चयनिका श्रीवास्तव
जयपुर की पुरानी गलियों में बसे एक शांत मोहल्ले में, हल्के नीले रंग का एक छोटा-सा स्टूडियो था जहाँ से हर शाम एक अनकही ख़ामोशी और रंगों की सोंधी महक बाहर आती थी। वहाँ बैठती थी इशिता वर्मा—नेत्रहीन, मगर भावनाओं से भरी एक चित्रकार, जो रंगों को अपनी उंगलियों की नमी और हवा की कंपन से पहचानती थी। उसके पास रंगों की दृष्टि नहीं थी, पर एक अनोखी शक्ति थी—हर रंग की भावना को महसूस करने की। स्टूडियो में बिखरे कैनवासों पर वह अपने भीतर के संसार को उतारती थी—कभी आंधी की तरह, तो कभी बारिश के बूंदों सी नर्म। उसकी पेंटिंग्स में कोई चेहरा नहीं होता था, लेकिन देखने वाला ठहर जाता था, जैसे उसने अपनी ही कहानी उस रंगों के जाल में कहीं देख ली हो।
उसी शहर के एक और कोने में रणवीर सिंह राठौड़, एक प्रसिद्ध वास्तुकार, पुराने किलों और हवेलियों को आधुनिक स्पर्श देने के लिए जाना जाता था। उसका डिज़ाइन हमेशा परफ़ेक्ट होता, पर एक बात सबको चौंकाती थी—उसकी हर परियोजना ग्रे, ब्लैक और वाइट तक सीमित रहती थी। रंगों से उसे एक असहज दूरी थी, मानो वह रंगों से नहीं, उनकी यादों से डरता था। लोग उसकी स्टाइल को “मिनिमलिस्ट” कहते थे, लेकिन वो जानता था कि ये बस एक पर्दा है—उस डर को छिपाने का जिसे वह किसी से साझा नहीं करता। जयपुर की एक प्रतिष्ठित हवेली के रिनोवेशन प्रोजेक्ट के दौरान, दादीसा के कहने पर उसे एक आर्टिस्ट की मदद लेनी थी—एक ऐसी कलाकार जो सिर्फ महसूस करके रंगों को जीवन देती थी।
गैलरी ‘सप्त रंग’ में जब रणवीर पहली बार इशिता की प्रदर्शनी में गया, तो वह अपने आप से ही झुँझला गया। कैनवस पर रंगों की अव्यवस्थित लहरें, गहराई लिए हुए स्पर्श—उसने कुछ समझने की कोशिश नहीं की, पर उसके भीतर कुछ हिल गया। वहीं एक कोने में, इशिता सफेद ड्रेस में खड़ी थी, बिना देखे भी सब कुछ देखती हुई। जब रणवीर ने उससे मुलाक़ात की, इशिता मुस्कराई और कहा, “कभी-कभी जो आँखों से नहीं दिखता, वही सबसे ज़्यादा सच होता है।” यह एक टकराव था—एक रंगों को महसूस करने वाली और एक रंगों से भागने वाले के बीच। लेकिन ये टकराव ही कहानी की पहली रंगरेखा खींचता है।
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इशिता की बातें रणवीर के मन में किसी धीमे से बहते सुर की तरह गूंजने लगीं—शब्द जो उसने बस सुने थे, लेकिन भीतर कहीं गहरे उतर गए थे। वो सोचता रहा, “किसी ने मुझसे यूँ सीधा क्यों नहीं कहा कि देखना ज़रूरी नहीं होता?” लेकिन यह सोच उसे परेशान भी कर रही थी। दादीसा की हवेली में रंगों को लेकर कुछ नई कल्पनाएँ लाने की आवश्यकता थी, और उन्हें इशिता की कला में वह जादू दिखा, जिसे वह हवेली की पुरानी दीवारों पर उतरते देखना चाहती थीं। रणवीर को मजबूरी में इशिता से सहयोग करना पड़ा—और यहीं से उनके बीच की दूरी, धीरे-धीरे, बातचीत में बदलने लगी। रणवीर ने सोचा कि शायद ये एक पेशेवर रिश्ता रहेगा, सीमाओं में बंधा हुआ। लेकिन इशिता की दुनिया में कोई चीज़ सीधी लकीर में नहीं चलती थी।
हवेली की पहली मुलाकात में, इशिता ने अपने हाथों से पुराने पत्थरों को छुआ, उन दीवारों की सांसों को महसूस किया। उसने बिना देखे बता दिया कि पश्चिम की दीवार ज़्यादा धूप खाती है, और पूर्वी दीवार पर नमी है। रणवीर को चौंकने की आदत नहीं थी, लेकिन वो रुका, उसने देखा—नहीं, सुना। इशिता की भाषा रंगों की नहीं थी, वह एक अनुभव थी। लेकिन जितनी सहजता से इशिता ने उस हवेली से संबंध जोड़ा, उतनी ही दूरी रणवीर ने बनाए रखी। जब वह उसकी बनाई एक स्केच को देखने आया, तो उसने कहा, “ये बहुत… बिखरा हुआ है।” इशिता मुस्कराई और बोली, “जैसे तुम हो।” उस एक वाक्य ने रणवीर को जैसे नंगा कर दिया हो, और वह चुपचाप बाहर चला गया।
रात को हवेली के बरामदे में बैठे रणवीर ने अपने लैपटॉप में डिज़ाइन की लाइनें देखीं—पर उनमें कोई धड़कन नहीं थी। वो पहली बार सोचने लगा कि क्या वो जो बना रहा है, उसमें कुछ कमी है? और क्या ये कमी सिर्फ रंगों की है, या उसके भीतर किसी और खालीपन की? उसी समय, इशिता अपनी डायरियों में एक नई कविता लिख रही थी: “स्याह भी एक रंग है, अगर उसे महसूस कर सको…”। दोनों अपने-अपने कोनों में बैठे थे, लेकिन उनके बीच कोई अदृश्य धागा जुड़ने लगा था—एक रंगहीन रेखा जो धीरे-धीरे जीवन की ओर बढ़ रही थी।
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जयपुर की उस पुरानी हवेली में, समय जैसे दीवारों पर जमा हो गया था—टूटी हुई खिड़कियाँ, जर्जर पेंट, और दीवारों पर जाले—सब कुछ किसी भूले हुए युग की कहानी कहते थे। लेकिन जब इशिता ने पहली बार वहाँ कदम रखा, उसने दरारों में इतिहास की धड़कन सुनी। उसने दीवारों को छुआ और धीमे से पूछा, “क्या आप मुझे अपनी कहानी सुनाएँगी?” रणवीर जो पास ही खड़ा था, हँस पड़ा—उसे लगा ये कुछ ड्रामेटिक है। लेकिन दादीसा, जो दूर से देख रही थीं, मुस्कराईं। उन्होंने कहा, “ये हवेली बस ईंट-पत्थर की नहीं, यादों की बनी है। और यादों को सुनना आता है इसे।” उस क्षण रणवीर को एहसास हुआ कि इशिता और उसकी दादीसा, दोनों ही कुछ ऐसा देख सकती हैं जो वह कभी नहीं समझ पाया।
काम शुरू हुआ। हवेली के पश्चिमी हिस्से की दीवार पर इशिता ने स्केच बनाना शुरू किया—एक स्त्री का चेहरा, जिसके बालों में बादल बंधे थे और आँखों में हवा बहती थी। रणवीर, जो सटीक रेखाओं और मापदंडों का आदी था, बार-बार स्केच में ‘स्ट्रक्चर’ ढूंढता रहा। उसने एक बार चिढ़ कर कहा, “तुमने चेहरा अधूरा क्यों छोड़ा है?” इशिता ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया, “हर चेहरा पूरा नहीं होता, कुछ अधूरे चेहरे ही तो हमारे अपने होते हैं।” वह जवाब सीधा रणवीर के भीतर चला गया। उस रात उसने पहली बार अपनी बहन की पुरानी तस्वीर देखी—जिसे उसने वर्षों से छुआ तक नहीं था। तस्वीर धूल में थी, पर मुस्कान अब भी वैसी ही थी—अधूरी, मगर उसकी।
अगले दिन इशिता अपने साथ एक पुराना रेडियो लेकर आई और दीवार पर स्केच बनाते समय धीमी क्लासिकल धुनें चलाने लगी। रणवीर ने पूछा, “संगीत से तुम्हें क्या मदद मिलती है?” इशिता ने मुस्कराते हुए कहा, “हर रंग का एक सुर होता है। कुछ रागों से पीला बहता है, कुछ से नीला गहराता है।” रणवीर ने पहले कभी रंगों को सुना नहीं था—अब वह सुनने लगा। हवेली की दीवारों पर चित्र नहीं, एहसास उतरने लगे थे। और रणवीर के भीतर पहली बार कोई दरवाज़ा हल्के से खुला—शायद रंगों के लिए नहीं, खुद के लिए।
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हवेली में काम करते-करते, एक शांत शाम, इशिता ने धीरे से रणवीर से पूछा, “क्या तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि ये रंग तुम्हारे लिए सिर्फ़ दर्द नहीं, बल्कि एक डर का भी सागर हैं?” रणवीर ने कुछ देर चुप्पी साधी, फिर अपनी उदासी भरी यादों को शब्दों में पिरोते हुए बताया। उसने बताया कि बचपन में एक पेंट फैक्ट्री में लगी आग ने उसकी दुनिया ही बदल दी थी—उस आग में वह अपनी बहन को खो बैठा था, और उस दुर्घटना से रंगों में अब भी एक अजीब सा दर्द जुड़ा हुआ था। इस बात ने उसके भीतर एक दीवार खड़ी कर दी थी, जिसके पार जाने का उसे डर था।
इशिता ने रणवीर की बातों को न सिर्फ सुना, बल्कि महसूस भी किया। उसकी आँखों में गहरी समझ थी, और उसने धीरे से कहा, “हर दर्द में भी एक कहानी होती है, जो हमें कुछ सिखाती है।” इशिता ने रणवीर को आश्वस्त किया कि कभी-कभी उन रंगों को अपनाना भी एक तरह का उपचार हो सकता है। उसने उसे बताया कि कला में रंगों को एक नयी पहचान देने का अवसर भी होता है—जहाँ दर्द को एक नए सुर में ढाला जा सकता है। रणवीर के मन में छिपी उस पुरानी भयावह स्मृति की दहलीज पर एक नर्म सी रोशनी पड़ने लगी थी।
उस शाम, इशिता ने रणवीर के साथ एक थेरैप्यूटिक पेंटिंग सत्र रखा। उसने एक खाली कैनवास पर हल्के-हल्के रंग भरते हुए बताया कि हर रंग में एक चुपा संदेश होता है, और यह संदेश हमें हमारे अतीत से जोड़ता है। रणवीर ने पहले तो झिझक महसूस की, पर धीरे-धीरे उसने अपने डर का सामना करना शुरू किया। ब्रश के हर स्पर्श में उसने अपने दर्द को पिरोया, और इशिता की सहयोगी निगाहों में उसे एक नए आशा की चमक दिखाई देने लगी। उसी क्षण, हवेली की पुरानी दीवारें भी मानो एक नए रंग में रंगने लगीं—जहाँ डर नहीं, बल्कि मुक्ति का संदेश प्रकट हो रहा था।
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कुछ दिनों बाद, इशिता ने रणवीर को एक जगह चलने का प्रस्ताव दिया—एक नेत्रहीन बच्चों के स्कूल में, जहाँ हर बच्चा रंगों को देखता नहीं, महसूस करता है। रणवीर थोड़ी हिचक के साथ तैयार हुआ, लेकिन उसके भीतर एक अनजाना आकर्षण था—शायद यह जानने का कि जो डर उसे रोकता आया है, वह किसी और के लिए प्रेरणा कैसे बन सकता है। स्कूल में प्रवेश करते ही बच्चों की खिलखिलाहट, स्पर्श की समझ और अनोखे प्रश्नों ने रणवीर को एक अजीब सी गर्माहट दी। एक बच्चा, अंशु, उसके हाथ में नीला रंग रख कर बोला, “ये ठंडा लगता है ना? ये आसमान है।” रणवीर चौंक गया—उसने नीले को कभी महसूस नहीं किया था, केवल देखा था, और फिर उससे डर गया था।
इशिता ने रणवीर को समझाया कि इन बच्चों के लिए हर रंग का एक स्पर्श होता है, एक गंध, एक आवाज़। कुछ रंग हवा की गति से, तो कुछ मिट्टी की खुशबू से पहचाने जाते हैं। अंशु और बाकी बच्चों ने रणवीर को एक खेल में शामिल किया—जहाँ रंगों की पहचान आँखों पर पट्टी बांधकर करनी थी। जब रणवीर ने आँखें मूँद कर एक रंग को छुआ और उसने हल्की सी गर्माहट महसूस की, तो पहली बार उसके चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान आई। इशिता ने धीरे से कहा, “तुमने देखा नहीं, फिर भी पहचान लिया। अब बताओ, डर रहा है या जी रहा है?” रणवीर उस सवाल का जवाब नहीं दे पाया—क्योंकि अब उसके भीतर सवाल बदल चुके थे।
उस दिन की शाम, हवेली लौटते समय रणवीर गाड़ी चला रहा था, लेकिन इस बार उसकी आँखें नहीं, उसका मन रास्ता देख रहा था। इशिता खिड़की के पास बैठी, हवा की सरसराहट को सुन रही थी। दोनों के बीच खामोशी थी, लेकिन अब वह खामोशी बोझिल नहीं थी—बल्कि एक नई शुरुआत की तरह। रणवीर ने उससे कहा, “शायद तुमने मुझे देखने की एक नयी आंख दे दी है।” इशिता ने मुस्कराकर जवाब दिया, “नहीं रणवीर, ये आंखें तो हमेशा से तुम्हारे पास थीं—बस डर ने उन्हें बंद कर रखा था।” हवेली की ओर लौटते सूरज की किरणें गाड़ी की खिड़की से छनकर उनके चेहरों पर पड़ रही थीं—जैसे समय खुद रंग बनकर उनके साथ चलने लगा हो।
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हवेली के रिनोवेशन प्रोजेक्ट के बीच में, रणवीर ने इशिता के लिए एक सरप्राइज़ प्लान करना शुरू किया—एक ऐसा गार्डन, जहाँ बिना देखे भी रंगों को महसूस किया जा सके। उसने उस गार्डन को डिजाइन किया जिसमें हर पौधे की खुशबू, बनावट और स्थान ऐसा रखा गया था कि कोई भी व्यक्ति, विशेषकर दृष्टिहीन, वहाँ चलकर फूलों और पत्तों के ज़रिए रंगों की उपस्थिति जान सके। वह हर कोने में छोटी-छोटी ध्वनियाँ जोड़ता गया—कहीं हवा से बजती घंटियाँ, कहीं पानी की हल्की सरसराहट। जब उसने पहली बार यह डिज़ाइन इशिता को दिखाया, तो वह कुछ देर चुप रही, फिर बस इतना बोली, “तुमने पहली बार लकीरों से आगे सोचा है।”
इस गार्डन पर काम करते समय दोनों पहले से कहीं ज़्यादा करीब आने लगे। कभी मिट्टी की गंध पर बहस होती, कभी सूरजमुखी के रंग पर चर्चा। लेकिन उन बहसों में अब टकराव नहीं था, बल्कि अपनापन था। इशिता ने एक दिन पूछा, “तुम्हारी डिज़ाइन में अब रंग कहाँ से आए?” रणवीर ने हँसकर कहा, “शायद तुम्हारे स्पर्श से।” हवेली के काम के बीच में दादीसा यह बदलाव देख रही थीं—उनकी निगाहों में संतोष था, मानो दीवारें ही नहीं, दिल भी रंगे जा रहे हों। अदिति, जो शुरू से रणवीर को लेकर थोड़ी सशंकित थी, अब उसकी आँखों में भरोसे की झलक देखने लगी थी।
एक दिन, रणवीर ने इशिता को हवेली की छत पर ले जाकर गार्डन का पहला कोना दिखाया जो बनकर तैयार हो गया था। हवा में तुलसी और चमेली की मिलीजुली सुगंध थी, और ज़मीन में पड़े रंगीन कंकड़ों पर इशिता ने चलते हुए कहा, “तुमने रंगों को आवाज़ दे दी।” रणवीर ने धीमे से कहा, “या शायद तुमने रंगों को मेरी आवाज़ सुना दी।” उस रात, हवेली के पुराने गलियारों में पहली बार कुछ नयी आहट गूंजी—एक ऐसी भावना, जो सिर्फ दीवारों में नहीं, बल्कि दो अधूरी आत्माओं के भीतर गूंज रही थी। अब वे दोनों सिर्फ हवेली नहीं, एक-दूसरे के भीतर भी रेखाओं से आगे बढ़ रहे थे।
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दिन के उजाले में जैसे हवेली की दीवारें बोलती थीं, वैसे ही शाम होते-होते इशिता और रणवीर की चुप्पियाँ भी गहरी होने लगीं। हवेली की मध्य दीवार पर इशिता एक नई पेंटिंग बना रही थी—एक अधखिले गुलाब और एक मुरझाए बादल के बीच का द्वंद्व। वह चित्र रणवीर को विचलित करने लगा। उसमें कुछ ऐसा था जो सीधे उसकी स्मृतियों को कुरेदता था। रणवीर ने वह कैनवस देखा और उसकी सांसें तेज़ हो गईं—गुलाब का रंग वही था जो उसकी बहन की अंतिम स्केच में था, जो उसने बचपन में दीवार पर खींचा था और जिसे अग्निकांड में खो दिया था। वो हड़बड़ा कर बाहर निकल गया, जैसे किसी अदृश्य चोट ने उसे फिर से लहूलुहान कर दिया हो।
इशिता ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके स्पर्श में उसकी बेचैनी छिपी नहीं रही। वह जानती थी कि कला सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि ज़ख्मों की परत भी होती है। उसने जानबूझकर उस रंग का चुनाव नहीं किया था, लेकिन शायद उनके बीच कुछ ऐसा जुड़ गया था कि अब रंग भी उनकी स्मृतियों को पहचानने लगे थे। रात को हवेली की छत पर इशिता अकेली बैठी रही, और रणवीर अपने कमरे में बंद रहा। दोनों के बीच दूरी आ गई थी, लेकिन यह दूरी नफरत की नहीं, बल्कि सच के डर की थी। इशिता ने महसूस किया कि कुछ बातें कहने से ज़्यादा सुनने के लिए होती हैं, और शायद रणवीर अब खुद को सुनने के रास्ते पर था।
अगले दिन, इशिता ने पेंटिंग अधूरी छोड़ दी—उसी जगह जहाँ गुलाब मुरझाया था। उसने रणवीर से कुछ नहीं पूछा, कोई जवाब नहीं माँगा। उसने बस एक छोटा सा वाक्य हवा में छोड़ दिया, “कुछ रंगों को वक्त चाहिए होता है।” रणवीर ने कुछ कहा नहीं, लेकिन उस अधूरी पेंटिंग के सामने कुछ मिनट बैठा रहा। फिर बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया। उनकी बातचीत में अब शब्द कम थे, लेकिन हर रंग, हर अधूरी रेखा एक नया संवाद बन गई थी। उस हवेली में अब दो अधूरे लोग थे—जो एक-दूसरे को पूरा नहीं, बल्कि सच मानने की कोशिश कर रहे थे।
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हवेली की सबसे पुरानी दीवार, जिसे राजेश्वरी देवी ‘साँसों वाली दीवार’ कहती थीं, अब तक खाली थी। दादीसा चाहती थीं कि इस दीवार पर कुछ ऐसा उकेरा जाए जो हवेली की आत्मा को दर्शाए—विरासत, पीड़ा और पुनर्जन्म का प्रतीक। इशिता ने दीवार को छुआ और उसकी दरारों को महसूस किया, जैसे वह समझ रही हो कि दीवार भी किसी अधूरे मनुष्य की तरह टूटी हुई, लेकिन जिंदा है। उसने रणवीर से कहा, “इस दीवार को मैं अधूरी छोड़ूँगी।” रणवीर ने चौंक कर पूछा, “क्यों?” इशिता ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “क्योंकि कुछ अधूरी चीज़ें ही सबसे ज़्यादा सच होती हैं। और ये दीवार तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक तुम इसका पहला रंग नहीं लगाते।”
रणवीर के लिए यह एक सरल निवेदन नहीं था—यह एक चुनौती थी, एक आमंत्रण था अपने सबसे गहरे डर से टकराने का। वह देर तक दीवार के सामने खड़ा रहा। उसके हाथ कांप रहे थे। सामने कैनवास नहीं था, बल्कि उसकी यादों की सतह थी—उस बहन की हँसी, उस दिन की आग, और वो सारे रंग जो उसने जला दिए थे। इशिता ने उसे अकेला छोड़ दिया, और वहाँ से चुपचाप चली गई। रणवीर ने बहुत देर तक कुछ नहीं किया, फिर दीवार की एक कोने पर हल्का नीला रंग उठाया—वही जो कभी उसकी बहन की पसंद था। धीरे-धीरे, कांपते हाथों से उसने ब्रश को दीवार पर रखा। ब्रश का पहला स्ट्रोक जैसे नहीं, एक पुराने बंद कमरे की खिड़की खुल गई हो। उसकी आँखों से आंसू बह निकले—वो रोया, लेकिन इस बार शर्म से नहीं, राहत से।
जब इशिता दोपहर में लौटी, रणवीर दीवार के सामने बैठा था, रंग से सना हुआ, और उसके चेहरे पर पहली बार सुकून की झलक थी। दीवार पर सिर्फ एक छोटा सा नीला चिह्न था—लेकिन उसमें जीवन था। इशिता ने कुछ नहीं कहा, बस उसके पास बैठ गई। दोनों ने उस अधूरी दीवार को देखा, जो अब पूरी लगने लगी थी। उसी क्षण, हवेली की पुरानी घड़ी ने एक घंटी दी—मानो समय भी उस क्षण को स्वीकार कर चुका हो। उस नीले रंग ने केवल दीवार को नहीं, रणवीर को भी बदल दिया था—अब वह रंगों से डरता नहीं था, बल्कि उनके ज़रिए अपने अतीत से दोस्ती करने लगा था।
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हवेली का काम लगभग पूरा हो चुका था, और पुराने पत्थरों पर अब नई आत्मा बस गई थी। इशिता की पेंटिंग्स, रणवीर के डिज़ाइन और दादीसा की यादें—सब मिलकर इस जगह को जीवन का नया अर्थ दे चुके थे। उसी सुबह, रणवीर ने इशिता को एक सुनसान बगीचे की ओर बुलाया, जहाँ एक नीली पत्थर की बेंच पर बैठे हुए उसने अपने लैपटॉप से एक मॉडल पेश किया। “ये देखो,” उसने कहा, “ये एक आर्ट-सेंटर है, तुम्हारे नाम पर। ऐसा स्थान जहाँ नज़र से नहीं, दिल से देखा जाएगा। जहाँ रंग सुने जाएंगे, महसूस किए जाएंगे।” इशिता कुछ पल चुप रही, उसकी उंगलियाँ उस डिजिटल स्केच पर चलीं—मानो वह हर कोने की आत्मा को जान रही हो। “ये तुमने मेरे लिए नहीं बनाया,” वह बोली, “ये तो तुम्हारे भी भीतर था—बस तुमने अब उसे पहचाना।”
रणवीर ने स्वीकारा कि हाँ, इशिता ने उसे सिर्फ रंगों से मिलवाया नहीं, बल्कि उसकी चुप आत्मा को भी आवाज़ दी। उसने उसे जीने की कला सिखाई, देखने से परे महसूस करने की ताकत दी। दोनों अब हवेली के उस कमरे में खड़े थे, जहाँ इशिता की पहली पेंटिंग टंगी थी—वह अधूरी स्त्री, जिसके बालों में बादल थे और आँखों में हवा बहती थी। अब रणवीर ने उसके नीचे एक छोटी सी पट्टी लगाई: “पूरा वही होता है, जो अधूरे को भी अपना ले।” इशिता ने दीवार की ओर हाथ बढ़ाया और धीरे से पेंटिंग को छुआ, फिर रणवीर की ओर मुस्कराकर कहा, “अब तुमने रंगों को देखा नहीं, समझा है।” उनकी मुस्कराहटें अब कैनवस के पार जाकर एक साझा जीवन में रंग भर रही थीं।
गैलरी में अंतिम प्रदर्शनी का दिन आया, जहाँ हवेली की दीवारों की तस्वीरें और इशिता की मूल रचनाएँ प्रदर्शित की गईं। रणवीर और इशिता, दोनों साथ खड़े थे—भीड़ के बीच में मगर एक-दूसरे के रंगों में खोए हुए। जब एक आगंतुक ने उनसे पूछा, “आप दोनों की कला इतनी एक जैसी कैसे है?” इशिता ने उत्तर दिया, “क्योंकि हमने रंगों को देखा नहीं, जिया है।” वहीं दादीसा, पीछे खड़ी होकर मुस्करा रही थीं—जैसे वर्षों पहले जो अधूरा था, वह अब पूर्ण हो चुका हो। उस शाम, रंग केवल कैनवस में नहीं थे—वे उनके स्पर्श में, साँसों में, और उन दो दिलों के बीच बहते रिश्ते में समा गए थे। अब जो कुछ बचा था, वह सिर्फ एक अंतिम रंग था—शांतिपूर्ण स्वीकार्यता का।
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जयपुर की हवा में अब एक नया रंग घुला था—शांति का, स्वीकृति का, और आत्म-खोज का। हवेली का आर्ट-सेंटर बनकर तैयार हो चुका था और उसके उद्घाटन समारोह में शहर भर के लोग उमड़ पड़े थे। मीडिया, कलाकार, वास्तुकार, और वे बच्चे भी जिनसे रणवीर कभी डरकर भाग जाता था—सब वहाँ मौजूद थे। इशिता की बनाई ‘सुनने वाली दीवारें’ और रणवीर की डिज़ाइन की ‘स्पर्श गैलरी’ अब किसी चमत्कार से कम नहीं थीं। इस केंद्र का उद्देश्य यही था—रंगों को दृष्टि से परे जाकर महसूस करना। जब उद्घाटन समारोह में एक रिपोर्टर ने रणवीर से पूछा, “इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी प्रेरणा क्या रही?”, उसने बिना हिचक जवाब दिया, “एक लड़की जिसने रंगों को कभी देखा नहीं, पर जिसने मुझे सिखाया कि देखने से ज़्यादा ज़रूरी है महसूस करना।”
उस शाम, सूर्यास्त के वक़्त, रणवीर इशिता को लेकर सेंटर की छत पर गया, जहाँ एक खाली कैनवस और दो ब्रश रखे थे। “आज हम दोनों एक साथ पहली पेंटिंग बनाएंगे,” रणवीर बोला। इशिता ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ रंग अब डराते नहीं हैं?” रणवीर ने गंभीर होकर कहा, “अब रंग डराते नहीं, रास्ता दिखाते हैं।” दोनों ने मिलकर एक रंग उठाया—न पीला, न नीला—बल्कि एक ऐसा रंग जिसे इशिता ने ‘शांति का स्पर्श’ कहा था। कैनवस पर बिना योजना के रंग फैलते गए, और वह चित्र बनता गया जो किसी आंख से नहीं, बस दिल से समझा जा सकता था। वह एक ऐसी यात्रा का निशान था, जहाँ दो अधूरे लोग साथ चलकर एक पूर्ण तस्वीर बना गए थे।
आख़िर में, उद्घाटन के बाद की रात, सेंटर की दीवार पर इशिता ने आखिरी पंक्ति ब्रेल में उकेरी—”जो दिखता नहीं, वही सबसे गहरा सच होता है।” रणवीर ने उस पंक्ति को स्पर्श किया और उसकी आँखें भर आईं। इशिता ने पूछा, “तुम पढ़ पाए?” रणवीर ने जवाब दिया, “हाँ, शायद पहली बार कुछ ऐसा पढ़ा जो सिर्फ महसूस करने से समझ में आया।” उस पल, हवेली, रंग, स्पर्श, और वो अधूरी दीवारें—सब कुछ पूर्ण हो गया। कहानी वहीं खत्म नहीं हुई—वो अब हर उस व्यक्ति में जीवित थी जो रंगों को सिर्फ देखने के बजाय, जीने का साहस करता था।
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