जाता था कि धरम दा ने जवानी में शिमला, मसूरी और यहाँ तक कि बनारस में भी कला सीखी थी, लेकिन फिर गाँव लौट आए थे और अपनी दुनिया बना ली थी—एक ऐसी जगह, जहाँ बच्चों को मिट्टी, रंग और कल्पना की आज़ादी मिलती थी। आदित्य जब छोटा था, तब वो कई बार वहाँ बैठकर स्केच बनाता, लेकिन शहर लौटते ही वह सब छूट गया। वर्षों बाद जब वह उस कला-केंद्र के सामने खड़ा था, तो लकड़ी की दीवारों पर अब भी कुछ रंग-बिखरे पोस्टर हवा में झूल रहे थे। दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था, और भीतर से पेंसिल के कागज पर चलने की रगड़ सुनाई दे रही थी—एक लयबद्ध, शांत ध्वनि।

भीतर प्रवेश करते ही एक तीखी गंध उसे मिली—पुराने तेल रंगों, नेफ्थलीन बॉल्स और पुराने अखबारों की। दीवारों पर गाँव के बच्चों द्वारा बनाए गए चित्र सजे थे—पहाड़, मंदिर, खेत, स्त्रियाँ सिर पर घड़ा लिए हुए, और एक चित्र जिसने आदित्य के कदम रोक दिए—एक लड़की की पीठ दिखाई दे रही थी, वो किसी पहाड़ी पर बैठी थी और उसके बालों में नीला रिबन बंधा था। वह चित्र हूबहू वैसा ही था जैसा वह माया को याद करता था। “ये किसने बनाया?” आदित्य ने धीमे से पूछा, और भीतर की टेबल से उठती आवाज़ आई—”उसे बनाए हुए भी कई साल हो गए, कोई लड़की थी, कभी-कभी आकर चित्र बना जाती थी। अब तो नहीं आती, बस चित्र रह गया है।” उस टेबल के पीछे एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी बैठा था, सफेद बाल, आँखों पर मोटा चश्मा, और हाथ में ब्रश। “आप धरम दा हैं?” आदित्य ने पूछा। “मैं अब सिर्फ ध्वनि हूँ, लड़का… तस्वीरों की ध्वनि।” वह मुस्कराया, और फिर ध्यान से आदित्य की ओर देखा, “तू… तू कहीं देखा-सा लगता है, तू नाना के साथ आता था न यहाँ?” आदित्य का गला रुँध गया, उसने सिर हिलाया, और कहा—”हाँ, मैं वही हूँ… वही जो कभी माया के पीछे-पीछे पेंसिल लेकर भागता था।” इस नाम पर धरम दा चुप हो गए, जैसे समय अचानक रुक गया हो।

धरम दा ने एक पुराना एल्बम निकाला, जिसमें चित्रों के साथ-साथ कुछ चिठ्ठियाँ भी थीं—किसी पुराने समय की निशानियाँ। उनमें से एक में माया की लिखावट थी, जो शायद एक पर्वत यात्रा पर जाने से पहले उसने छोड़ी थी। “चित्र वो बनाती थी, लेकिन कहती थी कि असली तस्वीरें दिल में होती हैं, जो कभी मिटती नहीं।” धरम दा ने आदित्य की ओर देखा, “तेरे लिए कुछ छोड़ा था, पर तू आया ही नहीं।” आदित्य ने काँपते हाथों से वो पन्ना उठाया—उसमें सिर्फ दो पंक्तियाँ थीं: “अगर कभी लौटना हो, तो उस चाय के पेड़ के नीचे मिलना, जहाँ पहली बार तूने मुझे ‘साँवरी’ कहा था।” ये शब्द पढ़ते ही उसका हृदय भीग गया, जैसे बारिश की पहली बूँद किसी सूखी धरती पर गिरी हो। बाहर अब धूप निकल आई थी, लेकिन उसके भीतर बादल घिरने लगे थे। शायद वह चाय का पेड़ अब भी वहाँ था, और शायद कोई साँवरी अब भी इंतज़ार कर रही थी—या फिर वह सिर्फ एक स्मृति थी, जिसे तस्वीरों में क़ैद कर लिया गया था। पर अब आदित्य को तय करना था—कि वो लौटेगा उस पेड़ के नीचे, जहाँ से उसका बचपन रुक गया था।

***

धरम दा की झोपड़ी से निकलकर जब आदित्य ने दोबारा पगडंडी पकड़ी, तो हवा का मिज़ाज बदलने लगा था। आसमान में बादल उमड़ने लगे थे और दूर पहाड़ियों पर धुंध घनी हो रही थी। उसने जेब से चिट्ठी को एक बार फिर निकाला—”अगर कभी लौटना हो…” ये शब्द अब सिर्फ अतीत नहीं रहे थे, ये जैसे किसी जीवित स्मृति की तरह उसके दिल के भीतर साँसें ले रहे थे। उसने सोचा कि अगली सुबह वह उस चाय के बाग तक जाएगा, लेकिन उसके भीतर कुछ ऐसा था जो उसे रुकने नहीं दे रहा था। वह पैदल ही रानीखेत की ओर चल पड़ा—वहाँ से नीचे घाटी में उतरते ही एक पुराना रास्ता था जो उन चाय के खेतों तक जाता था। रानीखेत से उसकी भी यादें जुड़ी थीं—माया के साथ एकबार बारिश में भीगते हुए भागना, एक पुरानी छतरी को साझा करना, और फिर किसी पथरीले मोड़ पर रुककर उसने पहली बार माया से कहा था, “अगर तू चली गई, तो पहाड़ सूना हो जाएगा।” वह हँस दी थी और बोली थी, “मैं तो यहीं की हूँ, तू ही भाग जाएगा शहर में खो जाने।” और वही हुआ भी था।

रास्ते भर हल्की फुहारें चलती रहीं, लेकिन जब वह रानीखेत के समीप पहुँचा, तो बारिश तेज़ हो गई। उसने एक छोटे टी स्टॉल के नीचे शरण ली, जो किसी पुराने नेपाली बूढ़े द्वारा चलाया जा रहा था। वहाँ बैठते ही चाय का कप उसकी ओर खिसकाया गया, और उसने बिना पूछे एक घूँट लिया। बूढ़ा बोला, “शहर से आए हो? आँखें बता रही हैं कि कुछ ढूँढ रहे हो।” आदित्य मुस्करा पड़ा, लेकिन जवाब में कुछ नहीं कहा। बारिश बाहर तीरों की तरह गिर रही थी, और उसी बारिश में सामने की पहाड़ी पर एक औरत का धुँधला सा रूप दिखा, जो एक छोटे कुत्ते को गोदी में लिए ऊपर चढ़ रही थी। वह आकृति दूर से ही जानी-पहचानी सी लगी, लेकिन जैसे ही वह कोहरे में ओझल हो गई, आदित्य को फिर वही बेचैनी घेरने लगी। उसने टी स्टॉल वाले से पूछा, “यहाँ से चाय के खेतों का रास्ता किधर है?” बूढ़े ने इशारे से पीछे की ओर बताया, “वहाँ से नीचे उतरो, देवदार के पेड़ों के बीच एक पगडंडी है, लेकिन ध्यान रखना, बारिश में रास्ता फिसलता है।”

आदित्य ने बिना एक पल गंवाए उस पगडंडी पर कदम रख दिया। बारिश अब भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी, लेकिन उसका मन भीतर से साफ हो रहा था, जैसे पानी उसकी वर्षों की जमी हुई धूल को धो रहा हो। चलते-चलते उसके जूते कीचड़ से लथपथ हो गए, और उसके बालों से पानी टपक रहा था, लेकिन जब वह उस जगह पहुँचा जहाँ से नीचे चाय के खेत दिखाई देते थे, तो वह थम गया। वह पेड़ अब भी वहाँ था—वही पुराना, घना, बारिश में भी झुका हुआ चाय का पेड़, जिसके नीचे कभी वह और माया छुपे थे। उसने थरथराते हाथों से चिट्ठी फिर निकाली और धीरे से पढ़ी, जैसे वह किसी प्राचीन मंत्र को दोहरा रहा हो। अचानक, एक कदम पीछे से किसी ने हल्के स्वर में पुकारा—”आदित्य?” वह ठिठक गया, मुड़ा—और वहाँ, बारिश की परतों के बीच, नीली शॉल में लिपटी वही आँखें उसे देख रही थीं, जिनमें बचपन की शरारत और इंतज़ार दोनों साथ थे। शब्द कहीं गुम हो गए, और बारिश के संगीत में बस एक ही बात गूंज रही थी—”मैं यहीं थी, तू ही चला गया था…”

***

बरसात अब धीमी हो चुकी थी, पर हवा में उसकी ठंडक अब भी बाकी थी—वैसी ही सिहरन पैदा करने वाली, जैसी किसी पुराने खत को पढ़ते समय दिल में उतरती है। आदित्य की आँखों के सामने खड़ी माया बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी उसकी स्मृतियों में बसी थी—शायद थोड़ी बड़ी हो गई थी, चेहरे पर एक गहरी शांति और एक हल्की थकान की रेखा, पर उसकी आँखें अब भी वैसी ही थीं—गहरी, सवालों से भरी हुई, और इंतज़ार में डूबी। कुछ देर दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, बिना शब्दों के, जैसे बारिश ने ही उनके बीच की दूरी को भिगोकर मिटा दिया हो। माया ने चुपचाप अपना हाथ आगे बढ़ाया, और आदित्य ने बिना कुछ सोचे वह हाथ थाम लिया। वह बोली, “आ जा… भीग जाएगा।” पास ही एक पुरानी झोंपड़ी थी, चाय बागान के कर्मचारियों की बनी हुई, जिसके भीतर एक लालटेन टिमटिमा रही थी। दोनों भीतर आकर बैठ गए। आदित्य ने हाथ से अपनी शर्ट से टपकती बूंदों को झाड़ा और पूछा, “तू यहीं थी माया?” वह मुस्कराई—धीरे, संकोच में, और फिर बोली, “हाँ… कहीं गई नहीं। शायद इसलिए क्योंकि मुझे पता था कि तू एक दिन लौटेगा।”

कुछ देर चुप्पी रही, सिर्फ लालटेन की लौ हिलती रही। माया ने फिर एक पुराना लकड़ी का बक्सा खोला, जिसमें कई पुराने कागज़, सूखे फूल, और एक नीला रिबन रखा था। “तेरे खत… मैंने संभाल कर रखे थे, पर तूने तो एक भी जवाब नहीं भेजा,” वह बोली, और उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक निष्कलंक स्वीकार। आदित्य का दिल कसक उठा, उसने धीमे से कहा, “मैं भाग गया था, माया… डरकर, दुनिया के पीछे। सोचा कि पहाड़ छोड़ दूँगा तो तुझसे भी दूर हो जाऊँगा। लेकिन हर दिन… हर दिन, तेरी कोई बात, तेरी कोई हँसी पीछा करती रही।” माया ने एक कागज़ निकाला—वह एक अधूरा पत्र था, जो शायद उसने भेजा ही नहीं था। उस पर लिखा था—”शहर की चकाचौंध में जब तुझे मेरे खेतों की मिट्टी की खुशबू याद आए, तो लौट आना… मैं यहीं रहूँगी, अपनी वही पुरानी साँवरी बनकर।” आदित्य ने वह पंक्ति पढ़ी और जैसे बरसों की थकान उसके भीतर से बह गई। “मुझे माफ़ कर सकेगी?” वह फुसफुसाया। माया ने उसकी ओर देखा और बोली, “अगर माफ़ न करती, तो आज इस झोंपड़ी में तू नहीं होता।”

झोंपड़ी के बाहर बारिश रुक गई थी, पर भीतर एक नई शुरुआत की बूंदें टपक रही थीं। लालटेन की रोशनी में माया का चेहरा अब साफ दिख रहा था—उसके माथे पर टिकी एक बूँद, उसकी गीली पलकों पर ठहरी एक पुरानी प्रतीक्षा। आदित्य ने उसके पास खिसकते हुए धीरे से कहा, “चल, एक बार फिर पेड़ के नीचे चलें… उस जगह जहाँ से तूने मेरा नाम पुकारा था।” माया हँसी—एक हल्की, सुकून भरी हँसी, और बोली, “उस पेड़ की छाँव अब भी वैसी ही है, आदित्य… बस अब वहाँ भूले-बिसरे खतों की जगह कुछ नए वादों को रखना होगा।” और दोनों एक साथ, एक पुरानी कहानी को नई स्याही देने के लिए बाहर निकल पड़े—जहाँ मिट्टी की खुशबू थी, एक चुप्पी थी, और वर्षों से अधूरी पड़ी एक प्रेम-कथा, जो अब शब्दों में उतरने को तैयार थी।

***

रात की बरसात के बाद सुबह कुछ और ही रंग लेकर आई थी—हवा में मिट्टी की वह ताजी सोंधी खुशबू थी, जो पहाड़ों की बारिश के बाद ही आती है। कौसानी की पगडंडियों पर धूप उतर आई थी, लेकिन आदित्य और माया अब एक नई राह पर चल पड़े थे—ऋषिकेश की ओर, जहाँ गंगा के घाट पर वे बचपन में एक बार साथ गए थे। माया ने बताया था कि वह हर साल वहाँ जाती है, एक दिन गंगा घाट पर बैठकर घंटों चुपचाप बहते पानी को देखती है, जैसे उसमें अपना जीवन तलाशती हो। आदित्य के लिए यह एक और अवसर था, एक और मोड़, जहाँ वह अपने भीतर छुपी हुई बेचैनी को शांत कर सके। रास्ते भर दोनों कम बोले, लेकिन उनकी चुप्पियों के बीच अब कोई बोझ नहीं था—बस एक सहजता थी, जैसे दोनों ने वर्षों की दूरियों को एक झोंपड़ी में, एक लालटेन की रोशनी में पीछे छोड़ दिया हो। जब ऋषिकेश पहुँचे, तो शाम उतरने लगी थी। घाट पर आरती की तैयारियाँ चल रही थीं, और हर तरफ दीपों की झिलमिलाहट, शंख की ध्वनि और हवा में कपूर की सुगंध तैर रही थी।

वे दोनों त्रिवेणी घाट पर एक कोने में बैठ गए, जहाँ भीड़ थोड़ी कम थी और घाट की सीढ़ियाँ सीधी गंगा में उतरती थीं। माया ने गंगा की ओर देखते हुए कहा, “हर साल मैं यहीं आती थी, सोचती थी कि अगर तू अब भी कहीं है, तो एक न एक दिन यहीं आकर मुझे ढूंढेगा।” आदित्य ने उसकी ओर देखा, लेकिन बोल न सका—वह क्षण बोलने का नहीं था, महसूस करने का था। घाट की सीढ़ियों से उतरते समय उसने देखा कि एक साधु एक बूढ़े तबला वादक के साथ बैठा कोई भजन गा रहा है—धीमा, लेकिन ऐसा कि उसकी लहरें पूरे घाट में फैलती जा रही थीं। गीत के बोल थे: “मन की नदिया बहती जाए, बहती जाए, लौट के कोई आए…” और जैसे इन शब्दों ने आदित्य के भीतर कोई दरवाज़ा खोल दिया हो। उसने धीमे से माया का हाथ थामा और कहा, “ये गीत, ये घाट, सब कुछ वैसा ही है… बस मैं अब वह नहीं रहा, जो भाग गया था।” माया की आँखें नम हो गईं, लेकिन उनमें अब राहत थी—जैसे वर्षों से टिका हुआ एक मौन उत्तर पा गया हो।

आरती शुरू हो चुकी थी। पंडितों की कतारों में दीपक जल उठे थे और उनका प्रतिबिंब गंगा में तैर रहा था—प्रकाश और पानी के मिलन जैसा, जैसे अतीत और वर्तमान एक साथ बह रहे हों। माया और आदित्य दोनों ने अपनी हथेलियों में एक-एक दीप लिया और गंगा में छोड़ दिया। दीपों के साथ उनके मन की प्रार्थनाएँ भी बह निकलीं—शायद एक दूसरे के लिए क्षमा, एक नई शुरुआत के लिए प्रार्थना, और उस प्रेम के लिए जो समय से परे था। आदित्य ने कहा, “माया, क्या तू फिर से मुझे पहचान पाएगी, जैसे बचपन में पहचानती थी?” माया ने धीरे से सिर हिलाया, “मैं तुझे कभी भूली ही नहीं थी। तेरे हर ख़त के जवाब मैंने बिना पते के भेजे थे, इन्हीं हवाओं से। शायद आज वही जवाब लौटकर आए हैं।” घाट पर घंटों बैठे रहे दोनों, जैसे अब उन्हें कहीं जाना नहीं था। गंगा की लहरों ने जैसे उनकी अधूरी बातों को, भूले-बिसरे गीतों को अपने साथ समेट लिया था, और उस रात आदित्य ने पहली बार खुद को पूरी तरह माया की आँखों में बहता पाया—निरंतर, निशब्द, और निर्मल।

***

गंगा की रात शांत थी, लेकिन आदित्य के भीतर कुछ ऐसा था जो बहुत देर बाद स्थिर हुआ था—जैसे कई सालों से बहती कोई बेचैनी अब किनारे लग चुकी हो। ऋषिकेश के घाट पर बिताई वह रात उनके रिश्ते की एक नई सुबह लेकर आई थी, और अगली सुबह जब वे दोनों घाट के पास के एक पुराने गेस्टहाउस की बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे, तब आदित्य पहली बार खुलकर माया की आँखों को देख सका—बिना समय की धुंध के, बिना दूरी के पर्दे के। वे आँखें अब भी वैसी ही थीं, लेकिन अब उसमें कुछ और भी था—एक स्थिरता, एक आत्मविश्वास, जो वर्षों की प्रतीक्षा और अकेलेपन से जन्मा था। माया कुछ नहीं कह रही थी, लेकिन उसकी चुप्पी अब बोझ नहीं लग रही थी। उसने चाय का कप रखते हुए पूछा, “अब क्या करोगे आदित्य? क्या वापस लौटोगे?” आदित्य ने एक लंबी साँस ली और कहा, “शायद नहीं… या शायद लौटूँगा, लेकिन इस बार कुछ लेकर।” माया ने पूछा, “क्या?” वह मुस्कराया और बोला, “तेरी आँखों का रंग… ये जो पहाड़ की धूप में और भी गहरा लगता है, इसे लेकर जाना है… ताकि जब कभी थक जाऊँ, तो बंद आँखों में तुझे देख सकूँ।”

उस दिन उन्होंने गंगा किनारे बहुत देर तक एक पुरानी सी बेंच पर बैठकर बातें कीं—बचपन की, उनके बीच के अधूरे संवादों की, और शहर बनाम गाँव की दुनिया की। आदित्य को माया की बातों में एक खास बात दिखी—वह अब किसी के लौट आने की प्रतीक्षा नहीं करती थी, बल्कि उसने खुद को अपने जीवन के संगीत में ढाल लिया था। वह अब स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी, लोकगीत सिखाती थी, और हर महीने गाँव में एक महिला कला-संगोष्ठी करती थी जहाँ औरतें चित्र बनातीं, मिट्टी के दीये सजातीं, और अपनी कहानियाँ बाँटती थीं। “तूने इस घाट को अपना घर बना लिया है,” आदित्य ने कहा। माया ने सिर हिलाया और बोली, “हर नदी को आखिर किनारा चाहिए होता है… मुझे यही किनारा ठीक लगा।” लेकिन फिर उसने अपनी आँखें झुका लीं, और धीमे से पूछा, “तू क्या फिर किसी दिन भाग जाएगा?” यह सवाल अचानक नहीं था, लेकिन इसमें कोई तीखा उलाहना भी नहीं था—बस एक डर था, जो अब भी उसकी पलकों के नीचे पनाह लिए बैठा था।

आदित्य ने माया का हाथ थामा और पहली बार ठोस शब्दों में कहा, “नहीं भागूँगा। इस बार मैं कुछ छोड़कर नहीं जा रहा, बल्कि कुछ साथ लेकर जा रहा हूँ… तेरे हिस्से की ख़ामोशी, तेरे पन्नों पर अधूरे छपे खत, और इन आँखों की गहराई।” माया की आँखों में अब हल्की नमी थी, लेकिन वह रोई नहीं। उसने बस उसकी हथेली को थोड़ी देर और थामे रखा। गेस्टहाउस से निकलते हुए, आदित्य ने उसके लिए एक स्केचबुक खरीदी, और उसके पहले पन्ने पर लिखा—”इन आँखों के रंग को कैद करने की कोशिश है ये… शायद कभी पूरा न हो, लेकिन अधूरी कोशिशों में भी तो एक पूरी कहानी बसती है।” माया ने वह स्केचबुक अपने बैग में रख ली, और आदित्य के साथ घाट की ओर लौटते हुए पूछा, “क्या तुझे डर नहीं लगता कि ये सब फिर से अधूरा रह जाएगा?” आदित्य ने मुस्कराकर कहा, “डर अब भी है, पर अबकी बार साथ में तेरी आँखें भी हैं… और मुझे लगता है, रास्ता खो भी जाऊँ तो यही रास्ता वापस ले आएंगी।” घाट की सीढ़ियों पर बैठकर दोनों ने चुपचाप बहती गंगा को देखा—अब उनके बीच सिर्फ पानी बहता था, कोई दूरी नहीं।

***

ऋषिकेश से लौटने के बाद पहाड़ की हवा कुछ और हल्की लग रही थी, जैसे कोई भार उतर गया हो, कोई नाम जो अब तक मौन में पलता था, अब धीरे-धीरे सांसें ले रहा था। आदित्य ने एक कमरा किराए पर ले लिया था—कौसानी की ऊपरी ढलान पर एक पुराने स्कूल के पीछे एक छोटी सी खिड़की वाला कमरा, जहाँ से सुबह हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिखती थीं और शाम को देवदार के झुरमुट से लाल सूरज विदा लेता था। माया रोज़ स्कूल जाती थी, और शाम को वे दोनों कभी मंदिर के पास मिलते, कभी धरम दा के कला-केंद्र में। लेकिन उस सुबह, जब आदित्य अकेले बैठा खिड़की के पास अपनी डायरी में कुछ लिख रहा था, तो उसे एक अधूरी चिट्ठी हाथ लगी—वह चिट्ठी जो माया ने कभी नहीं भेजी थी, पर धरम दा की किताबों के बीच उसे रख गई थी। चिट्ठी पीले पड़ चुके पन्ने पर थी, पर शब्द अब भी धड़क रहे थे।

“प्रिय आदित्य,
शायद जब तू ये पढ़ेगा, तब तक बहुत कुछ बदल चुका होगा। हो सकता है तू मुझे भूल गया हो, या शायद अब याद करना भी नहीं चाहता हो। पर मैं चाहती हूँ तू जान सके—मैंने तुझे कभी रोका नहीं, बस प्रार्थना की थी कि लौटेगा एक दिन, उस पेड़ के नीचे जहाँ पहली बार तूने कहा था ‘तू मेरी साँवरी है।’ तब मैं नहीं समझी थी, पर अब जानती हूँ—कभी-कभी कुछ बातें उम्र से पहले कही जाती हैं, और समझ उम्र के बाद आती है। मैंने तुझे हर मोड़ पर देखा—कभी रेडियो के किसी पुराने गीत में, कभी बच्चों की हँसी में, कभी पहाड़ के बादलों में… तू कहीं गया नहीं था, तू हर जगह था।
– माया”

चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आँखें भर आईं, जैसे ये शब्द अब जाकर अपने मुकाम तक पहुँचे हों। वह सोच में डूबा रहा—क्या माया जानती थी कि उसकी चिट्ठी अब पढ़ी जाएगी? या यह भी बस उसकी उस स्वाभाविक अंतर्दृष्टि का हिस्सा था, जो उसे दुनिया से अलग करती थी? उसी शाम उसने पहली बार माया को उस चिट्ठी का ज़िक्र किया। वे दोनों चाय के बाग के पास बैठे थे, वही पुराना पेड़ अब भी खामोश पहरेदार की तरह खड़ा था। जब आदित्य ने पूछा, “ये चिट्ठी क्यों नहीं भेजी?” माया ने बस मुस्कराकर कहा, “क्योंकि कुछ चिट्ठियाँ सिर्फ लिखने के लिए होती हैं, भेजने के लिए नहीं।” आदित्य चुप हो गया। कुछ मौन इतने गहरे होते हैं कि उन्हें शब्दों से तोड़ना भूल लगती है। उसने धीरे से माया का हाथ पकड़ा और कहा, “पर अब मैं वह चिट्ठी अपने साथ रखूँगा—क्योंकि अब मैं वह नहीं हूँ जो भागता है, अब मैं वह हूँ जो रुकता है, पढ़ता है, और समझता है।”

उस रात आदित्य ने पहली बार अपनी डायरी में माया के लिए एक चिट्ठी लिखी—जो उसने उसे दी नहीं, बस उसके जाने के बाद कमरे की मेज़ पर रख दी। चिट्ठी में उसने लिखा, “अगर मैं फिर से खो जाऊँ कभी, तो ये चिट्ठी मुझे लौटा देना। तू ही मेरा पहाड़ है, माया… और जब दुनिया की सड़कों पर सब कुछ धुंधला हो जाए, तो तेरी आँखें मुझे दिशा देंगी।” सुबह जब माया कमरे में पहुँची, तो आदित्य वहाँ नहीं था, लेकिन खिड़की से आती हवा उस चिट्ठी को हौले-से हिला रही थी—जैसे कोई अधूरी बात फिर से पूरा होने को तैयार हो। उसने चिट्ठी पढ़ी, आँखें बंद कीं, और मुस्कराई—क्योंकि अब उसे पता था, कुछ चिट्ठियाँ भले ही न भेजी जाएँ, लेकिन वे हमेशा समय पर पहुँच जाती हैं।

***

तीन दिन बाद आदित्य लौटा—हाथ में एक कपड़े में लिपटी स्केचबुक, आँखों में हल्की थकान और चाल में एक नई स्थिरता। वह कहीं गया नहीं था दूर, बस गाँव के किनारे उस चाय बागान में, जहाँ एक बुजुर्ग दंपती रहते थे, जो अब किसी को पहचानते नहीं थे लेकिन उनके घर की दीवारों पर आदित्य के बनाए हुए पुराने स्केच आज भी टंगे थे। उसने वहाँ तीन दिन एकांत में बिताए—बिना माया से मिले, बिना किसी को बताए। वह चाहता था कि जब वह लौटे, तो सिर्फ एक प्रेमी नहीं बल्कि एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में लौटे—जो भागा नहीं करता, जो खालीपन को भरने के लिए किसी और की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि भीतर से सम्पूर्ण होकर सामने खड़ा होता है। जब वह कौसानी लौटा, तब सुबह की धूप नीले आसमान पर खिल रही थी और हवाओं में एक सूखी पत्तियों जैसी गंध थी—बीती हुई ऋतुओं की। वह सीधे माया के स्कूल पहुँचा—कक्षा चल रही थी, बच्चे पहाड़ी लोकगीत गा रहे थे, और माया कक्षा के बीच में बैठकर ताली बजा रही थी। आदित्य कुछ देर दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे भीतर गया और पिछली बेंच पर बैठ गया, ठीक वैसे ही जैसे कोई छात्र पहली बार स्कूल में आता है—चुप, जिज्ञासु, और भीतर से भरा हुआ।

कक्षा समाप्त होने के बाद माया ने उसकी ओर देखा, और बिना कुछ कहे मुस्कराई। वह मुस्कान एक स्वागत थी—प्रश्न नहीं, स्पष्टीकरण नहीं—बस यह स्वीकार कि “तू लौट आया, इतना ही काफ़ी है।” आदित्य ने उसके सामने स्केचबुक रखी। माया ने उसे पलटा—हर पन्ने पर उसकी आँखें, उसके बाल, उसकी चुप्पियाँ, और वो पेड़ जो दोनों की कहानियों का मूक साक्षी था। एक पन्ने पर एक चित्र था—एक गुमनाम नदी, जिसके किनारे एक आदमी बैठा था और दूसरी तरफ एक औरत हाथ में चिट्ठी लिए देख रही थी। माया ने उसे देखा, फिर पूछा, “अब क्या सोच रहा है?” आदित्य ने धीरे से कहा, “अब सोच रहा हूँ लौटने की… पर इस बार साथ लेकर।” माया ने जवाब नहीं दिया, बस खिड़की से बाहर देखा—जहाँ बच्चे अभी भी खेल रहे थे, और हवा में तुलसी के पत्तों की हल्की गंध थी। फिर उसने कहा, “अगर लौटना है, तो सिर्फ रास्तों से नहीं… खुद से भी लौटना होगा।” आदित्य ने सिर हिलाया, “इस बार मैं किसी मंज़िल की तलाश में नहीं, बल्कि तेरे साथ चलने की कोशिश में हूँ।”

शाम को दोनों उसी पेड़ के नीचे पहुँचे, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी। सूरज ढलने लगा था, और धूप की आखिरी किरणें चाय के पत्तों पर टिमटिमा रही थीं। माया ने कहा, “क्या पता ये रास्ता फिर बदल जाए, आदित्य… तू फिर से शहर बुला ले तुझे।” आदित्य ने उसकी ओर देखा, और धीरे से कहा, “अगर बुलाया भी, तो इस बार मैं अपना पहाड़ साथ लेकर जाऊँगा… तू साथ चलेगी?” माया चुप रही, फिर उसकी हथेली में अपना हाथ रख दिया। एक पल की खामोशी के बाद आदित्य बोला, “शहर जाऊँगा… कुछ अधूरे काम पूरे करने, माँ-बाबा को समझाने, पर लौटूँगा तेरे साथ, यहाँ, इस घर में… जहाँ तेरी खिड़की से हिमालय दिखता है।” माया ने सिर झुका लिया, और जब उसने आँखें उठाईं, तो उनमें वही सन्नाटा था—पर अब डर नहीं, सिर्फ इंतज़ार। और उस शाम, जब आदित्य पहाड़ की उस पगडंडी पर फिर से उतरा, उसने जाना—वापसी कभी सिर्फ एक जगह की नहीं होती, वह भीतर लौटने की प्रक्रिया होती है… और जब किसी की आँखें घर बन जाएँ, तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं।

***

छह महीने बीत चुके थे। शहर की भीड़, स्टूडियो की चमक, कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स और नकली मुस्कानें अब आदित्य की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं रहे। उसने सबकुछ समेटकर दिल्ली छोड़ दिया था—अपार्टमेंट, पेंटिंग के आधे-अधूरे कैनवास, और एक ऐसा जीवन जो अब उसे अपना नहीं लगता था। जब वह कौसानी लौटा, तो कोई औपचारिकता नहीं हुई। माया बस उस दिन स्कूल से लौटते समय उसके सामने खड़ी हुई, और दोनों बिना कुछ बोले एक-दूसरे की आँखों में देख मुस्करा दिए थे। अब वे दोनों एक पुराने घर में साथ रहते थे, जिसकी खिड़की से सुबह की पहली धूप हिमालय की बर्फ पर पड़ती थी, और जहाँ शाम को चाय के बर्तन की खनक, बच्चों की हँसी, और रेडियो पर बजता कोई पुराना गीत पूरे घर को भर देता था। माया अब भी बच्चों को पढ़ाती थी, और आदित्य ने एक नया कला-केंद्र खोला था—’तूलिका’ नाम से—जहाँ गाँव के बच्चे, औरतें और युवा पहाड़ी जीवन को रंगों में ढालते थे। दीवारों पर अब सिर्फ चित्र नहीं थे—वे स्मृतियों के दरवाज़े थे, जिनसे होकर भीतर कोई और ही दुनिया झाँकती थी।

एक दिन, जब हल्की धूप में माया खिड़की के पास बैठी सूती दुपट्टे पर कुछ कढ़ाई कर रही थी, आदित्य उसकी तरफ देखता रहा। उस खिड़की से सिर्फ पहाड़ नहीं दिखते थे—उससे एक ऐसी दुनिया दिखती थी, जो दोनों ने साथ गढ़ी थी, धीरे-धीरे, एक-एक स्मृति जोड़कर। माया ने अचानक पूछा, “अब क्या सोचता है?” आदित्य ने पास आकर कहा, “सोचता हूँ, अगर उस दिन तू चिट्ठी न लिखती… अगर धरम दा वो चिट्ठी न संभालते… तो शायद मैं अब भी किसी शहर की खिड़की से सिर्फ इमारतें देख रहा होता।” माया हँसी, “हर चिट्ठी का एक वक़्त होता है, आदित्य। कुछ समय पर पहुँचती हैं, कुछ देर से… लेकिन अगर भाव सच्चा हो, तो चिट्ठी खोती नहीं—जैसे हम नहीं खोए थे।” आदित्य ने खिड़की की चौखट पर बैठते हुए एक स्केच निकाला—माया की एक पेंसिल चित्र। फिर धीरे से उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला, “ये मेरी पूरी कहानी है अब… तू, ये पहाड़, और ये खिड़की। इससे ज़्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

शाम को गाँव में लोकनृत्य था, ‘रणभेरी’ के ढोल की थाप पर बच्चे और बुजुर्ग नाच रहे थे। आदित्य और माया उस भीड़ में खड़े थे—कोई उन्हें देखने नहीं आया था, वे किसी मंच पर नहीं थे, लेकिन उनकी उपस्थिति पूरे माहौल में गूंज रही थी। वह प्रेम अब किसी शब्द का मोहताज नहीं था, न ही किसी वादे का। वह साँसों में था, रंगों में था, बच्चों की आँखों की चमक में था, और उस खिड़की से दिखती दुनिया में था—जो पहाड़ों से भरी थी, लेकिन उनमें समाई एक स्त्री की आँखों जितनी गहरी और शांत थी। और जैसे जैसे रात ढलती गई, आदित्य की डायरी का आख़िरी पन्ना भरता गया—”कभी-कभी ज़िंदगी खिड़की से दिखती है… दरवाज़े से नहीं। और अगर किसी की आँखों में तुम्हें तुम्हारा घर दिख जाए, तो समझो, लौटना सफल रहा।”

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