Hindi - यात्रा-वृत्तांत

धागों के उस पार – एक रामेश्वरम यात्रा

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नीलय मेहता


अनिरुद्ध सेनगुप्ता ने स्टेशन पर रुकती उस ट्रेन को देखा तो कुछ देर तक बस खड़ा रहा, जैसे कोई अंतर्मन उसे रोक रहा हो या शायद वही धक्का दे रहा हो जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। चेन्नई एগ्मोर से रामेश्वरम जाने वाली वह रात की ट्रेन उसके लिए किसी साधारण सफ़र का ज़रिया नहीं थी—वह एक ऐसा दरवाज़ा थी, जो उसे उसके भीतर की किसी गूंजती आवाज़ तक ले जाने वाली थी। टिकट खिड़की पर लंबी लाइन, प्लेटफॉर्म की गंध, खड़खड़ाती ट्रॉली और चायवालों की पुकार—यह सब अनिरुद्ध को परिचित सा लगा लेकिन उस दिन हर आवाज़ किसी इशारे की तरह प्रतीत हो रही थी। हाथ में बस एक छोटा बैग, एक पुराना DSLR कैमरा, एक मोटी नोटबुक और जेब में एक मोबाइल फोन जो अब ऑफलाइन हो चुका था—वह कुछ भी नहीं लेकर निकला था, सिवाय अपने टूटे हुए अतीत के टुकड़ों के। ट्रेन की सीट पर बैठते ही उसने खिड़की के बाहर देखा, जैसे शहर से विदा लेते हुए अपने भीतर के शोर को भी विदा कह रहा हो। खिड़की से आती रात की हवा और ट्रेन की लयबद्ध आवाज़ उसके भीतर किसी पुराने गीत की तरह उतरती गई। फोन बंद था, किसी को बताया नहीं था, ऑफिस से लंबी छुट्टी ली थी और उसने खुद से वादा किया था कि इस यात्रा में वह कोई जवाब नहीं ढूंढ़ेगा—सिर्फ सवालों के साथ बैठकर देखेगा कि क्या होता है।

रात की उस लंबी यात्रा में अनिरुद्ध की आँखों में नींद नहीं थी, पर थकान थी—शारीरिक नहीं, मानसिक। कोलकाता में छोड़ा हुआ एक टूटा रिश्ता, अधूरी पेंटिंग्स, छूटती जा रही दोस्ती और ऑफिस के लगातार दोहराते हुए दिन—सब मिलकर उसे एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर चुके थे जहाँ से या तो वह झूठे मुस्कानों के साथ जीता या सब कुछ छोड़कर एक बार खुद से बात करता। और यही दूसरा रास्ता उसे यहाँ तक खींच लाया था। ट्रेन की खिड़की से समंदर की गंध आने लगी थी—उसे पता था कि वह पम्बन ब्रिज के करीब आ चुका है। पम्बन ब्रिज—जहाँ से समुद्र के ऊपर से ट्रेन गुजरती है, और हर यात्री का दिल एक पल को थम जाता है। अनिरुद्ध की भी साँस रुक गई जब उसने देखा—दाईं ओर नीला आकाश, बाईं ओर गहराता समुद्र और बीच में एक संकरा पट्टा जिस पर उनकी ट्रेन तैरती हुई सी चल रही थी। यह दृश्य वह वर्षों से इंटरनेट पर देखता आया था, लेकिन अब, जब वह इसे अपनी आँखों से देख रहा था, तो जैसे उस दृश्य ने उसकी आत्मा पर दस्तक दी हो। उसने कोई फोटो नहीं लिया, बस खामोशी से उस लम्हे को महसूस किया। पम्बन ब्रिज को पार करते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह अपने भीतर के किसी पुल को भी पार कर गया हो—जो अब तक टूटा हुआ था, लेकिन इस लहराती, झूमती ट्रेन ने उसे फिर से जोड़ दिया।

सुबह की पहली किरणों के साथ ट्रेन रामेश्वरम पहुंची, और स्टेशन की मिट्टी, हवा और शांति ने जैसे उसका स्वागत किया। कोई भीड़ नहीं, कोई भागदौड़ नहीं, बस एक शांत द्वीप जैसा अहसास। ऑटो वालों की सामान्य सी आवाजें, नारियल के झुके हुए पेड़, और मंदिर की घंटियाँ दूर से सुनाई देती रहीं। अनिरुद्ध ने एक सस्ता सा लॉज लिया, खिड़की से समंदर दिखता था और कमरे में एक टेबल जिस पर वह अपनी डायरी रख सका। उसने अपने जूते उतारे, कैमरा खिड़की पर रखा और चुपचाप कुछ देर तक खड़ा रहा, जैसे यह तय नहीं कर पा रहा हो कि क्या उसे बाहर निकलना चाहिए या पहले भीतर झांकना चाहिए। अंततः उसने डायरी खोली और पहले पन्ने पर लिखा—”मैं यहाँ क्यों आया हूँ, यह मुझे नहीं पता—but I know I was dying to come.” बाहर मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर लोग जा रहे थे, कुछ समूहों में, कुछ अकेले, लेकिन सबके चेहरों पर एक उद्देश्य था—मोक्ष, स्नान, दर्शन या प्रायश्चित। अनिरुद्ध के पास ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था—उसे बस एक चीज़ चाहिए थी—एक जगह जहाँ वह बिना कुछ कहे, सब कुछ कह सके। और यही खोज, इस यात्रा का पहला अध्याय बन गई—एक खामोश शुरुआत, जहाँ ट्रेन की आवाज़, समंदर की गंध और खिड़की से आती रोशनी ने मिलकर अनिरुद्ध को उसकी खोई हुई भाषा की पहली धुन सिखाई।

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रामेश्वरम की सुबहें बाकी जगहों की तरह नहीं होतीं—यहाँ सूरज चुपचाप उठता है, समंदर की लहरें बिना शोर के तट पर दस्तक देती हैं, और हवा में नमक की एक हल्की परत होती है जो आपको जगाने के लिए नहीं, बल्कि सुलाने के लिए आती है। अनिरुद्ध जब अपने कमरे की खिड़की खोलता है, तो सामने फैला समंदर उसके भीतर की उस बेचैनी को शांत कर देता है, जो वह कोलकाता से साथ लेकर आया था। वह कुछ देर तक वहीं खड़ा रहता है, कैमरे को हाथ में लिए बिना कोई तस्वीर खींचे, क्योंकि कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिन्हें आँखें ही कैद कर सकती हैं। लॉज के नीचे एक छोटी सी चाय की दुकान है जहाँ दो-तीन तीर्थयात्री बैठकर गरम इडली-सांभर के साथ दिन की शुरुआत कर रहे हैं। अनिरुद्ध वहां जाकर एक कप फिल्टर कॉफी मांगता है और बगल की लकड़ी की बेंच पर बैठ जाता है। उसका कैमरा अब भी बंद है, लेकिन उसकी आँखें हर चेहरे को जैसे स्कैन कर रही हैं—हर चेहरा, हर झुर्री, हर मुस्कान एक कहानी लगती है। वह चायवाले से पम्बन ब्रिज के बारे में पूछता है, और वह मुस्कुराते हुए कहता है, “वो तो जादू है साहब, एक बार देखिए… फिर लौटना मुश्किल हो जाता है।”

अनिरुद्ध ने तय किया कि वह दोबारा पम्बन ब्रिज देखने जाएगा, लेकिन इस बार कैमरा लेकर। वह एक किराए की स्कूटी लेता है और उस दिशा में निकल पड़ता है जहाँ से ट्रेनें समंदर के ऊपर चलती हैं और सड़क किनारे हवा किसी प्राचीन मंत्र की तरह कानों में फुसफुसाती है। रास्ता सीधा है, लेकिन अनुभव टेढ़ा—हर मोड़ पर समंदर झलकता है, हर पेड़ के पीछे एक कहानी छुपी है, और हर छाया में एक प्रश्न। जैसे ही वह पम्बन ब्रिज के पास पहुँचता है, उसकी गति धीमी हो जाती है। वह स्कूटी किनारे खड़ी करता है और पैदल पुल के किनारे तक जाता है, जहाँ लोग खड़े होकर समुद्र की गहराई को निहारते हैं। नीचे नीले पानी में मछलियाँ तैर रही हैं, एक नाव किसी दूर के द्वीप की ओर जा रही है, और ऊपर से एक ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। यही वह क्षण है जब अनिरुद्ध अपना कैमरा निकालता है, लेकिन क्लिक नहीं करता। वह समझता है कि कुछ अनुभवों की तस्वीरें लेना उन्हें बाँधना है, और वह इस पल को खुला रखना चाहता है। वह महसूस करता है कि इस पुल के दोनों छोर उसके जीवन के दो पड़ाव हैं—एक जहाँ वह सब कुछ पीछे छोड़ आया है, और दूसरा जहाँ अभी कुछ तय नहीं, लेकिन शायद खुद से मिलने की संभावना है। वह वहीं पुल पर बैठ जाता है, समंदर की हवा में खुद को बहने देता है और पहली बार कुछ लिखने के बजाय कुछ महसूस करता है।

उसकी डायरी उस शाम नहीं खुलती। वह लौटते समय बीच में एक छोटी सी मछुआरा बस्ती में रुकता है। बच्चे सीपियाँ इकट्ठा कर रहे हैं, महिलाएँ जाल समेट रही हैं और पुरुष नावें किनारे खींच रहे हैं। अनिरुद्ध वहाँ कुछ देर बैठकर बस देखता है। एक बच्चा पास आकर उससे पूछता है, “आप टीवी वाले हो?” अनिरुद्ध हँस पड़ता है और कहता है, “नहीं, मैं खुद को देखने आया हूँ।” बच्चा उसकी बात नहीं समझता, लेकिन उसका कैमरा देखकर कहता है, “मेरा फोटो लोगे?” अनिरुद्ध उसके मासूम चेहरे की एक तस्वीर लेता है, और वो तस्वीर उसके लिए सिर्फ एक चेहरा नहीं, एक संकेत बन जाती है—एक रास्ता, जो उसे धीरे-धीरे उस जीवन की ओर ले जा रहा है जहाँ बाहरी शोर कम है और भीतर की आवाज़ें ज़्यादा स्पष्ट। वापस कमरे में आकर वह कैमरे से वो फोटो निकालता है और नोटबुक के पहले पन्ने के नीचे लिखता है: “कभी-कभी समंदर के ऊपर एक रास्ता नहीं होता, बस एक एहसास होता है—कि तुम उस पार जा सकते हो, अगर खुद को बहने दो।” उस रात वह कोई सपना नहीं देखता, लेकिन उसे नींद में पम्बन ब्रिज की लहरें सुनाई देती हैं—जैसे किसी ने उसके कान में कहा हो, “अभी बहुत कुछ बाकी है।”

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रामेश्वरम के जिस सड़क से अनिरुद्ध मंदिर की ओर बढ़ रहा था, वह कोई सामान्य सड़क नहीं थी—वह श्रद्धा, व्यापार, संस्कृति और शांति का एक जीवंत चित्र बन चुकी थी। सड़क के दोनों ओर मंदिर से जुड़ी वस्तुएँ बेचने वाले दुकानदारों की कतारें थीं—शंख, रुद्राक्ष, काले पत्थर के शिवलिंग, छोटे चांदी के घंटियाँ, और मणिपुरी कपड़ों में लिपटी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ। इन दुकानों से उठती चंदन, अगरबत्ती और नारियल पानी की गंध में कुछ ऐसा था जो अनिरुद्ध को भी भक्ति की उस छाया में खींच लाया, जिससे वह हमेशा दूर रहता था। कैमरा उसके गले में लटक रहा था लेकिन आज वह तस्वीर नहीं खींचना चाहता था—आज उसे खुद इस चित्र का हिस्सा बनना था। रामनाथस्वामी मंदिर के मुख्य द्वार के सामने खड़ा होकर उसने देखा—प्राचीन द्रविड़ शैली की वास्तुकला, असंख्य स्तंभों की कतारें और भीतर से आती गूंजती मंत्रध्वनि, मानो सदीयों से चली आ रही प्रार्थनाएं अभी भी हवा में तैर रही हों। एक अनजान श्रद्धालु की तरह, उसने जूते उतारे, टिकट लिया और चुपचाप मंदिर के गर्भगृह की ओर बढ़ चला।

मंदिर के भीतर की शांति बाहरी गहमा-गहमी से बिल्कुल उलट थी—वहाँ समय थमा हुआ लगता था। मंदिर की प्रसिद्ध 22 कुंड स्नान की प्रक्रिया को देखकर अनिरुद्ध पहले चकित हुआ और फिर आकर्षित। हर कुंड में स्नान करने के बाद लोग गीले कपड़ों में भी एक अलग तरह के तेज के साथ आगे बढ़ते जाते थे। एक पुजारी ने जब उसे पूछा, “स्नान करोगे?”, तो पहले वह हिचकिचाया, लेकिन फिर न जाने क्या हुआ कि उसने सिर हिलाकर हाँ कह दी। पहला जलकुंड जैसे ही उसके सिर पर पानी गिरा, वह चौंका—ठंडा, खारा और एकदम तेज। हर कुंड के जल में एक अलग स्पर्श था, एक अलग कहानी। जब वह 22वें कुंड तक पहुँचा, तो उसे ऐसा लगा जैसे उसका शरीर ही नहीं, उसकी स्मृतियाँ भी धुल चुकी थीं। मंदिर के विशाल प्रांगण में गीले वस्त्रों में बैठा अनिरुद्ध, अपने जीवन के उन हिस्सों को दोबारा देख रहा था, जिन्हें उसने खुद से भी छिपाकर रखा था—माँ का अचानक जाना, कॉलेज की दोस्ती जो ईगो में टूट गई, प्रेम जो निभ न सका और वह अकेलापन जो उसने हमेशा कैमरे के पीछे छिपा लिया था। मंदिर की घंटियों की गूंज के बीच, अनिरुद्ध ने पहली बार खुद से कहा—”शायद यह भी पूजा है, जब तुम बिना बोले अपनी टूटन को किसी शक्ति के सामने रख दो।”

मंदिर से लौटते समय वह मंदिर के बाहर बैठी एक वृद्धा के पास रुक गया, जो चावल से बनी रंगोली के पास बैठी थी। उसके पास कुछ मोती बिखरे हुए थे, जिन्हें वह एक धागे में पिरो रही थी—बिना कुछ कहे, बिना किसी बेचैनी के। अनिरुद्ध ने पूछा, “क्या बेचती हैं?” वृद्धा मुस्कुराकर बोली, “धागों में बंधा विश्वास।” उसने अनायास ही एक मोती की माला खरीद ली—सिर्फ इसलिए नहीं कि वह सुंदर थी, बल्कि इसलिए कि उस वृद्धा की आँखों में एक ऐसी शांति थी, जो उसे मंदिर के गर्भगृह में भी महसूस नहीं हुई थी। जब वह लौट रहा था, तो मंदिर की छाया लंबी हो चुकी थी, सूर्य पश्चिम में झुकने लगा था और सड़क पर कम भीड़ थी। उसके गीले बाल अब सूखने लगे थे, लेकिन मंदिर में बीते लम्हे अब भी उसकी आत्मा को भिगोए हुए थे। कमरे में पहुँचकर, उसने डायरी खोली और लिखा: “आज मैंने पहली बार प्रार्थना की… बिना बोले, बिना माँगे, सिर्फ खुद से मिलने के लिए।” उस दिन न उसने तस्वीरें लीं, न पोस्ट किया, न किसी को बताया कि वह कहाँ है—क्योंकि कुछ यात्राएँ सिर्फ तुम्हारे और तुम्हारे मौन के बीच होती हैं, और जब मौन बोलने लगे, तब शब्द की ज़रूरत नहीं रहती।

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कमरे की दीवार पर गिरती पीली धूप की पट्टियाँ जब अनिरुद्ध की आंखों में चुभीं, तो उसे एहसास हुआ कि वह दिन चढ़े तक सोता रहा था—या शायद उस रात की थकान अभी तक उतरी नहीं थी, जो मंदिर के भीतर अपने ही सवालों के साथ बिताई गई थी। उठते ही उसने डायरी खोली, लेकिन कल लिखी अंतिम पंक्तियाँ अब अधूरी-सी लग रही थीं, जैसे उनके पीछे कुछ और था जिसे वह कह नहीं पाया था। उसने अनमने हाथों से कैमरा उठाया और कमरे में ही इधर-उधर खींची तस्वीरों को पलटने लगा—दीवार पर लटकता पंखा, खिड़की से झांकती रोशनी, पलंग के नीचे पड़ी एक टूटी चप्पल—सबकुछ सामान्य, लेकिन किसी छिपे हुए अर्थ से भरा हुआ। और फिर, वह तस्वीर सामने आई जिसे उसने धनुषकोडी जाने से पहले एक शाम मंदिर के बाहर खींची थी—एक आदमी, जिसकी आँखों में भय नहीं था, लेकिन गहराई थी; जो अनिरुद्ध की ओर देख रहा था जैसे उसे पहचानता हो, लेकिन नाम नहीं जानता। उस तस्वीर को देखकर अनिरुद्ध जैसे चौंक गया। उस आदमी को उसने सिर्फ एक बार देखा था, लेकिन उसकी आँखें अब भी पीछा कर रही थीं। क्या यह किसी संयोग का खेल था या उसके भीतर चल रहे द्वंद्व की कोई प्रतीकात्मक परछाईं?

उस दिन वह कहीं बाहर नहीं गया। कमरा ही उसका मंदिर, प्रश्नोत्तर कक्ष और दर्पण बन गया था। उसने कैमरे को बंद करके बिस्तर के कोने में रख दिया और एक पुराने बैग से कुछ कागज़ निकाले। ये वही पन्ने थे जिन्हें वह कभी कॉलेज के दिनों में लिखा करता था—छोटे कविताओं के अंश, अधूरी कहानियाँ, और सबसे ऊपर एक चिट्ठी जो कभी पोस्ट नहीं की गई थी। वह चिट्ठी किसी प्रिय को संबोधित थी, शायद उस लड़की को जिससे वह एक समय प्रेम करता था, लेकिन अपने भय और असुरक्षा के चलते कभी उसे बता न सका। चिट्ठी में लिखा था: “अगर मैं खुद से मिल पाऊँ, तो शायद तुम्हें बेहतर तरीके से समझ पाऊँगा।” यह पंक्ति पढ़कर उसकी आंखों में एक अजीब सी नमी उतर आई, लेकिन वह रोया नहीं—बस, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को हवा लगी हो और वह अब ठीक होने की दिशा में बढ़ रहा हो। वह जानता था कि भूतकाल के उन छायाओं से वह लड़ नहीं सकता—उसे उन्हें समझना होगा। उस दिन उसने पहली बार डायरी में अपने नाम के नीचे एक तारीख लिखी और लिखा: “मैंने अतीत को पुकारा नहीं, लेकिन वह लौट आया। शायद वह यह देखने आया है कि मैं अब कैसा हूँ।”

शाम होते-होते वह कमरे के बाहर की बालकनी में आ गया, जहाँ से दूर समंदर दिखता था, लेकिन आज लहरें शांत थीं—जैसे वे भी कुछ सोच रही हों। उसने अपनी नोटबुक के पिछले पन्ने में एक स्केच बनाया—एक आदमी, जिसके सिर पर कैमरा है, लेकिन आंखें बंद हैं। नीचे उसने लिखा: “देखना तब तक अधूरा है, जब तक हम खुद को नहीं देखते।” वह समझ गया था कि रामेश्वरम का यह सफ़र सिर्फ चित्रों का संग्रह नहीं, आत्मा की पुनर्संरचना है। उस दिन रात को वह मंदिर नहीं गया, स्कूटी नहीं चलाई, किसी समुद्रतट पर नहीं बैठा—वह बस अपने कमरे में रहा, खुद के उन हिस्सों के साथ जिनसे वह वर्षों से भागता आया था। बाहर की चुप्पी अब उसके भीतर भी बसने लगी थी, और यह चुप्पी डरावनी नहीं लग रही थी—बल्कि सुकूनदेह थी। अनिरुद्ध ने सोचा, “अगर मैं इस चुप्पी में टिक पाया, तो शायद मेरे सारे सवाल खुद ही मुझसे बोल उठेंगे।” और इसी सोच के साथ उसने लाइट बुझाई, खिड़की खोली और उस शांत समंदर की आवाज़ों में खुद को फिर से डूब जाने दिया।

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धनुषकोडी—एक नाम जो बचपन से अनिरुद्ध के लिए किसी कहानी की तरह था। एक उजड़ा शहर, समुद्र में डूब चुका स्टेशन, आधे बने चर्च, बालू में दबे घर और खंभे जो अब सिर्फ हवा की दिशा बताते हैं। लॉज के रिसेप्शन पर बैठा वृद्ध जब बोला—“धनुषकोडी जाएगा? वहाँ सिर्फ रेत, खामोशी और पुरानी आत्माएँ मिलेंगी”—तो अनिरुद्ध को जैसे किसी ने उसे वहीं जाने का न्योता दिया हो। अगली सुबह सूरज उगते ही वह एक जीप किराए पर लेकर निकल पड़ा। रास्ता लहरदार था, और सड़क जल्दी ही मिट्टी और फिर रेत में बदल गई। समंदर दोनों ओर से पास आता जा रहा था, जैसे एक गलियारे में वह घुस चुका हो। कहीं-कहीं झुके हुए नारियल के पेड़, एक ओर नीला समुद्र, दूसरी ओर बिखरे हुए खंडहर और आसमान पर तैरते बगुले—धनुषकोडी किसी परियों की दुनिया की तरह नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा आईना था जिसमें समय और विनाश एकसाथ अटके हुए थे। अनिरुद्ध ने जैसे ही जीप से पैर नीचे रखा, उसे अपने जूतों की आवाज़ से चिढ़ होने लगी—यह धरती इतनी शांत थी कि हर चलती चीज़ उसमें खलल डालती थी। रेत पर चलते हुए उसे पुराना रेलवे स्टेशन दिखा—एक चुप खंभा, जिस पर अब नाम नहीं, बस नमक की परतें थीं। कोई यात्री नहीं, कोई ट्रेन नहीं—फिर भी वहाँ एक प्रतीक्षा अब भी टिके रहने का दावा कर रही थी।

आगे बढ़ते हुए अनिरुद्ध की नज़र एक छोटे से शिव मंदिर पर पड़ी, जो अब भी खड़ा था—रेत में आधा डूबा, लेकिन बेलपत्रों और चढ़े फूलों से सजा हुआ। उसके पास ही एक पीले रंग का झोंपड़ी जैसा ढाँचा था, जहाँ बैठा था एक वृद्ध साधु। उजली दाढ़ी, कांसे की थाली में बेलपत्र, और आँखें जो जैसे वर्षों से किसी को देखे बिना भी सब देखती आई थीं। अनिरुद्ध वहीं चुपचाप बैठ गया। कुछ मिनटों तक दोनों के बीच मौन पसरा रहा, फिर साधु बोला, “फोटोग्राफर?” अनिरुद्ध ने सिर हिलाया। साधु मुस्कुराया, “यहाँ कुछ नहीं मिलेगा कैमरे से… जो मिलेगा वो भीतर के लेंस से देखना पड़ेगा।” ये शब्द जैसे तीर की तरह उसकी चेतना में उतर गए। फिर साधु ने इशारे से आकाश की ओर देखा और कहा, “वो देखो, ये शहर जो अब नहीं है, वो कभी बहुत कुछ था। लेकिन देखो, सब बह गया, मिट गया—फिर भी कुछ टिक गया।” अनिरुद्ध ने पूछा, “क्या?” साधु ने अपनी छाती पर हाथ रखते हुए जवाब दिया, “यादें नहीं, समझ… और समझ नहीं, मौन।” उस एक वाक्य में वह गहराई थी, जो न ग्रंथों में थी, न यात्राओं में—बस अनुभवों की राख में सुलगती चिंगारी थी। अनिरुद्ध ने साधु से कोई और सवाल नहीं पूछा। दोनों ने साथ में खिचड़ी खाई, और समंदर की लहरें देखने लगे—मानो अब कोई शेष नहीं रहा कहने को।

धूप ढलने लगी थी, रेत अब सुनहरी हो चुकी थी और समंदर की लहरें तेज़। वापसी की जीप रुकने लगी, लेकिन अनिरुद्ध जाने से पहले साधु से एक बात और पूछना चाहता था। उसने कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि मैं किसे ढूंढ़ रहा हूँ।” साधु ने धीरे से उत्तर दिया, “शायद किसी को नहीं—शायद उस धागे को जिसे तुमने खुद के चारों ओर लपेट रखा है। उसे खोलना नहीं, बस उसके पार देखना सीखो।” ये शब्द उसकी आत्मा पर किसी मंत्र की तरह बैठ गए। जीप में लौटते हुए अनिरुद्ध ने कैमरे से धनुषकोडी की कोई तस्वीर नहीं ली। उसने खुद से वादा किया—”जो मेरी स्मृति में ऐसे ही जीवित रह सकता है, उसे एक फ्रेम में कैद करने की ज़रूरत नहीं।” वापस लौटते समय, जब आकाश लाल हो रहा था और समंदर काली चादर ओढ़ रहा था, अनिरुद्ध ने अपनी डायरी में सिर्फ तीन शब्द लिखे: “खंडहरों में जीवन।” और उन शब्दों में वह सारा अर्थ समा गया, जिसे वह अब तक सैकड़ों शब्दों में पकड़ने की कोशिश करता रहा था।

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वापसी की रात अनिरुद्ध के लिए केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि भीतर से बदलते किसी मौसम की दस्तक थी। धनुषकोडी से लौटने के बाद वह जब अपने कमरे में आया, तो समुद्र की लहरों की वह गूंज अब भी उसके भीतर बज रही थी। साधु के कहे वाक्य—“धागों के पार देखना सीखो”—कानों में गूंजते रहे जैसे किसी प्राचीन ऋचा की पुनरावृत्ति हो। कमरे की दीवारों पर पड़ती धुंधली छाया, बंद पंखे की घरघराहट, और खिड़की से आती समंदर की खुशबू—सब मिलकर जैसे उसके भीतर किसी बंद द्वार को खटखटाने लगे। उसने कैमरे को अलमारी के ऊपर रख दिया, डायरी खोली लेकिन पेन नहीं उठाया। पहली बार वह शब्दों से नहीं, मौन से भर रहा था। वह बिस्तर पर लेट गया, और छत की ओर देखकर सोचने लगा—”हम सब अपने-अपने धागों में लिपटे हुए हैं, जो रिश्तों, उम्मीदों, पछतावे, और असुरक्षा के ताने-बाने से बने हैं। और हम इन्हें खोलने में इतना समय लगा देते हैं कि उनके पार देखना ही भूल जाते हैं।” उसी रात पहली बार उसे अपने भीतर कुछ सरकता हुआ महसूस हुआ—जैसे कोई जमी हुई चीज़ पिघल रही हो, या कोई पुराना दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

सुबह की पहली रोशनी जब कमरे की दीवार पर उतरी, तो अनिरुद्ध के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। उसने बिना कुछ बोले, बिना कैमरा उठाए, सिर्फ एक रेखाचित्र बनाया अपनी डायरी में—एक साधारण चेहरा, जिसके चारों ओर रेखाओं से लिपटा हुआ एक जाल था, और उसके ऊपर एक छोटा सा सूरज। नीचे लिखा था: “प्रकाश तभी दिखता है, जब धागे छांव बनकर ढलते हैं।” उस दिन वह किसी पर्यटक की तरह नहीं, एक साधक की तरह रामेश्वरम की गलियों में निकला। उसने न मंदिर देखा, न समुद्र—वह बस चलते गया, उन राहों से जहाँ लोगों की आवाज़ें कम थीं और घरों की दीवारों पर लटकते तुलसी के पौधों में जीवन साँस लेता था। एक जगह एक वृद्धा कपड़े धो रही थी, दूसरी ओर बच्चे नींबू बेच रहे थे। हर चेहरा जैसे उसकी कहानी कहता, हर कदम जैसे उसे उसकी ओर ले जाता। उस सादगी में वह सौंदर्य था, जो किताबों में नहीं, जीवन के खुरदुरे किनारों में पनपता है। अनिरुद्ध को एहसास हुआ कि यह यात्रा जिस उत्तर की तलाश में थी, वह उत्तर कोई शब्द नहीं था—बल्कि वह मौन था, जो अब उसमें जगह बना चुका था।

शाम को जब वह समुद्र तट पर पहुँचा, तो उसे किसी तीर्थ जैसी अनुभूति हुई। वह बालू पर नंगे पाँव चला, लहरों को छुआ और बिना कोई इच्छा व्यक्त किए समंदर की ओर एक नज़र डाली—मानो कह रहा हो, “मैं अब समझ चुका हूँ।” वहाँ बैठकर उसने अपनी डायरी में सिर्फ एक वाक्य जोड़ा—“मैं अब बहने के लिए तैयार हूँ।” पीछे मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं, दूर नावों की परछाइयाँ लहरों पर तैर रही थीं, और आकाश में उड़ते पक्षी जैसे उसकी आत्मा को एक नया विस्तार दे रहे थे। कैमरा अब भी उसके पास था, लेकिन वह जानता था कि कुछ चीज़ें सिर्फ जीने के लिए होती हैं, पकड़ने के लिए नहीं। उस दिन की रात उसने कोई किताब नहीं पढ़ी, कोई संगीत नहीं सुना—वह सिर्फ खिड़की से समंदर की ओर देखता रहा, और उन धागों को देखता रहा जो अब भी उसे घेरे हुए थे, लेकिन अब वे उसे बाँध नहीं रहे थे। वह जान गया था कि देखने का सबसे सच्चा तरीका है—अपनी आंखों को बंद करके, भीतर देखना।

***

अनिरुद्ध ने उस दिन सुबह सूरज के उठने से पहले ही अपने कमरे से निकल जाने का फैसला कर लिया था। रेत पर चलने से पहले उसने जूते भी नहीं पहने—बस नंगे पाँव, कैमरा कंधे पर, डायरी हाथ में, वह चुपचाप उस तट की ओर बढ़ चला जहाँ कल रात उसकी आँखें देर तक लहरों में अटकी रही थीं। समंदर अभी शांत था, जैसे किसी गहरी नींद से उठा हो और अभी पूरी तरह जागा न हो। तट पर केवल कुछ मछुआरे दिखाई दे रहे थे, जो अपनी नावों में जाल समेट रहे थे, और दूर एक वृद्ध दंपति सूर्य को नमस्कार कर रहे थे। अनिरुद्ध उनसे दूर एक सुनसान जगह बैठ गया, जहाँ से समंदर उसके सामने खुला पड़ा था और पीछे कोई आवाज़ नहीं थी जो उसे विघ्न पहुंचा सके। उसने अपनी डायरी खोली, पेन उठाया, लेकिन लिखने से पहले उसने अपनी हथेलियाँ रेत पर रख दीं—जैसे वो इस धरती से जुड़ जाना चाहता हो। उस मौन में बैठकर, जब सिर्फ लहरों की आवाज़, हवा की सनसनाहट और दिल की धड़कन साथ थीं, उसने खुद से वह सवाल पूछे जो वर्षों से भीतर दबे पड़े थे—”मैं क्या हूँ जब कोई मुझे नहीं देखता? क्या मेरा होना सिर्फ तस्वीरों में है, या रिश्तों में, या मेरी यादों में?”

इन सवालों के जवाब उसे तुरंत नहीं मिले, लेकिन कुछ बदलता हुआ-सा महसूस हुआ। उसने डायरी में लिखा—“हम खुद को तभी जान पाते हैं जब हमारा परिचय किसी और से नहीं, खुद से होता है। जब हमारे भीतर की आवाज़ें इतनी स्पष्ट हो जाती हैं कि बाहरी शोर उन्हें दबा नहीं पाता।” थोड़ी देर बाद, जब सूरज पूरी तरह निकल आया और उसका प्रकाश लहरों पर चमकने लगा, तो अनिरुद्ध ने अपने कैमरे से एक तस्वीर ली—लेकिन यह किसी इंसान की नहीं थी, न किसी दृश्य की। यह एक खाली नाव की तस्वीर थी, जो लहरों पर हिचकोले खा रही थी लेकिन बंधी नहीं थी। उस तस्वीर में उसे अपने जीवन का रूपक दिखा—”एक नाव, जो बंधन के बिना भी दिशा पा सकती है।” उस एक क्लिक के बाद उसने कैमरा बंद कर दिया और डायरी में नीचे लिखा—“कभी-कभी सबसे सच्ची यात्रा वो होती है, जिसमें तुम खुद को सवालों के हवाले कर दो और उत्तरों की परवाह छोड़ दो।” वह उठकर फिर से तट पर चलने लगा, लेकिन अब उसके पाँव रेत में पहले से कम धँस रहे थे—शायद भीतर का भार कुछ हल्का हो चला था।

दोपहर को वह उसी जगह लौट आया जहाँ पहले दिन मंदिर के बाहर बैठी वृद्धा ने उसे ‘धागों में बंधा विश्वास’ दिया था। वह वहाँ नहीं थी, लेकिन उसकी जगह कोई छोटा बच्चा बैठा था, जो रुद्राक्ष की माला बेच रहा था। अनिरुद्ध ने उससे कुछ नहीं खरीदा, बस बैठ गया। कुछ देर बाद उसने बच्चे से पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, ये चीज़ें बेचकर लोग क्या पाते हैं?” बच्चा बोला, “शायद वो शांति ढूंढ़ते हैं… जैसे मम्मी कहती है—भगवान चीज़ों में नहीं, नीयत में होता है।” उस मासूम उत्तर ने अनिरुद्ध को भीतर तक हिला दिया। वह उठा, बच्चे को एक चॉकलेट दी जो उसकी जेब में कहीं से निकल आई थी, और मुस्कराते हुए कहा, “शायद भगवान आज मुझे तुझमें मिला।” उस दिन वह ज्यादा नहीं घूमा, ज्यादा नहीं लिखा—बस बैठा रहा एक जगह, और पहली बार उसे लगा कि उसकी उपस्थिति ही पर्याप्त है। ना किसी भूमिका की ज़रूरत, ना किसी परिभाषा की। और जब रात को वह अपने कमरे में लौटा, खिड़की से लहरों की आवाज़ सुनते हुए, उसने अपनी डायरी के सबसे पहले पन्ने पर फिर से लिखा—“मैं कौन हूँ जब कोई मुझे नहीं देखता? शायद वो… जो आज खुद को देख सका।”

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अगली सुबह अनिरुद्ध ने पहली बार अपने कैमरे को बड़े सहेज के साथ उठाया, जैसे किसी पुराने दोस्त से फिर से मिलने जा रहा हो। लेकिन इस बार उसका दृष्टिकोण कुछ अलग था—अब वह तस्वीरें सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि संवेदना के लिए लेना चाहता था। वह रामेश्वरम के बाहरी इलाकों की ओर निकल पड़ा, जहाँ पर्यटक कम आते हैं और स्थानीय जीवन अपने असली रूप में साँस लेता है। रास्ते में वह एक छोटे-से मछुआरा गांव पहुँचा, जहाँ लोग छप्पर के घरों में रहते थे, और आँगन में बैठी महिलाएं जाल बुनने के साथ-साथ बच्चों को दुलारती थीं। वहाँ कोई तामझाम नहीं था—न बिजली की गाड़ियों की आवाज़, न मोबाइल की रिंगटोन—बस चूल्हे की धीमी आंच, नारियल की छाँव और नमक भरी हवा। अनिरुद्ध ने पहले तो कैमरा नहीं उठाया। वह वहाँ बैठा, बच्चों के साथ सीपियाँ इकट्ठा कीं, बुज़ुर्गों से उनके जीवन की कहानियाँ सुनीं, और चाय पीते हुए एक वृद्ध मछुआरे से पूछा, “आपकी सबसे कीमती चीज़ क्या है?” उसने हँसते हुए उत्तर दिया—“ये नाव नहीं, साहब… मेरी बीवी की वो तस्वीर है, जो शादी के दिन खिंचवाई थी। अब नहीं है वो, लेकिन तस्वीर है… वही रोज़ मुझसे बात करती है।” यह सुनकर अनिरुद्ध की आंखें नम हो गईं। तभी पहली बार उसने कैमरा उठाया और उस आदमी की एक तस्वीर खींची—जिसमें चेहरा झुर्रियों से भरा था, लेकिन आँखें किसी रोशनी से चमक रही थीं।

इस बार अनिरुद्ध ने जो भी तस्वीरें लीं, उनमें कुछ अलग था। कोई सजावट नहीं, कोई पोज़ नहीं, कोई तैयारी नहीं—बस जीवन का वैसा प्रवाह जो बिना कहे बहुत कुछ कह देता है। एक बुजुर्ग महिला जो अपने पोते को गोदी में लिए गुनगुना रही थी; एक बच्चा जो टूटी साइकिल को चप्पल की पट्टी से जोड़ रहा था; एक नौजवान जो नाव रंगते हुए गा रहा था—इन सबमें अनिरुद्ध ने जीवन की एक नई भाषा देखी। उसकी आँखें अब फ्रेम नहीं खोज रहीं थीं—फ्रेम खुद उसे बुला रहे थे। वह समझ गया था कि कला का उद्देश्य सुंदरता भर नहीं, सच्चाई तक पहुँचना भी है। इन तस्वीरों को देखकर उसे कोलकाता की वह प्रदर्शनी याद आई जहाँ लोग सिर्फ ‘अलग’ या ‘शानदार’ तस्वीरें देखना चाहते थे, लेकिन कभी-कभी जो आम है, वही सबसे दुर्लभ होता है। शाम को वह जब लौटकर अपने लॉज के छोटे से टेबल पर बैठा, तो पहली बार उसने कैमरे की स्क्रीन पर उन तस्वीरों को देखते हुए महसूस किया कि उनमें सिर्फ दृश्य नहीं, आत्मा है। वह जानता था कि शायद ये तस्वीरें कभी किसी पत्रिका में छपें या न छपें, लेकिन इन्हें खींचते समय जो जुड़ाव उसने महसूस किया, वही उसका सबसे बड़ा पुरस्कार था।

उसने अपनी डायरी में उस दिन कुछ नहीं लिखा, बल्कि एक तस्वीर को कागज़ में चिपकाया—उस वृद्ध मछुआरे की, जिसकी आँखों में स्मृति की आग जल रही थी। नीचे उसने बस एक पंक्ति लिखी: “कुछ तस्वीरें बोलती नहीं, लेकिन चुपचाप तुम्हें बदल देती हैं।” रात को खिड़की से जब वह समंदर को देख रहा था, तो उसे अपने भीतर भी एक विशालता महसूस हुई—एक ऐसी गहराई, जिसमें अब डर नहीं था, सिर्फ स्वीकार था। जो पहले एक दौड़ थी—सही फ्रेम, परफेक्ट क्लिक, अद्भुत दृश्य की तलाश—अब वह एक संवाद बन गई थी। उसकी यात्रा अब केवल एक फ़ोटोग्राफ़र की यात्रा नहीं थी, बल्कि एक ऐसे यात्री की थी जो दृश्य के परे जाकर अनुभव से जुड़ रहा था। और जब उसने कमरे की बत्ती बुझाई, तो उसे ऐसा लगा जैसे आज उसकी आँखें बंद नहीं हुईं—बल्कि पहली बार पूरी तरह खुली थीं।

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रामेश्वरम में अनिरुद्ध का अंतिम दिन आया तो वह कोई विशेष योजना के साथ नहीं उठा। यह दिन उसने किसी मंदिर के दर्शन, किसी समुद्र तट पर बैठने या किसी तस्वीर के लिए आरक्षित नहीं किया था—बल्कि यह दिन केवल लिखने के लिए था, उन शब्दों के लिए जिन्हें उसने बरसों से टाल रखा था। सूरज की पहली किरण के साथ उसने बालकनी में खड़े होकर आकाश को देखा, और पहली बार उसे ऐसा लगा कि उसने इस जगह को नहीं, बल्कि इस जगह ने उसे चुना था। वह उस टेबल पर बैठा जहाँ पहली बार उसने डायरी खोली थी, और पेन को हाथ में लेते ही उसका मन पीछे लौट गया—कोलकाता के उस बरामदे में जहाँ माँ सब कुछ समझ जाती थी बिना कहे; उस कैफे की टेबल तक जहाँ वह आख़िरी बार रिया से मिला था; उस ऑफिस की बालकनी तक जहाँ हर दिन वह धुएँ के बादलों में अपने सपनों को छोड़ आता था। आज वह सब उसकी मेज़ पर थे—अनकहे, अधूरे, लेकिन अब पलायन की जगह स्वीकार के लिए तैयार। उसने चुपचाप कागज़ का एक अलग पन्ना निकाला और शीर्षक लिखा: “रिया के नाम।” यह पत्र उसका अंतिम संवाद था—न रिश्तों का स्पष्टीकरण, न क्षमा-याचना—बस वह मौन जो वर्षों से दोनों के बीच जमा था, अब शब्द बनना चाहता था।

उसने लिखा: “प्रिय रिया,
तुम्हारे जाने के बाद भी बहुत कुछ बाकी रह गया था—जैसे अधूरी तस्वीरें, बिना भेजे गए मैसेज, और वो बातें जिन्हें हम सिर्फ मौन में कहते थे। मैंने कोशिश की कि सब कुछ भूल जाऊँ, लेकिन जो भीतर चुभता है, वह वक्त के साथ मिटता नहीं, बस धीरे-धीरे रूप बदलता है। मैं यहाँ रामेश्वरम आया, खुद को ढूँढ़ने—या शायद खो देने। और यहाँ आकर मैंने जाना कि तुम्हारा जाना मेरे लिए सिर्फ एक रिश्ता खत्म होना नहीं था, बल्कि मेरे भीतर के आईने का टूटना था। मैं अब जान पाया हूँ कि हम किसी से दूर होने के बाद भी उससे जुड़े रह सकते हैं—उसकी बातों, उसकी यादों, उसकी उन हँसी के टुकड़ों से जो अब भी किसी शांत रात में सुनाई दे जाते हैं। ये पत्र इसलिए नहीं कि तुम वापस आ जाओ, बल्कि इसलिए कि मैं खुद से कह सकूं कि मैंने अब कह दिया है जो कहने से डरता रहा। मैंने तुम्हें माफ़ किया है—और खुद को भी।”

जब वह लिख चुका, तो पन्ने को मोड़कर डायरी में रख दिया। उसे पता था कि यह पत्र कभी पोस्ट नहीं होगा, लेकिन उसके भीतर जो गांठ थी, वह अब खुल चुकी थी। उस दिन शाम को वह अपने कैमरे के साथ आख़िरी बार समुद्र किनारे गया। सूरज धीरे-धीरे समंदर में डूब रहा था, और अनिरुद्ध को लग रहा था जैसे कुछ अंदर भी शांत हो रहा हो, स्थिर हो रहा हो। उसने कैमरा उठाया, और लहरों की नहीं—बल्कि अपने पाँवों की तस्वीर खींची, जो गीली रेत में धँसे थे। नीचे लिखा: “मैं यहाँ था। और मैंने खुद को पा लिया।” लौटते समय वह लॉज के रिसेप्शन पर उस वृद्ध से मिला जिसने पहले दिन उसे पम्बन ब्रिज की ‘जादू’ वाली बात बताई थी। वृद्ध ने पूछा, “कैसा लगा?” अनिरुद्ध मुस्कराया और बोला, “जैसे किसी पुराने घाव पर पहली बार धूप पड़ी हो।” वृद्ध ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर कहा, “अब जब कभी खो जाओ, यहाँ फिर आना।” और अनिरुद्ध जानता था—वह अब शायद फिर लौटेगा, लेकिन बतौर वही इंसान नहीं जो पहली बार यहाँ आया था।

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ट्रेन के रवाना होने से कुछ घंटे पहले अनिरुद्ध स्टेशन के पास वाली वही चाय की दुकान पर जा बैठा, जहाँ से उसकी यात्रा शुरू हुई थी। दुकानदार ने उसे पहचान लिया और मुस्कुराते हुए पूछा, “फिर से आएँगे न?” अनिरुद्ध ने जवाब नहीं दिया—बस एक धीमा सिर हिलाया, जिसमें वादा भी था और मौन भी। चाय की चुस्की लेते हुए उसने आस-पास के यात्रियों को देखा—कुछ तीर्थयात्री, कुछ पर्यटक, कुछ लौटते हुए थके चेहरे और कुछ उत्साहित आंखें। उनमें अब उसे कुछ अलग दिखाई देता था, जो पहले उसकी नज़रों से छूट जाता था। शायद यह यात्रा की दृष्टि थी, या शायद उसके भीतर की दृष्टि अब खुल चुकी थी। वह बार-बार जेब से अपना छोटा स्केचबुक निकालता और उसमें बनी उन तस्वीरों को देखता जो कभी खींची नहीं गईं, सिर्फ महसूस की गईं। ट्रेन के सीटी बजने से ठीक पहले, उसने आखिरी बार स्टेशन के उस नीले बोर्ड को देखा—’रामेश्वरम’—और आँखों में एक अजीब-सी गहराई उतर आई। उसने खुद से कहा, “अब यहाँ से जाना कोई बिछड़ना नहीं, बल्कि खुद के एक पुराने संस्करण से विदा लेना है।”

ट्रेन की खिड़की से पीछे छूटता शहर, बालू से ढके घर, नारियल के झुंड और दूर से दिखती समंदर की रेखा, सब कुछ जैसे किसी पुराने पोस्टकार्ड की तरह लगता रहा। लेकिन यह दृश्य अब उसे उदास नहीं कर रहा था—बल्कि शांति दे रहा था। वह डायरी खोलकर उस पन्ने पर पहुँचा जहाँ उसने पहली बार रामेश्वरम का नाम लिखा था, और नीचे जोड़ा—“यहाँ मैंने खुद को खोने की कला सीखी, और फिर धीरे-धीरे खुद को पाना भी।” उसके दाएं हाथ में कैमरा था, लेकिन वह बंद था; और बाएं हाथ में खुली हुई डायरी, जिसमें आज कोई भारी बात नहीं लिखी थी—बस कुछ रेखाएँ थीं, जो शब्दों से ज़्यादा बोल रही थीं। सामने की सीट पर एक छोटा बच्चा बैठा था, जो लगातार बाहर झाँकते हुए मुस्कुरा रहा था। अनिरुद्ध ने उसकी एक तस्वीर ली, और कैमरे की स्क्रीन पर देखते हुए खुद से कहा, “अब मैं फ्रेम नहीं खोजता, सिर्फ सच पकड़ने की कोशिश करता हूँ।” यह वह बदलाव था, जो उसकी इस यात्रा का सार बन चुका था—बाहर की दुनिया वैसी ही थी, लेकिन अब देखने वाला बदल चुका था।

ट्रेन जब किसी छोटे स्टेशन पर रुकी, तो हवा में नमक और धूप की महक घुली हुई थी। अनिरुद्ध ने अपनी डायरी का आखिरी पन्ना खोला और लिखा: “अगर तुम कभी खुद को ढूंढ़ने निकलो, तो किसी बड़े शहर या ऊँचे पहाड़ों की तरफ मत भागो—कभी किसी शांत, खोए हुए शहर में जाओ, जहाँ समंदर कहानी कहता है और खंडहर उत्तर देते हैं। शायद वहाँ तुम खुद से पहली बार मिलो।” उसके शब्द अब भारी नहीं थे, न थके हुए—बल्कि हल्के थे, जैसे लंबे समय तक पकने के बाद बने हों। ट्रेन फिर से चल पड़ी थी, और खिड़की के उस पार ढलती हुई रोशनी में अनिरुद्ध का चेहरा शांत था—जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करने के बाद अब वह जगह मिल गई हो जहाँ रुककर सांस ली जा सके। और जब रात की परछाइयाँ खिड़की पर उतरने लगीं, उसने धीरे से डायरी बंद की, कैमरा बैग में रखा, और अपनी आँखें मूंद लीं। बाहर सब कुछ चल रहा था, लेकिन भीतर… एक गहरी, संतुलित खामोशी थी—ठीक वैसी जैसी सिर्फ एक सच्ची यात्रा के बाद ही मिलती है।

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