सात साल के बाद भारत की ज़मीन पर पैर रखते ही अनुपम को एक अजीब-सी गरमाहट महसूस हुई, जैसे किसी पुराने स्वेटर को फिर से पहन लिया हो। एयरपोर्ट से निकलते ही चिलचिलाती धूप और खस्ता ट्रैफिक ने उसे भले ही हल्का सा चौंका दिया हो, पर दिमाग कहीं और था — उन गलियों की ओर जहाँ बचपन के दिन खिलखिलाते थे, जहाँ दादी बिना नागा रोज़ शाम को दीया जलाती थीं, और जहाँ दिवाली एक त्यौहार नहीं, एक एहसास हुआ करता था। टैक्सी की खिड़की से बाहर झाँकते हुए वह हर नुक्कड़, हर पेड़, हर पोस्टर में कोई न कोई पुरानी तस्वीर ढूँढता रहा। मोहल्ले में प्रवेश करते ही वह चुप हो गया — कुछ बदला था, कुछ नहीं। पान की वही दुकान, सामने वाले घर का वही सीढ़ियों पर बैठा भोंकता कुत्ता, और उसके घर के सामने की टूटी पर को आज भी किसी ने नहीं सुधारा था। माँ दरवाज़े पर इंतज़ार करती मिलीं, और पहली बार अनुपम को यह महसूस हुआ कि साल दर साल जो चीज़ें दूर लगती थीं, वे बस यहीं पर रुककर उसका इंतज़ार कर रही थीं। घर में घुसते ही कपूर और चन्दन की गंध, दीवारों पर हल्की-सी सीलन और पुरानी घड़ी की टिक-टिक ने उसे वापस उसी 16 साल के लड़के में बदल दिया जो दिवाली के दिन चुपचाप छत पर जाकर अनार फोड़ा करता था।
घर में दाख़िल होने के कुछ घंटों के भीतर ही वह मोहल्ले की हलचल में खिंचता चला गया — मामा की ज़िद थी कि उसे इस बार दीयों की तैयारी में हाथ बंटाना ही होगा। मोहल्ला “अवधपुरी कॉलोनी”, अब पहले से ज़्यादा सजीला और जागरूक हो चुका था। हर गली में रंग-बिरंगे कागज़ी लट्टू, दीवारों पर बने कमल के रंगोली, और लोगों में बस एक ही बात — “इस बार की सजावट पहले से बेहतर होनी चाहिए!” उसी होड़ में वह पहली बार कव्या को देखता है। सफेद सूती कुर्ते में, रंगों से भरे हाथ और माथे पर हल्की-सी शिकन लिए, वह रंगोली बना रही थी एकदम मुख्य चौक पर। उसका काम इतना साफ़ और सजीव था कि वहां से गुज़रते लोग अपने आप ठहर जाते। अनुपम ने उसे बस एक पल के लिए देखा, लेकिन वो एक पल जैसे किसी स्लो मोशन सीन जैसा लगने लगा — जहां सिर्फ दीयों की लौ झिलमिला रही थी, और कव्या उसमें पूरी तरह डूबी हुई थी। उसने खुद को टोकते हुए सर झटका और आगे बढ़ गया, लेकिन कुछ था जो उसके मन में उसी वक़्त से अटका रह गया।
शाम ढलते ही मोहल्ले में दीयों की पहली कतार सजनी शुरू हो गई, और अनुपम को आयोजक मंडली में खींच लिया गया — उसका विरोध करना बेकार था। कव्या वहाँ भी मौजूद थी, पूरी गंभीरता से हर दीये की दिशा और दूरी नाप रही थी। “ये दीया थोड़ा दाएँ रखना,” उसने किसी से कहा, और तभी उसकी नज़र अनुपम पर पड़ी। “आपने पहले कभी दीये सजाए हैं?” उसने हँसते हुए पूछा, जैसे जानती हो कि जवाब ना में ही होगा। अनुपम ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “नहीं, पर यूएस में हमने क्रिसमस लाइट्स ज़रूर लटकाई हैं।” कव्या ने सिर झुकाकर कहा, “अच्छा, तो चलिए फिर। दीयों को बस बिजली की तरह टाँगना मत, इन्हें ज़मीन से जोड़ना होता है।” उनके बीच पहली बातचीत वहीं दीयों के ऊपर झुकते हुए शुरू हुई — कभी बातों में टकराव, कभी हँसी, और बीच-बीच में चुप्पियाँ जो दीयों की लौ से भी ज़्यादा गरम और मर्मस्पर्शी लगती थीं। दिवाली की तैयारी शुरू हो चुकी थी, पर अनुपम के लिए यह त्यौहार कुछ और बनने जा रहा था — एक लौ, जो शायद लौट आने की वजह भी बन सकती थी।
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अगली सुबह सूरज की किरणें खिड़की से ऐसे झाँक रही थीं जैसे रात भर की सारी थकान चुपके से धो देनी हो। अनुपम की नींद खुली तो घर में पहले से हलचल थी — माँ बेसन के लड्डू बना रही थीं, आँगन में झाड़ू लग रही थी, और कहीं दूर से शंख की धीमी आवाज़ हवा में तैर रही थी। वो बालकनी में आकर खड़ा हुआ तो देखा, मोहल्ले के चौक पर लोग फिर से इकट्ठा हो रहे थे — दीयों के साथ-साथ इस बार कंदीलें और झालरें भी सजनी थीं। तभी एक आवाज़ आई, “अरे अमेरिका वाले भैया, आज देर हो गई?” — ये आवाज़ उसी चुलबुली किशोरी की थी जो कल दीया पकड़ा रही थी, शायद कव्या की सहायक। अनुपम मुस्कराते हुए नीचे आया, और कुछ ही पलों में खुद को फिर उसी तैयारी में व्यस्त पाया जहाँ हर किसी के हाथ में कोई न कोई जिम्मेदारी थी — और सबका नेतृत्व कर रही थी कव्या, जो आज नीले रंग की चूड़ीदार में और भी निखर रही थी। वह हर कोण, हर रंग और हर दीये की दिशा पर ध्यान दे रही थी जैसे कोई कलाकार अपने अंतिम पेंटिंग को छू रहा हो। “कभी-कभी मुझे लगता है दीये मुझसे बातें करते हैं,” उसने अचानक अनुपम से कहा, “अगर इन्हें ठीक जगह न रखा जाए तो वो जलते नहीं, बस जलते-जलते बुझ जाते हैं।”
अनुपम उसकी बात पर पहले हँसा, फिर ठहर गया। कव्या की बातें सिर्फ सजावट तक सीमित नहीं थीं, उनमें कोई गहराई थी जो एक पल में दिल की खिड़कियाँ खोल सकती थी। वह उसके पास बैठ गया, हाथ में दीयों की थाली लिए। “और आपसे क्या बातें करते हैं ये दीये?” उसने मज़ाक में पूछा। “बताते हैं कि किसे अकेले नहीं रहना चाहिए,” कव्या ने बिना उसकी आँखों में देखे जवाब दिया। उनकी बातचीत अब सहज होती जा रही थी — जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों, जैसे दिवाली की रोशनी ने उनके बीच के अजनबीपन को पिघला दिया हो। बीच-बीच में अनुपम उसे अमेरिका की बर्फीली क्रिसमस और सर्द सड़कों के बारे में बताता, और कव्या उसे बताती कि भारत में त्यौहार सिर्फ दिखावे नहीं, जुड़ाव के बहाने होते हैं। मोहल्ले के बच्चे जब उनके इर्द-गिर्द दौड़ते तो दोनों के बीच एक अजीब-सी मुस्कान खिल जाती — न नई, न ही पूरी तरह पुरानी, पर इतनी गहरी कि शब्दों की ज़रूरत न हो।
शाम होने से पहले दीयों की कतारें पूरी हो चुकी थीं, और मोहल्ले का चौक अब किसी पुराने फिल्मी सेट जैसा लगने लगा था। रंगोली में रंग भरते हुए कव्या के हाथ थक गए थे, पर चेहरा चमक रहा था। अनुपम ने पहली बार ध्यान से देखा — उसके नाखूनों में हल्दी लगी थी, हथेलियाँ रंगों से भरी थीं, और बालों में बिखरी रेखाएँ उसे और भी सजीव बना रही थीं। अचानक उसने एक दीया गिरा दिया, तेल फैल गया। “ओह!” कव्या झुकी, तो अनुपम ने जल्दी से हाथ बढ़ाया, दोनों के हाथ दीये पर एक साथ आ गए। एक पल को दोनों ने एक-दूसरे को देखा, कुछ नहीं कहा। फिर कव्या ने धीरे से हाथ खींच लिया, और कहा, “देखिए, जलता दीया अगर गिर जाए, तो कोई बात नहीं। पर अगर न जल पाए — तब दुख होता है।” अनुपम को नहीं पता था कि वह दीयों की बात कर रही थी या किसी और बात की ओर इशारा कर रही थी। पर उस पल के बाद, अनुपम ने तय कर लिया — यह दिवाली बस दीये सजाने की नहीं, किसी को जानने और शायद खो देने से पहले थाम लेने की दिवाली बन सकती है।
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दिवाली के करीब आते-आते मोहल्ले की हर गली जैसे रौशनी से सांस लेने लगी थी, और अनुपम का हर दिन कव्या के साथ एक नई परछाईं में ढलने लगा था। अब वे सिर्फ दीये नहीं सजाते थे — वे साथ बैठकर फुलझड़ियाँ जलाते, हलवाई की दुकान से एक ही कटोरी में गुलाब जामुन खाते, और कई बार उन खामोश पलों में भी मुस्कुरा लेते जब कहने को कुछ नहीं होता था। मोहल्ले की बुज़ुर्ग महिलाएँ उन्हें देखकर मुस्कुरातीं, और बच्चों की टोली उन्हें ‘दीयों की जोड़ी’ कहकर चिढ़ाने लगी थी। अनुपम के लिए ये सब कुछ एक अजीब, धीमे जादू जैसा था — एक ऐसी ज़िंदगी की झलक जो उसके हाई-राइज़ अपार्टमेंट, मीटिंग कॉल्स और टाइम ज़ोन के पीछे कहीं छूट गई थी। कव्या उसे अपने बचपन के किस्से सुनाती — कैसे उसने अपने पापा को खोने के बाद हर दिवाली खुद दीयों की जिम्मेदारी ले ली थी, कैसे उसकी माँ अब घर में रहने के बजाय मंदिरों में दीया जलाने निकल जाती हैं। वो बातें करते-करते हँसती भी थी और अचानक चुप हो जाया करती थी, जैसे भीतर कुछ बुझा-बुझा सा है जिसे रोशनी की ज़रूरत हो।
अनुपम उसे अपने कॉलेज के दिनों की बातें बताता — अमेरिका की सर्दियाँ, थैंक्सगिविंग की खाली प्लेटें, और एक लड़की जिसका रिश्ता शायद ज्यादा वक़्त की तलाश में छूट गया। कव्या उसे गौर से सुनती, कभी कुछ नहीं कहती — बस कभी-कभी उसकी हथेलियों में मेंहदी की रंगत गहरी हो जाती, शायद अनजाने। एक शाम जब दोनों मंदिर के बाहर बैठकर लाइट्स की चेन लगा रहे थे, कव्या ने पूछा, “क्या तुम कभी अकेलेपन से डरते हो?” अनुपम ने रुककर कहा, “नहीं… शायद अब नहीं। पहले डरता था, पर अब लगता है कि अकेलापन भी किसी संगीत की तरह होता है — अगर सुनना आ जाए, तो अच्छा लगता है।” कव्या की आँखों में कुछ हिलने लगा, पर वह मुस्कराई। “शायद इसीलिए हम दीये जलाते हैं — ताकि ये अकेलापन कम लगे,” उसने कहा। उस दिन उनके बीच की चुप्पी पहले से ज़्यादा अपनापन लिए थी, जैसे दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में कोई दबी हुई बात पढ़ ली हो।
रातें अब धीमी पड़ती जा रही थीं, लेकिन उनका साथ गहराता जा रहा था। एक दिन जब अनुपम अपने पुराने फोटो एलबम को पलट रहा था, उसे बचपन की एक तस्वीर मिली — जिसमें एक छोटी बच्ची भी थी, रंगोली बनाती हुई। वह तस्वीर लेकर कव्या के पास पहुँचा, और पूछ बैठा, “ये तुम हो क्या?” कव्या तस्वीर देखकर चौंकी, और मुस्कराते हुए बोली, “हाँ, ये वही दिवाली थी जब मैंने पहली बार पूरे मोहल्ले की रंगोली बनाई थी — पापा के बिना पहली दिवाली थी।” उस तस्वीर ने अनुपम के दिल में एक हलचल मचा दी — वो जानता था अब यह बस एक संयोग नहीं रहा। कव्या और वह दो दीयों की तरह थे — अलग-अलग जगमगाते हुए, लेकिन अगर एक लौ मिल जाए, तो पूरी रात रोशन हो सकती थी। उस शाम उसने पहली बार चाहा कि ये दिवाली कभी खत्म न हो।
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त्योहार जितना नज़दीक आ रहा था, मोहल्ले की रौनक उतनी ही तेज़ हो रही थी, लेकिन अनुपम और कव्या के बीच की चमक अब धुँधली-सी होने लगी थी — जैसे किसी दीये में तेल कम पड़ रहा हो, पर लौ अभी भी टिके रहने की कोशिश कर रही हो। दोनों अब भी मिलते थे, मुस्कराते थे, साथ काम करते थे, लेकिन बातचीत में वो सहजता नहीं रही थी जो पहले होती थी। कारण था — बातें जो कही नहीं गईं थीं, और एहसास जो ज़ुबान पर आने से पहले ही आँखों में छिप जाते थे। कव्या अब अक्सर अचानक किसी बहाने से निकल जाती, बात करते-करते चुप हो जाती, या खुद को दूसरों में व्यस्त कर लेती। अनुपम को लगा, शायद उसने कुछ ग़लत कहा होगा, या शायद उसने ज़्यादा उम्मीद कर ली थी। पर सच तो यह था कि कव्या अपने ही डर से घिरी थी — वह डर जो हर लड़की के मन में होता है जब सामने वाला बस कुछ दिनों के लिए आया हो। उसे लगा कि अनुपम वापस चला जाएगा, और फिर यह सारा जुड़ाव सिर्फ दीपों की तरह जलकर राख बन जाएगा।
उधर अनुपम के घर में एक और तरह की तैयारी शुरू हो चुकी थी — रिश्तेदार शादी की बात छेड़ने लगे थे, माँ बार-बार पूछती, “कोई है क्या तेरे मन में?” और अनुपम हर बार मुस्कराकर बात टाल देता। एक रात जब सब लोग छत पर फुलझड़ी जला रहे थे, अनुपम नीचे अकेला बैठा रहा, आँखें सामने जलते दीयों पर टिकी थीं। तभी कव्या आई — चुपचाप — हाथ में दो मोमबत्तियाँ लिए। उसने एक मोमबत्ती अनुपम की ओर बढ़ाई, और कहा, “बिना बात के दूरियाँ बढ़ने लगें, तो कभी-कभी दीया नहीं, एक बात ही काफी होती है जलाने के लिए।” अनुपम ने मोमबत्ती ली, पर कुछ कहा नहीं। दोनों ने साथ में वो मोमबत्ती जलाई, पर उस रौशनी में भी एक सन्नाटा था। एक धीमा डर — कि यह जो कुछ भी है, अधूरा रह जाएगा। और शायद दिल की सबसे बड़ी ख्वाहिश वही होती है — जो पूरी न हो, बस धीरे-धीरे जलती रहे।
कव्या उस रात चली गई बिना कुछ कहे, लेकिन अनुपम की आँखों में वो सवाल छोड़ गई जो जवाब माँगता नहीं, पर भुलाया भी नहीं जाता। अगली सुबह जब वो मोहल्ले के रंगोली चौक पर गया, कव्या वहाँ नहीं थी। किसी और लड़की ने रंग भरने शुरू कर दिए थे। सबकुछ वहीं था — दीये, रंग, बच्चों की हँसी — पर उस माहौल से एक नाम गायब था, और वो नाम अनुपम की धड़कनों में अनजाने ढंग से शामिल हो गया था। दिवाली अभी दो दिन दूर थी, लेकिन अनुपम को महसूस हो चुका था — उसकी अपनी रौशनी कहीं और से नहीं, कव्या की आँखों से आती है। सवाल अब ये था कि क्या वो लौ वापस जलेगी — या हमेशा के लिए अधूरी रह जाएगी?
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दिवाली से एक दिन पहले की शाम थी, और पूरे मोहल्ले में रौनक अपने चरम पर थी — जैसे हर दीया अपने अस्तित्व का प्रमाण देना चाहता हो, हर घर एक छोटे मंदिर में बदल गया था। लेकिन अनुपम का मन जैसे भीड़ में भी अकेला था। कव्या दो दिन से कहीं नहीं दिखी थी — न रंगोली के पास, न मंदिर में, न आयोजन की बैठकों में। उसने दो-तीन बार आसपास के लोगों से पूछा, पर सभी ने बस इतना कहा कि शायद वो थकी हुई है, आराम कर रही होगी। पर अनुपम जानता था — ये थकान नहीं, कोई उलझन है। शाम ढलते-ढलते आसमान में हल्की धुंध घिरने लगी, और तभी बिजली चली गई। पूरा मोहल्ला एक पल के लिए अंधेरे में डूब गया। कुछ लोग परेशान हुए, कुछ मोबाइल की टॉर्च जलाने लगे, लेकिन तभी किसी बच्चे ने चिल्लाया, “दीये जलाओ! दीये हैं ना!” और देखते ही देखते हर घर से कोई न कोई बाहर निकला — हाथ में दीया लिए, और फिर एक-एक कर रोशनी लौटने लगी, एक सजीव, धीमी, आत्मीय रोशनी।
अनुपम भी छत से नीचे आया, और घर के सामने दीयों की थाली उठाकर बाहर आ गया। वही मोड़, वही चौक, वही मिट्टी की सोंधी गंध — और तभी उसने देखा, सामने मंदिर की सीढ़ियों पर कव्या बैठी है, अकेली, हाथ में एक जलता हुआ दीया। वो उसकी ओर बढ़ा, लेकिन बिना कुछ बोले पास बैठ गया। कुछ क्षण यूँ ही बीत गए — केवल दीये की लौ काँपती रही, और फिर कव्या ने कहा, “हर साल मैं दीये जलाती हूँ, सबके लिए — ताकि सबके घर में उजाला जाए। पर शायद खुद के अंदर का अंधेरा जलाना भूल जाती हूँ।” अनुपम ने धीरे से उसकी ओर देखा, और कहा, “तो इस बार किसी और को जलाने दो — ताकि तुम देख सको कि रौशनी लौट सकती है।” कव्या की आँखें भरी हुई थीं, पर उनमें डर कम था — और शायद भरोसा ज़्यादा। उसी वक्त उसने एक और दीया जलाया और अनुपम की ओर बढ़ाया — “ये दीया हम दोनों का हो सकता है — अगर तुम चाहो।” और उन दोनों ने एक साथ वह दीया सीढ़ियों पर रख दिया।
अंधेरे में जलते उस दीये की लौ अब स्थिर थी — जैसे दोनों के दिलों की हलचल अब ठहर चुकी हो। बाहर पूरा मोहल्ला दीयों से जगमगा रहा था, लेकिन अनुपम को लग रहा था कि सबसे चमकीली रौशनी वहीं उनके बीच जल रही है। बिजली लौट आई, और साथ में शोर, आवाज़ें, पटाखों की गूँज — पर उस एक पल में सब थम गया था। कव्या ने उसकी ओर देखा और मुस्कराई, “कभी-कभी बिना आवाज़ के जलना ही सबसे सच्ची रौशनी होती है।” और अनुपम को लगा — शायद इस बार की दिवाली सचमुच उसकी अपनी है, पूरी, चमकदार और कहीं भीतर से रोशन।
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दिवाली की रात के बाद सुबह का सूरज कुछ ठहरा-ठहरा सा लगा, जैसे त्योहार की रौशनी के बाद अब सब कुछ अपनी सामान्य गति में लौटने की कोशिश कर रहा हो। मोहल्ला शांत था, पिछली रात की फुलझड़ियों की राख अभी भी ज़मीन पर बिखरी थी, और दीयों की काँच अब बुझ चुकी थी। अनुपम की माँ सुबह से ही पैकिंग की तैयारी में लगी थीं — टिकट बुक हो चुका था, कल सुबह की फ्लाइट थी। घर में हलचल थी, पर अनुपम के भीतर एक अजीब-सी सुन्नता। रात की वो सीढ़ी पर बैठी चुप्पी, वो जलता दीया, और कव्या की आँखों की रौशनी — सब उसके ज़ेहन में घूमते रहे। उसने कई बार फोन उठाया कि उसे मैसेज करे, लेकिन हर बार वापस रख दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या कहना है — क्या यह बस दिवाली का आकर्षण था, या कुछ ऐसा जो अगले साल तक भी साथ रह पाएगा?
शाम होते-होते मोहल्ला फिर से सामान्य हो गया था। दुकानें खुली थीं, बच्चे पटाखों के खाली डिब्बों से खेल रहे थे, और बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठकर परचून की राजनीति में डूबे थे। अनुपम यूँ ही बिना उद्देश्य निकल पड़ा, उन्हीं गलियों में जिनमें उसने बचपन बिताया था। हर मोड़ पर कोई पुरानी याद खड़ी मिलती, और हर दीवार पर कोई नया सवाल। तभी एक मोड़ पर उसे वो छोटी लड़की मिली जो कव्या की सहायक थी, हाथ में एक छोटा पैकेट था उसके। “दीदी ने दिया है आपके लिए,” उसने कहा और दौड़ गई। अनुपम ने पैकेट खोला — उसमें एक छोटा मिट्टी का दीया था, जिस पर काले रंग से कुछ लिखा था:
“कभी-कभी रौशनी लौटती है, बस देर से।”
दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई, जैसे किसी बुझते दीये में फिर से लौ जल गई हो। उसने उसी वक्त फोन उठाया, पर नंबर डायल नहीं किया — इस बार वो सीधा कव्या के घर की ओर चल पड़ा।
वहाँ पहुँचकर देखा तो दरवाज़ा आधा खुला था, और अंदर से मंदिर की घंटी की धीमी आवाज़ आ रही थी। कव्या सामने आई, साधारण-सी सलवार सूट में, लेकिन आँखों में एक अलग सी चमक थी। कुछ कहे बिना उसने अनुपम की ओर देखा, और फिर धीरे से बोली, “टिकट रद्द कर दी क्या?” अनुपम मुस्कराया, “नहीं, अभी तो सिर्फ इरादा रद्द किया है।” कव्या ने पल भर के लिए नज़रें झुका लीं, फिर बोली, “तो क्या ये दीया अब हर साल जलेगा?” अनुपम ने जेब से वही दीया निकाला और कहा, “अगर तुम साथ हो, तो हर रात भी।”
उस एक वाक्य में सब कुछ कह दिया गया था — हर वो बात जो अधूरी थी, हर वो ख्वाहिश जो दीयों की रौशनी में बची रह गई थी। दिवाली खत्म हो गई थी, लेकिन किसी एक दिल में अब उजाला ठहरने लगा था।
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दिवाली बीत चुकी थी, पर अनुपम अब भी भारत में था — एक सप्ताह और रुकने का निर्णय उसने बहुत सोच-समझकर नहीं लिया था, बस वही एक दीया था जिसने फैसला लिया था। मोहल्ले के लोग पहले तो चौंके, फिर मुस्कराए। अब वो कव्या और अनुपम को एक ही सांस में पुकारने लगे थे — कोई रंगोली के साथ जोड़ता, तो कोई चाय के प्याले में। पर इन सबके बीच अनुपम और कव्या के बीच का रिश्ता अब कुछ और था — अब वो न सहमा-सहमा था, न ही अनकहा। अब दोनों साथ बैठते, खामोशियाँ बाँटते, और दिन ढलते ही मंदिर की सीढ़ियों पर जाकर वो दीया जलाते जिसे उन्होंने पहली बार साथ रखा था। उस दीये की लौ अब उनकी पहचान बन चुकी थी — एक ऐसी भाषा, जिसे किसी शब्द की ज़रूरत नहीं थी।
वो आखिरी रात थी जब अनुपम को जाना था — अगली सुबह की फ्लाइट थी, और अब कोई बहाना नहीं बचा था। शाम ढलते ही उसने माँ से विदा ली, बैग रखा और चुपचाप मोहल्ले के चौक की ओर निकल पड़ा। वहाँ सबकुछ शांत था, वही जगह जहाँ से ये सब शुरू हुआ था। तभी उसे सीढ़ियों पर बैठी कव्या दिखी — वही थाली, वही दीया, पर इस बार उसके पास दो दीये थे। अनुपम बिना कुछ कहे पास बैठा। कव्या ने एक दीया उसके हाथ में थमाया और धीमे से कहा, “इस बार हर साल दीये जलाने का वादा नहीं करूँगी… लेकिन अगर कभी लौटोगे, तो यहाँ एक लौ जलती मिलेगी।” अनुपम ने दीया थाम लिया — न हाँ कहा, न ना — बस उसकी आँखों में देखता रहा, जैसे समय वहीं ठहर जाए।
तभी कव्या ने दूसरा दीया जलाया, और कहा, “ये मेरा है, जो हर साल यहाँ जलेगा। और अगर कभी दोबारा लौटा, तो इसे तुम्हारा भी मान लूँगी।” दोनों दीयों की लौ उस पल स्थिर हो गई थी — जैसे दोनों के दिलों की बेचैनी ने एक-दूसरे का सहारा पा लिया हो। रात गहराती रही, पर उस चौक की वो दो लौ किसी मंदिर की आरती जैसी जलती रही। जब अनुपम उठा, तो उसके पास कहने को कुछ नहीं था — लेकिन कव्या ने मुस्कराकर कहा, “जाना ज़रूरी है, लेकिन रौशनी को लौटना आता है।” अनुपम ने सिर हिलाया, दीया वापस थाली में रखा, और बिना मुड़े चल पड़ा — पर हर कदम पर उसे वो लौ पीठ पर महसूस हो रही थी, जैसे किसी ने उसे सहेज कर रख लिया हो।
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समय बीतने का अंदाज़ा अक्सर तब होता है जब हम लौटकर वहीं पहुँचते हैं जहाँ से चले थे। अनुपम के लिए अमेरिका लौटने के बाद सब कुछ पहले जैसा ही था — वही कॉरपोरेट बिल्डिंग्स, कॉफी मशीन की कड़वाहट, और ग्लास की खिड़की से दिखती ठंडी बर्फ। पर एक चीज़ बदल गई थी — अब हर दीया उसे कव्या की याद दिलाता था। उसने घर में एक छोटा कोना सजाया था, जिसमें वही मिट्टी का दीया रखा था, जिस पर लिखा था: “कभी-कभी रौशनी लौटती है, बस देर से।” दिवाली बीते महीनों हो चुके थे, लेकिन उस दीये की लौ अब भी उसके भीतर जलती थी — कभी अधूरी उम्मीद की तरह, कभी आने वाले किसी वक़्त की आहट की तरह। उसके दिन फिर से मीटिंग्स और मेल्स में बीतते, पर हर रात वो थाली में दीया रखकर जलाता — एक आदत बन चुकी थी, या शायद एक वादा।
उधर भारत में, कव्या अब भी हर शाम वही मंदिर की सीढ़ियों पर दीया जलाती थी — वही दूसरा दीया, जो अब उसका नहीं रहा। मोहल्ले वालों ने उस दीये को नाम दे दिया था — “प्रतीक्षा का दीया।” लोग पूछते कि अब भी जलाती हो? और वह बस मुस्कराकर कहती, “हर लौ को लौटने का रास्ता दिखाना चाहिए।” और फिर एक दिन, कई महीनों बाद, जब भारत की गर्मी लौट रही थी और होली आने को थी, कव्या मंदिर में बैठी थी कि किसी ने पीछे से कहा, “इस बार रंगों के बीच लौ भी चाहिए क्या?” वो मुड़ी, और अनुपम को खड़ा पाया — हाथ में वही थाली, वही दीया, और वही मुस्कान जो अब उसका घर लगती थी। कोई संवाद नहीं हुआ, कोई बड़ा इज़हार नहीं — बस कव्या उठी, उसकी थाली से दीया लिया, अपने दीये के पास रखा, और दोनों को एक साथ जलाया।
अब मोहल्ले में हर साल एक कोना होता है — जहाँ दो दीये साथ जलते हैं, चाहे त्योहार हो या न हो। लोग कहते हैं, वहाँ रौशनी कुछ अलग होती है — न ज़्यादा तेज़, न कम, बस दिल को छू जाने वाली। और कव्या और अनुपम? अब वो दीये नहीं सजाते, बल्कि साथ बैठकर उन्हें जलते हुए देखते हैं। और हर बार जब कोई नया दीया जलता है, तो उनके बीच एक और बात बिना कहे कह दी जाती है — “जब दो दिल दीयों की तरह मिलते हैं, तो मोहब्बत रोशनी बन जाती है।”
समाप्त

