तपन मिश्रा
वाराणसी का स्टेशन, सुबह की भीड़, लाउडस्पीकर पर गूंजती announcements, और हवा में फैली एक चिरपरिचित गंध—धूप, धूल, और जलते घी की। अंशुमान का कैमरा उसकी छाती से लटका था, और उसकी आँखों में तलाश थी—एक अलग दुनिया की, उस लकीर के पार की जहाँ जीवन और मृत्यु हाथ थामे चलते हैं। वह पिछले कई महीनों से देश के अलग-अलग शहरों में डॉक्युमेंट्री शूट कर रहा था—अंधविश्वास, परंपरा, मृत्यु और पुनर्जन्म पर। लेकिन वाराणसी… वह जानता था, यहाँ कुछ और मिलेगा। स्टेशन से निकलते ही, उसे घाटों की ओर खींचती एक अदृश्य डोर ने जकड़ लिया था। जब वह अस्सी घाट पर पहुँचा, तब तक धूप झुलसा देने लगी थी, लेकिन घाट की सीढ़ियों पर बैठे साधु, चिता की राख से सने पंडे, और शंखध्वनि की गूंज में कुछ ऐसा था जो उस ताप को भी भूलने लायक बना देता था।
अंशुमान ने अपनी DSLR कैमरा उठाई और दृश्य कैद करने लगा—एक बेटे द्वारा पिता का पिंडदान, एक विदेशी पर्यटक ध्यानमग्न होकर गंगा की लहरें निहारते हुए, और कुछ दूरी पर एक शवयात्रा की तैयारी। उसकी रुचि सिर्फ दृष्य में नहीं थी, वह लोगों की कहानियाँ ढूँढता था। उसी दोपहर, एक नाव वाले बुज़ुर्ग ने उसे अजीब बात बताई। “बाबूजी, एक दुल्हन है जो हर साल आती है… लाल चुनरी ओढ़े, पाँव ज़मीन से ऊपर… रात के तीन बजे। मसान पर चलती है जैसे धुआँ।” अंशुमान ने हँसने की कोशिश की, लेकिन नाव वाले की आँखों में डर नहीं, श्रद्धा थी। “आपको उसकी कहानी सुननी चाहिए,” उन्होंने कहा, “घाट की राख में छिपी है वो बात।” उसी शाम, जब अंशुमान मणिकर्णिका घाट के पास चाय पी रहा था, उसने कुछ और लोगों से बात की। एक लकड़ी बेचने वाले ने भी वही कहा, “तीसरा प्रहर… जब शमशान सोता नहीं।” एक युवा साधु ने भी उसकी बात को और गहरा किया—“वो आत्मा नहीं है, प्रतीक्षा है। उस दुल्हन को मुक्ति नहीं मिली।” अंशुमान के लिए यह अब केवल एक लोककथा नहीं रही, बल्कि एक संभावना बन गई। एक ऐसा myth जो lens में कैद हो सकता है, अगर वो सही समय पर सही जगह हो।
रात होते-होते अंशुमान ने घाट के पास एक लॉज में कमरा लिया और निर्णय किया कि वह रात जागेगा। चाय और सिगरेट की मदद से वह खुद को जगाता रहा। घाट धीरे-धीरे वीरान होने लगा था, केवल कुछ चिताएँ जल रही थीं, और हवा में राख तैर रही थी। तीन बजने में कुछ मिनट बचे थे। वह कैमरा तैयार कर घाट की सबसे आखिरी सीढ़ी पर बैठ गया। और तभी… धुंध के बीच से आती एक छाया दिखी। लाल रंग की चुनरी, लंबा घूंघट, और शरीर हवा में तैरता हुआ, जैसे पाँव छूते ही नहीं ज़मीन। अंशुमान ने घबराकर कैमरे का बटन दबाया, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। वह स्तब्ध था—ना डर था, ना विश्वास। वह कुछ कदम चला, उस छाया के पीछे, लेकिन अचानक सब कुछ गायब हो गया—छाया, घूंघट, हवा में फैली गंध तक। केवल चिता की आग की चटकती आवाज़ रह गई। अगली सुबह जब उसने फुटेज देखा, कैमरे में कुछ नहीं था… सिर्फ़ एक अनसुनी सी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी—“मैंने उसे देखा था… वो बहुत सुंदर थी…” अंशुमान समझ गया था, यह कहानी अभी शुरू हुई है।
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अंशुमान की आँखों में नींद नहीं थी, सिर्फ़ प्रश्न थे। कैमरे की स्क्रीन पर बार-बार वह ब्लैंक फुटेज देखता रहा—कुछ भी नहीं, ना छाया, ना लाल रंग, ना वह आवाज़ जो उसने अपनी रूह में महसूस की थी। लेकिन हेडफोन में कुछ ज़रूर था—बहुत धीमे स्वर में एक महिला की साँसें, और एक पंक्ति: “मैंने उसे देखा था… वो बहुत सुंदर थी…”। यह किसकी आवाज़ थी? और वह स्त्री कौन थी जिसे उसने पिछली रात घाट पर देखा? क्या यह किसी भटकती आत्मा की लीला थी? या सिर्फ़ थकान और दिमाग़ की चाल? अंशुमान को अब यह सब एक hallucination नहीं लग रहा था—उसने कुछ असली महसूस किया था, एक ऐसी उपस्थिति जो हवा से भारी थी। घाट पर हर चिता की लपटों में, हर मंत्र की ध्वनि में, और हर राख के कण में जैसे एक कहानी बसी थी—और वह कहानी अब उसे पुकार रही थी। उसी दिन, वह सीधे पहुँचा पंडित भैरवनाथ के पास, जिन्हें घाट पर सबसे पुराना और रहस्यमयी पुजारी माना जाता था। उनकी आँखें आधी बंद, आधे जल चुके नारियल के जैसे। अंशुमान ने उन्हें सब बताया। वे मुस्कराए, लेकिन वह मुस्कान किसी मज़ाक की नहीं, एक स्वीकृति की थी।
“तुमने उसे देख लिया,” पंडित भैरवनाथ ने कहा, “अब वो तुम्हें छोड़ेगी नहीं।” अंशुमान ने पूछा, “कौन थी वो?” पंडित कुछ देर शांत रहे, फिर बोले, “नाम था चंदा। नाव वाले की बेटी। सुंदर थी, शांत थी, और वो उस आदमी से प्रेम कर बैठी जो यहाँ कभी का नहीं था।” उन्होंने धीरे-धीरे एक कहानी बतानी शुरू की, जो घाट के रहस्य से जुड़ी थी। “वह आदमी विदेशी था—चित्र बनाता था, गंगा को रंगों में ढालता था। उसकी आत्मा अजीब थी, जैसे पहले से जानता हो कि उसका अंत यहीं होना है। चंदा से उसका रिश्ता गुप्त था—नदी के किनारे, मंदिर की दीवारों पर, नावों के नीचे वो एक-दूसरे से मिलते थे। एक दिन उन्होंने शादी कर ली, गुप्त रूप से। लेकिन उसी रात वह आदमी मर गया। ना कोई ज़हर, ना चोट, ना बीमारी। बस, उसकी साँसें बंद हो गईं। और फिर… चंदा उस रात की सुबह, उसकी चिता में चल पड़ी—लाल साड़ी पहने, सिंदूर लगाए… और अग्नि में समा गई।” अंशुमान साँस रोककर सुन रहा था, जैसे हर शब्द से धुआँ उठ रहा हो। “लेकिन तब से,” पंडित ने आगे कहा, “हर साल उसकी आत्मा आती है। वही समय, वही रूप, वही घाट।”
उस रात फिर वही तीसरा प्रहर था। चाँद बादलों में छुपा हुआ, घाटों पर घनी चुप्पी, और केवल चिताओं की हल्की रोशनी थी। अंशुमान कैमरे के साथ तैयार था—लेकिन इस बार, वह खुद को सिर्फ़ एक कैमरा मैन नहीं, एक साक्षी मान रहा था। तीन बजने में कुछ ही पल बचे थे। और तभी, धुएँ के उस पार, वह वही लाल साड़ी, वही चुनरी, वही तैरती चाल दिखी। अंशुमान धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगा। उस स्त्री के पाँव सचमुच ज़मीन से ऊपर थे, जैसे हवा उसे थामे हुए चल रही हो। उसका घूंघट इतना लंबा था कि वह चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन हर बार जब वह आगे बढ़ती, उसके चारों ओर राख के कण उड़ते और समय ठहर सा जाता। घाट की सीढ़ियाँ जैसे किसी और लोक में बदलने लगी थीं—जैसे यह वाराणसी नहीं, कोई बीच की दुनिया हो। अचानक उसने मुड़कर देखा। अंशुमान की आँखें उस क्षण स्थिर हो गईं। घूंघट के नीचे जलते हुए आँसू थे—लाल, जैसे आग में डूबे हुए मोती। वह कुछ बोलने वाली थी… लेकिन तभी हवा की एक तेज़ लहर आई, और सब धुंध में विलीन हो गया। अंशुमान वहीं बैठ गया, काँपते हुए हाथों से राख उठाई—वो अब जान चुका था, ये आत्मा मुक्त नहीं हुई… और शायद उसे ही वह मुक्ति दिलानी थी।
अगली सुबह अंशुमान का शरीर घाट के किनारे एक टूटी नाव के पास पड़ा था। आँख खुली तो सामने था मणिकर्णिका घाट का धुँधलाया दृश्य—जैसे रात की राख अब भी हवा में तैर रही हो। उसकी यादें धुँधली थीं, लेकिन वह चेहरा… वह लाल आँचल… और राख में डूबा वह चित्कार अब भी उसकी नसों में दौड़ रहा था। लौटकर वह सीधा लॉज गया और कैमरा निकाला। वीडियो फुटेज एक बार फिर ब्लैंक। लेकिन इस बार उसमें सिर्फ़ राख के उड़ते कण नहीं थे, बल्कि कुछ क्षणों के लिए एक दृश्य उभरा—एक लाल रंग की आकृति जो दूर से उसे देख रही थी, और फिर गायब हो जाती है। इस बार फुटेज में एक और चीज़ दर्ज हुई थी—एक अस्पष्ट पर गहरी आवाज़: “जो देखता है, वह बंध जाता है…”। अंशुमान समझ गया था, यह अब महज एक कहानी नहीं, बल्कि उसका हिस्सा बन चुकी है। इस रहस्य को समझे बिना वह लौट नहीं सकता।
उसने तय किया कि अब उसे उस आदमी से मिलना होगा जिसे घाट का सबसे पुराना और सबसे अजीब जानकार कहा जाता है—पंडित भैरवनाथ। उसे ढूँढना आसान नहीं था, लेकिन घाट के लकड़ी विक्रेताओं और संन्यासियों से पूछते-पूछते वह एक छोटी सी कुटिया तक पहुँचा, जो गंगा से कुछ दूरी पर एक पीपल के पेड़ के नीचे थी। वहाँ बैठे थे एक कृशकाय, आधे अंधे, भस्म से लिपटे पंडित—माथे पर राख का बड़ा टीका, आँखें जैसे किसी और दुनिया की तरफ देख रही हों। अंशुमान ने धीरे-धीरे अपना परिचय दिया, और जो देखा था, वह बताया। पंडित भैरवनाथ ने चुपचाप सुना, फिर बोले, “जो तुमने देखा, वह सत्य है। लेकिन हर सत्य को जानने का मूल्य होता है।” अंशुमान ने जिज्ञासा से पूछा, “वह स्त्री कौन है?” पंडित ने लंबी साँस ली, और कहा, “चंदा… नाव वाले की बेटी थी। मासूम, सीधी, मगर भाग्य से छल की शिकार। उस पर किसी और जन्म का ऋण था—जो उसने प्रेम में चुकाया।”
पंडित भैरवनाथ की आँखें अतीत में लौट गईं। “चंदा इस घाट की बेटी थी—घाट की चिताओं की गंध में पली-बढ़ी। उसका पिता लाशें पार लगाता था। एक दिन घाट पर एक अंग्रेज़ आया—एलियट। वह चित्रकार था, मगर उसकी रुचि रंगों से ज़्यादा मृत्यु में थी। वह चिताओं के चित्र बनाता, आत्माओं की कहानियाँ सुनता। चंदा और एलियट की मुलाकातें नाव में शुरू हुईं, और वे एक-दूसरे की भाषा से अनजान होकर भी प्रेम करने लगे। कहते हैं उन्होंने गुप्त रूप से एक मंदिर में विवाह किया। लेकिन उस रात एलियट की मृत्यु हो गई। कोई बीमारी नहीं, कोई ज़हर नहीं… वह बस मर गया—जैसे उसकी आत्मा किसी ने खींच ली हो। और फिर, चंदा ने अग्नि को गले लगा लिया, उसके साथ। किसी ने नहीं रोका। उस रात, अग्नि शांत नहीं हुई—और उसके बाद घाट भी नहीं।” अंशुमान दम साधे सुनता रहा। “हर साल, उसी दिन, उसी समय, वह आती है। लाल साड़ी पहनकर, पाँव ज़मीन से ऊपर… जैसे किसी प्रतीक्षा में हो। वह आत्मा नहीं… वह प्रश्न है। और तुमने उसे देख लिया। अब वह तुम्हारे भीतर उतर चुकी है।” अंशुमान काँप गया।
“क्या मैं उसकी मदद कर सकता हूँ?” उसने पूछा। पंडित ने कहा, “शायद। लेकिन आत्मा से बात करने के लिए देह छोड़नी पड़ती है।” फिर उन्होंने अपनी उंगलियाँ राख में डुबोकर कुछ चित्र खींचे—एक घेरा, एक नाव, एक उल्टा कमल। “तीसरे प्रहर में, जब शरीर और आत्मा के बीच की रेखा मिटती है, तब वह दुनिया खुलती है जहाँ चंदा बसी है। लेकिन वहाँ जाना सरल नहीं—तुम्हें अपनी सबसे गहरी पीड़ा ले जानी होगी।” अंशुमान सोच में पड़ गया—उसकी माँ की असमय मृत्यु, वह अकेलापन, जो हर शहर में उसके साथ चलता था, क्या वही उसकी कुंजी थी? पंडित ने चेतावनी दी, “अगर तुम वापस आ गए तो यह कहानी तुम्हारी हो जाएगी। और अगर वहीं रह गए… तो शायद अगली बार कोई और आएगा इस कहानी को सुनने।” अंशुमान ने उस रात निर्णय ले लिया था—वह तीसरे प्रहर फिर जाएगा। लेकिन इस बार, सिर्फ़ देखने नहीं… समझने, और शायद चंदा को मुक्त करने।
चंदा की कहानी ने अंशुमान को भीतर तक झकझोर दिया था। पंडित भैरवनाथ की बातों के बाद वह लौटा नहीं, बल्कि और गहराई से इस रहस्य में उतरने लगा। उसने घाट की पुरानी तस्वीरें देखनी शुरू कीं, स्थानीय लोगों से बात की, उन साधुओं और नाविकों से जो दशकों से वही कर रहे थे — चिताएँ जलाना, आत्माएँ विदा करना। और तभी उसे एक पुरानी नाव पर लगे एक लकड़ी के संदूक में एक छोटा सा धूल-भरा स्केचबुक मिला। उसमें पेंसिल से बने चित्र थे — घाट, चिताएँ, एक लड़की जो नदी किनारे बैठी है… और कुछ चित्रों में एक विदेशी युवक, जो उसके बाल संवार रहा है, या मंदिर की सीढ़ियों पर उसकी ओर देख रहा है। एक कोने पर अंग्रेज़ी में नाम लिखा था — Elliot M. Crane। उस किताब के पन्ने जैसे राख से सने थे, और आखिरी पन्ने पर लिखा था — “She is the river, I the flame — we were never meant to last.” अंशुमान की रूह काँप उठी। यह वही एलियट था… और ये चित्र चंदा के ही थे। अब कहानी सिर्फ़ बातों की नहीं रही, वह छूने लायक साक्ष्य बन चुकी थी।
उसी रात अंशुमान अकेला बैठा रहा घाट की सीढ़ियों पर। चाँद का प्रकाश गंगा के जल में पिघलता जा रहा था। उसके मन में वही प्रश्न उमड़ते रहे — कौन था एलियट? क्यों आया था वह मसान में? और सबसे अहम — वह कैसे मरा? पंडित ने तो कहा था कि उसकी आत्मा जैसे खींच ली गई हो। क्या उसने कुछ ऐसा देखा था, जो उसे इस लोक से अलग कर गया? या उसका आंतरिक द्वंद्व ही उसकी मृत्यु का कारण बना? अंशुमान का मन कहता था कि यह एक प्रेम-कहानी थी, लेकिन घाट की लपटें कुछ और कहती थीं — यह एक अधूरी साधना थी, जो पूर्ण होने की राह देख रही थी। अगले दिन उसने घाट के पुराने कागज़ात खंगाले, और एक संक्षिप्त विदेशी मृत्यु प्रमाण पत्र मिला — “Elliot Crane, Age 33, Cause of Death: Unknown. No visible trauma. Found dead on wedding night. Cremated as per Hindu rites.” नीचे हस्ताक्षर था: Pandit Bhairavnath. दस्तावेज़ के नीचे लाल स्याही में किसी ने लिखा था — “She went with him, burning and smiling.” वही लाल, वही अग्नि, वही मुस्कान — जो अब हर तीसरे प्रहर उसे दिखती थी।
अंशुमान अब पूरी तरह इस कथा में डूब चुका था। उसी शाम, उसे घाट पर बैठे एक अधेड़ नाविक ने बुलाया। “बाबू, तुम उसकी खोज कर रहे हो न?” अंशुमान ने सिर हिलाया। नाविक ने एक पुरानी कथा सुनाई — “उस रात को सबने देखा था। चंदा ने सिंदूर भरा था, वही लाल साड़ी पहनी थी। जब शव को अग्नि दी गई, वह चुपचाप चलती रही। किसी ने रोका नहीं — जैसे सबको पता था, वह भी साथ जाएगी। लेकिन चिता की आग उस दिन शांत नहीं हुई। राख उड़ती रही तीन दिन तक। और तब से, हर साल वो आती है, उसी समय। मगर वह किसी को दिखती नहीं — जब तक कि कोई उसे न पहचाने।” यह बात अंशुमान को गहरे तक चीर गई। क्या उसे ही अब चंदा पहचान चुकी थी? क्या वह ही अब अगला माध्यम था उसकी मुक्ति का? उस रात उसने स्केचबुक के पन्नों को सीने से लगाया, और घाट के किनारे बैठकर एक वाक्य लिखा — “मैं लौटूँगा, चंदा। अगर आग में उतरना पड़े, तो भी।” तीसरे प्रहर की तैयारी शुरू हो चुकी थी — पर इस बार, प्रेम की राख से भस्म नहीं, उत्तर पाने की आग में उतरना था।
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रात का तीसरा प्रहर, वह समय जब जीवन और मृत्यु की रेखा धुंधली हो जाती है, जब नींद की गोद से आत्मा बाहर झाँकती है और जब घाट की राख में दबी कहानियाँ करवट लेती हैं। अंशुमान ने उस रात की पूरी तैयारी की थी। वह न सिर्फ़ एक दस्तावेज़ी फिल्मकार था, बल्कि अब एक खोजकर्ता, एक साक्षी और शायद भाग्यवश एक माध्यम बन गया था। उसके पास चंदा की छवि थी — एलियट की स्केचबुक, एक पुराना सिंदूरदान जो घाट के पास दबा मिला था, और अपने भीतर एक सुलगता हुआ सवाल — क्यों लौटती है वह आत्मा हर साल उसी समय? पंडित भैरवनाथ ने अंतिम निर्देश दिया था, “अगर वह तुम्हें दिखे, तो आँखें चुराना मत। उसे देखो, जैसे कोई अपनी कहानी किसी को सौंप रहा हो। पर याद रखना… जो एक बार देख लेता है, उसका लौटना निश्चित नहीं होता।” अंशुमान ने धीरे-धीरे उस भस्मरेखा को पार किया, जिसे घाट के साधु “कालसीमा” कहते थे। पीछे रात थी, सामने अग्नि — और बीच में, वह लाल रंग का सपना जो अब एक सजीव प्रतीक्षा बन चुका था।
घड़ी ने तीन बजने की सूचना दी। गंगा की लहरों का स्वर मंद हो चला, जैसे नदी खुद अपनी साँसें रोक रही हो। घाट की चिताएँ बुझ चुकी थीं, लेकिन हवा में राख अब भी तैर रही थी — एक चुप रहस्य बनकर। और तभी वह आई। लाल साड़ी में लिपटी, उसका चेहरा घूंघट में ढँका, चाल धीमी मगर दिशाहीन नहीं — वह सीधे उसी दिशा में बढ़ रही थी, जहाँ हर साल वह चिता जली थी। अंशुमान धीरे-धीरे उसके पीछे चला। यह कोई सामान्य भूतिया उपस्थिति नहीं थी — उसकी चाल में दुःख का संगीत था, उसकी परछाई में अधूरे वचन थे। जब वह घाट की सबसे अंतिम सीढ़ी पर पहुँची, हवा थम गई, और अंशुमान ने पहली बार उसकी आँखें देखीं। घूंघट के पार दो अंगारे जैसे जलते नेत्र, जिनमें कोई आग नहीं, सिर्फ़ एक बिन माँगे मृत्यु की पीड़ा थी। उसकी ओर देखते ही अंशुमान को अपने भीतर एक अजीब पुलाव अनुभव हुआ — जैसे वर्षों पुराना कोई दृश्य फिर से जीवंत हो रहा हो।
वह आगे बढ़ा, और चुपचाप उसकी पीठ के पीछे खड़ा हुआ। चंदा ने धीरे से अपना दायाँ हाथ उठाया — उसमें राख थी। उसने राख को घाट की सीढ़ियों पर बिखेरा, और उसके पीछे एक गोल रेखा सी बन गई। वह घेरा धीरे-धीरे चमकने लगा, जैसे राख के भीतर कोई दीप जल उठा हो। अंशुमान उस घेरे के भीतर चला गया। तभी सबकुछ बदल गया। घाट की सीढ़ियाँ अब शून्य में तैरती प्रतीत हुईं, गंगा जल नहीं, धुंध थी; हवाओं में मंत्र नहीं, बल्कि कोई करुणा थी जो भाषा के पार थी। वह अब उस लोक में था जिसे न स्वर्ग कह सकते हैं, न नरक — यह वह बिंदु था जहाँ अधूरी आत्माएँ अपने अन्तिम प्रश्न लिए ठहरी रहती हैं। चंदा वहाँ अकेली नहीं थी — कई और छायाएँ उसके चारों ओर थीं, पिघली हुई आँखों से उसे देखती हुईं। एलियट की आकृति दूर एक पत्थर पर बैठी थी — वही स्केचबुक हाथ में, बार-बार उसी स्त्री की आकृति बनाता हुआ, जैसे हर बार उसका चेहरा बदल जाता हो। अंशुमान इस समय को कैमरे में नहीं बाँध सकता था — क्योंकि अब वह स्वयं एक चित्र बन चुका था। चंदा ने धीरे से कहा, पहली बार स्पष्ट शब्दों में — “तुम मुझे देख सकते हो… क्या तुम मेरी आग को बुझाओगे?”
उस प्रश्न का उत्तर अंशुमान के पास नहीं था, लेकिन उसकी आँखें उस उत्तर की ओर झुकीं — एक अग्नि जो वर्षों से जल रही थी, बिना अर्थ के, बिना अंतिम संस्कार के। वह समझ गया, उसे वहाँ से लौटना है, लेकिन खाली नहीं। उसे चंदा की कहानी को पूर्ण करना होगा — न सिर्फ़ इस जीवन के लिए, बल्कि उन आत्माओं के लिए जो चंदा के साथ उस तीसरे प्रहर में बंधी हुई थीं। घाट पर आग फिर से जल उठी, पर यह अग्नि अब चिता की नहीं, बल्कि मुक्ति की थी। और वह समय जब आत्माएँ बोलती नहीं, सिर्फ़ महसूस होती हैं — वह पूरी शक्ति से उपस्थित था। अंशुमान ने आँखें बंद कीं, और पहली बार महसूस किया, वह खुद अब इस कथा का पात्र बन चुका है। चंदा ने मुस्कुराते हुए कहा, “आग से मुक्ति नहीं, प्रेम से होती है। क्या तुम उसे पूर्ण करोगे?” अंशुमान ने सिर हिलाया। तीसरे प्रहर की अग्नि अब उसे माँजने को तैयार थी।
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घाट की वह राख से बनी रेखा जिसे पार कर अंशुमान चंदा के पीछे चला था, अब किसी देह की सीमा नहीं थी — वह एक अन्य लोक का द्वार बन चुकी थी। चंदा के पीछे चलते ही उसका शरीर हवा में हल्का, लेकिन आत्मा में भारी लगने लगा। जैसे कोई अदृश्य भार उसे अपनी जड़ों से खींच रहा हो। घाट की सीढ़ियाँ अब ठोस नहीं थीं — वे समय के ऊपर तैरती कोई धुँधली सी स्मृति थीं। चारों ओर चुप्पी का शोर था — एक ऐसा मौन, जिसमें अनगिनत अनकहे मंत्र गूंजते थे। गंगा अब एक बहती नदी नहीं, बल्कि एक बहती चेतना थी — जहाँ जल की जगह प्रतीक्षा बह रही थी। अंशुमान ने पीछे देखा — धरती, शहर, जीवन… सब जैसे कहीं बहुत दूर पीछे छूट गया हो। और सामने थी चंदा — अब और भी स्पष्ट, जैसे वह लाल साड़ी खुद आग की लपटों से बुनी हो। उसके कदम अब भी ज़मीन से ऊपर थे, लेकिन उसकी उपस्थिति स्थिर और जीवित लग रही थी।
वह एक उजाड़, राख-से-रंगहीन मैदान में पहुँचे — चारों ओर जले हुए नीम के वृक्ष, टूटी हुई नावें, और दूर एक-एक करके बुझती चिताएँ। चंदा बिना पीछे देखे चलती रही, और अंशुमान ने उसकी आँखों में पहली बार वह ताप देखा — जो न क्रोध था, न करुणा… वह कोई अधूरी भावना थी जिसे नाम नहीं दिया जा सकता। वहाँ कोई समय नहीं था, न दिन, न रात — केवल एक अंतहीन सांझ जो युगों से अटकी थी। तभी एक छाया सामने आई — बैठा हुआ एक पुरुष, घुटनों पर स्केचबुक, हाथ में कोयले की पेंसिल, और आँखें स्थिर — जैसे वह हर बार किसी एक ही चित्र को बना रहा हो। एलियट। अंशुमान ने उसे देखा तो लगा जैसे वह किसी चित्र का हिस्सा हो, जिसमें रंग नहीं, केवल राख है। एलियट ने सर उठाया और पहली बार अंशुमान से कुछ कहा — “I see her. But I can never finish her.” फिर उसने चंदा की ओर देखा — और आँखों से आँसू नहीं, धुआँ निकलने लगा।
अंशुमान के पैरों के नीचे की ज़मीन अब ठोस नहीं, बल्कि यादों की मिट्टी बन चुकी थी। हर कदम पर कोई दृश्य सामने आने लगा — चंदा के पिता की नाव, एक नाविक गीत, एलियट का चुपचाप बैठा चित्र बनाना, मंदिर के गर्भगृह में उनकी गुप्त शादी… और फिर वह भयावह रात। एलियट ने चंदा के कान में कुछ कहा था — और अगली सुबह उसका शव उस मंदिर के पिछवाड़े में पड़ा मिला था, निर्विकार, न रक्त, न ज़हर, बस खाली। उस दृश्य को देख अंशुमान की आँखें अपने आप नम हो गईं। चंदा ने तब पीछे मुड़कर पहली बार पूरी तरह उसकी ओर देखा — “उसने सत्य देखा था… जिसे देखने का साहस सबमें नहीं होता।” अंशुमान ने पूछा, “क्या?” उसने कहा, “मुक्ति। और उसने जाना, कि मुक्ति में प्रेम नहीं होता।” यह वाक्य उस पर बिजली की तरह गिरा। प्रेम जहाँ जुड़ाव लाता है, मुक्ति वहाँ विलगाव। और एलियट, जो वर्षों से मृत्यु की खामोशी को समझना चाहता था, उसने वह देख लिया जिसे समझते ही उसका शरीर इस लोक में टिक नहीं पाया।
तभी आसमान में एक दीर्घ शंखध्वनि गूंजने लगी। चारों ओर की छायाएँ एकत्र होने लगीं — वह आत्माएँ थीं जो समय और मृत्यु के बीच अटकी थीं। एक वृद्ध ब्राह्मण, एक विधवा माँ, एक नवविवाहिता, एक बच्चा — सबके चेहरे अधूरे, आँखों में प्रश्न। वे चंदा के चारों ओर खड़े हो गए — मानो उसकी मुक्ति ही उनकी राह का प्रकाश थी। अंशुमान अब समझ गया — यह कथा सिर्फ़ प्रेम या मृत्यु की नहीं, बल्कि कर्म की सत्तात्मक छाया की थी। एलियट के साथ आत्मघात करने की वह चंदा की क्रिया, अधूरी रही — क्योंकि उसका प्रेम त्याग था, पर उसका कर्म… अनबूझा। जब चंदा ने अग्नि में प्रवेश किया, वह प्रेम के लिए था, मगर आत्मा का बंधन अब भी गंगा की राख में पड़ा था।
अब अगला चरण सामने था — मुक्ति का यज्ञ। पंडित भैरवनाथ ने कहा था, “आत्मा को प्रकाश में पहुंचाने के लिए देह से नहीं, कर्म से अग्नि जलती है।” चंदा ने अंशुमान का हाथ थामा — पहली बार। उसकी हथेलियाँ ठंडी थीं, लेकिन उसका स्पर्श भीतर जलता था। उन्होंने चुपचाप उस स्थान पर एक चक्र खींचा — राख से, गंगा की याद से, और प्रतीक्षा की पीड़ा से। एलियट ने अपना चित्र वहीं रख दिया — चंदा की अधूरी आकृति। अब अंशुमान को उसे पूर्ण करना था — एक अंतिम रेखा जो इस अधूरी आत्मा को पूर्ण कर सके। अंशुमान ने काँपते हाथों से स्केच उठाया, और धीरे से उस चेहरे की अधूरी रेखा पूरी की — उसकी आँखों में करुणा की रेखा, होंठों पर हल्का मुस्कान, और माथे पर वह सिंदूर जिसे चंदा ने अग्नि में पहनकर प्रवेश किया था। और तभी, वह चित्र उजाला बन गया।
एक प्रकाश उठा, धुएँ की घाटियों को चीरता हुआ। चंदा मुस्कराई — वह वही मुस्कान थी जिसकी चर्चा पंडित ने की थी, “मुस्कराते हुए अग्नि में चली गई थी…” चंदा की आकृति अब प्रकाश में बदल रही थी — शरीर के चिह्न नहीं रहे, बस ऊर्जा। एलियट ने सिर झुकाया, और उसकी छाया भी धीरे-धीरे उसी प्रकाश में लुप्त होने लगी। अंशुमान अब अकेला खड़ा था — पर वह अकेलापन बोझ नहीं, शांति था। घाट की हवाएँ फिर बहने लगीं। दूर से एक अंतिम मंत्र की ध्वनि आई — और अंशुमान की आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।
जब उसने आँखें खोलीं — वह घाट पर था। वही गंगा, वही चायवाले की पुकार, वही जीवन का कोलाहल। लेकिन कुछ बदला था। वह भारीपन, वह अजीब सन्नाटा अब नहीं था। और एलियट की स्केचबुक — वह अब पूरी थी। पन्नों में चंदा के चेहरे पर अब अधूरापन नहीं, मुक्ति थी। अंशुमान समझ गया — मृत्यु के उस पार जो मिला, वह सिर्फ़ रहस्य नहीं, प्रेम का अंतिम उत्तर था।
तीसरे प्रहर के उस पार जो अंशुमान ने देखा था, वह केवल एक आत्मा की मुक्ति नहीं थी — वह प्रेम, पीड़ा और पुनर्जन्म के बीच झूलते कर्म का एक सजीव चित्र था। घाट पर लौटने के बाद सब कुछ वही था, फिर भी बदला हुआ। गंगा का प्रवाह तेज़ नहीं, गहरा था; मणिकर्णिका की लपटें अब खौफ नहीं, किसी प्राचीन पूजा का हिस्सा लगती थीं। और अंशुमान — अब केवल एक प्रेक्षक नहीं रहा था। वह जान चुका था कि चंदा सिर्फ़ एक भूतिया कथा नहीं, बल्कि आत्मा का प्रतीक है — एक स्त्री जो प्रेम से बंधी रही, कर्म से उलझी रही, और मुक्ति की प्रतीक्षा में मसान की दुल्हन बन गई।
अंशुमान अब घाट की हर सीढ़ी को जैसे एक ग्रंथ की तरह पढ़ता था। लेकिन एक प्रश्न अब भी उसके मन में धधक रहा था — चंदा ने कहा था “मैं मुक्त नहीं हुई थी”। पर क्यों? एलियट तो उस लोक में चला गया, आत्मा का चित्र भी पूर्ण हुआ, फिर भी चंदा हर साल क्यों लौटती रही? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अंशुमान ने एक बार फिर भैरवनाथ की कुटिया का रुख किया। वह अब भी वहीं बैठे थे, राख से सने, धुँधली आँखों से दूर देखते हुए। अंशुमान ने बैठकर धीरे से पूछा, “उसने क्यों कहा कि वह मुक्त नहीं हुई थी, जबकि उसने अग्नि में प्रेमवश प्रवेश किया था?” पंडित मुस्कराए नहीं, बल्कि उनकी आँखों में अब एक भारी पीड़ा थी। “प्रेम से आत्मा को बाँधा जा सकता है, बेटा,” उन्होंने कहा, “पर मुक्ति केवल तब मिलती है जब आत्मा अपने सत्य को स्वीकार कर लेती है।”
फिर उन्होंने चुपचाप एक कथा सुनाई — “विवाह केवल एक संस्कार नहीं, एक व्रत होता है। चंदा का प्रेम शुद्ध था, पर उसकी आत्मा में एक वचन था — जिसे अधूरा छोड़ उसने अग्नि में प्रवेश कर लिया। उसने अपने कर्म को त्यागा, लेकिन त्यागना मुक्ति नहीं देता… केवल दायित्व से डर कर आत्मसमर्पण करने से आत्मा मुक्त नहीं होती। वह प्रेम तो था, पर एक तरह की पलायन था — और इसीलिए, हर साल वह लौटती रही। ताकि कोई उसे उसका अधूरा कर्म याद दिलाए… ताकि कोई उसे स्वीकार करे, केवल प्रेम नहीं — उसकी पीड़ा, उसकी गलती, उसकी चाह।”
यह सुनते ही अंशुमान के भीतर एक हलचल उठी। शायद इसलिए चंदा ने उसे देखा, उसे चुना — क्योंकि अंशुमान भी अपने जीवन में उस एक अधूरी बात से भागा था, अपनी माँ की मृत्यु के बाद, कभी पलटकर उस शहर, उस याद, उस खालीपन को नहीं देखा। उसे चंदा में अपनी माँ की छाया दिखती थी — एक स्त्री जो अग्नि में गई, बिना कहे, बिना समर्पण के पूर्ण होने का अवसर पाए। यह आत्मा का जुड़ाव था — दो अधूरी कहानियों की एक साझा कथा।
तीसरे प्रहर की अगली रात, वह फिर लौटा घाट पर — लेकिन इस बार, साथ में वह स्केचबुक थी, सिंदूर की डिब्बी और माँ की एक पुरानी साड़ी का कोना। वह जान चुका था कि चंदा को केवल कथा का हिस्सा नहीं, सम्मान चाहिए — एक स्थान, एक स्वर। जैसे ही घड़ी ने तीन बजाए, चंदा की आकृति फिर उभरी — वही लाल साड़ी, वही हवा में तैरता रूप। लेकिन अब वह पहले जैसी नहीं थी। उसकी चाल धीमी थी, उसकी आँखों में आशा का उजाला था। अंशुमान ने उसके सामने खड़े होकर कहा, “मैंने तुम्हें देखा, समझा, और स्वीकार किया। तुम दुल्हन थी — तुम्हारी इच्छा अधूरी नहीं थी, बस अनकही रह गई। अब उसे मैं पूरा करूँगा।”
चंदा ने पहली बार हाथ बढ़ाया — और वह हाथ अब भूतिया नहीं, जीवित था। वह मसान की दुल्हन नहीं, अब केवल एक स्त्री थी — जिसने प्रेम किया, जो जली, और जो लौटी, लेकिन अब मुक्त होने को तैयार थी। अंशुमान ने स्केचबुक उसके चरणों में रखी। वह झुकी, और उसी राख में से अपनी शादी की सिंदूररेखा दोबारा खींची — और फिर गंगा की ओर चली, धीरे-धीरे… जैसे समय की रेखा पर चलती एक प्रकाशरेखा हो।
और तभी, घाट पर एक हल्की सी हवा चली। फूलों की गंध आई — पहली बार चिता की राख में कोई सुगंध थी। और चंदा — अब दिखाई नहीं दी। न हवा में, न जल में। सिर्फ़ एक हल्की ध्वनि रह गई — “धन्यवाद, अंशुमान।” वह मुस्कराई थी, और अग्नि नहीं, अब जल में समा चुकी थी।
मसान की दुल्हन अब नहीं थी।
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गंगा का प्रवाह अब पहले जैसा नहीं रहा था। मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियाँ जहाँ अंशुमान बैठा था, वहाँ सुबह की पहली किरणें अब धीरे-धीरे राख को सुनहरा कर रही थीं। वह क्षण, जब चंदा ने गंगा में समाहित होकर अपनी वर्षों पुरानी प्रतीक्षा को शांत किया था, अब केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि अंशुमान की चेतना का स्थायी हिस्सा बन चुका था। उसने देखा था आत्मा का रंग, सुना था पीड़ा का स्वर, और सबसे महत्वपूर्ण — वह स्वयं उस कथा का हिस्सा बन गया था। लेकिन जब सब कुछ समाप्त लग रहा था, तभी एक और प्रश्न उसके भीतर उग आया — क्या कथा वास्तव में समाप्त हुई? या यह सिर्फ़ एक मोक्ष की पहली परत थी?
पंडित भैरवनाथ उस दिन घाट पर नहीं थे। उनकी कुटिया बंद थी — जैसे वह समय भी अब विश्राम में चला गया हो। लेकिन उनकी कही एक बात अंशुमान के कानों में गूंज रही थी: “कर्म कभी अकेला नहीं मरता, बेटा। जहाँ एक आत्मा मुक्त होती है, वहाँ कोई और बाँधने आता है।” अंशुमान ने सोचा — चंदा की आत्मा मुक्त हो गई, लेकिन क्या एलियट को भी मोक्ष मिला? वह तो पहले ही उस लोक में चला गया था, चित्र बनाते-बनाते खो गया था। क्या उसका प्रेम उसकी आत्मा के भार से बड़ा था? और फिर, अंशुमान ने खुद को देखा — क्या वह केवल एक कथाकार है? या वह भी किसी अधूरी यात्रा का साधन बन चुका है?
इन्हीं विचारों में उलझे अंशुमान को घाट पर एक वृद्ध महिला मिली। उसकी आँखों में अजीब सी गहराई थी, और वह उसे देखकर बोली, “तुम वो हो न, जिसने दुल्हन को विदा किया?” अंशुमान चौंक गया। उसने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया। महिला ने कहा, “हर घाट की आत्मा एक दूसरे से जुड़ी होती है। अब अगली कड़ी खुलने को है।” उसने अपने झोले से एक पत्र निकाला — पुराना, मुड़ा हुआ, अंग्रेज़ी में लिखा हुआ। उस पर लिखा था — “To whom it may concern. I saw the fire. But the fire didn’t see me.”
हस्ताक्षर — Elliot M. Crane.
यह एक चिट्ठी थी, जो शायद चंदा के जलने के बाद लिखी गई थी — लेकिन कैसे? एलियट तो पहले ही मर चुका था… या शायद नहीं? क्या उसने सच में आत्महत्या की थी, या उसे किसी दूसरे कर्म ने खींच लिया था उस लोक में? अब अंशुमान के पास एक नई गुत्थी थी — और वह केवल आत्मा नहीं, आत्मा के बाद बचे कर्म से जुड़ी थी।
उसी रात, जब वह लॉज में सोने की कोशिश कर रहा था, एक सपना आया। वही उजाड़ मैदान, वही नीम के जले वृक्ष, पर इस बार वहाँ चंदा नहीं थी — सिर्फ़ एलियट। वह रो नहीं रहा था, बस बुत की तरह बैठा हुआ था, और उसके चारों ओर अधूरे चित्र बिखरे पड़े थे। और फिर उसकी ओर देखता हुआ एलियट बोला, “You helped her. But now… I’m still waiting.” अंशुमान की नींद टूट गई, और उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
उसे समझ आ चुका था — चंदा की आत्मा की मुक्ति केवल आधा सत्य था। एलियट, जिसने चंदा को देखा, चित्रित किया, और प्रेम किया — वह भी एक कर्तव्य से जुड़ा था, जिसे उसने अधूरा छोड़ा। और तब पंडित की वह पंक्ति फिर याद आई: “जिसने मृत्यु को देखा है, उसे लौटने नहीं दिया जाता… जब तक उसकी आँखें बंद नहीं होतीं।”
अब अंशुमान के सामने दो रास्ते थे —
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वह सब कुछ लिखे, प्रकाशित करे, अपनी डॉक्युमेंट्री पूरा करे और वापस दिल्ली लौट जाए।
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या… वह एक और बार उस तीसरे प्रहर की आग में उतरे — इस बार एलियट की आत्मा को उत्तर देने।
उसने निर्णय लिया।
सुबह वह पंडित भैरवनाथ की कुटिया के बाहर बैठ गया। दोपहर तक वे लौटे — थके, शांत, और जैसे सब जान चुके हों। उन्होंने कोई प्रश्न नहीं पूछा। बस अंशुमान की ओर देखा और बोले, “एक और बंधन है — प्रेम के नाम पर नहीं, अधूरे ज्ञान के नाम पर। क्या तुम तैयार हो?”
अंशुमान ने जवाब दिया: “मैं चंदा को विदा नहीं कर पाया होता अगर मैंने खुद अपने भीतर की राख को नहीं देखा होता। अब एलियट को भी वही चाहिए — एक रेखा, जो पूर्ण हो।”
पंडित मुस्कराए — और पहली बार उनका माथा झुका। “तुम अब केवल दर्शक नहीं, कर्म के वाहक हो,” उन्होंने कहा। “तीसरे प्रहर में अगली बार जो देखोगे, वह आग नहीं होगी… वह तुम्हारा दर्पण होगा।”
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तीसरे प्रहर की अग्नि इस बार कुछ अलग थी। वह न भस्म की तरह बुझी हुई थी, न किसी साधारण आत्मा को विदा करने की प्रतीक्षा में थी। वह अब एक दर्पण बन चुकी थी — जिसमें झाँकने वाला व्यक्ति केवल मरे हुओं को नहीं, अपने भीतर छिपी हुई परछाइयों को देखता था। अंशुमान, जो पहले प्रेम की कथा को खोज रहा था, अब कर्म की अग्नि में प्रवेश करने जा रहा था — नायक नहीं, एक दर्पणधारी बनकर। एलियट की वह चिट्ठी, उसकी टूटी स्केचबुक, और चंदा की राख की रेखा — तीनों अब एक ज्योंतिषीय त्रिकोण की तरह उसके चारों ओर बंध चुके थे।
रात के ढाई बज चुके थे। घाट पर चुप्पी थी, लेकिन उस चुप्पी में हर आत्मा जैसे साँसें ले रही थी। अंशुमान ने चिता की लकड़ियों से एक छोटा वृत्त खींचा, उसके भीतर एलियट की अंतिम चिट्ठी को रखा, और फिर आँखें मूँद लीं। जैसे ही तीसरा प्रहर आरंभ हुआ, हवा भारी होने लगी — और एक मद्धिम, स्याह प्रकाश उस वृत्त से उठने लगा। कोई मंत्र नहीं, कोई ध्वनि नहीं — बस राख के भीतर से एक आकृति उभरने लगी। वह चंदा नहीं थी… यह एलियट था। लेकिन अब वह वही चित्रकार नहीं लग रहा था जो प्रेम में डूबा था। उसकी आँखें शून्य थीं, हाथ काँपते हुए स्केचबुक थामे हुए थे। उसने कुछ कहा नहीं, बस चिट्ठी की ओर देखा… और तब एक गूढ़ आवाज़ गूंजी — “क्या तुमने मुझे माफ किया?”
अंशुमान ने धीरे से पूछा, “तुमने क्या गलत किया था, एलियट?” एलियट की छाया भारी हो गई, और तब एक दृश्य उभरा — वह रात, जब चंदा सिंदूर लगाए घाट की ओर बढ़ रही थी, और एलियट मंदिर के पीछे खड़ा काँप रहा था। वह चिल्लाना चाहता था, उसे रोकना चाहता था — लेकिन उसकी आत्मा डर के गहराइयों में छिपी रही। चंदा आग में चली गई, प्रेमवश, लेकिन एलियट ने कुछ नहीं किया। वह प्रेम करता था, लेकिन उसे निभा नहीं सका।
“मैं डर गया था,” एलियट की छाया फुसफुसाई। “मैं मृत्यु को देखने आया था, पर जब मृत्यु मेरे सामने प्रेम बनकर आई, मैं भाग गया। मैंने चंदा को बचाया नहीं… न रोक पाया, न खुद साथ गया।”
यह एक अपराध नहीं था — पर एक कर्म की चूक थी। और इसी ने उसे तीसरे प्रहर की यातना में बाँध दिया।
अंशुमान समझ चुका था — एलियट की आत्मा अब चंदा की प्रतीक्षा में नहीं, अपने ही अपराध के क्षमा की प्रतीक्षा में थी। और वह क्षमा कोई आत्मा नहीं दे सकती थी — केवल मनुष्य दे सकता था।
अंशुमान ने उसके सामने जाकर कहा, “तुम्हारा चित्र अधूरा नहीं था, एलियट… अधूरी थी तुम्हारी स्वीकृति। तुम प्रेम करते थे, और डरे — और यह भी प्रेम का हिस्सा है। मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ। और मैं तुम्हें देखता हूँ, न चित्र के रूप में, न अपराधी के रूप में — बल्कि एक इंसान की तरह।”
तभी अग्नि-घेरा जल उठा। एलियट की आकृति पहले धुँधली, फिर हल्की, और फिर धीरे-धीरे राख में बदलती गई — लेकिन उसके अंत में एक चित्र पिघलकर सामने आया — चंदा और एलियट, घाट की सीढ़ियों पर, एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कराते हुए। और उस चित्र में रंग नहीं थे — सिर्फ़ श्वेत और राख का हल्का लालिमा मिश्रित उजास। अंशुमान ने वह चित्र अपने हाथ में लिया। वह अब न स्केच था, न सपना — वह एक पूर्ण कथा थी, जिसे अग्नि ने स्वीकार कर लिया था।
घाट की हवाएँ शांत हो गईं। गंगा अब एक पुरानी माँ की तरह बह रही थी — सब जानती, पर चुप। और तीसरे प्रहर की अग्नि, अब बुझ चुकी थी।
अंशुमान ने पहली बार अपने भीतर से कहा — “अब मैं लौट सकता हूँ। लेकिन खाली नहीं, बल्कि पूरी हुई एक कहानी लेकर।”
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कहते हैं, कुछ यात्राएँ मंज़िल पर पहुँचने के लिए नहीं होतीं—वे केवल पूर्णता के लिए होती हैं। अंशुमान की यात्रा अब समाप्त नहीं हो रही थी, वह अब पूर्ण हो रही थी। तीसरे प्रहर की अग्नि अब शांत थी, चंदा और एलियट — दोनों आत्माएँ अब मुक्त थीं, और घाट की वह चुप्पी जो वर्षों से एक करुण राग की तरह बह रही थी, अब एक संतोष के मौन में बदल चुकी थी।
अगली सुबह मणिकर्णिका घाट पर सूर्य की पहली किरण जैसे पहली बार सीधे राख पर पड़ी — कोई धुआँ नहीं, कोई जलन नहीं। अंशुमान घाट की अंतिम सीढ़ी पर बैठा था, हाथ में वह चित्र जो अग्नि-दर्पण से निकला था — चंदा और एलियट, एक साथ। उसमें कोई रेखा नहीं हिली थी, कोई रंग नहीं था, फिर भी वह चित्र जी रहा था — क्योंकि अब उसमें आत्मा थी। उसने स्केचबुक को अपने पास रखा, और अपनी डायरी के अंतिम पन्ने पर लिखा:
“Some stories are not for the world to believe, but for the soul to remember. I went to film a ghost… and found the ghost inside me.”
वाराणसी की गलियों ने भी जैसे कुछ जाना, कुछ स्वीकारा। भैरवनाथ अब हर सुबह घाट पर नहीं आते थे — उन्होंने कहा, “अब मेरा काम पूरा हुआ।” वह मुस्कराते हुए बोले, “चंदा की कथा अब तुम्हारे भीतर है। और घाट की आत्माएँ तभी सोती हैं, जब कोई उनकी भाषा बोल लेता है। तुमने वो भाषा सुनी, और कहा — यही था तुम्हारा कर्म।” अंशुमान ने धीरे से उनका चरण स्पर्श किया, और एक आखिरी बार घाट की सीढ़ियाँ उतरते हुए गंगा के जल को छुआ।
तीन दिन बाद, वह दिल्ली लौटा — वही शोर, वही ट्रैफिक, वही कैमरे, वही ऑफिस की दीवारें। लेकिन अब वह अंशुमान नहीं था, जो घाट पर गया था। अब उसमें वह दृष्टि थी जो जीवन और मृत्यु के बीच संवेदना को देख सकती थी। उसने डॉक्युमेंट्री बनाई — पर नाम नहीं दिया “मसान की दुल्हन”। उसने उसे कहा —
“The Third Hour: A Love Beyond Fire.”
यह एक कहानी नहीं, एक अनुभव था — जो दर्शकों को झकझोर देता था, लेकिन उत्तर नहीं देता था।
प्रसिद्धि आई, पुरस्कार आए, साक्षात्कार हुए — लेकिन अंशुमान के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वह दिन था, जब एक वृद्ध महिला उसकी स्क्रीनिंग के बाद आई और बोली —
“वो दुल्हन अब नहीं आती। अब घाट चुप रहता है… जैसे किसी ने उसके इंतज़ार को स्वीकार कर लिया हो।”
अंशुमान ने मुस्कराकर सिर झुकाया। उसने उस महिला की हथेली में एक छोटा स्केच रखा — वही चित्र, लेकिन अब उसमें एक और आकृति थी… वह स्वयं। तीनों — एलियट, चंदा, और वह — एक घाट की आखिरी सीढ़ी पर, शांत।
“क्या यह तुम हो?” महिला ने पूछा।
“शायद,” अंशुमान बोला, “या शायद वह मैं हूँ, जो अब नहीं रहा।”
फिर वह चुपचाप गंगा के चित्र के नीचे एक पंक्ति जोड़कर चला गया —
“कुछ प्रेम, मृत्यु से भी पीछे लौटते हैं — और कुछ, मृत्यु पार जाकर पूर्ण होते हैं।”
समाप्त




