Hindi - प्रेतकथा

पीपल का शाप

Spread the love

शक्कर रञ्जन महापात्र


जब बप्पा भानगढ़ी गाँव पहुँचा, तो आसमान धूसर था और धूप जैसे छिप कर बैठ गई थी। बस से उतरते ही उसे सबसे पहले महसूस हुआ मिट्टी की सोंधी गंध, जो बारिश से पहले की नमी जैसी लग रही थी। गाँव छोटा था, मगर उसकी खामोशी में कोई अजीब सी बात थी—जैसे कोई सब कुछ देखकर भी अनजान बना हो। स्टेशन से निकलकर वह जब कच्चे रास्ते पर चला, तो देखा कि बच्चे खेलते समय अचानक चुप हो जाते हैं, और बूढ़े अपनी छड़ी थामे, गर्दन झुका कर ऐसे निकल जाते हैं जैसे आँखें मिलाना कोई अपराध हो। बप्पा को यह सब थोड़ा अजीब तो लगा, मगर उसने अपने भीतर की आवाज को दबा दिया—वह यहाँ सिर्फ़ रिसर्च के लिए आया था, न कि अंधविश्वासों में उलझने के लिए।

गाँव के एक छोर पर दादी माँ का पुराना घर था, जहाँ वह अगले कुछ दिनों तक ठहरने वाला था। वह घर जितना पुराना था, उतनी ही मजबूत उसकी दीवारें थीं, लेकिन उस घर की खिड़कियों में एक उदास बेचैनी झाँक रही थी। दादी माँ—जो अब बहुत बूढ़ी हो चली थीं—ने बप्पा को देखकर एक सूनी सी मुस्कान दी और कहा, “समय पर आ गया तू… पेड़ अब जागने वाला है।” बप्पा मुस्करा कर बोला, “आपकी कहानियाँ अब भी डराती हैं दादी!” लेकिन दादी की आँखों में जो चुप्पी थी, वह किसी कहानी से अधिक सच्ची लगी। रात होते-होते गाँव का माहौल और भी ठंडा, और स्याह होने लगा। बप्पा खिड़की से बाहर देख रहा था, जहाँ एक बूढ़ा आदमी एक दीये की लौ लेकर पीपल के पेड़ की ओर बढ़ रहा था—ठीक उस पेड़ की ओर, जिसके बारे में गाँववालों का कहना था कि वह रात को साँस लेता है।

पहली रात बप्पा को नींद नहीं आई। खाट पर करवट बदलते हुए उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई धीमी-धीमी फुसफुसाहट उसके कानों के पास से होकर गुजर रही हो। पहले उसने सोचा कि यह उसका भ्रम है, मगर खिड़की के बाहर से आती ठंडी हवा में एक विचित्र गंध थी—कुछ जले हुए बालों और भीगे मांस की तरह। खिड़की की लकड़ी खुद-ब-खुद चरमराई और बप्पा ने जैसे ही उठकर बाहर झाँका, उसे एक पल के लिए लगा कि पेड़ की एक टहनी हिली नहीं, बल्कि किसी ने उसे धीरे से हिलाया है। दूर कहीं कोई बच्चा रो रहा था, और उसी रोने के बीच किसी औरत की गीली हँसी उभरी—ऐसी हँसी, जो न माँ जैसी थी, न ही किसी इंसान जैसी। बप्पा की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि दादी के शब्दों में सिर्फ़ डर नहीं था—वहाँ एक चेतावनी थी, और शायद वह देर से समझ रहा था।

***

सुबह की पहली किरणें बप्पा की आँखों पर पड़ीं, लेकिन पिछली रात की घटनाएँ अब भी उसके मन में ताजा थीं। वह आधी रात तक जागता रहा था, हर आहट को समझने की कोशिश में, मगर जब नींद आई, तो अजीब-अजीब सपनों से भरी हुई। सपनों में उसने खुद को एक पुराने मंदिर में देखा, जहाँ दीवारों पर रक्त से कुछ लिखा था, और सामने वही पीपल का पेड़ था—मगर उल्टा लटका हुआ। जब वह नींद से उठा, तो उसकी सांसें तेज थीं और माथा पसीने से भीगा हुआ। नीचे आकर उसने देखा कि दादी माँ पहले से ही आँगन में बैठी तुलसी में जल चढ़ा रही थीं, और उनके होंठों पर कोई मंत्र धीरे-धीरे चल रहा था। उन्होंने बिना उसकी ओर देखे ही कहा, “पेड़ को देखा तूने?” बप्पा चौंका, “आपको कैसे पता?” दादी माँ धीरे से मुस्कराईं, “जो एक बार उसकी आँख में झाँक ले, उसकी रातें फिर कभी वैसी नहीं रहतीं।”

दादी माँ ने बप्पा को भीतर बुलाया और एक पुराना संदूक खोलकर उसमें से एक कपड़ा निकाला—लाल रंग का, जिसके किनारों पर राख जमी थी। “ये मेरी माँ की माँ की निशानी है,” उन्होंने कहा, “जिस रात इस गाँव की पहली लड़की पेड़ से लटकी मिली थी, उसी रात से इसे संभाल कर रखा गया है। वो आत्मा… वो पिशाचनी, उसी लड़की की है जिसे इस गाँव ने मार दिया था। कहते हैं, उसकी आत्मा इस पेड़ में बस गई, और अब हर पूर्णिमा को वो किसी को अपने साथ ले जाती है। पहले वो सिर्फ औरतों को पकड़ती थी, लेकिन अब उसने फर्क करना छोड़ दिया है।” बप्पा ने हँसी में बात टालनी चाही, “दादी, ये सब बस किस्से हैं, डराने के लिए…” मगर दादी ने उसकी ओर तीखी नज़रों से देखा, “अगर किस्से होते, तो ये गाँव रात में खामोश न हो जाता। ये लोग डरते हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ देखा है… और मैं भी देख चुकी हूँ।” उनकी आँखों में जो कंपन था, वो अभिनय नहीं लग रहा था—वो किसी ऐसे डर का हिस्सा था, जो सालों से उनमें बैठा था।

बप्पा का मन बार-बार उस रात की परछाइयों की ओर लौटता रहा, लेकिन उसका वैज्ञानिक मन अब भी तर्क खोज रहा था। वह सोचता रहा कि हो सकता है वह नींद और थकान में कोई सपना देख रहा हो, या कोई ध्वनि भ्रम हुआ हो। लेकिन जब उसने गाँव के बच्चों से पूछा कि रात में वे क्यों बाहर नहीं खेलते, तो एक छोटी बच्ची ने केवल इतना कहा, “क्योंकि पेड़ देखता है…” और फिर दौड़कर अपनी माँ की ओट में छुप गई। उसी शाम जब बप्पा एक बार फिर पीपल के पास गया, तो उसने देखा कि पेड़ के नीचे कुछ टूटे हुए कांच, चूड़ियों के टुकड़े और राख जैसी मिट्टी फैली हुई थी। उसे समझ नहीं आया कि यह सब वहाँ क्यों था, लेकिन तभी पीछे से एक आवाज आई—नीला की—जो बोली, “वो तुम्हें पहचान चुका है।” बप्पा मुड़ा, मगर वहाँ कोई नहीं था। उसकी धड़कनें तेज हो गईं, और अब तक जो कहानी उसे दादी के पुराने दिनों का भ्रम लग रही थी, वह धीरे-धीरे उसकी अपनी सच्चाई बनती जा रही थी।

***

शाम ढलते ही भानगढ़ी की हवा में एक अजीब बोझिलपन भरने लगा। आसमान में बादल घिरे थे, लेकिन बारिश नहीं हुई—सिर्फ एक भारी सन्नाटा, जो पूरे गाँव को अपनी गिरफ्त में ले रहा था। बप्पा ने तय किया कि वह आज रात दादी माँ के मना करने के बावजूद पीपल के पेड़ के पास जाएगा, क्योंकि उसे यथार्थ और कल्पना के बीच की रेखा मिटती हुई महसूस हो रही थी। अपने कैमरे और नोटबुक के साथ वह घर से चुपचाप निकला, ताकि दादी को भनक न लगे। रास्ते में गाँव की गलियाँ जैसे जिंदा थीं—हर मोड़ पर लगा कि कोई छाया उसके पीछे चल रही है। जब वह पीपल के पेड़ के पास पहुँचा, तो अंधेरा इतना गहरा था कि टॉर्च की रोशनी भी जैसे गुम हो रही थी। पेड़ की शाखाएँ हिल नहीं रही थीं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता था जैसे वे सांस ले रही हों—हर पल के साथ फैलती, सिकुड़ती, जैसे कोई जीवित शरीर।

बप्पा ने कैमरा ऑन किया और कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश की, लेकिन स्क्रीन पर कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा था—सिर्फ धुंधली आकृतियाँ और एक लाल रंग का धब्बा, जो तस्वीर के हर कोने में घूमता रहा। तभी एक ठंडी हवा का झोंका आया, और पेड़ की एक शाखा बप्पा के कंधे से टकराई—बिलकुल ऐसे जैसे किसी ने छूने की कोशिश की हो। बप्पा पीछे हटा, लेकिन उसकी आँखें पेड़ के तने पर ठहर गईं—वहाँ कुछ उभरी हुई आकृतियाँ थीं, जैसे किसी ने नाखूनों से गहरा खरोंचा हो। उसने पास जाकर देखा, तो उन खरोंचों से एक शब्द बनता दिखाई दिया—“वापस मत जा।” तभी उसे पीछे से किसी के चलने की आहट सुनाई दी। वह मुड़ा, मगर कोई नहीं था। उसकी सांसें तेज हो गईं और वह पलटा ही था कि सामने नीला खड़ी थी—उसके चेहरे पर भाव शून्य थे, और उसकी आँखें पीली होकर चमक रही थीं।

“तुमने उसे जगा दिया…” नीला की आवाज़ में कोई कंपन नहीं था, बस एक ठंडा निर्विकार भाव। बप्पा ने घबराकर पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?” नीला ने धीरे से कहा, “मैं तो यहीं रहती हूँ… उसी के साथ।” बप्पा पीछे हटने ही वाला था कि नीला धीरे से पेड़ की ओर इशारा करके बोली, “यह पेड़ नहीं, उसकी देह है। हर शाखा उसकी अंगुलियाँ हैं, और जड़ें उसकी साँसें।” बप्पा जैसे ही पीछे मुड़कर भागने को हुआ, उसका पैर किसी चीज़ से टकराया—जब उसने नीचे देखा, तो वहाँ टूटी हुई चूड़ियों के साथ एक कटी हुई चोटी पड़ी थी… और वह अब भी गीली थी। डर अब सिर्फ भाव नहीं रहा, वह अब उसकी साँसों में समा गया था। जैसे-तैसे वह वहाँ से भागा, लेकिन पीछे से नीला की वही आवाज़ गूंजती रही, “अब तू चाहे जहाँ भी जाए, वो तेरे भीतर आ चुकी है।” बप्पा के मन में पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि यह कहानी किसी और की नहीं, अब उसी की है।

***

अगली सुबह बप्पा की आँख खुली तो खिड़की से झाँकती धूप में धूल तैर रही थी, जैसे किसी पुराने ज़माने की फ़िल्म की रील चल रही हो। मगर बप्पा का मन अब भी बीती रात की घटनाओं में अटका था। वह लगातार यह सोचता रहा कि नीला कौन थी—और क्या सच में वह एक इंसान थी? उसने दादी माँ से कुछ पूछना चाहा, लेकिन उन्होंने उसकी आँखों में झाँकते ही सिर हिलाया, “जिसे देख लिया, उसे समझना नहीं चाहिए।” उनका चेहरा इतना सख़्त और भयभीत था कि बप्पा के अंदर कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई। दिन भर वह गाँव के आसपास भटका, बच्चों से बातें कीं, कुछ बुज़ुर्गों से भी—लेकिन जैसे ही वह नीला का नाम लेता, सबके चेहरे उतर जाते, और वे बस एक ही बात कहते—“वो अब भी यहीं है… जो रात में दिखती है, वो दिन का हिस्सा नहीं होती।”

शाम होते ही बप्पा को फिर वही बेचैनी होने लगी। वह एक बार फिर उस जगह गया जहाँ पिछली रात नीला मिली थी। लेकिन आज वहाँ सन्नाटा गहरा था। कुछ ही दूरी पर एक पुराना कुआँ था, जिसके पास एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। अंदर झाँकने पर उसने एक पुरानी लकड़ी की चौकी, दीवारों पर मिट्टी से बनाए गए चिन्ह और एक फटी हुई चुनरी देखी। जैसे-जैसे वह भीतर गया, उसकी नजर एक दीवार पर टंगे दर्पण पर पड़ी—जिसमें उसका प्रतिबिंब नहीं था। तभी उसके पीछे किसी की साँसों की आहट सुनाई दी। वह पलटा, और नीला वहीं खड़ी थी—उसी फीके नीले रंग के झबले में, आँखें अब भी खाली, लेकिन चेहरा जैसे किसी असहनीय दर्द से भरा हुआ। बप्पा ने हिम्मत करके पूछा, “तुम क्या चाहती हो मुझसे?” नीला ने जवाब नहीं दिया, बस पास आकर अपनी हथेली उसके सीने पर रख दी।

बप्पा को अचानक एक झटका सा लगा—जैसे कोई और स्मृति, कोई और जीवन उसके अंदर भर गया हो। उसे एक पल को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह इस गाँव में पहले भी रह चुका है, जैसे नीला से उसका कोई पुराना रिश्ता हो, बहुत पुराना। नीला की आँखों से आँसू बहने लगे, और उसने धीमे से कहा, “तू लौट आया है… मगर इस बार भी देर कर दी तूने।” बप्पा की साँसें थम सी गईं। नीला ने एक आखिरी बार उसकी ओर देखा और कुएँ की ओर मुड़ी। बप्पा चिल्लाया, “रुको!” मगर वह तब तक वहाँ नहीं थी। केवल कुएँ से उठता धुआँ और उसी धुएँ में एक औरत की हँसी, जो धीरे-धीरे पूरे गाँव की दीवारों से टकरा रही थी। उस रात बप्पा को पहली बार यकीन हुआ कि नीला सिर्फ़ एक आत्मा नहीं थी—वह एक टूटी हुई प्रतिज्ञा थी, एक अधूरी कहानी, जो अब उसे पूरी करनी थी।

***

अगली सुबह बप्पा की आँखें बहुत देर से खुलीं, लेकिन उसका शरीर जैसे रात की घटनाओं से थका हुआ था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो उसने देखा—नीला, पेड़, कटी चोटी—वह सब हकीकत थी या किसी गहरे डर से उपजा भ्रम। उसने अपने कैमरे की तस्वीरें देखने की कोशिश की, लेकिन स्क्रीन पर कुछ भी नहीं था—सिर्फ काले फ्रेम और एक अजीब सी फिजरिंग लाइट। जैसे कैमरे ने कुछ रिकॉर्ड तो किया था, लेकिन वह अब किसी और भाषा में तब्दील हो चुका था। दादी माँ ने उससे कुछ पूछने की कोशिश की, लेकिन बप्पा ने टाल दिया। वह खुद से जूझ रहा था—क्या वह नीला को वाकई देख रहा है, या यह उसके दिमाग की कोई रचना है? दिन भर वह चुपचाप बैठा रहा, लेकिन नीला की आँखें, उसकी बातों की ठंडक, पेड़ की साँसें—सब उसकी चेतना के पीछे अंधकार की तरह मंडराते रहे।

शाम ढली, और जैसे ही आसमान लाल हुआ, बप्पा खुद को रोक नहीं सका। वह दादी माँ की नजरों से बचकर फिर उसी जगह गया जहाँ पिछली रात नीला मिली थी। लेकिन इस बार पेड़ शांत था—बिलकुल जड़। कोई सरसराहट नहीं, कोई टहनी की हरकत नहीं। बप्पा ने खुद से पूछा—क्या वह सच में यहाँ आई थी? तभी पीछे से वही आवाज आई, “तुम फिर आ गए।” बप्पा पलटा—नीला खड़ी थी, मगर आज उसके बाल खुले थे और चेहरा उदास। “क्यों आती हो तुम?” बप्पा ने पूछा। नीला कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “क्योंकि तुम मुझे सुन सकते हो।” बप्पा ने उसकी ओर बढ़ते हुए कहा, “तुम कौन हो?” नीला ने अपनी उंगलियों से मिट्टी में कुछ लिखा—‘मैं वो हूँ, जिसे मिटा दिया गया।’ बप्पा सिहर गया, उसकी बातों में न कोई भावना थी, न पीड़ा, बस एक निर्विकार यथार्थ जो उसे अंदर तक झकझोर गया।

नीला धीरे से बोली, “ये गाँव नहीं चाहता कि मैं बोलूं, इसलिए मुझे रातों में ही जीना पड़ता है… लेकिन तुम अलग हो।” बप्पा ने कहा, “क्या हुआ था उस रात?” नीला की आँखों में नमी तैर गई, “मुझे प्यार हुआ था… गलत आदमी से, इस गाँव के लिए तो पाप जैसा। उन्होंने मुझे पीपल से बाँध दिया और आग लगा दी, ताकि मेरी आत्मा भी साथ जल जाए। पर मैं नहीं जली, मैं इस पेड़ में समा गई।” बप्पा की रूह काँप गई—उसके सामने खड़ी यह लड़की कोई भूत नहीं, एक इतिहास थी, जिसे मिटाने की नाकाम कोशिश की गई थी। “मैं अब क्या कर सकता हूँ?” बप्पा ने पूछा। नीला ने कहा, “मेरे सच को लिखो… ताकि मैं केवल डर न रह जाऊँ, एक इंसान बन सकूं… शायद मुक्ति मिल जाए।” वह इतना कहकर गायब हो गई, जैसे एक धुंआ हवा में घुल जाए। बप्पा वहीं खड़ा रह गया, पहली बार डर से नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी को पूरा करने की जिम्मेदारी से।

***

उस रात बप्पा की नींद टूटी एक अजीब सी खरोंचने की आवाज से—जैसे किसी ने लकड़ी की दीवार को नाखून से चीरने की कोशिश की हो। कमरे में अंधेरा घना था, और हवा में धूप-बत्ती जैसी जली हुई गंध थी, मगर उसमें कुछ सड़ा हुआ भी मिला था। वह उठकर खिड़की तक गया, बाहर झाँका—कुछ नहीं था। मगर जैसे ही उसने मुड़ने के लिए कदम बढ़ाया, उसे अपनी परछाईं कुछ भारी लगी, जैसे वह उसकी नहीं, किसी और की हो। पल भर को वह स्तब्ध रह गया—उसकी परछाईं उसके साथ नहीं चल रही थी, वह खुद से अलग, दीवार पर बनी एक और आकृति की तरह थी—झुकी हुई, लम्बी, और आँखों जैसी दो धब्बों वाली। वह बुरी तरह घबरा गया और वापस बिस्तर पर बैठ गया, अपने माथे से पसीना पोंछते हुए, सोचते हुए कि यह डर अब केवल मानसिक नहीं रहा—अब वह उसकी देह के भीतर समा रहा था।

सुबह होते ही बप्पा गाँव के पुराने मंदिर की ओर गया, जहाँ उसने सुना था कि कभी उस लड़की का नाम लिया गया था जिसे पेड़ से बाँधकर मारा गया। मंदिर वीरान था, जर्जर, और अंदर केवल चमगादड़ों की गंध, टूटी मूर्तियाँ और दीवारों पर धुंधले श्लोक। लेकिन सबसे पीछे एक पत्थर की पट्टिका थी, जिस पर कोई नाम खरोंचा गया था—“नी…ला”। आधा मिटा हुआ, जैसे किसी ने जान-बूझकर मिटाया हो। उसी क्षण उसे पीछे से आहट सुनाई दी—मुड़ते ही उसने देखा एक लंबा साया मंदिर के दरवाज़े से बाहर निकल गया। वह दौड़ा, मगर बाहर कुछ नहीं था—सिर्फ धूल, टूटी ईंटें और कुछ उड़ती राख। बप्पा अब समझ गया था कि यह आत्मा अब केवल नीला की नहीं थी—यह साया अब उसके आसपास भी था, उसे घेर रहा था, उसकी सोच में, उसकी नींद में, उसके कैमरे में… शायद उसके भीतर भी।

उसने दादी माँ को सब कुछ बताने का फैसला किया, लेकिन जब वह घर पहुँचा तो देखा दादी माँ बेहोश पड़ी थीं, और उनका बायाँ हाथ कांप रहा था। डॉक्टर को बुलाया गया, लेकिन उन्होंने कहा कि दादी माँ को किसी बहुत गहरे मानसिक आघात ने छुआ है। रात में जब बप्पा उनके पास बैठा, तो दादी ने आँखें खोलीं और फुसफुसाया, “वो अब तुझमें घुस रही है… उसका साया अब तेरा हिस्सा बनता जा रहा है।” बप्पा सन्न रह गया। क्या उसने केवल नीला की आत्मा को जगाया था या उस डर को बुलाया था जो खुद को अब उसकी पहचान बना रहा था? जब वह आईने में झाँकता, तो अब उसकी आँखें भी कुछ और दिखाने लगी थीं—उनमें कोई और झाँक रहा था। डर अब बाहर नहीं था, वह अब उसके भीतर घर कर चुका था।

***

गाँव में पूर्णिमा की रात को लेकर सदियों से डर की परंपरा चली आ रही थी—उस रात कोई घर से बाहर नहीं निकलता, दरवाज़े बंद कर दिए जाते, दीपक बुझा दिए जाते और हर खिड़की पर लाल धागे बाँध दिए जाते थे। बप्पा ने पहले इन बातों को अंधविश्वास समझा था, मगर अब जब नीला की कहानी और साये की मौजूदगी ने उसे अपनी गिरफ़्त में ले लिया था, तब उसे एहसास हुआ कि डर भी एक भाषा है, जिसे ये गाँव पीढ़ियों से बोलता आया है। उस रात आसमान पर चाँद इतना उजला था कि लगता था जैसे पूरी धरती उसकी चमक से धुल रही हो, लेकिन उस उजाले में ही कुछ स्याह, कुछ छिपा हुआ भी था—जैसे रोशनी के भीतर ही एक परछाईं साँस ले रही हो। दादी माँ बिस्तर पर लेटी थीं, और बप्पा उनकी हथेली में तुलसी का पत्ता रखकर उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहा था, मगर उनकी फुसफुसाहट में बार-बार एक ही शब्द लौटकर आ रहा था—“मत निकलना, बप्पा, मत निकलना…”

मगर जैसे किसी अदृश्य डोर ने खींच लिया हो, बप्पा खुद को उस पीपल के पेड़ के सामने खड़ा पाया। चारों ओर अजीब सी खामोशी थी—न कोई जानवर, न पत्तों की सरसराहट, न हवा की आवाज़। बस एक ठहराव, जैसे वक़्त रुक गया हो। पेड़ के तने पर आज पहले से कहीं अधिक उभरी आकृतियाँ थीं, और उन पर चमकती चाँदनी जैसे हर कटाव को खून से भर रही थी। तभी बप्पा को पेड़ के पीछे कोई चलता दिखा—वही नीला। मगर आज उसकी चाल बदली हुई थी, जैसे वह ज़मीन से एक इंच ऊपर चल रही हो। उसका चेहरा साफ़ था, शांत और सुंदर, मगर उसकी आँखों में न भाव था, न उम्मीद। वह धीरे से बोली, “वो आ रहा है…” और इशारा किया पेड़ के सबसे नीचे हिस्से की ओर, जहाँ से ज़मीन खुद-ब-खुद हिलने लगी थी—जैसे कोई चीज़ भीतर से बाहर आना चाहती हो।

अचानक बप्पा की साँसें थमने लगीं, उसकी आँखों के सामने एक धुंध छाने लगी, और पेड़ के नीचे की मिट्टी फट गई। वहाँ से जो निकला, वह कोई इंसानी आकृति नहीं थी—एक लंबा, झुका हुआ काला साया, जिसकी आँखें नहीं थीं, बस दो जलती हुई राख की बूँदें थीं। नीला पीछे हट गई, लेकिन बप्पा वहीं जड़ हो गया। उस साये ने धीरे से उसकी ओर हाथ बढ़ाया, और बप्पा को लगा जैसे उसके सीने पर किसी ने बर्फ से भी ठंडी हथेली रख दी हो। पूरा शरीर सुन्न पड़ गया, और तभी नीला चीख पड़ी, “नहीं! इसे मत छूना, अभी नहीं!” लेकिन देर हो चुकी थी—बप्पा की आँखों में वही राख उतर आई थी, जो उस साये की आँखों में थी। उस रात, जब चाँद सबसे ऊँचा था, गाँव के एक ओर से एक दर्दनाक चीख गूँजी, और फिर सन्नाटा… जैसे किसी की साँसें हमेशा के लिए चुप हो गई हों।

***

पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी, लेकिन भानगढ़ी गाँव पर उसका साया अब भी मंडरा रहा था। सुबह होते ही गाँव के लोग बाहर निकले, मगर कोई भी पेड़ की ओर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। दादी माँ की हालत और भी बिगड़ गई थी—वो बड़बड़ाने लगी थीं, “वो अब हमारा नहीं रहा… अब वो उसका है…” बप्पा, जो अब तक डर और तर्क की लड़ाई में खुद को थामे हुए था, अब किसी गहरे धुँधलके में समा चुका था। उसकी आँखें बदल चुकी थीं—वे अब शांत नहीं थीं, बल्कि उनमें राख की चमक थी, और चेहरा बिना कुछ कहे भी कुछ बोल रहा था। गाँव के बच्चे अब उससे डरने लगे थे, और बूढ़े लोग सिर झुका कर उसकी मौजूदगी से बचने लगे थे। बप्पा खुद भी अपने भीतर कुछ महसूस कर रहा था—जैसे उसकी स्मृतियाँ किसी और की हो रही हों, और उसकी साँसें किसी और की धड़कन से बंध चुकी हों।

उस रात नीला फिर आई—इस बार वह डरी हुई थी। “तुम बदल रहे हो,” उसने कहा, “उसका साया तुम्हें धीरे-धीरे खा रहा है। अगर तुम कुछ नहीं करते, तो अगली पूर्णिमा से पहले तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा।” बप्पा ने धीरे से पूछा, “मैं क्या कर सकता हूँ?” नीला बोली, “जिस अग्नि में मुझे जलाया गया था, वही अग्नि उसकी कैद भी तोड़ सकती है… लेकिन वो आग शुद्ध होनी चाहिए, श्रद्धा और सत्य से जलनी चाहिए। तुम्हें पेड़ को जलाना होगा… और उसके साथ खुद को भी… वरना हम दोनों उसे हमेशा के लिए सौंप दिए जाएँगे।” बप्पा चुप रहा। उसके भीतर का डर अब सवाल नहीं कर रहा था—वह सिर्फ़ उत्तर ढूँढ रहा था। क्या वह खुद को जलाकर इस भय को मिटा सकता है? क्या नीला को मुक्त करना ही उसका अंतिम कर्म है?

अगले दिन बप्पा ने चुपचाप गाँव की पुरानी छावनी से सूखी लकड़ियाँ, घी और कपूर इकट्ठा किया। दादी माँ ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “अगर तुझे उसकी मुक्ति पानी है, तो अपने भीतर के अंधेरे को पहले जलाना होगा।” रात होते ही वह अकेले पीपल के पेड़ के पास पहुँचा, नीला पहले से वहाँ खड़ी थी। उसने चुपचाप लकड़ियाँ सजाईं और चिंगारी जलाई। जैसे ही आग धधकी, पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं, और एक गूंजती हुई चीख हवा में फैल गई—जैसे कोई सदियों पुराना ज़ख्म फिर से खुल गया हो। बप्पा ने आँखें बंद कीं और आग की लपटों में कदम रख दिया। उस क्षण नीला चिल्लाई, “बप्पा!” और कुछ टूट गया—आसमान में बिजली गिरी, पेड़ की जड़ें चटक गईं, और बप्पा के शरीर से एक काली छाया निकलकर धुएँ में विलीन हो गई। कुछ देर बाद, जब सब शांत हुआ, नीला अकेली खड़ी थी—और पहली बार, वह सूरज की किरणों में पूरी तरह दिखाई दे रही थी।

***

जैसे-जैसे आग की लपटें बुझीं, नीला पेड़ की जड़ों के पास बैठ गई, जहाँ राख की परत अब भी सुलग रही थी। हवा भारी थी, लेकिन भय से नहीं—एक अजीब किस्म के हल्केपन से, जैसे कोई लंबी सजा पूरी हो गई हो। नीला की आँखों में न आँसू थे, न सुकून—बस मौन था, जिसमें एक अनकहा धन्यवाद छिपा हुआ था। उसने आकाश की ओर देखा, जहाँ चाँद अब मद्धम था, और उसकी रोशनी में उसे पहली बार दिखा—बप्पा, पर इस बार वो किसी और रूप में था। नीला के सामने एक और छवि उभरी, धुँधली और गहराई से जुड़ी हुई—एक ऐसा चेहरा, जो केवल स्मृति में था, पर फिर भी आत्मा में अंकित। वह बुदबुदाई, “तुम वही हो… जो उस रात मुझे बचाने आया था… और हार गया था।”

वह सब कुछ जैसे फिर से लौट आया—वो पिछला जन्म, जब बप्पा गाँव के पुरोहित का छोटा बेटा था और नीला एक ब्राह्मण लड़की। दोनों का प्रेम वर्जित था, और जब ये बात गाँववालों को पता चली, उन्होंने नीला को पीपल से बाँध दिया और उसे पवित्रता की आड़ में अग्नि को सौंप दिया। बप्पा बचाने पहुँचा था, लेकिन उसे वहीं मार दिया गया। आत्मा समय के गर्भ में भटकती रही, लेकिन अग्नि अधूरी रही, प्रेम अधूरा रहा, और पीपल एक शाप में बदल गया। यही अधूरी आग अब पूरी हुई थी। नीला ने अब समझा कि जो आत्मा बप्पा के भीतर प्रवेश कर रही थी, वह केवल शापित आत्मा नहीं थी, वह उसका ही अधूरा अतीत था, जो उसे बार-बार लौटाकर यहाँ लाता रहा—हर जन्म में, हर समय में।

सुबह हुई, और पहली बार गाँव के लोगों ने देखा कि पीपल का पेड़ गिर गया है—उसकी शाखाएँ राख हो चुकी थीं, और जड़ें मिट्टी में समा गई थीं। दादी माँ धीरे-धीरे बाहर आईं, और जब उन्होंने नीला को देखा, तो उनकी आँखें भर आईं। “तू अब आज़ाद है,” उन्होंने कहा। नीला ने मुस्कराकर सिर झुकाया, और उस क्षण हवा में एक हल्की सी मिठास तैर गई—जैसे बहुत दिनों से थमी हुई साँसों ने अंततः अपना रास्ता पा लिया हो। नीला धीरे-धीरे चलकर उसी राख के पास गई, जहाँ अब कुछ नहीं था, और एक आखिरी बार आँखें बंद करके बोली, “अब अगला जन्म सिर्फ़ जीवन होगा, शाप नहीं।” और धीरे-धीरे उसकी देह मिट्टी में विलीन होने लगी—शांत, मुक्त और उज्ज्वल।

***

भानगढ़ी गाँव अब बदल चुका था। पीपल का शाप जो सदियों से हवा में लटका था, अब जैसे उसके साथ बह गया था। गाँव के लोगों ने पहली बार रात में आकाश की ओर खुलकर देखा—ना सिर पर बंधी लाल धागों की मजबूरी थी, ना खिड़कियों पर डर के पर्दे। मंदिर में फिर से दीप जलाया गया, और वर्षों से बंद पड़ा घंटा पहली बार किसी बच्चे ने बजाया। लेकिन उन सबके बीच, दादी माँ अब भी चुप थीं। उनकी आँखों में एक गहराई थी, जैसे उन्होंने समय को परख लिया हो। जब वे राख के उस चबूतरे के पास आईं जहाँ कभी पीपल खड़ा था, उन्होंने धीमे से ज़मीन को छुआ और बुदबुदाईं, “शायद यही उसकी नियति थी… प्रेम कभी जलता नहीं, बस रूप बदलता है।” उनके स्पर्श से मिट्टी में जैसे एक आखिरी कम्पन हुआ, और फिर सब स्थिर हो गया—मुक्त, शांत।

उसी रात, बप्पा के कमरे की पुरानी अलमारी में एक धूल भरी डायरी मिली, जो किसी को भी याद नहीं थी कि वहाँ कैसे पहुँची। वह नीला की थी—उसमें अधूरी कविताएँ, टूटी चूड़ियों के चित्र, और एक नाम बार-बार उकेरा गया था—‘अनिरुद्ध’। वह नाम जिसे बप्पा कभी नहीं जानता था, मगर अब जैसे उसके भीतर गूंज रहा था। उस डायरी की आखिरी पंक्ति थी: “अगर मेरा अगला जन्म आए, तो बस उसकी आँखों में मुझे फिर से पहचान मिले।” बप्पा का अस्तित्व अब नहीं था, लेकिन उसकी आत्मा कहीं हवा में तैर रही थी, हर शब्द, हर राख के कण में बसी हुई—जैसे उसने प्रेम को पूर्ण किया हो, और मृत्यु को पीछे छोड़ दिया हो। नीला की हँसी अब रात में डर नहीं देती थी, बल्कि दूर जंगलों में किसी पहाड़ी झरने की तरह लगती थी—शुद्ध, आत्मिक, शाश्वत।

कुछ महीने बाद, गाँव में एक नवजात शिशु का जन्म हुआ, जिसकी आँखें गहरी राख जैसी थीं, और जो किसी भी चौंकाने वाली आवाज़ पर भी मुस्करा देता था। दादी माँ ने उसकी ओर देखा और बस इतना कहा, “वो लौट आए हैं।” पीपल का पेड़ नहीं था, मगर उसी जगह अब एक नीम का छोटा सा पौधा उग आया था—जो हर सुबह सूरज की रोशनी में झिलमिलाता और हर रात चाँदनी में नीला चमकता। समय आगे बढ़ गया, लेकिन प्रेम की वह कहानी जो अधूरी थी, अब मिट्टी, राख और धूप में घुलकर पूर्णता पा चुकी थी। भानगढ़ी अब सिर्फ़ एक गाँव नहीं था—वह प्रेम और मुक्ति की भूमि बन चुका था, जहाँ एक शाप ने जन्म लिया था, और एक बलिदान ने उसे सदा के लिए मुक्त कर दिया।

***

वर्षों बीत गए, लेकिन भानगढ़ी की मिट्टी अब भी उस अग्नि की गर्माहट संजोए हुए थी, जिसने दो आत्माओं को न केवल मुक्त किया, बल्कि एक अधूरी कथा को पूर्णता दी। गाँव अब बदल गया था—नई सड़कें बनीं, स्कूल खुला, और लोग बाहर की दुनिया से जुड़ने लगे। लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलीं। हर पूर्णिमा की रात गाँव के मंदिर में अब भी एक दीप जलाया जाता था—न किसी डर से, बल्कि स्मृति और सम्मान से। लोग उस दीप को “प्रेम की लौ” कहते थे, जो सिखाता था कि जिस भय ने कभी उन्हें जकड़ रखा था, वही प्रेम जब सत्य के साथ खड़ा होता है, तो अंधेरे की जड़ें भी उजाले में पिघल जाती हैं।

नीला और बप्पा अब लोककथा बन चुके थे। बच्चे उनके बारे में सुनते और पूछते, “क्या वो सच में थे?” और बुज़ुर्ग मुस्करा कर कहते, “अगर प्रेम सच है, तो वो भी सच थे।” मंदिर की पुरानी दीवार पर किसी ने चुपचाप एक चित्र उकेर दिया था—एक लड़की, जिसका आँचल हवा में उड़ रहा है, और सामने एक पेड़ जो अब राख हो चुका है, मगर उसकी जड़ से एक नन्हा पौधा निकल रहा है। उस चित्र के नीचे केवल दो शब्द थे: “मुक्ति मिली।” गाँव के बच्चे अब उस जगह खेलते थे, जहाँ कभी कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था—क्योंकि अब वहाँ डर नहीं, आशीर्वाद था।

एक दिन, दादी माँ भी इस दुनिया से विदा हो गईं। उनके कमरे में उनके बिस्तर के नीचे से एक पोटली मिली, जिसमें राख, एक लाल कपड़ा और नीला की वही पुरानी डायरी थी। साथ में एक चिट्ठी भी थी—बप्पा के नाम, जो उन्होंने कभी भेज नहीं पाई थीं। उसमें लिखा था, “अगर तुम लौटो, तो जानना… तुमने सिर्फ़ एक आत्मा नहीं, एक युग को मुक्त किया है।” भानगढ़ी की हवाओं में अब एक नई सुगंध घुल चुकी थी—वो प्रेम की, जो डर की राख से उठकर अमरता बन गया था।

___

WhatsApp-Image-2025-06-25-at-5.38.41-PM.jpeg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *