अमूलिक त्रिपाठी
1
गाँव की आखिरी गली में खड़ा बांस का पेड़ अब बूढ़ा हो चला था। उसकी शाखाएँ जैसे समय के हाथों से झुक गई थीं, और पत्तियाँ… हर साल कम होती जा रही थीं। उसी पेड़ के नीचे आज भी वही पुराना पत्थर पड़ा था, जहाँ कभी शाम को सोनू, रमिया और बाकी दोस्त बैठा करते थे। अब ना वो शोर था, ना कहकहे, बस एक सन्नाटा था जो हर चीज़ में रिसता चला आया था।
सोनू वहीं बैठा था, मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ घुमा रहा था, लेकिन आँखें कहीं और थीं। कानों में हल्की आवाज़ में पुराना गाना बज रहा था—”छोटे छोटे शहरों से…”। यही गाना था जो कॉलेज के दिनों में उसकी धड़कनों की रफ़्तार बढ़ा देता था, जब वो सोचता था कि एक दिन वो शहर जाएगा, बड़ी नौकरी करेगा, और कुछ ऐसा बनकर लौटेगा जिसे गाँव वाले सलाम करें। पर हुआ क्या? दस साल बीत गए, और वो आज भी वहीं था—इसी गली में, इसी पेड़ के नीचे, और उन्हीं अधूरे ख्वाबों के साथ।
उसका मन आज कुछ ज्यादा ही बेचैन था। पिछले महीने रमिया ने बताया था कि उसे लखनऊ के सरकारी स्कूल में ट्रांसफर मिल गया है। सोनू ने मुस्कुराकर कहा था, “बहुत बढ़िया! आखिर तुम्हारा सपना तो पूरा हुआ।” पर भीतर कुछ दरक गया था। वो जानता था कि रमिया का जाना सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं था, वो एक युग का अंत था। रमिया उसकी दोस्त थी, और शायद उससे कुछ ज्यादा भी। लेकिन इस ‘शायद’ ने ही ज़िंदगी भर कुछ कहने से रोक रखा था।
गाँव की गलियों में आज कुछ अजीब-सा सन्नाटा था। लोग जानते थे कि रमिया आज जा रही है। सरकारी स्कूल की आखिरी क्लास ले रही थी वो। बच्चों की आँखों में कुछ अनकहा था, जैसे वो भी समझ रहे हों कि ये सिर्फ एक अध्याय का अंत नहीं, बल्कि एक रिश्ता था जो बिछड़ने वाला था।
“अच्छा बच्चों,” रमिया ने धीमे से कहा, “आज मेरी आखिरी क्लास है। मैं चाहती हूँ कि तुम लोग बस इतना याद रखो—किताबें पढ़ना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है इंसान बनना। हमेशा सच्चाई का साथ देना और अपने गाँव को कभी मत भूलना।”
बच्चे चुपचाप देख रहे थे, जैसे शब्द गले में अटक गए हों। एक छोटी लड़की ने कहा, “मैडम, आप जब भी आएँ, हमें जरूर मिलिएगा।” रमिया मुस्कुरा दी, लेकिन वो मुस्कान अधूरी थी। उसकी आँखें नम थीं, और दिल भारी।
स्कूल से बाहर निकलते ही उसे सोनू दिखाई दिया। वह वहीं खड़ा था, हाथ में वही पुराना बैग, जिसे वह कभी नौकरी के फॉर्म भरने के लिए ले जाया करता था। रमिया के पास आते ही उसने चुपचाप एक चिट्ठी उसकी ओर बढ़ाई।
“रास्ते में पढ़ लेना,” बस इतना कहकर सोनू चला गया।
रमिया कुछ कह नहीं पाई। उसने चिट्ठी अपने बैग में रख ली और एक बार पीछे मुड़कर देखा। सोनू की पीठ उसकी तरफ थी, लेकिन चाल बता रही थी कि उसके भीतर बहुत कुछ टूट रहा है।
शाम को जब ट्रेन स्टेशन से छूटी, रमिया खिड़की के पास बैठी रही। बाहर खेत, पगडंडियाँ, और वो ही बांस का पेड़, सब पीछे छूटते जा रहे थे। ट्रेन के शोर में भी दिल की हलचल ज्यादा तेज़ सुनाई दे रही थी। उसने बैग से चिट्ठी निकाली और धीरे से पढ़ने लगी।
“रमिया,
तुम्हारे जाने के बाद इस गाँव में बहुत कुछ खाली रह जाएगा—स्कूल, चौपाल, और शायद मेरा दिल भी। तुमने हमेशा कहा, सपने देखने चाहिए। मैं भी देखता हूँ अब, हर रात। पर जागते हुए भी कुछ ख्वाब होते हैं जो पूरे नहीं होते।
तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त रही हो, और शायद उससे भी कुछ ज्यादा। ये मैंने कभी नहीं कहा, पर आज कह रहा हूँ।
अगर कभी लौटो, तो उसी बांस के पेड़ के नीचे मिलना, जहाँ हम कभी बैठा करते थे।
— सोनू”
रमिया की आँखों से आँसू बह निकले। चिट्ठी को उसने अपने सीने से लगा लिया। ट्रेन की गति तेज होती जा रही थी, और गाँव पीछे धुंधला होता जा रहा था।
उसे पहली बार लगा—कुछ अधूरे ख्वाब सिर्फ नींद के लिए नहीं होते। वो ज़िंदा रहते हैं, साँस लेते हैं, और कभी-कभी, बस किसी चिट्ठी में अपना घर बना लेते हैं।
2
लखनऊ का चारबाग स्टेशन भीड़ से भरा हुआ था। लोग सामान खींचते हुए, फोन पर बात करते हुए, किसी को विदा देते हुए या किसी के इंतज़ार में नज़रें गड़ाए खड़े थे। रमिया प्लेटफॉर्म पर उतरते ही कुछ पल के लिए ठिठक गई। गाँव की शांति से निकलकर ये तेज़ रफ्तार शहर कुछ भारी-सा लगा। उसके कंधे पर लटकता बैग, दिल में उमड़ते विचार, और सोनू की चिट्ठी की आखिरी पंक्ति—“अगर कभी वापस लौटो, तो बांस के पेड़ के नीचे मिलना”—अब भी गूंज रही थी।
ऑटो में बैठते ही उसने शहर को पहली बार गौर से देखा। ऊँची-ऊँची इमारतें, विज्ञापन से लदे पोल, धूल-धुँए से ढके चेहरे और भागते कदम। रमिया को याद आया, गाँव में जब कभी कोई आता था शहर से, तो वो कितनी उत्सुकता से पूछती थी, “लखनऊ कैसा है?” और जवाब हमेशा होता—“बड़ा है, तेज़ है, थोड़ा बेरहम भी।”
नई स्कूल में उसकी नियुक्ति थी—गौतम नगर में। रास्ते भर वो सोचती रही—क्या वो वहाँ भी बच्चों को वैसा ही सिखा पाएगी, जैसे गाँव में सिखाया था? क्या वहाँ भी बच्चे उसी मासूमियत से सवाल करेंगे?
पहले दिन जब वह स्कूल पहुँची, तो सब कुछ व्यवस्थित लगा—बड़े कमरे, पंखे जो सचमुच चलते थे, और बच्चे जो जूते-मोज़े पहनकर समय पर आते थे। लेकिन उनमें कुछ था जो रमिया को खाली लगा। एक बच्चा किताब खोलकर बैठा था लेकिन आँखें शून्य में थीं, जैसे रट रहा हो, समझ नहीं रहा। क्लास के बाद उसने उससे पूछा, “क्या हुआ? कुछ समझ नहीं आया?”
बच्चा बोला, “मम्मी ने कहा ट्यूशन जाना है, जल्दी करो। पापा कहते हैं टॉपर बनो। समझ आ जाए या नहीं, नंबर आना चाहिए।”
रमिया चुप हो गई। गाँव के बच्चों की आँखों में जिज्ञासा होती थी, यहाँ सिर्फ अपेक्षा। वो खुद से सवाल करने लगी—क्या वह इस माहौल में खुद को खो देगी? या फिर कुछ बदल पाएगी?
शाम को जब वह अपने छोटे से किराए के कमरे में लौटी, तो दीवारें भी नई थीं और खिड़की से दिखता दृश्य भी। लेकिन मन का कोना अब भी उसी पुराने बांस के पेड़ के नीचे बैठा था। सोनू की चिट्ठी उसने फिर से निकाली और पढ़ी। वो शब्द अब तक उतने ही ताजे थे जितने स्टेशन पर पढ़ने के वक़्त थे।
अगले कुछ हफ़्तों में रमिया ने धीरे-धीरे स्कूल में खुद को ढालना शुरू किया। वह बच्चों से सवाल पूछने लगी, कहानियाँ सुनाने लगी, और उन्हें रट्टा मारने की बजाय समझाने की कोशिश करने लगी। कुछ बच्चे उसकी बातें समझने लगे थे, कुछ अभी भी अंक तालिका में उलझे थे।
एक दिन एक छात्रा, तन्वी, उसके पास आई और बोली, “मैम, आप जब पढ़ाती हैं तो अच्छा लगता है। बाकी टीचर्स बस बोर्ड पर लिखते हैं।”
रमिया मुस्कुराई, “पढ़ाई सिर्फ किताब से नहीं होती तन्वी, ज़िंदगी से भी होती है। तुम जब भी सवाल सोचो, उन्हें दबाना मत।”
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद वो यहाँ भी कुछ बदल सकती है। लेकिन फिर भी, हर रात जब वो थककर खिड़की के पास बैठती, चाय पीती, तो उसका मन गाँव में उड़ चला जाता। उसे याद आता चौपाल, बच्चे, स्कूल की टूटी खिड़की, और सबसे ज़्यादा सोनू।
सोनू ने कभी फोन नहीं किया। ना उसने। चिट्ठी के बाद जैसे एक चुप्पी के धागे दोनों के बीच कस दिए गए थे। लेकिन उस चुप्पी में भी कुछ था—एक रिश्ता, जो कहे बिना भी महसूस होता था।
एक रविवार को वह हज़रतगंज के एक किताबों की दुकान में गई। वहाँ अचानक एक किताब उसकी निगाह में आई—”रिटर्निंग टू रूट्स”। उसने किताब उठाई और सोचा—क्या वो भी कभी लौटेगी? लेकिन क्या लौटने से सब पहले जैसा हो जाएगा?
उसने उसी वक्त तय किया, अगली छुट्टी में वो गाँव जाएगी। बिना बताए, बिना कारण के। बस ये देखने के लिए कि क्या वो बांस का पेड़ अब भी वैसा है? क्या चौपाल अब भी साँझ होते ही जिन्दा हो उठती है? और क्या सोनू अब भी वहीं बैठा होता है, मोबाइल में पुराना गाना बजाते हुए?
उसने अगली सुबह स्कूल में छुट्टी की अर्जी दे दी।
उधर गाँव में, सोनू अब भी उसी बांस के पेड़ के नीचे बैठता था। लेकिन अब वहाँ बैठने में बेचैनी नहीं थी, बस इंतज़ार था। उसने चिट्ठी भेजने के बाद कोई उम्मीद नहीं रखी थी, पर हर शाम जब हवा चलती, उसे लगता जैसे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा हो।
उसने भी खुद को थोड़ा बदल लिया था। अब वो खेतों के अलावा एक ऑनलाइन कंप्यूटर कोर्स करता था, और गाँव के बच्चों को ट्यूशन देता था। गाँव में लोग अब उसे “मास्टर सोनू” कहने लगे थे।
पर जब वो बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते थक जाता, तो वहीं बांस के पेड़ के नीचे बैठकर आँखें बंद कर लेता, और रमिया की आवाज़ कानों में गूंजने लगती—“सोनू, तुम हमेशा सोचते रहते हो, कभी कुछ करते क्यों नहीं?”
और अब वो सोच ही नहीं रहा था, कर भी रहा था। लेकिन कहीं दिल के कोने में अब भी एक ख्वाहिश थी—कि वो आए, एक बार, बस एक बार।
3
शाम के पाँच बज चुके थे। लखनऊ की सड़कों पर ट्रैफिक रेंग रहा था और आकाश में हल्का नीला रंग उतरने लगा था। रमिया अपने कमरे में बैठी चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी। उसे नहीं पता था कि इस बार गाँव जाना क्यों ज़रूरी लग रहा है। ये कोई त्यौहार नहीं था, ना कोई शादी, ना किसी की तबीयत ख़राब हुई थी। फिर भी दिल ने कहा—बस जाना है।
वो बहाना बना सकती थी, “स्कूल की थकान है, कुछ दिन छुट्टी चाहिए,” लेकिन उसे खुद से झूठ बोलने की जरूरत नहीं थी। वो जानती थी—इस बार गाँव सिर्फ मिट्टी की खुशबू के लिए नहीं, सोनू की आँखों के जवाब के लिए है।
ट्रेन की टिकट उसने उसी दिन बुक कर ली थी। जाने वाली तारीख थी—15 अगस्त। एक संयोग था या नियति, लेकिन वो आज़ादी का दिन था। और शायद यही वो दिन था, जब उसे भी किसी चुप्पी से आज़ाद होना था।
रमिया ने ट्रेन में बैठते वक्त एक बार फिर चिट्ठी पढ़ी। अब वो चिट्ठी कोई प्रेम-पत्र नहीं, एक दस्तावेज़ बन चुकी थी—उस रिश्ते का, जो कभी नाम नहीं ले सका। ट्रेन जब आगे बढ़ी, तो रमिया की धड़कनें भी उसी गति से तेज़ हो गईं।
उधर गाँव में, सोनू को इस यात्रा की भनक तक नहीं थी। वो अब रोज़ सुबह चार बजे उठकर खेतों में पानी देता था, फिर दिन में बच्चों को पढ़ाता। उसकी ज़िंदगी अब एक संतुलन पर टिकी थी—जहाँ ख्वाब भी थे, और जिम्मेदारियाँ भी।
बांस का पेड़ अब भी वैसा ही खड़ा था, लेकिन सोनू ने अब वहाँ बैठना कम कर दिया था। उसे डर लगता था—कहीं पेड़ के नीचे बैठा तो फिर वही पुरानी यादें उसे खींच न लें। लेकिन आज सुबह कुछ अजीब हुआ। एक बच्चा ट्यूशन से जाते-जाते बोला, “मास्टरजी, पेड़ के नीचे चलिए ना आज। आपकी कहानी अधूरी लगती है बिना उस जगह के।”
सोनू मुस्कुरा दिया, लेकिन अंदर कुछ चुभा। उस बच्चे को क्या पता, उस पेड़ के नीचे हर शाम कोई नाम पुकारा करता है जो आज तक जवाब नहीं आया।
दोपहर को जब खेत से लौटकर घर पहुँचा, माँ ने कहा, “कल रमिया आ रही है।”
सोनू का हाथ थम गया। “क्या?”
“हाँ, उसकी माँ का फोन आया था। दो दिन के लिए आ रही है गाँव में। शायद स्कूल में कुछ छुट्टियाँ मिली हैं।”
सोनू कुछ नहीं बोला। वो अपनी चारपाई पर बैठ गया। उसके सीने में एक हलचल होने लगी, जैसे कोई पुराना लय फिर से बजने लगा हो।
अगले दिन सुबह से ही गाँव में एक हलचल थी। स्कूल के बच्चे तक पूछने लगे, “रमिया मैडम कब आएँगी?” किसी को नहीं पता था कि वो सिर्फ अपने परिवार से मिलने आ रही थी या किसी पुराने रिश्ते से दोबारा मिलने।
रमिया दोपहर की लोकल बस से पहुँची। जब बस से उतरी, तो उसके कपड़े पर धूल की एक परत जम चुकी थी, लेकिन आँखों में चमक थी—जैसे कोई अपने आँगन में लौट आया हो। उसकी माँ ने गले लगाया और कहा, “तू थक गई होगी, चल खाना खा ले।”
रमिया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, लेकिन उसके कान कुछ और सुनने की कोशिश कर रहे थे। जैसे कोई आवाज़ उसे बुला रही हो—बांस के पेड़ के नीचे से।
शाम ढलने लगी थी। गाँव का आकाश सिंदूरी रंग में डूब रहा था। रमिया चुपचाप बाहर निकली। किसी से कुछ नहीं कहा, कोई बहाना नहीं बनाया। पाँव जैसे खुद-ब-खुद उस गली की तरफ मुड़ गए। वही गली, जहाँ उसकी परछाई अब भी वक्त के इंतजार में थी।
और वहाँ—पेड़ के नीचे—सोनू बैठा था। शायद किसी किताब में कुछ लिख रहा था, या यूँ ही पन्ने पलट रहा था। रमिया कुछ दूर तक चुप रही, फिर बोली, “अब भी यहाँ बैठते हो?”
सोनू ने सिर उठाया। उसके चेहरे पर कुछ क्षण के लिए अविश्वास था, फिर एक हल्की सी मुस्कान फैल गई। “तुम आ गईं?”
“हाँ,” रमिया ने धीरे से कहा। “तुम्हारी चिट्ठी अब तक संभाल कर रखी है। कभी-कभी पढ़ लेती हूँ। कुछ सवाल अब भी बाकी हैं।”
सोनू ने पन्ना बंद किया और कहा, “पूछो।”
“तुम अब क्या चाहते हो, सोनू?”
सोनू ने गहरी साँस ली। “पहले सोचता था तुम्हें। अब… अब खुद को भी। मैं चाहता हूँ कि मेरा काम हो, मेरी पहचान हो, और…”
“और?”
“अगर तुम चाहो… तो हमारे बीच का ‘शायद’ अब नाम ले सके।”
रमिया ने कुछ पल तक कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से बगल में बैठ गई। बांस की पत्तियाँ हिल रही थीं, जैसे हवा भी कुछ कहना चाहती हो।
“सपने अब भी पूरे हो सकते हैं, अगर हम साथ चलें,” रमिया ने कहा।
सोनू ने उसकी ओर देखा। पहली बार, वो ‘शायद’ जैसे मिटता दिखा।
और उस शाम, गाँव की आखिरी गली में, बांस के पेड़ के नीचे, दो पुराने ख्वाब फिर से साँस लेने लगे।
4
बांस के पेड़ के नीचे बैठना कभी इतना कठिन नहीं लगा था। लेकिन आज… आज हर शब्द सोच-समझकर बोलना पड़ रहा था, जैसे हवा भी जज बन बैठी हो। रमिया और सोनू आमने-सामने थे, दोनों के बीच कुछ मीठा, कुछ अनकहा और बहुत कुछ अधूरा पसरा हुआ था।
सोनू ने झुककर ज़मीन से एक कंकड़ उठाया और उंगलियों में घुमाने लगा, जैसे उस कंकड़ में कोई जवाब छिपा हो। “कभी-कभी लगता था तुमसे फिर मिलूँगा ही नहीं,” उसने कहा, नज़रें ज़मीन पर।
“और मुझे लगता था, तुम अगर चाहो तो कभी भी आ सकते थे,” रमिया बोली, और उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, सिर्फ सच्चाई थी।
सोनू ने एक हल्की मुस्कान दी। “जाने की हिम्मत नहीं थी। सोचा, अगर तुम भूल गई हो मुझे, तो क्या होगा? और अगर मैं भूल नहीं पाया, तो?”
“तुम्हारे चिट्ठी ने मुझे कभी भूलने नहीं दिया,” रमिया ने कहा। “तुमने उस एक पन्ने में सब कुछ कह दिया, जो मैं सालों से महसूस करती थी, पर कभी कह नहीं पाई।”
हवा हल्की-सी तेज़ हो गई थी, जैसे पेड़ भी उनकी बातों में शरीक होना चाहता हो। पास ही कोई बच्चा चिल्लाया, कोई साइकिल की घंटी बजी, लेकिन इन दोनों के बीच बस खामोशी थी—गहरी और समझदार।
कुछ देर बाद रमिया बोली, “याद है, कॉलेज के बाद जब मैं बीएड करने गई थी, तुमने कहा था—’तू शहर की लड़की बन जाएगी, फिर गाँव की गलियों में क्या मज़ा आएगा तुझे?’”
सोनू हँसा, “हाँ, और तुमने कहा था, ‘गाँव मेरा घर है, शहर तो बस नौकरी की जरूरत।’ तब नहीं समझ पाया था, लेकिन अब समझ में आया है कि ज़रूरत और अपनापन में फर्क होता है।”
“पर क्या ज़रूरतें कभी खत्म होती हैं?” रमिया पूछ बैठी।
“नहीं,” सोनू बोला, “लेकिन कोई हो, जो ज़रूरत के आगे तुम्हें थामे रखे, तो सब कुछ आसान हो जाता है।”
रमिया चुप हो गई। उसकी आँखें दूर कहीं देख रही थीं—शायद वो वक्त, जब उन्होंने एक-दूसरे को खोया था।
“तुम्हारे बिना वो शहर भी अधूरा था, सोनू,” उसने कहा। “बड़े स्कूल, बेहतर सुविधाएँ, पर कुछ भी अंदर नहीं छूता था। सब कुछ जैसे मशीन जैसा हो गया था। वहाँ बच्चे अंकों से नापे जाते थे, और यहाँ… यहाँ रिश्तों से।”
सोनू ने धीरे से उसका हाथ थामा। “अगर अब मैं कहूँ, कि इस बार मत जाओ… कि यहीं रहो, साथ रहो… तो क्या कहोगी?”
रमिया ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, लेकिन उनमें डर नहीं था।
“अब कुछ कहना नहीं चाहिए,” उसने मुस्कुराकर कहा, “अब सिर्फ करना चाहिए।”
अचानक उस पल में, वर्षों की चुप्पी जैसे टूट गई। ना कोई वादा हुआ, ना कोई प्रस्ताव—बस दो लोग, जिन्होंने वक्त के साथ अपना प्यार खोया नहीं था, अब फिर से अपने शब्दों को छू पा रहे थे।
शाम ढल चुकी थी। गाँव की गलियाँ अब धुँधली हो चली थीं, और चूल्हों से उठता धुआँ आकाश से बातें कर रहा था। रमिया उठी, “माँ इंतज़ार कर रही होगी, चलूँ?”
सोनू ने धीरे से सिर हिलाया। “कल मिलोगी?”
“ज़रूर,” उसने कहा। “कल शायद थोड़ा और पास बैठेंगे।”
वो चली गई, लेकिन उस जगह पर उसकी खुशबू रह गई। सोनू ने पहली बार महसूस किया, जैसे जिंदगी उसे एक दूसरा मौका दे रही हो।
रात में वो अपने कमरे में बैठा, मोबाइल पर वही पुराना गाना बजा रहा था—“छोटे छोटे शहरों से…”। लेकिन आज गाने की धुन में दर्द नहीं था, एक मीठी सी उम्मीद थी।
अगली सुबह रमिया स्कूल गई। पुराने स्कूल का माहौल वैसा ही था—टूटी खिड़कियाँ, उखड़ी दीवारें, पर बच्चों की चमकती आँखें सब कुछ भर देती थीं। बच्चे उसे देखकर दौड़ पड़े। “मैडम! आप आ गईं! हमें लगा आप फिर कभी नहीं आएँगी।”
रमिया झुककर बच्चों को गले लगाई। “मैं तुम लोगों को कैसे भूल सकती हूँ?”
उसने स्कूल के प्रिंसिपल से बात की। “सर, क्या मेरी ट्रांसफर वापस यहीं हो सकती है?”
प्रिंसिपल चौंके, “आप लखनऊ छोड़कर यहीं वापस आना चाहती हैं?”
“हाँ,” उसने कहा, “कभी-कभी कुछ फैसले करियर से ज़्यादा दिल से होते हैं।”
शाम को सोनू को खबर मिली। वो भागकर बांस के पेड़ तक गया, लेकिन रमिया वहाँ नहीं थी। वो सीधा उसके घर गया। दरवाज़े पर पहुँचते ही उसने दस्तक दी।
रमिया ने दरवाज़ा खोला। बिना कुछ कहे, वो सिर्फ मुस्कुराई।
सोनू ने पूछा, “क्या सच है?”
“हाँ,” उसने कहा, “मैं वापस आ गई हूँ… इस बार हमेशा के लिए।”
सोनू की आँखें भर आईं। और पहली बार, उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया—बिना किसी डर, बिना किसी ‘शायद’, बस एक सच्चाई के साथ।
और उस दिन, गाँव की गली में, बांस के पेड़ ने दो आत्माओं को फिर से जोड़ा—इस बार पूरी तरह से, बिना अधूरेपन के।
5
गाँव की सुबहें हमेशा से खास रही हैं—पंछियों की चहचहाहट, धुएँ की खुशबू, और दूर से आती मंदिर की घंटियों की आवाज़। लेकिन आज की सुबह कुछ और थी। हवा में एक ताजगी थी, जैसे बरसों बाद कुछ रुका हुआ बहने लगा हो। रमिया अब इस गाँव की हो गई थी—फिर से, पूरी तरह से।
उसके घर लौटने की खबर गाँव में आग की तरह फैल चुकी थी। कुछ लोग बोले, “इतनी पढ़ी-लिखी लड़की, लखनऊ छोड़कर वापस क्यों आई?” तो कुछ ने चुपचाप मुस्कुरा कर कहा, “जहाँ दिल हो, वहीं घर होता है।” लेकिन रमिया को किसी की परवाह नहीं थी। उसने अपने मन की सुनी थी, और वही उसके लिए काफी था।
सोनू अब पहले से ज्यादा व्यस्त रहने लगा था। बच्चों की ट्यूशन, खेत का काम और अब रमिया के साथ मिलकर एक योजना—गाँव में एक छोटी लाइब्रेरी खोलने की। “बच्चे किताबों से डरते नहीं, बस उन्हें किताबें मिलती नहीं,” रमिया ने कहा था, और सोनू ने तुरंत हाँ कर दी थी।
चौपाल पर बैठकर दोनों ने योजना बनाई। “स्कूल में जो पुरानी किताबें पड़ी हैं, उन्हें एक जगह इकट्ठा करते हैं,” सोनू ने सुझाव दिया। “और गाँव के जो पढ़े-लिखे लोग शहर में हैं, उनसे दान में किताबें मंगाते हैं,” रमिया ने जोड़ा।
कुछ ही दिनों में गाँव के एक खाली कमरे को रंगा गया, झाड़-पोंछ हुआ, और वहाँ लकड़ी की पुरानी अलमारियाँ सजीं। उसमें धीरे-धीरे किताबें भरने लगीं। बच्चों के लिए बाल कहानियाँ, युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा की किताबें, और महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, और आत्मनिर्भरता से जुड़ी पत्रिकाएँ।
रमिया ने पहली क्लास ली तो कुछ बच्चे सकुचाते हुए आए। “मैडम, यहाँ स्कूल नहीं है?” एक बच्चे ने पूछा। रमिया मुस्कुराई, “नहीं, ये खेल भी है और सीखना भी। यहाँ तुम जो चाहो पढ़ सकते हो।”
धीरे-धीरे बच्चों का विश्वास बढ़ा। वो आने लगे, बैठने लगे, पढ़ने लगे। रमिया कहानी सुनाती, सोनू उनका उच्चारण सुधरवाता। और कुछ ही हफ्तों में वो जगह गाँव की धड़कन बन गई।
पर किसी भी बदलाव को समय, धैर्य और विश्वास चाहिए। गाँव के कुछ बड़े-बुजुर्गों ने आपत्ति जताई। “लड़कियाँ यहाँ आकर पढ़ेंगी? घर का काम कौन करेगा?” रमिया ने विनम्रता से जवाब दिया, “अगर पढ़ेंगी नहीं, तो घर भी नहीं संभाल पाएँगी।”
कुछ महिलाओं ने पहले तो संकोच किया, लेकिन जब उन्होंने देखा कि रमिया ने सिर्फ किताबों की बातें नहीं की, बल्कि उन्हें सिलाई-कढ़ाई, बैंक में खाता खोलना, और मोबाइल चलाना भी सिखाया, तो वे भी जुड़ने लगीं। अब हर बुधवार गाँव की औरतें इकट्ठा होकर एक सत्र करतीं, जिसमें वे सीखतीं और एक-दूसरे से साझा करतीं।
सोनू इन सब में रमिया का साया बन गया था। वो कभी आगे बढ़कर नहीं आया, ना कभी कुछ जताया। वो बस वहाँ था—हर ज़रूरत पर, हर योजना में। रमिया जानती थी, उसके जीवन की स्थिरता अब सोनू में थी।
एक दिन की बात है, जब रमिया स्कूल से लौट रही थी, तभी गाँव की एक लड़की, ज्योति, उसके पास दौड़ती आई। “मैडम! मुझे आपके जैसी टीचर बनना है।” रमिया ठहर गई। “सच?” उसने पूछा।
“हाँ, आप जैसी, जो सिर्फ पढ़ाती नहीं, सुनती भी हैं। जो डाँटती नहीं, समझाती हैं।” रमिया की आँखें भर आईं। उसे पहली बार लगा कि उसका लौटना सिर्फ एक प्रेम की वापसी नहीं थी, ये एक उद्देश्य की ओर वापसी थी।
शाम को जब रमिया और सोनू बांस के पेड़ के नीचे बैठे थे, रमिया ने कहा, “सोनू, क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुमने कुछ खोया?”
सोनू ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, समय… लेकिन अब लगता है, समय लौट कर आया है, तुम्हारे साथ।”
“मुझे लगता था, शहर छोड़ना मेरे करियर का अंत होगा,” रमिया बोली। “लेकिन अब समझ में आता है, कुछ नई शुरुआतें शहर से दूर होती हैं।”
“और कुछ रास्ते घर की दहलीज़ से शुरू होते हैं,” सोनू ने जोड़ा।
रात को रमिया ने एक डायरी निकाली, जिसमें वो अपने अनुभव लिखती थी। उसने पन्ना खोला और लिखा—
“आज हमने गाँव की पहली लाइब्रेरी की नींव रखी। किताबों से ज्यादा उम्मीदें सजीं अलमारी में। सोनू अब सिर्फ नाम नहीं, मेरे जीवन का अर्थ है। और मैं? मैं अब सिर्फ रमिया नहीं, मैं अब आवाज़ हूँ उन बच्चों की, जो अब बोलने लगे हैं।”
उसने कलम बंद की, और खिड़की से बाहर देखा। गाँव की गली में अब भी कुछ लड़कियाँ किताबें लिए जा रही थीं, और आकाश में चाँद अपनी चुप हँसी हँस रहा था।
बदलाव धीरे आता है, लेकिन जब आता है, तो हर कोना रोशनी से भर देता है।
6
गाँव की लाइब्रेरी अब केवल एक कमरे तक सीमित नहीं रही थी। यह अब एक आंदोलन बन चुका था। हर उम्र, हर वर्ग के लोग अब वहाँ आते—कभी किताबें पढ़ने, कभी बहस करने, और कभी बस चुपचाप बैठने। रमिया और सोनू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कुछ पुरानी किताबों से शुरुआत लेकर गाँव की सोच में इतनी बड़ी लहर उठ सकती है।
लेकिन बदलाव जब आता है, तो वो केवल बाहर नहीं होता। भीतर भी बहुत कुछ बदलता है—रिश्तों की परिभाषा, जीवन की प्राथमिकताएँ और अपने होने का अर्थ।
एक दिन की बात है। रमिया एक काग़ज़ के ढेर को समेटते हुए बोली, “सोनू, तुम्हें क्या लगता है, ये जो हम कर रहे हैं… क्या ये काफी है?”
सोनू ने दीवार पर लटके पोस्टर की ओर इशारा किया—जिसमें लिखा था: “शिक्षा, सवाल पूछने की ताक़त है।”
“काफी का मतलब क्या होता है?” वह बोला, “हम जहाँ हैं, जो कर सकते हैं, वो कर रहे हैं। शायद किसी और के लिए ये छोटा हो, लेकिन ज्योति, बबलू, और पिंकी के लिए ये दुनिया बदलने जितना बड़ा है।”
रमिया ने धीमे से सिर हिलाया। लेकिन उसके भीतर कुछ और चल रहा था—एक नया सपना, एक नई योजना।
वह चाहती थी कि लाइब्रेरी अब सिर्फ किताबों की जगह न रहे। वह चाहती थी कि गाँव की लड़कियों के लिए एक ऐसा मंच बने, जहाँ वे अपनी आवाज़ खोज सकें, अपनी बात कह सकें, बिना डर, बिना हिचक। “हम एक ‘गर्ल्स क्लब’ शुरू करते हैं,” उसने एक दिन सोनू से कहा।
सोनू ने आँखें उठाईं। “गर्ल्स क्लब?”
“हाँ,” वह बोली, “जहाँ हफ़्ते में एक दिन लड़कियाँ आएँ, अपनी समस्याएँ साझा करें, जीवन के बारे में चर्चा करें। हम उन्हें आत्मरक्षा सिखाएँ, मासिक धर्म के बारे में खुलकर बात करें, और सबसे जरूरी—उन्हें यह विश्वास दिलाएँ कि वे सिर्फ बोझ नहीं हैं, वे बदलाव की वाहक हैं।”
सोनू ने कुछ देर सोचा। फिर कहा, “रमिया, तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो?”
“हाँ,” उसने मुस्कुराकर कहा, “मैं वही कर रही हूँ, जो मुझे बचपन में चाहिए था। बस उस वक़्त कोई रमिया नहीं थी हमारे लिए।”
अगले ही हफ़्ते, ‘कन्या संवाद’ नाम से क्लब की शुरुआत हुई। शुरुआत में सिर्फ पाँच लड़कियाँ आईं। संकोच से भरी नज़रों में बहुत कुछ दबा हुआ था। रमिया ने उन्हें चॉकलेट दी, मुस्कुराकर बोली, “आज बातों का दिन है। कोई किताब नहीं, कोई पाठ नहीं, सिर्फ बातें।”
धीरे-धीरे बातें खुलीं। एक लड़की ने कहा, “दीदी, घर में मोबाइल नहीं छूने देते।” दूसरी ने जोड़ा, “भाई को बाहर भेजते हैं पढ़ने, हमें नहीं।” तीसरी ने चुपचाप कहा, “मैं स्कूल नहीं जा पाई, अब भी सपना देखती हूँ।”
रमिया चुपचाप सुनती रही। फिर बोली, “तुम सबके सपनों को जगह देने के लिए ये क्लब है। यहाँ जो कहा जाएगा, वो सिर्फ यहीं रहेगा, लेकिन उसका असर हर घर तक जाएगा।”
इस पहल ने गाँव के कुछ कट्टर विचारधाराओं को चुभन दी। एक दिन चौपाल पर एक बुज़ुर्ग ने कहा, “अब औरतें भी चौपाल चलाएँगी क्या?”
सोनू वहीं था। वह शांति से बोला, “हाँ काका, जब बेटियाँ रोटियाँ सेंक सकती हैं, खेतों में काम कर सकती हैं, तो बात भी कर सकती हैं। बदलाव यही है।”
कुछ लोगों ने मुँह बिचकाया, लेकिन अधिकतर चुप रहे। और चुप्पी भी कभी-कभी स्वीकार का संकेत होती है।
एक शाम, रमिया गाँव की पगडंडी पर चल रही थी। पीछे से सोनू आया और बोला, “एक बात पूछनी है।”
“पूछो,” रमिया ने हल्के से कहा।
“अगर तुम लखनऊ में होती, और मैं तुम्हें वहीं मिलता, तो क्या हम तब भी ऐसे साथ होते?”
रमिया रुकी। “शायद नहीं। वहाँ हम एक-दूसरे के बीच शहर होते, दूरियाँ होतीं। लेकिन यहाँ… यहाँ हमारे बीच सिर्फ एक बांस का पेड़ है।”
सोनू हँसा। “और वो भी अब हमें पहचानने लगा है।”
अचानक, एक लड़की भागती हुई आई। “मैडम! हमें स्कूल में ‘नारी दिवस’ पर भाषण देना है। आप सिखाएँगी ना?”
रमिया ने उस बच्ची के सिर पर हाथ रखा। “बिलकुल। इस बार तुम्हारा भाषण सिर्फ शब्द नहीं होगा, वो पूरे गाँव की आवाज़ बनेगा।”
रात को रमिया ने डायरी में लिखा—
“आज गाँव की एक बच्ची ने मुझसे कहा, ‘मैडम, आप जैसी बनना है।’
शायद यही वो पल है, जब शिक्षक होने का अर्थ समझ आता है।
और शायद… सोनू के साथ होना भी अब सिर्फ प्रेम नहीं, साझेदारी है—बदलाव की साझेदारी।”
उस रात पहली बार चाँद कुछ और चमकदार लगा, और बांस की पत्तियाँ जैसे कह रही थीं—“चलो, दीवारों के पार कुछ रोशनी उगाएँ।”
7
गाँव में अब हर शनिवार की दोपहर कुछ अलग होती थी। कन्या संवाद क्लब की बैठकें गाँव के खाली पड़े सामुदायिक भवन में होतीं, जहाँ पहले शादी-ब्याह के आयोजन होते थे। अब वहाँ लड़कियाँ बैठती थीं, गोले में, चेहरे पर संकोच से ज्यादा उत्सुकता और दिल में सवालों से ज्यादा उम्मीदें।
आज की बैठक में रमिया ने एक नया विषय रखा था—“अपने लिए ख्वाब देखना क्या स्वार्थ है?” उसने सवाल पूछकर सबको चुप कर दिया।
“दीदी, जब हम अपने लिए सोचते हैं तो घर में कहा जाता है कि ये पढ़ाई-लिखाई की उम्र नहीं, काम की उम्र है,” रिंकी बोली।
“मुझे तो ये भी नहीं मालूम कि सपना होता क्या है,” एक लड़की ने कहा।
रमिया ने सबकी तरफ देखा और कहा, “सपना सिर्फ रात में आने वाली कोई तस्वीर नहीं होती, सपना वो होता है जो दिन में आँख खोलकर देखा जाए। और जो तुम्हें अंदर से हिला दे। जिसे पाने के लिए तुम हर डर से लड़ जाओ।”
सोनू पीछे बैठा चुपचाप सुन रहा था। अब वह क्लब का स्थायी हिस्सा बन चुका था, लेकिन कभी बोलता नहीं। सिर्फ देखता, नोट्स बनाता, जरूरत हो तो चाय-पानी का ध्यान रखता। उसका मौन अब समर्थन था।
बैठक खत्म होते ही कुछ लड़कियाँ उसके पास आईं। “मास्टर जी, आप भी तो कभी बाहर जाना चाहते थे ना? आपने सपना छोड़ा क्यों?”
सोनू कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “हर सपना मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता नहीं होता, कुछ सपने रास्ता बदल देते हैं।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि पहले मेरा सपना था शहर जाकर कुछ बड़ा करना। लेकिन फिर मैंने देखा कि अगर मैं यहीं कुछ कर सका, जिससे तुम जैसी लड़कियों की ज़िंदगी बदले, तो शायद वही मेरा असली सपना था।”
लड़कियाँ सोच में पड़ गईं। किसी ने पहली बार सुना था कि सपने कभी-कभी बदल भी सकते हैं, और फिर भी पूरे कहलाते हैं।
शाम को रमिया और सोनू बांस के पेड़ के नीचे बैठे थे। अब यह जगह उनका अघोषित ठिकाना बन चुकी थी। गाँव के लोग जानते थे, जब ये दोनों वहाँ होते हैं, तो वहाँ केवल बातें नहीं होतीं—वहाँ भविष्य की योजना बनती है।
रमिया बोली, “तुम्हें कभी लगता है कि हम ये सब करने के बावजूद भी समाज से हार सकते हैं?”
सोनू ने मुस्कुराकर कहा, “जो कभी मैदान में उतरे ही नहीं, वो हार नहीं सकते। और हम तो हर रोज़ मैदान में हैं।”
“पर ये लड़कियाँ… कभी-कभी मुझे लगता है, हम उन्हें सपने दिखा तो रहे हैं, लेकिन रास्ते पूरे नहीं हैं। उनके घरवालों की सोच, पैसे की कमी, और समाज की बंदिशें… क्या हम ये सब पार कर पाएँगे?”
“हर दीवार एक दरवाज़ा होती है, रमिया,” सोनू बोला। “हमारा काम है दरवाज़ा दिखाना। खोलना उन्हें होगा।”
उस रात दोनों ने मिलकर एक योजना बनाई—गाँव की 10 लड़कियों को ‘कम्युनिटी चेंजमेकर’ के रूप में प्रशिक्षित करना। उन्हें आत्मरक्षा, बेसिक फर्स्ट एड, बैंकिंग, साइबर सुरक्षा, और बाल अधिकारों की जानकारी देना। और फिर उन्हें अपने-अपने टोले में आगे बाँटना।
“अगर एक लड़की दस और लड़कियों को सिखाए, तो बदलाव गाँव के हर कोने तक पहुँचेगा,” रमिया बोली।
“और तब कोई दीवार इतनी ऊँची नहीं रह जाएगी जिसे लाँघा न जा सके,” सोनू ने जोड़ा।
अगली सुबह वे प्रिंसिपल के पास पहुँचे। गाँव के स्कूल को प्रशिक्षण केंद्र के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति माँगी। प्रिंसिपल पहले तो हिचकिचाए, लेकिन फिर मान गए।
सप्ताह भर गाँव में हलचल रही। माता-पिता को समझाना, लड़की चुनना, सामर्थ्य देखना, और फिर योजना के अनुसार सत्र चलाना। रमिया हर दिन ऊर्जा से भरी होती, और सोनू शांत होकर सब संभालता।
एक दिन प्रशिक्षण के दौरान, सोनू बाहर खड़ा बच्चों की लाइन देख रहा था, तभी रमिया उसके पास आई।
“थक गए?” उसने पूछा।
“नहीं, सोच रहा था कि कितना बदल गया है सब,” सोनू बोला।
“और हम?”
“हम भी,” सोनू ने उसकी ओर देखा, “पहले सोचते थे साथ होने के लिए शादी ज़रूरी है, अब समझ में आता है साथ का मतलब क्या होता है।”
रमिया ने उसका हाथ थामा। “पर क्या शादी नहीं करेंगे?”
सोनू चौंका, फिर बोला, “तुम पूछ रही हो?”
“हाँ,” उसने कहा। “अब मैं तुमसे वादा चाहती हूँ—कि चाहे हम इस गाँव में रहें, या शहर में, लाइब्रेरी में हों या खेत में—हम साथ रहेंगे। जैसे अब तक रहे हैं, बिना शोर, बिना प्रदर्शन।”
सोनू ने उसकी हथेली को कसकर पकड़ा। “मैं वादा करता हूँ। पर शादी भी होगी, और पूरे गाँव को बुलाएँगे। क्योंकि हमारे जैसे प्रेम को छिपाकर नहीं, दिखाकर जीना चाहिए।”
उस पल में, बांस की पत्तियाँ झनझना उठीं, जैसे वे भी ताली बजा रही हों। और हवा में गूँज उठी एक घोषणा—एक साझेदारी की, जो प्रेम से बड़ी थी, उद्देश्य से गहरी थी।
उस रात रमिया ने डायरी में लिखा—
“आज सोनू ने कहा, हमारा साथ प्रेम से भी बड़ा है।
शायद यही मेरी खोज थी—एक ऐसा साथी, जो मेरे ख्वाबों को बाँधे नहीं, उड़ने दे।
और अब जब मैं उड़ती हूँ, तो जानती हूँ कि ज़मीन पर कोई है जो मेरी वापसी का रास्ता रोशन रखेगा।”
8
गाँव की सुबहें अब कुछ और थीं—जैसे हर किरण एक नई कहानी कहती हो। सोनू और रमिया की जोड़ी अब सिर्फ एक प्रेम की मिसाल नहीं थी, बल्कि गाँव के बदलाव की धुरी बन चुकी थी। लोग अब उन्हें नाम से नहीं, काम से पहचानने लगे थे। “अरे वो रमिया दीदी और मास्टर सोनू, जिनकी वजह से हमारी बिटिया पढ़ रही है…” ऐसा हर चौपाल पर सुनाई देता।
कम्युनिटी चेंजमेकर योजना के छह हफ्ते पूरे हो चुके थे। दस लड़कियाँ अब आत्मविश्वास से भरी हुई थीं। वे अपने-अपने मोहल्लों में बच्चियों को सिखा रही थीं कि कैसे खड़े होना है, कैसे ‘ना’ कहना है, और कैसे अपने सपनों की बात घर में करनी है।
एक दिन शाम को रमिया क्लब की बैठक से निकल रही थी, तभी रिंकी दौड़ती हुई आई। “दीदी! आज मैं अपने पापा से कह आई कि मैं भी दसवीं के बाद पढ़ाई बंद नहीं करूँगी।”
“और उन्होंने क्या कहा?” रमिया ने सांस रोककर पूछा।
“पहले चुप रहे, फिर बोले—‘अगर दीदी तुम्हें पढ़ा रही हैं, तो जरूर कुछ अच्छा ही होगा।’”
रमिया के होठों पर मुस्कान फैल गई। ऐसे ही छोटे-छोटे पल थे जो उसकी थकान मिटा देते थे।
उसी शाम, सोनू और रमिया गाँव के पोखर के किनारे बैठे थे। वहीं, जहाँ एक समय लड़कियाँ घूंघट में सिर झुकाकर पानी भरती थीं। आज पास ही कुछ लड़कियाँ बैठकर हँसी-ठिठोली कर रही थीं—उनमें से कुछ वही थीं जिन्होंने क्लब में सीखा था कि हँसना पाप नहीं, अधिकार है।
“तुम्हें कभी डर नहीं लगा?” सोनू ने पूछा। “कि ये सब जो हम कर रहे हैं, कभी टूट सकता है?”
“डर तो हर रोज़ लगता है,” रमिया बोली। “लेकिन जब मैं इन लड़कियों की आँखों में वो चमक देखती हूँ, जो मैंने कभी खुद में नहीं देखी थी, तब लगता है, डर से बड़ा है विश्वास।”
सोनू ने चुपचाप उसकी तरफ देखा। “तुम्हें पता है, मैं अब खुद को तुम्हारे साथ पाकर बदल गया हूँ। पहले मैं बस ज़िंदगी जी रहा था, अब मैं ज़िंदगी बना रहा हूँ।”
“और मैं?” रमिया ने हल्के से मुस्कुरा कर पूछा।
“तुम अब मेरे हर फैसले का हिस्सा हो,” सोनू बोला। “और हम जो कर रहे हैं, वो सिर्फ गाँव को नहीं, मुझे भी बदल रहा है।”
अगले दिन, गाँव में जिला अधिकारी का दौरा था। स्कूल के बच्चों ने कार्यक्रम रखा था और ‘कन्या संवाद’ की लड़कियाँ भी पहली बार मंच पर बोलने वाली थीं। सोनू और रमिया दोनों ही मंच के पीछे खड़े थे, बच्चों का हौसला बढ़ा रहे थे।
जब रिंकी मंच पर गई और बोलना शुरू किया—“नमस्ते, मेरा नाम रिंकी है, और मैं पहले डरती थी बोलने से। लेकिन आज बोल रही हूँ क्योंकि किसी ने मुझ पर विश्वास किया…” तो भीड़ में सन्नाटा छा गया। उसके शब्द किसी मंत्र की तरह लोगों के दिल में उतरते गए।
कार्यक्रम के बाद, अधिकारी ने सोनू और रमिया को बुलाकर कहा, “आप लोगों ने जो किया है, वो अद्भुत है। क्या आप इस मॉडल को जिले के अन्य गाँवों में भी लागू करना चाहेंगे?”
सोनू ने रमिया की तरफ देखा। वो मुस्कुरा रही थी। “ज़रूर,” उन्होंने एक स्वर में कहा।
लेकिन यह सफर आसान नहीं था। जैसे ही बदलाव की लहर और तेज़ हुई, विरोध भी खुलकर सामने आने लगा। कुछ गाँववाले बोले, “लड़कियों को इतना मत उड़ाओ, वरना लौटेंगी नहीं।” कुछ ने यहाँ तक कह दिया, “इन दोनों ने गाँव के संस्कार बिगाड़ दिए हैं।”
एक रात सोनू के दरवाजे पर कोई पत्थर फेंक गया। सुबह रमिया के घर के बाहर कुछ फुसफुसाहटें थीं—“देखो, बिना ब्याह के कैसे घूमती है लड़के के साथ।”
लेकिन इस बार, ना सोनू चुप रहा, ना रमिया। उन्होंने गाँव की चौपाल में खुद बैठक बुलाई।
“आप सब हमें सालों से जानते हैं,” सोनू ने कहा। “क्या हमने किसी का नुकसान किया?”
“क्या किसी की बेटी को गलत रास्ते पर भेजा?” रमिया बोली। “या उन्हें डर से बाहर निकाल कर जीने की हिम्मत दी?”
सन्नाटा था। फिर एक बुजुर्ग महिला उठी और बोली, “जब मेरी पोती मुझे पहली बार कहानियाँ सुनाने लगी, तब मैं समझ गई, ये लड़की अब सिर्फ बेटी नहीं, दुनिया देखने की खिड़की है। और ये खिड़की तुम दोनों ने खोली है।”
तालियाँ बजीं। धीरे-धीरे माहौल बदल गया। जो लोग पहले सवाल उठाते थे, अब समर्थन में खड़े थे।
उस रात, रमिया ने डायरी में लिखा—
> “आज मुझे एहसास हुआ कि जब आप अपने हिस्से की रोशनी लेकर आगे बढ़ते हैं, तो अंधेरे खुद ब खुद रास्ता छोड़ देते हैं। सोनू अब सिर्फ मेरा प्रेमी नहीं, मेरा साथी है—बदलाव का, संघर्ष का, और विश्वास का।”
बांस के पेड़ के नीचे उस रात फिर से दो लोग बैठे थे—चुपचाप, शांत, लेकिन भीतर एक तूफ़ान के साथ।
सोनू ने कहा, “जब सब खत्म हो जाएगा—क्लब, लाइब्रेरी, ये शोरगुल… क्या तब भी हम यूँ ही बैठेंगे?”
रमिया ने कहा, “हाँ। क्योंकि जो बचेगा वो तुम और मैं होंगे। और हमारे हिस्से की ये रोशनी… जो हमने मिलकर जलाई है।”
9
गाँव की वही गली, वही बांस का पेड़, और वही धूल से भरी पगडंडी—लेकिन अब उनमें कुछ बदल गया था। अब इन रास्तों पर सिर्फ गुज़रा हुआ समय नहीं था, बल्कि भविष्य की परछाइयाँ थीं। एक बदलाव, जो किताबों से शुरू हुआ था, अब ज़िंदगी के हर कोने में अपनी जगह बना चुका था।
‘कन्या संवाद’ की दस लड़कियाँ अब खुद प्रशिक्षक बन चुकी थीं। एक समय जो केवल श्रोता थीं, वे अब वक्ता थीं। गाँव के दूसरे टोले, दूसरे मोहल्ले, यहाँ तक कि आस-पास के गाँवों से भी लोग आने लगे थे। रमिया और सोनू की जोड़ी अब एक मिशन का नाम बन गई थी।
आज गाँव में एक और विशेष दिन था—लाइब्रेरी का पहला स्थापना दिवस। पूरे गाँव को निमंत्रण दिया गया था। चूल्हों से पहले ही पकवानों की खुशबू उठ रही थी, बच्चे नहा-धोकर तैयार हो रहे थे, और मंच पर आखिरी तैयारियाँ चल रही थीं।
रमिया सुबह जल्दी उठकर साड़ी पहन रही थी। सोनू ने दरवाज़े पर दस्तक दी, “तैयार हो गईं?”
रमिया ने दरवाज़ा खोलते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ, आज तो हमारी किताब का पहला साल पूरा हुआ।”
“और हर पन्ना अब तक दिल से लिखा गया है,” सोनू ने कहा।
दोपहर होते-होते सामुदायिक भवन के बाहर भीड़ इकट्ठा होने लगी। लोग अपने बच्चों को लेकर आए थे, औरतें सज-धजकर आई थीं। मंच पर छोटे बच्चों का स्वागत नृत्य था, फिर ‘कन्या संवाद’ की लड़कियों ने प्रेरणादायक भाषण दिए।
और फिर बारी थी सोनू और रमिया की।
सोनू मंच पर गया, माइक थामा और बोला, “इस एक साल में हमने देखा कि सपने सिर्फ शहरों में नहीं पलते। यहाँ गाँव की धूल में भी ऐसे बीज हैं, जो सही देखभाल पाकर वटवृक्ष बन सकते हैं। आपने हमें जो साथ और भरोसा दिया, वो ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है।”
तालियों की गूँज में रमिया मंच पर आई। उसका चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था। “मैंने जब गाँव छोड़ा था, लगा था कि कुछ बनने जा रही हूँ। लेकिन जब लौटकर आई, तब समझ में आया कि कुछ बनने से ज़्यादा ज़रूरी है किसी के लिए कुछ कर पाना। ये लाइब्रेरी, ये क्लब, ये सब हम सबका है—हम सबकी आशा है।”
संध्या के समय, जब सब निबट चुका था और भीड़ लौटने लगी थी, तब सोनू और रमिया वापस बांस के पेड़ के नीचे आ बैठे।
सामने बैठकर रमिया ने धीरे से कहा, “सोनू, क्या अब हमें अपने रिश्ते को एक नाम देना चाहिए?”
सोनू चौंका नहीं। उसने बस सिर झुकाकर कहा, “मैं तो कब से तैयार था।”
“शादी?” रमिया ने आँखों में चमक लिए पूछा।
“हाँ, पर तुम्हारी शर्तों पर,” सोनू मुस्कुराया।
रमिया ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, “शर्त सिर्फ इतनी है कि हम शादी को कोई बंधन नहीं, साझेदारी बनाकर जिएँगे। जैसे अब तक जिए हैं।”
सोनू ने उसकी हथेली पर हल्की-सी थपकी दी। “मंज़ूर है।”
उन दोनों ने मिलकर शादी की तैयारी गाँव के बच्चों और लड़कियों के साथ की। कोई दुल्हन की साड़ी सजाने में मदद करता, कोई मंडप के रंग चुनता। पूरा गाँव इसमें शामिल था, जैसे ये सिर्फ दो लोगों की शादी नहीं, गाँव की जीत थी।
शादी के दिन बांस के पेड़ के नीचे मंडप सजा। गाँव की बुज़ुर्ग महिलाओं ने मंगल गीत गाए, बच्चों ने फूल बरसाए। पंडित ने पूछा, “कन्या पक्ष कौन है?” तो रिंकी आगे बढ़कर बोली, “हम सब हैं।”
सबकी आँखें भर आईं।
विवाह की रस्मों के बाद, जब सब खाना खा रहे थे, सोनू और रमिया एक किनारे बैठे थे, थके हुए लेकिन संतुष्ट।
“क्या तुम जानती हो,” सोनू ने कहा, “कि जब मैंने पहली बार तुम्हें स्कूल की ड्रेस में देखा था, तब ही मन बना लिया था कि अगर कभी ज़िंदगी में साथी चाहिए, तो तुम जैसी ही होनी चाहिए।”
रमिया हँसी, “और तुम? तुम जैसे लड़कों को तब मैं मूर्ख समझती थी, जो ख्वाब देखते थे पर कभी कहते नहीं थे।”
“अब तो कह दिया,” सोनू ने मुस्कुराया।
“हाँ,” रमिया बोली, “और अब मैं हर दिन तुम्हारे साथ वो ख्वाब देखना चाहती हूँ, जो दूसरों की आँखों में पलते हैं।”
उस रात, दोनों ने फिर बांस के पेड़ के नीचे बैठकर चाय पी। अब वहाँ कोई संकोच नहीं था, कोई चुप्पी नहीं थी। वहाँ सिर्फ दो दिल थे—जो प्रेम के साथ-साथ उद्देश्य में भी बंधे थे।
रात के सन्नाटे में पेड़ की पत्तियाँ सरसराईं, जैसे आशीर्वाद दे रही हों।
और रमिया ने डायरी में लिखा—
“आज हमने अपनी कहानी की अंतिम पंक्ति लिख दी—शादी। लेकिन ये अंत नहीं, शुरुआत है। अब हम साथ मिलकर न सिर्फ जीएँगे, बल्कि औरों के लिए भी रास्ते बनाते जाएँगे। ये प्रेम अब केवल हमारा नहीं रहा—ये गाँव की धड़कन बन चुका है।”
समाप्त




