सौरभ ठाकुर
१
छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे अनछुए रास्तों पर अनिरुद्ध घोष की जीप धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। मौसम अजीब रूप से ठहरा हुआ था — न हवा, न चिड़ियों की चहचहाहट, बस पेड़ों की लंबी छायाएँ और कभी-कभी टायरों के नीचे कुचले पत्तों की आवाज़। अनिरुद्ध, जो कोलकाता का एक खोजी पत्रकार था, ऐसे ही अनजाने, लगभग भूले-बिसरे गाँवों की लोककथाओं और अंधविश्वासों पर रिपोर्टिंग करता था। इस बार उसे एक गुमनाम ईमेल के ज़रिए पैतालगाँव के बारे में पता चला था — “हर तीसरी रात, यहाँ कोई न कोई गायब हो जाता है… मंदिर बंद है… औरत की चीखें आती हैं…” बस इतना ही लिखा था। लेकिन यही अनजानी बात उसे खींच लाई थी। जीप के ड्राइवर ने गाँव के बाहर रुकने की जिद की, “साहब, मैं इससे आगे नहीं जाऊँगा। आप जिस गाँव की बात कर रहे हैं, वहाँ रात को जानवर भी नहीं जाते।” अनिरुद्ध ने उसे पैसे देकर विदा किया और पैदल ही गाँव की ओर बढ़ चला। शाम उतरने लगी थी। गाँव की पहली झलक में सब कुछ शांत और सामान्य दिखा — मिट्टी की दीवारें, लकड़ी की खपरैल, कुछ बच्चे जो दूर से उसे देख कर चुप हो गए, और बूढ़े जो बिना मुस्कान के घूरते रहे। लेकिन सामान्य के भीतर एक गहराई थी — कुछ ऐसा, जो शब्दों में नहीं दिखता लेकिन साँसों में महसूस होता था।
अनिरुद्ध को गाँव का एक पुराना मकान ठहरने के लिए दिया गया — मिट्टी की दीवारों वाला छोटा घर, जिसके बाहर तुलसी का पौधा और अंदर खाट पर बिछा मोटा गद्दा था। गाँव के सरपंच ने उससे जल्दी-जल्दी बात की, “आप रिपोर्ट बना लीजिए, पर मंदिर की तरफ मत जाइए। जो हुआ था, वह बहुत पहले की बात है, उसे उखाड़ने का कोई मतलब नहीं।” अनिरुद्ध के सवालों पर सभी ने कतराने की कोशिश की। रात होते-होते, वह घर के बाहर बैठा चाय पी रहा था जब पहली बार उसे वह अजीब सी आवाज़ सुनाई दी — जैसे किसी औरत ने दूर जंगलों के बीच से चीख मारी हो, फिर लंबा सन्नाटा और एक फुसफुसाहट, “वापसी दो…”। अनिरुद्ध के रोंगटे खड़े हो गए। वह रिकॉर्डर लेकर बाहर निकला, लेकिन आसपास कोई नहीं था — न हवा, न हलचल, बस वही आवाज़ कानों में गूंजती रही। अगले दिन वह गाँव के मंदिर तक जाना चाहता था, लेकिन लोगों ने कह दिया कि वह रास्ता अब बंद है। “मंदिर बंद है साहब… शाप है वहाँ…” एक बुज़ुर्ग बोला और भीतर चला गया। अनिरुद्ध को यह अंधविश्वास लग रहा था, लेकिन साथ ही यह डर कुछ अलग था — यह डर सिखाया नहीं गया था, यह डर जिया गया था। रात को जब वह दोबारा उस दिशा में कैमरा लेकर गया, तो एक तगड़ी हवा चली, जैसे किसी ने उसे धक्का देकर रोका हो। उस रात की नींद में भी, वही जलती हुई आवाज़ आई — इस बार उसकी आँखें खुली थीं।
तीसरे दिन अनिरुद्ध गाँव के एक छोर पर बने पुराने कुएँ की तरफ गया, जहाँ कभी पानी हुआ करता था, अब सूखा पड़ा था। वहाँ उसे मिला एक छोटा लड़का, राजा, जो चुपचाप उसे देख रहा था। “आप भी जलेंगे?” उसने मासूमियत से पूछा। अनिरुद्ध चौंका — “कौन जलता है?” राजा ने बस एक ओर इशारा किया — मंदिर की दिशा में। उसी वक्त गाँव की एक औरत आई — साड़ी में लिपटी, तेज़ नज़रों वाली — “राजा, घर चल, ज्यादा बातें मत कर!” वह औरत थी रमा देवी — मंदिर की देखरेख करती थी, लेकिन खुद कभी मंदिर नहीं जाती। उसने अनिरुद्ध को चेताया, “जो यहाँ मर गया, वो अब चैन से नहीं है। और जो अब ज़िंदा हैं, वे हर रात मौत का इंतज़ार करते हैं।” उसकी आँखों में ऐसा कुछ था जो तर्क के बाहर था — जैसे वह खुद कुछ जानती है लेकिन कह नहीं सकती। उस रात, जब तीसरा पहर शुरू हुआ, अनिरुद्ध ने रिकॉर्डर चालू किया और छत पर कैमरा लगाया। जैसे ही घड़ी ने तीन बजाए, हवा का रुख बदल गया। दरवाज़े खुद-ब-खुद हिले, खिड़कियों से राख उड़ती दिखी, और एक औरत की चीख कमरे के भीतर गूंज गई — “वापसी दो… अब दे दो…” कैमरे की स्क्रीन पर एक जलती हुई आकृति उभरी — चेहरा अस्पष्ट, आँखें बुझी हुई, लेकिन होंठ लगातार हिलते रहे। अनिरुद्ध की साँसें थम गईं। कैमरा अचानक बंद हो गया और कमरे में जैसे सब कुछ जम गया। अगले दिन जब उसने वीडियो दोबारा देखा, उसमें कुछ भी नहीं था — न आवाज़, न परछाई, न चीख। पर उसकी नींद और विश्वास दोनों टूट चुके थे। कुछ था पैतालगाँव में — कुछ ऐसा जो उसे यहाँ बुला रहा था, जो अब चाह रहा था कि उसका सच सुना जाए। और अनिरुद्ध ने तय कर लिया — चाहे जो हो, वह अब इस चीख का पीछा करेगा।
२
सूरज की पहली किरणें अभी गाँव की मिट्टी से टकराई भी नहीं थीं कि अनिरुद्ध हाथ में कैमरा, नोटबुक और एक पुराना कम्पास लिए मंदिर की दिशा में निकल पड़ा। पिछली रात की चीखें, राख की गंध, और कैमरे पर आई वो अधूरी परछाई अब उसके भीतर सवाल नहीं, एक जुनून बन चुकी थी। वह जानता था कि कुछ लोग झूठ बोल रहे हैं, कुछ डर से चुप थे, और कुछ शायद खुद उस सच्चाई का हिस्सा थे जिसे सालों पहले गाँव ने मिट्टी में दबा दिया था। मंदिर गाँव के उत्तर छोर पर था, एक ऊँचे टीले पर बना, जहाँ अब कोई नहीं जाता था। रास्ता पत्थरों और जड़ों से भरा था, जैसे प्रकृति ने भी मंदिर तक पहुँचने का विरोध किया हो। जब अनिरुद्ध वहाँ पहुँचा, तो देखा — एक विशाल लकड़ी का द्वार, लोहे की जंजीरों और पीतल के ताले से जकड़ा हुआ, जिस पर समय की धूल के नीचे भी कुछ उकेरे हुए चिह्न दिख रहे थे — तांत्रिक मंत्रों जैसे प्रतीक, जो देखने में डरावने तो थे ही, लेकिन उनके पीछे कोई पुराना ज्ञान छुपा था। मंदिर की दीवारें काली पड़ चुकी थीं, जैसे आग की लपटों ने उन्हें चूमा हो, और सामने एक टूटा हुआ दीपस्तंभ पड़ा था, मानो किसी ने यहाँ सबकुछ नष्ट करने की कोशिश की हो। अनिरुद्ध ने तस्वीरें लीं, और जब वह ताले को छूने लगा, तभी हवा तेज़ हुई और मंदिर की घंटियों जैसी ध्वनि उसके कानों में गूंजी — जबकि मंदिर तो सालों से बंद था।
गाँव लौटते समय उसकी मुलाकात फिर से रमा देवी से हुई, जो इस बार उसे देखकर चौंकी नहीं — जैसे उसे पता था कि वह मंदिर तक जाएगा। “जो वहाँ गया, वो वापस नहीं आया,” उसने धीमे स्वर में कहा। अनिरुद्ध ने पूछा, “आप क्यों नहीं जाती मंदिर की ओर?” रमा की आँखों में कुछ डगमगाया, लेकिन उसने जवाब टाल दिया। उसी रात, जब अनिरुद्ध अपनी रिकॉर्डिंग की फाइल्स चेक कर रहा था, उसने देखा कि मंदिर की तस्वीरों में ताले के पास एक परछाई है — ऐसी आकृति जो तस्वीर खींचते समय वहाँ नहीं थी। वह एक महिला जैसी थी, जिसके हाथ में दीपक था, और जो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी थी। अनिरुद्ध ने फौरन कैमरा बंद कर दिया। अगली सुबह, वह गाँव के सबसे बूढ़े व्यक्ति गोवर्धन काका से मिलने गया, जो अब शायद ही किसी से बात करता था। लंबे बाल, धंसी आँखें और काँपते हाथों के साथ वह चौपाल के एक कोने में बैठा था। पहले तो वह कुछ नहीं बोला, फिर जब अनिरुद्ध ने मंदिर की तस्वीरें और ताले की आकृति दिखाई, तो उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। “ये ताला… ये तंत्रमुक्ति का प्रतीक है… इसे बाहर से नहीं, अंदर से बंद किया गया था।” अनिरुद्ध सन्न रह गया। “मतलब कोई था अंदर?” काका की आँखें अब खाली देख रही थीं, “था नहीं… है…” फिर वह उठकर चला गया, और पहली बार अनिरुद्ध ने महसूस किया कि शायद वह किसी भूत की नहीं, किसी बंद आत्मा की कहानी से टकरा गया है।
उसी रात, अनिरुद्ध ने तय किया कि वह मंदिर के ताले को खोलने की कोई तरकीब निकालेगा — भले ही उससे गाँव नाराज़ हो जाए। पर उससे पहले, उसे इस ताले और चिह्नों के बारे में समझना होगा। उसने अपने संपर्क से एक पुरातत्व विशेषज्ञ से फोन पर संपर्क किया और मंदिर की तस्वीरें भेजीं। विशेषज्ञ ने जवाब दिया — “ये ‘नागशक्ति तांत्रिक रक्षण मंत्र’ है… आमतौर पर इसका उपयोग किसी आत्मा या शक्ति को स्थानबद्ध करने के लिए किया जाता था… ऐसा तभी किया जाता जब आत्मा अत्यंत शक्तिशाली हो और उसका क्रोध विनाशकारी हो।” अनिरुद्ध के मन में शीत लहर दौड़ गई — तो क्या मंदिर के भीतर कोई आत्मा कैद थी? और क्या वो आत्मा अब भी जीवित थी, जो हर तीसरी रात चीख रही थी? कैमरे की परछाइयाँ, राख की गंध, हवा में गूंजती आवाज़ें — ये सब एक ही सूत्र से जुड़े थे। जब रात को वह उस बारे में सोचते हुए सोया, तो सपने में उसने खुद को मंदिर के द्वार पर खड़े पाया, और सामने वही जलती हुई स्त्री थी — उसके बाल राख में लिपटे, चेहरे पर पीड़ा, और होंठों पर वही शब्द: “मेरा सत्य वापस दो…” नींद खुली तो सीने पर भारीपन था और तकिये के नीचे एक जली हुई साड़ी का टुकड़ा पड़ा था — जिसे वह पहचान नहीं पाया। अब अनिरुद्ध को यकीन हो चला था — यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि आत्मा की अधूरी कथा थी जिसे पूरा करना उसकी नियति बन चुकी थी।
३
तीन दिन बीत चुके थे और अब अनिरुद्ध को यह स्पष्ट हो गया था कि पैतालगाँव में जो घट रहा है वह महज़ किसी पुराने अंधविश्वास या गाँव के भ्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसके पीछे कोई जीवित, साँस लेता हुआ सच था जो अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा था। उसकी रातें बेचैनी और अजीब सपनों से भरी थीं—हर रात उसे वही औरत दिखाई देती थी, कभी राख में लिपटी, कभी मंदिर की वेदी पर बैठे हुए, और हर बार उसकी आँखों में एक ही सवाल: “तू सुनेगा?” उस दिन जब अनिरुद्ध रमा देवी के घर पहुँचा, तो वह पहले से ही बाहर बैठी थी, जैसे उसके आने का इंतज़ार कर रही हो। उसका चेहरा गंभीर था, आँखों के नीचे नींद की कमी के काले घेरे, और हाथों में तांबे की एक पुरानी थाली थी जिस पर कुछ पुराने अक्षरों में नाम खुदा था — “शीतला”। अनिरुद्ध चौंका। “आप जानती हैं उसके बारे में?” रमा ने उसकी ओर देखा, धीमे स्वर में बोली, “मैं उसे नहीं जानती… लेकिन वह मुझे जानती है।” अनिरुद्ध कुछ समझ नहीं पाया। रमा थाली को ज़मीन पर रखकर बोली, “जब मैं छोटी थी, हर तीसरी रात मुझे नींद में कोई एक ही गीत गाता सुनाई देता था — ‘धूप में भी राख बिछा दो, सच्चाई वहाँ से निकलेगी।’” उसने बताया कि वह जब भी मंदिर के पास जाती थी, उसके कानों में घंटियों की आवाज़ और किसी औरत के रोने की ध्वनि आने लगती थी, इसलिए उसने कभी मंदिर के पास जाना बंद कर दिया। उसने यह भी बताया कि उसकी दादी — जिसे गाँव में “बनवाली” कहा जाता था — कभी जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी और एक बार शीतला का नाम भी उसकी जुबान पर आया था, लेकिन गाँव वालों ने उस बात को चुपचाप दबा दिया।
अनिरुद्ध को लगने लगा कि रमा की कहानी और शीतला की आत्मा के बीच कोई गहरा रिश्ता है। उसने रमा से मंदिर के उस ताले और चिह्नों के बारे में पूछा, तो वह चुप हो गई, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से उघड़ गया हो। फिर उसने कहा, “मेरी माँ कहती थी, हमारे परिवार पर एक अपराध का बोझ है… एक ऐसा अपराध जिसे हमने किया नहीं, लेकिन सहा है… और वो राख अब भी हमारे घर में है।” अनिरुद्ध ने नोटबुक में सब दर्ज किया और रमा से अनुमति लेकर उसके घर की तस्वीरें लेने लगा। तभी उसकी नज़र एक दीवार पर पड़ी — जहाँ राख जैसी कोई परत चिपकी थी, लेकिन नमी में चमक रही थी। कैमरे से क्लिक करते ही स्क्रीन पर एक चेहरा उभरा — वही औरत, वही जलती हुई आँखें, जो मंदिर में दिखी थी। रमा ने जैसे ही वह तस्वीर देखी, उसके हाथ कांपने लगे और वह थरथराती आवाज़ में बोली, “ये वो ही है… जो रात को मेरी नींद में आती है…” अनिरुद्ध ने उसका हाथ थामा, “क्या आपने कभी उससे सवाल पूछा?” रमा बोली, “हाँ, मैंने पूछा — तू कौन है? तो उसने कहा — मैं वो हूँ, जिसे तुमने भूला नहीं, पर बचाया भी नहीं…” उसके स्वर में भय और अपराधबोध दोनों थे। अनिरुद्ध अब यह मानने लगा था कि रमा देवी केवल मंदिर की देखरेख करने वाली नहीं, बल्कि इस पूरे रहस्य की कड़ी थी, जो ना चाहते हुए भी इस सब में शामिल थी। वह शीतला की कहानी की वारिस थी — उस सच्चाई की, जिसे कभी आग में जलाया गया था।
उस रात अनिरुद्ध ने रमा के घर के पास ही एक छोटी सी झोंपड़ी में कैमरा लगाया और माइक्रोफोन ऑन रखा। ठीक तीसरे पहर — वही आवाज़ गूंजी, पर इस बार उसमें शब्द स्पष्ट थे: “वो पाँच थे… एक जज, एक वैद्य, एक पुजारी, एक मुखिया और… एक औरत… जिसने मुँह मोड़ लिया।” अनिरुद्ध काँप गया। यह पाँचों गाँव के निर्णायक लोग थे — लेकिन वह “एक औरत” कौन थी? वह क्या रमा की दादी थी? वह खुद? या कोई और? इसी समय कमरे के भीतर अचानक मृदंग की आवाज़ गूंजने लगी, जैसे मंदिर में पूजा हो रही हो, जबकि मंदिर बंद था। अनिरुद्ध दौड़कर कैमरा उठाने गया, लेकिन जो रिकॉर्ड हुआ वो सिर्फ राख उड़ती तस्वीरें थीं और एक अस्पष्ट मंत्र — “पंचव्यूह में सत्य कैद है, एक ने देखा, एक ने झूठा कहा, एक ने जलाया, एक ने पूजा, और एक ने चुप्पी ओढ़ ली…” यह गूढ़ संकेत अब भी उत्तरों की अपेक्षा अधिक प्रश्न पैदा कर रहे थे, लेकिन इतना तय था — शीतला की आत्मा केवल बदला नहीं चाहती, वह न्याय चाहती थी — किसी से, शायद खुद से भी। रमा अब और चुप नहीं रही — उसने अनिरुद्ध को मंदिर की चाबी दी, जो वर्षों से एक पीतल की मटकी में राख के नीचे दबी थी। “यह उसी दिन से बंद है,” उसने कहा, “जिस दिन मेरी माँ ने मेरी दादी की राख इसी मटकी में छुपाई थी।” अनिरुद्ध ने चाबी हाथ में ली — वह ठंडी नहीं, तपती हुई सी लगी, जैसे किसी आत्मा का ताप उसमें आज भी जीवित था। अब वह जान चुका था — अगला कदम मंदिर का दरवाज़ा खोलना है। लेकिन क्या वह इसके लिए तैयार था?
४
अनिरुद्ध ने जैसे ही मंदिर की पुरानी जंग खाई पीतल की चाबी को दरवाज़े में डाला, हवा एकदम से भारी हो गई। मंदिर का लकड़ी का किवाड़ चिरचिराहट की धीमी कराह के साथ खुला, जैसे वर्षों से दबा कोई रहस्य अब बाहर आना चाहता हो। अंदर घुप्प अंधेरा था, लेकिन जब अनिरुद्ध ने अपनी टॉर्च ऑन की, तो सामने एक टूटी हुई वेदी, राख से ढंकी सीढ़ियाँ और दीवारों पर उकेरे गए कुछ अस्पष्ट चित्र दिखाई दिए। सबसे ऊपर एक नाम उभरा हुआ था — “शीतला”, जो समय के साथ धुँधला पड़ चुका था, लेकिन अब भी उसमे कोई चेतना थी, कोई बेचैन स्मृति जो हर कोने में साँस ले रही थी। मंदिर के भीतर हवा किसी ठंडी साँस की तरह बह रही थी, और हर बार जब अनिरुद्ध आगे बढ़ता, ऐसा लगता जैसे ज़मीन पर किसी ने राख बिछाई हो, जो उसके कदमों से चिपक रही थी। दीवारों पर कुछ पुराने मंत्र खुदे थे — “जो देखा गया, वह बोलेगा… जो छुपाया गया, वह लौटेगा…” अचानक उसे वेदी के पास एक छोटी सी मूर्ति दिखी — बिना चेहरा, बिना आकार, सिर्फ एक जली हुई आकृति, जिसके चारों ओर राख में पाँच त्रिकोण बने थे। पाँच त्रिकोण… ठीक पाँच नामों जैसे — जज, वैद्य, पुजारी, मुखिया, और एक औरत। अनिरुद्ध का शरीर ठंडा पड़ने लगा, जैसे किसी ने उसकी आत्मा को झिंझोड़ दिया हो। तभी मंदिर की छत से राख के कण गिरने लगे और एक हल्की सी आवाज़ गूंजी — “तू आया है, अब सुन भी ले…”
अनिरुद्ध ने झट से कैमरा और ऑडियो रिकॉर्डर ऑन किया। आवाज़ अब स्पष्ट थी, एक औरत की, धीमी और काँपती हुई — “मैं शीतला हूँ, जिसने सच कहा था… इसलिए जल गई थी।” शब्द सीधे उसकी चेतना में उतर रहे थे। वे न किसी दीवार से टकरा रहे थे, न हवा से गुज़र रहे थे — वे सीधे उसके भीतर बोल रहे थे। “मुझे झूठ कहा गया… ‘वो’ आया था — गाँव का रक्षक कहलाने वाला, औरतों की रक्षा करने वाला, लेकिन उसने ही मेरी इज़्ज़त को राख में बदल दिया…” शीतला की आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था, केवल एक अंतहीन थकावट, एक न्याय की पुकार। “मैं गई थी पंचों के पास, उनकी आँखें नीची थीं… सबने कहा चुप रहो… फिर सबने कहा तू पागल है…” और फिर, सबने मिलकर उसे गाँव की मर्यादा पर कलंक बताकर मंदिर के भीतर ही ज़िंदा जला दिया। अनिरुद्ध की साँसें रुक सी गईं। वह वही मंदिर था जहाँ वह खड़ा था — जहाँ अब राख की परतें उसे घेर रही थीं, और हर परत में एक कराह, एक चीख छुपी थी। शीतला कहती रही — “उसने मेरी आँखें नहीं जलाईं, पर हर रात जलता हूँ मैं… किसी औरत की आँख में जब आंसू आता है, मैं वहीं पिघलती हूँ… पर कोई मुझे देखता नहीं।” दीवारों पर अब वही चित्र जीवंत हो उठे — एक औरत आग की लपटों में, और पाँच चेहरों की परछाइयाँ — किसी के हाथ में न्याय की तलवार, किसी के पास माला, किसी के हाथ में चिकित्सा की किताब, और एक चेहरा अधूरा, धुँधला — वह औरत कौन थी जिसने चुप्पी ओढ़ी थी?
रमा देवी अब मंदिर के बाहर आ खड़ी हुई थी। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे — “मैं जानती थी यह सब… मेरी माँ ने कहा था — मत कुरेद अतीत, वो राख नहीं, जहर है…” लेकिन अनिरुद्ध अब पीछे नहीं हटना चाहता था। उसने पूछा, “आपकी दादी ने क्यों चुप्पी साधी?” रमा धीमे स्वर में बोली, “क्योंकि उनमें से एक… वही था जिससे मेरी माँ पैदा हुई थी… वह पुजारी।” शब्द मंदिर की दीवारों से टकराकर जैसे गूंज उठे। अनिरुद्ध ने कैमरा बंद किया, लेकिन शीतला की आवाज़ अब भी सुनाई दे रही थी — “मैं अब भी जलती हूँ… लेकिन अगर तू मेरा नाम पुकारे, सच से, खुले मन से, मैं दिखाऊँगी कि सच्चाई क्या थी।” अनिरुद्ध ने धीमे से कहा — “शीतला…” और मंदिर की वेदी अचानक काँपने लगी। राख हटी, और नीचे एक जलता हुआ चित्र उभरा — शीतला का चेहरा, जला हुआ, पर उसकी आँखों में अब भी शक्ति थी। चित्र के नीचे कुछ अंकित था — “जो मेरा नाम बोले, वो मेरा सच भी बोले… वरना वही राख होगा।” अनिरुद्ध की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। अब यह केवल एक शोध नहीं था — यह एक सौगंध थी, एक जिम्मेदारी। मंदिर का दरवाज़ा धीमे से फिर बंद हो गया, जैसे किसी और समय के लिए।
५
अगले दिन सुबह जब अनिरुद्ध ने अपनी रिकॉर्डिंग्स को फिर से सुना, तो उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। शीतला की आवाज़ बार-बार गूंज रही थी, लेकिन जब वह ट्रैक को डिकोड करने बैठा, तो एक और आवाज़ उभर आई — मर्दानी, भारी और थरथराती हुई, मानो राख के बीच से निकल रही हो: “तूने नाम लिया है… अब सारा खेल देख।” उसी क्षण, रिकॉर्डिंग में पाँच अस्पष्ट शब्द सुनाई दिए — “धर्म, वैद्य, नीति, न्याय, मौन।” अनिरुद्ध का दिल तेजी से धड़कने लगा। ये वही पाँच स्तंभ थे जो किसी भी समाज की आत्मा होते हैं, लेकिन क्या यही पाँच लोग थे जिन्होंने शीतला की आत्मा को जलाया था? उसने तुरंत रमा देवी से संपर्क किया। रमा उसे एक पीले पड़े दस्तावेज़ों वाले संदूक तक ले गई जो उसके दादा के समय से बंद था। जैसे ही संदूक खोला गया, पुरानी किताबों और हाथ से लिखे दस्तावेज़ों के बीच एक अजीब सी लकड़ी की पट्टी निकली, जिसपर पाँच नाम खुदे थे — पंडित भुवनेश्वर, वैद्य मनोहर, जज हरिकृष्ण, मुखिया शंभूनाथ, और… शिवा की माँ — गौरी। अनिरुद्ध ठिठक गया — एक औरत? वो पाँचवाँ स्तंभ ‘मौन’ था, और वह स्तंभ एक औरत थी जिसने कुछ नहीं कहा, सब कुछ देखा और फिर भी चुप रही। अब यह स्पष्ट था कि यह हत्या केवल पाँच पुरुषों की साज़िश नहीं थी — एक औरत की चुप्पी भी उसमें बराबरी से दोषी थी।
अनिरुद्ध ने दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ना शुरू किया। एक पुरानी पंक्ति में लिखा था — “ग्राम-शांति हेतु निर्णय लिया गया कि स्त्री दोषी है; अग्नि शुद्धि ही एकमात्र उपाय है।” नीचे पाँचों पंचों के दस्तखत थे। यह फैसला 1927 का था। अनिरुद्ध की आँखों में आंसू थे, लेकिन वह क्रोध से भरे नहीं थे — वे उन आत्माओं के लिए थे जो न्याय की जगह ज़िंदा जल गई थीं। रमा की आवाज़ आई, “मेरी दादी गौरी थी… और उन्होंने कभी इस विषय में बात नहीं की। वो रोज शीतला माता के मंदिर में जाती थीं, चुपचाप राख उठाती थीं और गले में लगा लेती थीं।” अब अनिरुद्ध ने समझा कि शीतला केवल एक आत्मा नहीं थी — वह एक प्रतीक बन चुकी थी, उस सच्चाई का, जिसे सबने दबा दिया। उसने तय किया कि उसे उन पाँचों के इतिहास को खोजना होगा — उनके परिवार, उनकी ज़िंदगियाँ, और शायद उन सभी निशानों को जो अब भी गाँव में छिपे थे। पहले वह गया पुरानी पाठशाला में जहाँ मुखिया शंभूनाथ कभी शिक्षक हुआ करता था। वहाँ एक दीवार पर कोयले से खींचा गया चित्र दिखा — एक जली हुई चूड़ियाँ पहने औरत, जिसके चारों ओर चार पुरुषों की आकृतियाँ थीं, और एक आकृति बिना आँखों के, जो पीछे खड़ी थी।
जब अनिरुद्ध रात को मंदिर के पास गया, तो उसे लगा जैसे कोई हवा में शब्द फुसफुसा रहा हो — “उन सबने मेरा नाम मिटाया… तू अब उन्हें पहचान दे।” उसी क्षण एक लोहे की कील उसके पास ज़मीन पर गिरी, जैसे किसी अदृश्य दीवार से छूटी हो। वह घबराकर पीछे हटा, लेकिन मंदिर की दीवार पर अब पाँच आकृतियाँ उभर आई थीं — उनके चेहरे पहले धुँधले थे, लेकिन धीरे-धीरे वह साफ़ होने लगे। एक ने गले में तुलसी की माला पहन रखी थी — पंडित भुवनेश्वर; एक सफेद कोट और लाठी लिए था — वैद्य मनोहर; तीसरे के हाथ में तराजू था — जज हरिकृष्ण; चौथे की पीठ पर झोला — मुखिया शंभूनाथ; और पाँचवीं आकृति — बिना मुँह के, केवल दो काले गड्ढों की तरह आँखें, गले में चूड़ियाँ — गौरी। ये वही लोग थे जिन्होंने एक मासूम स्त्री की आत्मा को लहू की राख में बदल दिया था। अनिरुद्ध का मन डगमगाने लगा, लेकिन शीतला की आवाज़ अब स्पष्ट थी — “मैं नहीं चाहती बदला… मैं चाहती हूँ सत्य, मेरा नाम फिर से बुलाया जाए, मेरी राख में जो सत्य था, उसे स्वीकार किया जाए।” अनिरुद्ध ने मंदिर की दीवार पर हाथ रखा और बोला, “तू केवल एक नाम नहीं है शीतला… तू न्याय है, जो समय के राख से अब फिर जन्म लेना चाहता है।”
६
उस रात अनिरुद्ध को नींद नहीं आई। हर बार आंखें बंद करने पर शीतला का चेहरा, मंदिर की दीवारों पर उभरती आकृतियाँ, और वह लोहे की कील आँखों के सामने घूमती रही। सुबह होते ही वह फिर मंदिर की ओर चल पड़ा। अब उसे सिर्फ़ जवाब नहीं चाहिए थे, उसे उस रास्ते की तलाश थी जहाँ शीतला की आत्मा ने सच को छुपा रखा था। मंदिर की बाहरी दीवारें ठंडी थीं, लेकिन उस स्थान के भीतर का एक कोना हल्का गर्म था — वहाँ की ईंटें बाकी जगह से थोड़ी ढीली थीं। अनिरुद्ध ने हौले से उस जगह पर हाथ मारा, और कुछ ही देर में एक ईंट खिसक गई। अंदर से राख की एक मोटी परत निकली — काली, भूरी और कुछ-कुछ लाल रंग की, जैसे किसी ने जली हुई आत्मा को दीवारों में कैद कर दिया हो। राख हटाते ही एक छोटा पत्थर का दरवाज़ा नज़र आया, जिस पर संस्कृत में कुछ उकेरा गया था — “यत्र सत्यं न स्वीकृतं, तत्र आत्मा न मुक्तम्।” अनिरुद्ध का गला सूख गया, लेकिन वह पीछे नहीं हटा। उसने पत्थर को खिसकाया, और एक संकरी सुरंग खुल गई, जिसकी सीढ़ियाँ नीचे धरती की तरफ जा रही थीं।
वह टॉर्च की रोशनी में नीचे उतरने लगा। यह रास्ता सीधा नहीं था — हर कुछ कदम पर दीवारों में कुछ गहरे खरोंच दिखते थे, जैसे किसी ने वहाँ से बाहर निकलने की कोशिश की हो। सुरंग के अंतिम छोर पर एक छोटा सा कमरा था, जहाँ बीचों-बीच एक हांडी रखी थी। उसके पास पाँच मिट्टी के दीपक जले हुए थे — ताज़े, मानो किसी ने आज ही जलाए हों। हांडी के ऊपर एक कपड़ा रखा था, जिस पर काली स्याही में कुछ लिखा था — “मेरे शब्दों को पढ़, पर केवल वही जो तुझे सुनाई दे।” अनिरुद्ध ने जैसे ही कपड़ा हटाया, उसके नीचे एक लिपटी हुई चिठ्ठी मिली, जिसमें पुरानी हिंदी में लिखा था — “जिन्होंने मुझे अग्नि दी, उन्हें मैंने क्षमा नहीं किया। पर जिन्हें सच्चाई नहीं पता थी, उन्हें मैं बंधन नहीं दूँगी। मेरा नाम फिर से पुकारो, मेरे अंतिम गीत को पूर्ण करो।” साथ में एक छोटी सी माला रखी थी — वही राख और चूड़ी से बनी माला जो शीतला की पहचान थी। तभी अचानक टॉर्च की रौशनी झपकने लगी, और कमरे में हवा की लहर उठी — दीये फड़फड़ाए, और दीवारों पर फिर वही पाँच चेहरे उभर आए, लेकिन इस बार वे जलते हुए दिखे — उनके चेहरों पर पछतावा, भय और घुटन का मिश्रण था।
अनिरुद्ध बाहर निकला, और मंदिर के गर्भगृह में बैठ गया। उसकी सांसें तेज़ थीं, लेकिन मन अब शांत होता जा रहा था। वह जानता था कि सिर्फ़ यह सच्चाई जान लेने से कुछ नहीं होगा — उसे गाँव के सामने लाना होगा, मंदिर की इन राखभरी दीवारों को फिर से जीवित करना होगा। रमा देवी से चर्चा कर, उन्होंने गाँव में एक सभा बुलाई, जहाँ वर्षों बाद मंदिर खोला गया। जब अनिरुद्ध ने पाँच नामों की घोषणा की और वह राख की माला सबके सामने रखी, तो कुछ वृद्ध लोगों के चेहरे सफेद पड़ गए। एक बूढ़े ने काँपते स्वर में कहा — “हमने कहानियाँ सुनी थीं, पर हमें कभी यह नहीं बताया गया कि वह सच्चाई थी।” तभी एक युवती, जिसकी आँखें शिवा से मिलती थीं, आगे आई और बोली, “मैं गौरी की परपोती हूँ। दादी जीवन भर चुप रहीं… शायद इसी क्षमा की तलाश में।” सभा मौन हो गई। अनिरुद्ध ने वही राख मंदिर की चौखट पर रख दी, और शीतला का नाम लिया — “शीतला, अब तेरा नाम मिटाया नहीं जाएगा। तेरी राख अब इतिहास नहीं, सबक बनेगी।” हवा एक बार फिर चली, लेकिन अब उसमें चीख नहीं थी… एक मीठी-सी शांति थी, जैसे किसी ने वर्षों बाद चैन की साँस ली हो।
७
शीतला का नाम पुकारे जाने के बाद पैतालगाँव की हवा जैसे स्थिर हो गई थी — न कोई आवाज़, न कोई चहलकदमी, मानो पूरा गाँव साँस रोके किसी अदृश्य निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा हो। अनिरुद्ध को रात भर नींद नहीं आई। मंदिर की दीवारों पर की गई घोषणाओं का प्रभाव गाँव वालों पर गहरा पड़ा था, लेकिन सबसे अधिक असर पड़ा था उन पाँच परिवारों पर, जिनके पूर्वजों के नाम उस स्याही में दर्ज थे। अगली सुबह जब अनिरुद्ध मंदिर पहुँचा, उसने देखा कि मंदिर के द्वार पर सफेद चूने से एक वृत खींचा गया था, और उसके बीचोंबीच राख की वही माला रखी हुई थी। किसी ने उसकी जगह नहीं बदली थी, लेकिन किसी ने उस पर फूल चढ़ा दिए थे — सफेद चमेली के फूल। यह संकेत था — गाँव समझ रहा है, पिघल रहा है। मंदिर के भीतर जब वह पहुँचा, उसे वहाँ एक और संकेत मिला — वो पाँच दीपक फिर से जल रहे थे, बिना किसी तेल के, बिना बाती के। अब उसकी जाँच की दिशा बदल गई थी। क्या यह सब कुछ सिर्फ आत्मा का क्रोध था, या फिर कोई गहरा आध्यात्मिक बंधन था जिसे अब टूटना था?
वह दोपहर को रमा देवी से मिलने गया। रमा देवी इस गाँव की प्राचीन परंपराओं की संरक्षिका थीं, और अब तक की सबसे गूढ़ किंवदंतियों की ज्ञाता भी। रमा देवी ने उसे एक कथा सुनाई जो अब तक अनकही थी — “जब गाँव में शीतला का जीवन दान के नाम पर समाप्त हुआ था, तब उसकी आत्मा को मुक्त करने के लिए एक अंतिम पूजा की व्यवस्था की गई थी। लेकिन वो पूजा अधूरी रह गई। कारण था — पाँचों दोषियों के परिवारों में से किसी ने उस दिन मंदिर के चौखट पर पैर नहीं रखा। शीतला की आत्मा वहीं अटकी रह गई — अधूरी, अपमानित और अनसुनी। अब जबकि उसकी कथा को पुनः जीवित किया गया है, आत्मा फिर से जाग चुकी है — लेकिन अब वह बदले की नहीं, मुक्ति की आकांक्षी है।” अनिरुद्ध को अब दिशा मिल चुकी थी। उसे वह अधूरी पूजा पूरी करनी थी — लेकिन कैसे? उसके पास न पुराना विधान था, न मंत्र, और न ही गाँव की सहमति। तभी रमा देवी ने उसे एक प्राचीन लिपि वाला ताड़पत्र सौंपा, जिस पर लिखा था — “जहाँ पाँचों वंशों के वाणी से क्षमा निकले, वहीं आत्मा को शांतिपथ मिलेगा।”
शाम को अनिरुद्ध ने उन पाँच परिवारों के उत्तराधिकारियों को एकत्र किया — कुछ संकोच कर रहे थे, कुछ खुले विरोध में थे, लेकिन उनमें एक शक्ति काम कर रही थी जो वर्षों से कुंठित थी — और वह थी पश्चात्ताप। मंदिर के गर्भगृह में दीप जलाकर, जब अनिरुद्ध ने मंत्रों की जगह सिर्फ नाम पुकारे — “गौरी, ललिता, शीतला, कुसुम और माया” — तब हर नाम पर वातावरण भारी होता गया। गाँव के लोगों ने जब मिलकर कहा, “हम क्षमा चाहते हैं,” तब हवा में एक कंपन हुआ, जैसे कोई अनदेखी शृंखला टूट रही हो। तभी अचानक मंदिर की छत से राख के कण गिरने लगे — धीमे-धीमे, फिर तेज़। यह डरावना नहीं था, बल्कि प्रतीक था — जैसे शीतला की आत्मा धीरे-धीरे आकाश की ओर उड़ रही हो, उसका बंधन टूट रहा हो। दीपक की लौ अब स्थिर थी, और माला की राख मंदिर की सीढ़ियों पर बिखर गई थी। फिर, पहली बार वर्षों में मंदिर के घंटा अपने आप बजा — धीमे-धीमे, फिर पूरे स्वर में। यह एक संकेत था — मृत आत्मा का संकल्प पूर्ण हो चुका था। अनिरुद्ध ने मंदिर की ओर देखा, और पहली बार वहाँ सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि मुक्ति देखी।
८
गाँव में वर्षों बाद एक ऐसी रात आई जब आकाश बिल्कुल साफ़ था, चाँद की रोशनी पोखर के जल में झिलमिलाने लगी थी, और मंदिर के ऊपर से कोई परछाईं नहीं गुजर रही थी। लेकिन यह शांति किसी त्यौहार की नहीं, किसी अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा कर रही थी — शीतला की आत्मा को मुक्त करने के लिए अंतिम ‘विसर्जन रात्रि’। अनिरुद्ध ने तय किया कि अधूरी प्रथा को पूर्ण रूप देने के लिए एक ऐसा अनुष्ठान होना चाहिए जो न केवल आध्यात्मिक हो, बल्कि सामाजिक भी — एक सार्वजनिक स्वीकारोक्ति, एक साक्षी बनकर आत्मा को सम्मानपूर्वक विदाई। गाँव के सभी लोग पोखर के किनारे एकत्र हुए, जहाँ दशकों पहले शीतला की चिता बुझाई गई थी। इस बार कोई आक्रोश नहीं था, न भय, बल्कि एक अव्यक्त करुणा, जैसे हर ग्रामीण उस लड़की की पीड़ा को पहली बार समझ पाया हो। अनिरुद्ध ने ताड़पत्र से मिली विधियों का पालन करते हुए पाँच दीप जलाए — प्रत्येक दोषी परिवार की ओर से, और उन्हें पोखर की सतह पर बहा दिया। चाँद की परछाईं और जलती हुई बातियों ने ऐसा दृश्य बनाया, मानो जल स्वयं आत्मा को अपने ऊपर ले जा रहा हो।
जैसे-जैसे मंत्रों का उच्चारण गूंजता रहा, हवा में एक हल्की सी सिहरन फैलने लगी। मंदिर की घंटियाँ धीरे-धीरे अपने आप बजने लगीं, और गाँव के सबसे पुराने पीपल के पेड़ से सूखे पत्ते हवा में उठकर पोखर के ऊपर गोलाकार चक्कर काटने लगे। तभी, पोखर की सतह पर एक हल्की सफेद आभा उभरी, जैसे राख की रेखा पानी के ऊपर तैर रही हो। लोगों ने देखा कि जल में कोई आकृति नहीं, लेकिन एक भाव था — जैसे कोई रुका हुआ श्वास अब मुक्त हो गया हो। रमा देवी ने धीमी आवाज़ में कहा, “अब वो चली गई।” लेकिन यह केवल एक भावना नहीं थी, बल्कि उस समय हर ग्रामीण के भीतर कोई अज्ञात बोझ उतर गया था। गाँव की बुज़ुर्ग महिलाएं जिनकी आँखें कभी नम नहीं होती थीं, उनकी आँखों से भी अश्रु बह निकले — ये आँसू शोक के नहीं, प्रायश्चित के थे। विसर्जन की रात, जो कभी भय और निषेध की प्रतीक थी, अब श्रद्धांजलि और क्षमा का रूप ले चुकी थी।
जब अनिरुद्ध ने आँखें बंद कर पोखर के किनारे सिर झुकाया, तब उसे अपने कंधे पर एक हल्की सी स्पर्श की अनुभूति हुई — मानो हवा में कोई हथेली उसे आशीर्वाद दे रही हो। वह तुरंत उठा, पर उसके सामने कुछ नहीं था, सिवाय बहते दीपों की रोशनी और शांत जल के। अब मंदिर की दीवारें भी बदल चुकी थीं — वहाँ से पुरानी राख की लकीरें मिट चुकी थीं, और उनकी जगह कुछ नई बेल-पत्तियों की आकृतियाँ उग आई थीं, जैसे जीवन ने फिर से जन्म लिया हो। अनिरुद्ध ने गाँव के बीचोंबीच खड़े होकर एक घोषणा की — “अब यह मंदिर सिर्फ देवी का नहीं, शीतला का भी मंदिर कहलाएगा — वो जिसने दुःख सहा, और फिर भी क्षमा की राह चुनी।” गाँव वालों ने पहली बार मंदिर के द्वार पर मिलकर फूल चढ़ाए, और पाँचों दोषी वंशजों ने एक साथ दीप जलाए। विसर्जन की रात, जो कभी डरावनी किंवदंती हुआ करती थी, अब पैतालगाँव के इतिहास की सबसे पवित्र स्मृति बन गई थी — एक मृत आत्मा की मुक्ति, और एक जीवित समाज की आत्मशुद्धि।
९
विसर्जन की रात बीत चुकी थी, मगर उसकी गूंजें अभी भी पैतालगाँव की गलियों में गूंज रही थीं। गाँव के हर कोने में एक बदलाव की हल्की आहट थी — कुछ अनकहा बदल चुका था, जैसे शाप का कोहरा छंटने लगा हो। परंतु अनिरुद्ध को चैन नहीं था, क्योंकि विसर्जन ने शीतला की आत्मा को मुक्त तो कर दिया, लेकिन उसकी राख अब भी मंदिर की भीतरी वेदी के नीचे गहरी परतों में दबी थी — उसकी अधूरी चिता, अधूरा सम्मान, और अधूरी न्याय-कथा वहीं दबी थी। अनिरुद्ध ने तय किया कि अब न केवल शीतला को आत्मिक मुक्ति मिले, बल्कि उसके अस्तित्व को वह मान्यता भी दी जाए जिसे वर्षों पहले उसे समाज ने छीन लिया था। मंदिर के भीतर, जहाँ दशकों से केवल देवी की मूर्ति प्रतिष्ठित थी, उसने ग्राम प्रधानों से मिलकर यह प्रस्ताव रखा कि उसी वेदी में एक छोटी सी स्मृति-शिला रखी जाए — शीतला के नाम की। यह प्रस्ताव पहले तो असहज लगने लगा, लेकिन धीरे-धीरे गाँववालों को यह एहसास हुआ कि यह कोई अपवित्रता नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का प्रतीक होगा।
तैयारियाँ शुरू हुईं। मंदिर के पुजारी, जो वर्षों तक केवल आदेश मानते आए थे, अब पहली बार सच्चे अर्थों में पूजा के पीछे की भावना को समझने लगे। गाँव की कुछ महिलाएं, जिनके अपने पूर्वज उस अन्याय का हिस्सा थे, उन्होंने मिलकर मिट्टी और राख मिलाकर वह शिला गढ़ी — जिसे ‘राख की रेखा’ कहा गया। यह शिला आकार में छोटी थी, मगर उसका बोझ पीढ़ियों के अपराधबोध से भारी था। दिन तय हुआ जब उसे वेदी के भीतर प्रतिष्ठित किया जाएगा — न देवी के समकक्ष, न नीचे, बल्कि एक ओर — जैसे गाँव अपनी गलती की ओर झुककर क्षमा मांग रहा हो। जिस दिन यह कार्य होना था, उसी सुबह मंदिर के बाहर एक गुलमोहर के पेड़ पर पहली बार लाल फूल खिले — बरसों से वह पेड़ सूखा था, और आज जैसे प्रकृति ने भी संकेत दे दिया हो कि समय बदल रहा है। अनिरुद्ध ने शिला को अपनी दोनों हथेलियों में उठाया, और एक-एक कदम मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए, हर चरण में अपनी आत्मा की एक गाँठ खोल दी। मंदिर के भीतर जब शिला स्थापित हुई, तभी घंटियाँ बिना छुए गूंज उठीं — मानो शीतला की आत्मा ने अंतिम बार स्वीकार किया हो कि उसे देखा गया, पहचाना गया।
उस शाम जब गाँववालों ने मिलकर पहली बार दीपोत्सव मनाया — न किसी देवी के लिए, न डर के लिए, बल्कि उस आत्मा के लिए जो मिट नहीं पाई थी — तब आसमान कुछ और ही था। चारों ओर रोशनी थी, लेकिन एक भी पटाखा नहीं फूटा, क्योंकि यह उत्सव मौन था — भीतर से आने वाला, एक आत्मग्लानि की स्वीकारोक्ति। अनिरुद्ध ने देखा कि कई युवा लड़कियाँ मंदिर के बाहर बैठी थीं, वे शीतला की कहानी सुन रही थीं — अब वह भूतनी नहीं, एक नायिका बन चुकी थी, जो अन्याय के सामने झुकी नहीं, भले ही समाज ने उसे निगल लिया हो। उस रात गाँव की लड़कियों ने दीपों से ‘शीतला’ का नाम मंदिर के आँगन में बनाया, और पहली बार गाँव के इतिहास में, किसी औरत के नाम पर पूजा हुई — बिना मूर्ति, बिना ढोंग। राख की वह रेखा अब धुंधली नहीं रही, बल्कि इतिहास की एक शिला बन चुकी थी। अनिरुद्ध ने मंदिर के बाहर बैठकर सोचा, “कभी-कभी आत्माओं को नहीं, जिंदा समाज को शुद्धिकरण की ज़रूरत होती है।” और शायद यही वह क्षण था, जब पैतालगाँव पहली बार सच में जागा — राख से नहीं, रौशनी से।
१०
वह सुबह ठंडी थी, लेकिन डर नहीं था। पहली बार पैतालगाँव की हवा में भय की गंध नहीं, बल्कि एक सुकून सा था — जैसे बरसों से जमी कोई परत उतर गई हो। मंदिर की घंटियाँ अब नियमित बजने लगी थीं, लेकिन उनके स्वर में अब कोई विवशता नहीं थी। राख की रेखा मंदिर के एक कोने में अपनी जगह पर शांति से विद्यमान थी, और गाँव वाले अब उसे स्पर्श कर श्रद्धांजलि देने लगे थे — न अंधविश्वास में, बल्कि एक गहरी स्वीकारोक्ति में। अनिरुद्ध इन बदलावों को मौन भाव से देख रहा था। उसके भीतर कोई हलचल नहीं थी, बस एक अजीब-सा खालीपन था, जैसे कोई लम्बा सपना समाप्त हुआ हो। उसने नाथू बाबा की कुटिया के बाहर जाकर प्रणाम किया — वही नाथू बाबा जिनकी चेतावनियों को सबने पागलपन समझा था, लेकिन अब वही शब्द गाँव की आत्मा बन चुके थे। अनिरुद्ध ने गाँव छोड़ने का निर्णय कर लिया था, क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था। जिस पुकार ने उसे यहाँ खींचा था, वह अब शांत हो चुकी थी। लेकिन जाते-जाते उसने एक आखिरी बार उस कुएँ के पास रुकना चाहा — जहाँ शीतला को ज़िंदा दफनाया गया था, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी।
कुएँ के पास अब एक छोटा सा पत्थर रखा गया था, जिस पर किसी ने लाल रंग से एक शब्द लिखा था — “मुक्ति।” अनिरुद्ध ने पास जाकर देखा, वह रंग लाल नहीं, सिंदूर जैसा था — और शब्द किसी स्त्री के हाथों से लिखा हुआ प्रतीत होता था। उसने चारों ओर देखा — कोई नहीं था। हवा स्थिर थी, और कुएँ का पानी अब स्थिर, पारदर्शी और शांत हो चला था। उसने पास बैठकर अपनी हथेली पानी में डुबाई — ठंडा स्पर्श, परंतु अब भय नहीं। तभी उसकी उंगलियों से हल्की सी लहर उठी, और उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने उसकी हथेली छू ली हो — मुलायम, कोमल, लेकिन ताक़तवर। एक क्षण के लिए उसे शीतला की आँखें याद आ गईं — वह घबराई नहीं थीं, वे विद्रोही थीं। उसी पल अनिरुद्ध को लगा जैसे कोई उसके कंधे पर हाथ रखकर कह रहा हो — “धन्यवाद।” उसने पीछे पलटकर देखा — कोई नहीं था, लेकिन कुएँ के पास की घास पर एक हल्का-सा दबाव बना था, जैसे कोई अदृश्य पगचिन्ह। वह मुस्कराया, और जैसे ही उठने लगा, हवा के झोंके में मंदिर की घंटियाँ एक बार फिर बज उठीं — बिल्कुल वैसे जैसे पहली बार शिला स्थापित करते वक़्त हुई थीं। यह अंतिम संकेत था — संकेत कि कहानी पूरी हो चुकी है, और शीतला अब उस जगह पर नहीं है जहाँ उसकी पीड़ा दबी थी।
गाँव की सीमा पर पहुँचकर अनिरुद्ध ने आखिरी बार पीछे देखा। मंदिर दूर से अब किसी किले जैसा नहीं, किसी स्मारक जैसा प्रतीत हो रहा था — न डरावना, न अभिमानी। वह सोच में डूबा रहा कि क्या शीतला की आत्मा अब कहीं और जन्म लेगी, किसी और गाँव में, किसी और नाम से? क्या यह कहानी बस यहीं तक थी, या फिर यह एक परंपरा की शुरुआत है — अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की, भूत-प्रेत से डरने के बजाय उनके पीछे छिपे घावों को पहचानने की? तभी गाँव की एक छोटी बच्ची, जो उसे हमेशा मंदिर के पास दिखती थी, दौड़ती हुई उसके पास आई और उसके हाथ में कुछ रख दिया। वह एक छोटा सा पुतला था — मिट्टी से बना, लाल चुनरी ओढ़े, और उसके माथे पर एक छोटी सी राख की बिंदी। अनिरुद्ध ने हैरानी से पूछा, “ये किसने बनाया?” बच्ची ने मुस्कराकर कहा, “शीतला दीदी मेरे सपनों में आई थीं। बोलीं, अब डरना नहीं — अब कहना सीखो।” अनिरुद्ध की आँखें नम हो गईं। यह कहानी भले ही समाप्त हो चुकी थी, लेकिन अब वह एक चेतावनी नहीं, एक प्रेरणा बन चुकी थी — और यह प्रेरणा अब एक अगली पीढ़ी के हाथों में थी। पगडंडी पर चलते हुए अनिरुद्ध ने उस पुतले को अपने बैग में रखा — एक निशानी, एक कहानी, और शायद एक वादा कि कभी-कभी आत्माओं को मुक्ति नहीं, बस समझ की ज़रूरत होती है।
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समाप्त


